सोमवार, मार्च 29, 2010

पाँच साल का राजा..?.

पाँच साल का राजा...श्री महाराज जी के प्रवचन से..|
किसी नगर में यह कानून था कि वहाँ पाँच साल के लिये ही राजा बनाया जाता था और फ़िर उस राजा को वैतरणी नामक नदी में
डाल दिया जाता था . नदी के पार भयानक हिंसक जीव जन्तुओं से भरा जंगल था . राजा को फ़िर से नगर में आने की इजाजत
नहीं होती थी और अंत में राजा भयानक मौत मारा जाता था . इसलिये उस नगर का कोई भी निवासी राजा बनने को तैयार नहीं
होता था . एक बार जब राजा का कार्यकाल पूरा हो चुका था और दूसरा कोई राजा मिल नहीं रहा था . एक चतुर आदमी वहाँ पहुँचा .
और पूरी बात सुनकर उसने कहा ठीक है मैं तुम्हारा राजा बनूँगा . नगर की प्रजा ने उसे खुशी खुशी राजा बना दिया .राजा बनते ही
उसने नगर के कुशल इंजीनियरों को बुलाकर नदी पर एक शानदार पुल बनवाया और फ़िर नदी के पार के जंगलों को काटकर एक शानदार महल बनाने का आदेश दिया क्योंकि अभी वह राजा था इसलिये उसका आदेश मानना मजबूरी थी .पाँच साल के अंदर ही उसने इधर से बढिया व्यवस्था उधर कर ली .पाँच साल पूरा होने पर जब उसे नदी में डाला गया .वह आदमी पुल पर चढकर अपने शानदार महल में पहुँच गया और आनंदपूर्वक रहने लगा...??
श्री महाराज जी कहते है कि पंचतत्वों से बने इस शरीर में तुम राजा की तरह ही हो..इसलिये समय रहते वह जतन कर लो कि जब म्रत्यु आने पर तुमको वैतरणी में फ़ेंका जाय तो तुम्हारे पास कोई अपना इंतजाम होना चाहिये .अभी तुम्हारे पास (मनुष्य शरीर) वह चीज है जिससे तुम स्वर्ग या उससे भी बङी स्थिति को प्राप्त कर सकते हो
अन्यथा समय निकल जाने पर साढे बारह लाख बरस में समाप्त होने वाली चौरासी लाख योनियों में पशु पक्षी कीट पतंगा या फ़िर अपने कर्मों के फ़लस्वरूप हजारों साल का नरक भोगना होगा..अभी तुम बहुत कुछ कर सकते हो ..अभी तुम सम्पूर्ण सुखों को देने वाले उस महामन्त्र का ध्यान करके बहुत कुछ बदल सकते हो..

विश्व को जीतना सरल है ,मन को जीतना कठिन है ??

विश्व को जीतना सरल है ,मन को जीतना कठिन है | श्री महाराज जी के प्रवचन से...
एक बार एक आदमी ने एक जिन्न को वश में कर लिया .जिन्न प्रकट हो गया..और बोला कि आज से में तुम्हारा
गुलाम हूँ पर मेरी एक शर्त है..कि मुझे लगातार काम करने की आदत है सो तुम्हें मुझे लगातार काम बताने होंगे और जैसे ही तुमने काम बताना बंद किया मैं तुम्हें मारकर खा जाऊँगा..उस आदमी ने खुशी खुशी मंजूर कर लिया..उसने सोचा कि मेरे पास ढेरों काम हैं और मुझे खूब ये फ़्री का नौकर मिला अब ये काम करेगा ..और मैं आनंद से मौज करूँगा..वह जिन्न को काम बताने लगा और जिन्न उन्हें चुटकियों में कर देता था.वह आदमी बङा खुश हुआ..लेकिन उसकी खुशी थोङे ही समय रह पायी..असल में जिन्न इतनी तेजी से काम करता था कि काम खत्म होने लगे और धीरे धीरे सब काम खत्म हो गये..अब तो उस आदमी को समझ में न आये कि जिन्न को क्या काम बताये..आखिर में उसे काम नहीं सूझा तो जिन्न उसे खाने को दौङा और वह आदमी जान बचाकर भागा .जिन्न उसके पीछे पीछे दौङने लगा..वह आदमी आकर एक साधु संत की कुटिया में गिर पङा और कहने लगा कि महाराज मुझे किसी तरह बचा लीजिये ..संत ने उसकी पूरी बात सुनी और कहा कि बस इतनी सी बात है..फ़िर उन्होनें कहा जैसा में कहूँ वैसा करना..तब तक जिन्न पास आ गया था ..उस आदमी ने संत की बतायी युक्ति से कहा कि हे जिन्न ये बांस जमीन में गढा हुआ है जब तक मैं तुम्हें दूसरा काम न बताऊँ इस पर चङो और फ़िर उतरो फ़िर चङो और फ़िर उतरो...जिन्न ऐसा ही करने लगा और थोङी ही देर में व्याकुल हो गया उसने उस आदमी से कहा कि अब मेरी कोई शर्त नहीं है..तुम जब काम बताओगे मैं बो काम करूँगा पर ये आदेश वापस ले लो.. वास्तव में हमारे मन की ठीक यही स्थिति है..मन जिन्न की तरह है..और जीव को कामों में उलझाकर मार रहा है
सतगुरु की बतायी युक्ति से ये वश में हो जाता है और तब उल्टा हो जाता है ..अभी तक जो जीव मन के कहे अनुसार नाच रहा था..अब मन उसका गुलाम होकर कार्य करता है और जीव अपार आनंद का अनुभव करता है ..क्योंकि वह सतगुरु की बतायी युक्ति से करोङो जन्मों की मन की इस दासता से मुक्त हो जाता है..वास्तव में यह साधारण कहानी नहीं है इसमें एक बेहद गूढ रहस्य छिपा है.यदि ठीक से विचार करो तो..??

ये मन सबसे बङा भिखारी है ??.

ये मन सबसे बङा भिखारी है .| श्री महाराज जी के प्रवचन से..|
एक राजा के पास एक बकरा था .राजा उस बकरे को बेहद चाहता था .एक बार उसने एलान किया कि जो भी उसके
बकरे को अफ़रा (खाने से इतना पेट भर देना कि कुछ भी खाने को जी न करे और खाने की तरफ़ देखने की भी इच्छा न हो ) लायेगा उसे बहुत सा सोना इनाम देंगे . बहुत लोग इनाम के लालच में बकरे को जंगल ले जाते और पूरे दिन बढिया बढिया पत्ते घास आदि खिलाते और शाम को ये सोचकर कि अब बकरा बेहद अफ़र गया है ,राजा के पास ले आते . बकरा अफ़र चुका है , इसके परीक्षण के लिये राजा थोङे पत्ते हाथ में लेकर बकरे के मुँह के पास लाता और अपने स्वभाव के अनुसार बकरा पत्तों की तरफ़ मुँह बङा देता और प्रतियोगी हार जाता . एक चतुर आदमी ने कहा कि वह राजा के बकरे को अफ़राकर लायेगा . वह बकरे को अपने साथ जंगल ले गया और हाथ में एक डंडा ले लिया , जैसे ही बकरा किसी चीज को खाने की कोशिश करता वह आदमी उसके मुँह में डंडा मार देता .
बेहद भूखा होने पर भी उसने बकरे को एकतिनका तक न खाने दिया .खाने की तरफ़ मुँह बङाते ही वह फ़ौरन उसके डंडा मारता..इससे डरकर बकरे ने भूखा होने के बाबजूद भी खाने की तरफ़ देखना भी छोङ दिया..शाम को
वह आदमी बकरे को लेकर राजा के पास पहुँचा और बोला कि इसका पेट भर चुका है..परीक्षण के लिये राजा ने पत्ते
बकरे के मुँह के पास किये तो मार की याद आते ही बकरे ने मुँह फ़ेर लिया..राजा ने कहा कि तुमने वास्तव में बकरे को अफ़रा दिया है..
वास्तव में हमारे मन की हालत ठीक ऐसी ही है इसे कितना ही खिलाओ ये त्रप्त नहीं होता है..ये सबसे बङा भिखारी है..अच्छी तरह जानते हुये भी कि बहुत की आवश्यकता नहीं है ये तमाम लोभ लालच में फ़ँसा रहता है और जीव को अंत में नरक में ले जाता है वास्तव में इसके चंगुल में ही फ़ँसकर जीव की ये दशा हो गयी..
जरा सोचो जब रात को हम आराम से लेटे होते हैं तब भी ये कल्पना से हमें तरह तरह के लोभ लालच में ले जाकर सपने दिखाता है कामी क्रोधी लालची इनसे भक्ति न होय . भक्ति करे कोई सूरमा जाति वर्ण कुल खोय .

मंगलवार, मार्च 23, 2010

नाम की महिमा

नाम की महिमा |
यहाँ नाम का अर्थ ढाई अक्षर के महामंत्र से है. वास्तव में जीव (मनुष्य) की अमरलोक से बिछ्ङ्ने के बाद काग व्रति हो गयी और ये अपना अमी आहार छोङकर विष्ठा रूपी वासना में मुंह मारता फ़िरता है .
सतगुरु इसे इसकी वास्तविक हैसियत बताते हैं. और काग से हंस बनाने के लिये महामन्त्र की दीक्षा देते हैं.ये दीक्षा हंसदीक्षा कहलाती है.इसका रहस्य ये है कि जीव सार और असार में फ़र्क जानने लगता है.हंस के बारे में सब जानते हैं कि वो दूध का दूध और पानी अलग कर देता है.यानी दूध पीकर पानी छोङ देता है.
इस नाम का जिन दोहों में जिक्र है.वे निम्न हैं.
कलियुग केवल नाम अधारा. सुमरि सुमरि नर उतरिहं पारा. तुलसी रामायण
महामंत्र जोइ जपत महेशू काशी मुक्ति हेतु उपदेशू
मन्त्र परम लघु जासु वश विधि हरि हर सुर सर्व. मदमत्त गजराज को अंकुश कर ले खर्व.
उल्टा नाम जपा जग जाना. वाल्मीक भये ब्रह्म समाना.
कहां लग करिहों नाम बङाई सके न राम नाम गुण गाईं
सबहिं सुलभ सब दिन सब देशा सेवत सादर शमन कलेशा (गुप्त है)
उमा कहूं में अनुभव अपना सत हरि नाम जगत सब सपना
औरऊ एक गुप्त मत ताहिं कहूं कर जोर शंकर भजन बिना ना पावे गति मोरि
नाम लेत भव सिन्धु सुखाहीं करहु विचार सुजन मन माहीं
पायो जी मेंने नाम रतन धन पायो ..मीरा
नाम रसायन तुम्हरे पासा..हनु..चालीसा
नाम लिया तिन सब लिया चार वेद का भेद बिना नाम नरके पढ पढ चारों वेद..कबीर
और भी बहुत से दोहे है.

सोमवार, मार्च 22, 2010

मोक्ष का द्वार कहाँ है

तुलसी रामायण मैं लिखा है ..
बड़े भाग मानुष तन पावा ,सुर दुर्लभ सद ग्रंथन ग़ावा । साधन धाम मोक्ष का द्वारा ,पाय न जेहि परलोक संवारा । सदग्रंथो मैं वर्णित देवताओं के लिए दुर्लभ ये मनुष्य शरीर हमे बड़े भाग्य से मिला है । ये पहली पंक्ति का अर्थ है और सामान्य है । लेकिन इसकी दूसरी पंक्ति गूड है । साधन धाम मोक्ष का द्वार ये शरीर है ।
इस शरीर से क्या साधन हो सकते है ?? और इसमें मोक्ष का द्वार कहाँ है ???
वास्तव मैं मोक्ष का रास्ता दसवें द्वार से होकर जाता है । हमारे शरीर के 9 द्वारों से हम परिचित है और इन्ही मैं हम वर्तते है... दो द्वार कानों के छेद है । म्रत्यु के उपरांत यदि आत्मा इन द्वारो से निकलता है तो विभिन्न प्रकार की प्रेत योनियों मैं जाता है क्योंकि शब्द कानो का विषय है और प्रेत आत्मा की पहचान शब्द से ही होती है । दो द्वार आँखों के छिद्र है इन से प्राण निकलने पर जीव कीट पतंगा योनियों मैं जाता है क्योंकि प्रकाश आँखों का विषय है और कीट पतंगों को प्रकाश से लगाव होता है ।
दो द्वार नाक के छिद्र है इनसे प्राण निकलने पर जीव हवा मैं रहने वाले पछियों की योनी मैं जाता है क्योंकि वायु नासिका का विषय है और पछि वायु मैं ही रहते है , एक द्वार मुंह का छिद्र है यहाँ से प्राण निकलने पर जीव पशुवत योनियों को प्राप्त होता है क्योंकि मुंह का कार्य सब प्रकार से शारीर का पोषण करना ही है और यही काम पशु भी करते है ।
एक द्वार लिंग या योनी का होता यहाँ से प्राण निकलने पर जीव जल जीवों की योनियों मैं जाता है क्योंकि इन इन्द्रियों से मूत्र के रूप मैं जल ही निकलता है । एक द्वार गुदा का होता है गुदा से प्राण निकलने पर जीव नरक को जाता है क्योंकि गुदा से विष्ठा के रूप जो गन्दगी निकलती है वह नरक के सामान ही होती है ..क्योंकि जीव इन्ही नो द्वारों मैं वरतता है इसलिए वह म्रत्यु के समय इन्ही से निकल जाता है और बड़ा कीमती ये मनुष्य शरीर व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है ।
मोक्ष का दसवां द्वार गुप्त है और इसी शरीर मैं है । अगर मनुष्य उसको जान ले और गुरु की बताई साधना कर ले तो वह फिर से मनुष्य जन्म का अधिकारी हो जाता है । और यदि साधना मैं थोड़ी ऊँचाई प्राप्त कर ले तो जन्म मरण के चक्कर से मुक्त हो जाता है ये दोनों ज्ञान ढाई अक्षर के महामंत्र से होते ही जिन्हे केवल सतगुरु से ही प्राप्त किया जा सकता है ।

मुक्ति का ज्ञान कुण्डलिनी ज्ञान से अलग है ??

आम तोर पर लोग साधू संतों आदि मैं अंतर नहीं कर पाते हैं । मैं इनके बारे मैं बता रहा हूँ ।
संत - ये सबसे बड़ी शक्ति होती है .इनसे ऊपर कोई शक्ति नहीं होती .संत शब्द सनत से बना है जिसका मतलव ही लगातार होता है .इनका केवल एक ही धर्म होता है सनातन धर्म .यानी संसार के किसी धर्म से इनको कोई मतलव नहीं होता है .इनका जन्म भी नहीं होता है ये प्रकट होते है । महत्वपूर्ण बात ये है की शास्त्रों वेदों से इनका कोई लेना देने नहीं होता है .इनके मत को संतमत कहते है .केवल परमात्मा का असली नाम यानी ढाई अक्षर का महामंत्र देकर ये जीवों का कल्याण करते है .आम पूजा नियम आदि से इनका कोई मतलब नहीं होता है ।
योगी -ये दुसरे नंबर पर होते है .इनकी साधनाएँ अनेकों प्रकार की होती है और योगियों के बहुत प्रकार होते है .कुछ योगियों को भगवान् भी कहा जाता है जैसे राम ,कृष्ण ,परुशराम ये ढेरों की संख्या मैं होते है .खास बात ये है के ये तीन लोक के दायरे मैं आते है और अविनाशी नहीं होते है यानी एक निर्धारित समय के बाद इनका रिटायर मेंट हो जाता है इनके अनेकों मंत्र अनेकों साधनाएँ होती है ।
महात्मा -ये तीसरे नंबर पर होते है .इनके भी अनेक प्रकार होते है इनकी भी अनेक प्रकार की साधनाएँ होती है उदाहरण के लिए कृष्ण को ,सूर्य को इन्द्र को भी महात्मा कहा जाता .दरअसल कोई आत्मा जब ऊंचाई को प्राप्त कर लेती है तो वो आत्मा से महात्मा हो जाती है फिर इनका रूपांतरण इनकी इच्छानुसार देवता आदि मैं हो जाता है । बहुत अच्छे कर्मों से भी देवता बना जा सकता है और इन्द्र आदि पदवी प्राप्त करके स्वर्ग आदि सुखों का भोग हजारों बरसों तक किया जा सकता है
सिद्ध -महात्मा से नीचे सिद्ध होते है कुण्डलिनी ज्ञान के माध्यम से ये सिद्धि प्राप्त कर लेते है और विभिन्न प्रकार के चमत्कार आदि दिखाकर ये वैभव भोगते है .इनकी सिद्धि का असर ख़त्म होते ही इनकी बेहद दुर्गति होती है.और बाद मैं नरक के अलावा इनका कोई स्थान नहीं होता है
एक बात और है संसार मैं सबसे अधिक प्रभावित लोग सिद्धों से ही होते है और उनके अधिक संपर्क मैं रहने बाले क्रियाओं मैं साथ देने वाले भी दुर्गति को प्राप्त होकर नरक मैं स्थान पाते हैं ।
बस इनसे नीचे कोई स्थान नहीं होता । संसारमैं जो लोग तमाम तरह के स्वांग रचकर विभिन्न पदवी आदि धारण कर लेते है उसका अलोकिक दृष्टि से कोई महत्व नहीं होता है
इनमें पुजारी ,भिछुक ,शास्त्रग्य ,भागवत वक्ता , प्रवचन करता , विभिन्न मतों का अनुसरण करने वाले ,ज्योतिषी ,तांत्रिक ,सन्यासी ,आदि किसी भी प्रकार का आत्म कल्याण करने मैं सक्षम नहीं होते है । और न ही कथा कीर्तन भागवत आदि सुनने से आत्म कल्याण होता है और न ही मुक्ति होती है ।
वास्तव मैं कोई भी धर्म हो कोई भी पूजा हो किसी भी जाती या देश का इंसान हो कुण्डलिनी ज्ञान और मुक्ति के लिए सहज योग के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है । ध्यान रखे कुण्डलिनी ज्ञान से मुक्ति कभी नहीं होती है । हाँ आत्मा अति दुर्लभ महानता को भी इस ज्ञान से प्राप्त कर सकती है और मनुष्य शारीर के रहते हुए वह इन्द्र आदि देवता की पदवी प्राप्त कर सकती है
पर मुक्ति का ज्ञान कुण्डलिनी ज्ञान से अलग है ??

सर्वजीत और कबीर साहेब

सर्वजीत और कबीर साहेब,|
आज से लगभग ५०० बरस पहले की बात है जब महान संत कबीर का प्रकटीकरण इस धरती पर हो चुका था कलियुग मैं अबकी बार ये संत आत्मा कबीर के नाम से प्रकट हुई थी . उसी समय काशी मैं सर्वजीत नामका एक महाविद्धान रहता है । सर्वजीत ने समस्त शास्त्रों का अध्ययन इस तरह किया था कि वो उसे मुंह जबानी याद थे वह किसी बात का जिक्र या बहस पूरे सबूतों के साथ देता था । वह एक वेळ पर सभी शास्त्रों को लादे रहता था और उस समय के विद्वानों को चुनोती देता था कि मैं सबसे बड़ा विद्वान हूँ मुझसे शास्त्रार्थ करो या फिर हार मानकर लिखो कि सर्वजीत मुझसे अधिक विद्वान है ।
बड़े बड़े विद्वानों को उससे हार माननी ही पड़ी । उन्ही दिनों सर्वजीत कि माताजी गंगास्नान करने के लिए गई और वहां उनकी मुलाकात कबीर साहेब से हुई । वो कबीर साहेव के ज्ञान से अत्यंत प्रभावित हुई और उनसे ढाई अक्षर के महामंत्र की दीक्षा लेकर आई थी ।
उन्होंने सर्वजीत से कहा की तुझे चाहे कितने ही शास्त्र क्यों न याद हो पर जो बात कबीर साहेब मैं है वो तुझमें छूकर भी नहीं गई ।
अहंकारी सर्वजीत को ये बात सीने मैं गोली की तरह लगी .वह अपने शास्त्रों से लादे वेळ पर सवार हुआ और कबीर के घर जा पहुंचा । कबीर साहेब उस समय घर पर नहीं थे दरवाजा उनके पुत्र कमाल ने खोला | सर्वजीत ने पूछा कबीर का घर यही है । कमाल ने उत्तर दिया..
कबीर का घर शिखर पर जहाँ सिल्बिली गेल..पिपीलिका रपटे जहाँ तू लादे है वेळ..?
सर्वजीत यह उत्तर सुनकर भन्ना गया उसने अपने समस्त ज्ञान का उपयोग किया पर इस प्रश्न का मतलब न समझ सका ।
तभी कबीर साहेब आ गए .सर्वजीत ने कहा मुझसे शास्त्रार्थ करो कबीर साहेब सरलता से बोले की मुझे शास्त्रों का ज्ञान नहीं है तब सर्वजीत बोला की मुझे लिखकर दो की तुम मुझसे शास्त्रार्थ मैं हार गए कबीर ने कहा की मैं पड़ा लिखा नहीं हूँ तुम स्वयं लिख लो मैं अंगूठा लगा दूंगा ..
सर्वजीत ने लिखा.. कबीर हारे सर्वजीत जीते.. कबीर साहेव ने उस पर अंगूठा लगा दिया । सर्वजीत ने घर आकर वो कागज़ अपनी माँ को दिखाया तो उस पर लिखा हुआ था.. कबीर जीते.. सर्वजीत हारे..
सर्वजीत हैरान रह गया कागज़ उसने स्वयं लिखा था .उसने सोचा की शायद जल्दी मैं गलत लिख गया हो .वो दुवारा कबीर के घर पहुंचा .दुवारा कागज़ लिखा और कबीर से अंगूठा लगवाया .फिर घर जाकर उसने कागज़ अपनी माँ को दिखाया तो उस पर फिर से लिखा हुआ था .. कबीर जीते सर्वजीत हारे..
अबकी उसने कागज़ बहुत ध्यान से लिखा था और पक्का यकीन से लिखा था.. उसका घमंड चूर चूर हो गया वो उलटे पाँव कबीर के पास गया और महात्मा कबीर के चरणों मैं गिर पड़ा .

शुक्रवार, मार्च 19, 2010

आत्म ज्ञान के तीन प्रमुख तत्व

जब कोई साधक पूजा उपासना से थोडा ऊपर उठाकर विशिष्ट ज्ञान के दायरे मैं आ जाता है तब अलग अलग संतों और संसार मैं प्रचलित विभिन्न मतों से उसे ज्ञात होता है के जो पूजा अब तक वह करता रहा है उसका कोई खास लाभ नहीं है । तब ज्ञान बुद्धि से उसे पता चलता है के संसार मैं तीन तरह के मत प्रचलित है ।
पहला अद्वैत ज्ञान - इसका अर्थ है के वो परमात्मा एक ही है और इसके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है सब तरफ वो ही वो है .वास्तव मैं ययः एक अकाट्य सत्य है पर इस सत्य को जान्ने वाला कोई विरला साधू ही होता है । अत्यंत दुर्लभ ये ज्ञान करोड़ों जन्मों की तपस्या के बाद मिलाता है इस ज्ञान को जानने वाले ६०० बरसों मैं गिने चुने संत ही थे जिनमें कबीर साहिब रैदास जी दादू जी पालतू जी मीराबाई रिहाई जी तुलसीदास जी रामकृष्ण परमहंस आदि हुए हैं मैंने कहा के ये अत्यंत दुर्लभ ज्ञान है जब तक आप को इस ज्ञान का कोई संत नहीं मिलता आप इस ज्ञान की कल्पना भी नहीं कर सकते है ।
VAISE जिन लोगों की रूचि इस ज्ञान मैं है उन्हे मई बता दूँ के आप कबीर का अनुराग सागर कबीर का बीजक आदि पद लें आप को उसमें पूरे उत्तर मिल जायेंगे ..वास्तव मैं कबीर का अनुराग सागर उन लोगो की आँखें खोलने के लिए पर्यत है जो मूर्ति पूजा को जाने क्या मानते है । १०० रूपये मूल्य की ये किताब आपके सोचने का तरीका बदल देगी और आप सब कुछ भूल कर किसी सच्चे संत की तलाश मैं निकल पड़ेंगे ।
दूसरा द्वैत ज्ञान है - इसका मतलब है के पुरुष और प्रकृति दो ही है । पुरुष अर्थात चेतन और प्रकृति अर्थात जड़ तत्व इसका सिधांत ये है के चेतन के होने से प्रकृति मैं क्रिया हो रही है । वास्तव मैं इस ज्ञान को जान्ने वाले भी दुर्लभ ही है क्योंकि इस ज्ञान को जान्ने वाला भी काल की पहुँच से ऊपर होता है क्योंकि ये सिद्धांत भी किसी देवी शक्ति या एनी शक्ति को नहीं मानता है फिर भी इसके संत अद्वैत के मुकाबले काफी अधिक होते है । जबकि ये संत आम आदमी को कभी शायद ही मिल पाए क्योंकि ये गुप्त साधना करना पसंद करते है और बहुत कम शिष्य बनाना पसंद करते है इसलिए ये ज्ञान भी दुर्लभ ज्ञान की SHRANI मैं AATA है ।
TEESARA ज्ञान TRAIT का है
पर्म्मात्मा प्रकृति और जीव इसी ज्ञान मैं बहुत सी पूजा पद्धिति आती है वास्तव मैं मैंने इसके लिए एक परिभाषा की तरह शब्दों का इस्तेमाल किया है इसकी वजह से आपको इनका मतलब समझने मैं दिक्कत हो सकती है ।
जैसे के साधारण भाषा मैं तरत को भगवन माँ शक्ति और जीव कहा गया है ...दुसरे ज्ञान मैं इसी पुरुष और प्रकृति से साड़ी स्रष्टि का उत्पन्न होना बताया गया है परन्तु उन्हें एक पहला आदमी पहली ओरत बताया गया है बिबले मैं इसको एडम और एव बताया गया है परन्तु वास्तव मैं सच कुछ और ही है ...हम लोग जिस ज्ञान की साधना करते है वह अद्वैत की साधना है । इसे ही सहज योग कहा जाता है इसमें सतगुरु द्वारा ढाई अक्षर का महामंत्र दे कर (जगाकर ) महाशक्ति से उसी तरह से कनेक्शन जोड़ दिया जाता है जिस तरह आप अपने घर मैं खम्बे से बिजली का तार जोड़ लेते है ।

लिया हुआ देना होगा

एक समय की बात है एक आदमी जिंदगी मैं पहली बार किसी महात्मा का सत्संग सुनने गया । वहां जाकर उसने सुना के हमें इस जीवन मैं जो मिला है वो हमारे पूर्व जन्मों के पुन्य से मिला है और केवल अपने परिवार के लिए ही सोचना परमार्थ नहीं स्वार्थ है ।
अर्थात अगर वह इस जीवन की तरह ही अगले जन्मों मैं होना चाहता है तो उसे परमार्थ के कार्य करने ही होंगे अन्यथा जब उसने बोया ही नहीं तो वो कटेगा कैसे ।
उस आदमी के दिमाग मैं यह बात बैठ गई । वो अगले जन्म मैं भी धन का सुख प्राप्त करना चाहता था क्योंकि उसका ये मन्ना था की धन से सुख पूर्वक रहा जा सकता है और धन बहुत सी समस्यायों का समाधान भी है ।
उसने अपने घर आकर ये घोषणा कर दी के जिसको भी अगले जन्म के लिए पैसा चाहिए वो मुझसे ले जय अर्थात कोई भी मुझसे इस जन्म मैं पैसा ले ले और अगले जन्म मैं लोटा दे जो इस शर्त पर तैयार हो वो पैसा ले जा सकता है ।
उसकी ये घोषणा सुनकर चार दोस्तों ने सोचा के चलो ये खूब पागल मिला है । जो इस जन्म मैं रुपया देगा और अगले जन्म मैं लेगा ये रूपया तो खूब फ्री मैं मिला समझो अरे अगले जन्म मैं पता नहीं ये कहाँ होगा हम कहाँ होगे ये हमें कैसे हमें पहचानेगा और फिर पता नहीं अगला जन्म होता भी है या नहीं ।
यही सोचकर वो ५०-५० ००० रूपये चारों ले आये के चलो ये खूब पागल मिला । उस आदमी ने उन चारों से कागज पर लिखवा लिया के वो ये रूपया अगले जन्म मैं देंगे । वो खूब ख़ुशी मनाते हुए आ रहे थे के तभी प्रभु की कृपा से एक लीला हुई ।
वो रात मैं जहाँ ठहरे थे वहां एक कोल्हू चलने वाले का घर था । रात का समय था जब उनको ये विलक्षण लीला दिखाई दी । उस टैली के घर एक भैंसा और एक वेळ था व्वो दोनों आपस मैं बाते कर रहे थे । प्रभु की लीला से उनको वे बातें यानि जन्बरों की बोली समझ मैं आने लगी । भंसा कह रहा था के इस तेली के मुझ पर दो चक्कर का ऋण और बचा है जैसे ही दो चक्कर पूरे होंगे मेरी मृत्यु हो जाएगी और मेरा ऋण ख़त्म हो जायेगा ..वेळ ने कहा तुम्हारी मुक्ति तो हो जाएगी पर मेरे ऊपर तो इसके ५० ००० रुपये निकलते है जब तक वो पूरे नहीं हो जाते मुझे इसका काम करना ही होगा फिर कुछ सोचकर वेळ बोला के एक उपाय और भी है वो यदि हो जाय तो ;यहाँ के राजा के हाथी के ऊपर मेरे ५० ००० रूपये है वो किसी प्रकार इसे मिल जाय तो मेरा ऋण भी चुक जाएगा ..
भैसा बोला कल राजा एक आयोजन करवाता है जिसमें कोई भी अपने किसी जानवर से यदि राजा के हाथी को मैदान छोड़कर भागने पर मजबूर कर दे तो राजा उसे इनाम मैं ५० ००० रूपये देता है यदि तुम किसी तरह राजा के हाथी को भयभीत कर दो और इस तेली को वो ५० ००० रूपये मिल जाए तो तुम्हारी भी मुक्ति हो जायेगी । वेळ को ये बात जाँच गई और वो भगवान् से प्रार्थना करने लगा के मेरे मालिक को इस बात की प्रेरणा हो के वो कल के मुकाबले के लिए मुझे ले जाए ।चारों दोस्त ये बात सुनकर चकित रह गए और वे बेहद भयभीत भी हो गए । उन्होंने इस बात की सच्चाई ज्जान्ने के लिए दूसरे दिन रूकने का निश्चय किया । के भैसा और वेळ की बातों का प्रमाण देखेंगे
दूसरे दिन जैसे ही भैसा के दो चक्कर पूरे हुए वो जमीन पर गिर पड़ा और मर गया । उधर तेली ने सोचा के मेरा भैसा मर गया है अब मुझे क्या करना चाहिए मुझे रुपयों की बहुत जरूरत है तभी उसके दिमाग मैं आया के यदि मैं अपने वेळ को राजा के हाथी से लडवा दूँ तो मेरी ये समस्या हल हो सकती है । ५० ००० रूपये से मेरे अनेकों काम हो जायेंगे यही सोचकर उसने हाथी से मुकाबले मैं अपने वेळ को लडवा दिया । अपनी मुक्ति का ख्याल रखकर वेळ पूरी ताकत से हाथी की तरफ बेहद गुस्से मैं दौड़ा हाथी उसका गुस्सा देखकर भोचक्का रह गया और दर कर भाग गया ।
तेली को ५० ००० रुपये मिलते ही व्वल का कर्ज उतर गया और वो भी गिरकर मर गया । अब तो उन चारों दोस्तों के छक्के छूट गए । लिया हुआ इस तरह चुकाना पड़ता है इसकी तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी । वो उलटे पाँव धनि आदमी के पास पहुंचे और कहने लगे के अपना रूपया वापस ले लो हमें नहीं चाहिए । लेकिन वो धनि आदमी अड़ गया के मुझसे तो तुम्हारी अगले जन्म की बात तय हुई है इसलिए रुपया मैं अगले जन्म मैं ही लूँगा । चरों दोस्त पछताने लगे के अब क्या करे ।
इसका रुपया न जाने हमें किस तरह अदा करना पड़े । फिर कुछ सोचकर उन्होंने उसी के गाव मैं एक तालाव बनवा दिया उस सुन्दर तालाब के चारों और उन्होंने सुन्दर सी वाटिका का निर्माण कराया और कर्ज के दो लाख रूपये पूरे खर्च कर दिए लेकिन इसके बाद वो एक एक डंडा लेकर चारों तरफ घूमने लगे वो किसी आदमी को तो दूर किसी पशु पक्षी तक को पानी नहीं पीने देते और न ही किसी को बाग़ मैं घुसने देते ।
उनकी चर्चा चारों और फेल गई और उस दानी आदमी के कानो तक भी पहुंची के चार आदमी एक सुन्दर बाग़ के मालिक हैं पर न तो वो बाग़ मैं किसी को घुसने देते हैं और न ही किसी को पानी तक पीने देते है ..वो आदमी भी उनके पास गया तो वो वाही चारों थे जिन्होंने उससे कर्जा लिया था उसने कहा के भाई तुम लोंगो को पानी क्यों नहीं पीने देते हो । ये सुनकर वो चरों वोले के हम एक शर्त पर तुम्हारी बात मान सकते है के तुम ये बात मान लो के ये बाग़ तुम्हारा हुआ और हमारा कर्जा चुक गया । फिर कोई भी इसका इस्तेमाल करे । थोड़ी नानुकर के बाद वो आदमी मान गया और वे कर्जे से मुक्त हो गए ।

गुरुवार, मार्च 18, 2010

सहज योग क्या है

वास्तव मैं सहज योग को समझने के लिए हमें चार घड़ों के दृष्टान्त को समझना होगा । मान लीजिये बारिश हो रही है और उसमें चार घड़े रखे हें । उनमें एक घड़ा तो बिलकुल सीधा रखा है दूसरा घड़ा थोडा तिरछा रखा है तीसरा घड़ा उल्टा रखा है और चौथा घड़ा सीधा है परन्तु फूटा है तो इनमें बारिश का पानी किस्में जायेगा । सीढ़ी सी बात है के सही और सीधे रखे हुए घड़े मैं । इसी प्रकार प्रभु की कृपा निरंतर बरस रही है पर हम घड़ों की तरह स्वभाव वालें हैं ।
कोई स्वभाव से तिरछा है तो उसे कृपा का थोडा ही अनुभव होता है । कोई उल्टा स्वभाव का है तो उसे बात समझ ही नहीं आती है । कोई फूटे घड़े के सामान है वो बात समझता तो है पर बात को अपने रोक नहीं पाटा है ।
जो सीधा घड़े के सामान है वो बात को ग्रहण करता है और उसका लाभ भी उठता है और मुक्ति पाने का अधिकारी भी होता है । वास्तव मैं सीधे घड़े से मतलव है के आत्म ज्ञान का महत्व समझ मैं आते ही सतगुरु के सामने समपर्ण हो जाना । शिष्य के समपर्ण होते ही उसे अलोकिक रहस्य्य समझ मैं आने लगते हैं लेकिन ये जब सतगुरु से तुम्हारा मिलना हो जय तभी संभव है । यहाँ मैं एक बात बता दूँ हरेक कोई सतगुरु नहीं होता । सतगुरु वाही है जो तुम्हारी आत्मा को प्रकाशित कर दें या तुम्हारा तीसरा नेत्र खोल दें य्यादी तुम्हें गुरु की शरण मैं आये हुए तीन महीने से अधिक हो गए और तुम बताये हुए तरीके से साधना भी कर रहे हो और तुम्हें कोई अनुभव नहीं हुआ तो तुम सतगुरु तो क्या किसी गुरु की शरण मैं भी नहीं हो । धर्म्ग्रिन्ठो मई इस बात को स्पष्ट कहा गया है के कलियुग मैं झूतेहें गुरुओं का बेहद बोलबाला होगा और जनता इनकी झूठी बातों मैं उलझ कर रह जाएगी । इसलिए यदि आपका गुरु सच्चा है तो अधिक से अधिक आपको तीन महीने मैं अलोकिक अनुभव होने लगंगे । मैं ऐसे साधको को जनता हूँ जिन्हें ११ दिनों मैं अनेक अनुभव हुए और वो भली प्रकार साधना करने लगे वास्तव मैं सहज योग उसी तरह से है जैसे आप बिजली के तार से कबले अपने घर मैं जोड़तें है और लाइट जलने लगती है

ज्ञान मार्ग की चार प्रमुख गतियाँ

वैसे तो ज्ञान मार्ग की अनेक गतियाँ हैं । परन्तु सुविधा के लिहाज से हम इन्हें चार प्रमुख भागों मैं बाँट सकते हैं । यहाँ ये बताना जरूरी है के मन और शारीर के अतिरिक्त जो अनुभव किसी ज्ञान द्वारा किये जाते है उन्हें अलोकिक ज्ञान कहते हैं । मन और शारीर से किया जाने वाला ज्ञान कर्म की श्रेणी मैं आता हैं .त्तुम्हारा कर्म ही तुम्हें अगले जन्मों मैं ले जाता है और जैसा कर्म होता है उसी आधार पर अगला जन्म होता है ..यहाँ ये बताना जरूरी है के आपका कर्म कितना ही अछ्छा क्यों न हो दुबारा मनुष्य जन्म ८४ लाख योनियों को भोगने के बाद ही प्राप्त होगा । आखिर इस मनुष्य शारीर मैं कुछ तो खास बात है जो देवता भी चाहते है के एक बार उन्हें ये मनुष्य शारीर मिल जय तो वे अखंड आनंद देने वाली मुक्ति को प्राप्त हो सकें ।
श्रीकृष्ण ने गीता मैं कहा है के हे अर्जुन मुक्ति ज्ञान से है अछ्छे कर्मों से मुक्ति कभी नहीं होती । अछ्छे कार्मों से तुझ्र स्वर्ग तो प्राप्त हो सकता है पर मुक्ति कभी प्राप्त नहीं होगी । जाहिर है ये मुक्ति बड़ी ऊंची चीज है .और मुक्ति के सामने स्वर्ग एकदम तुच्छ है ..इस लिए ज्ञान मार्ग को चार भागों मैं बांटा ग्या है
१_विहंगम मार्ग २_मकर मार्ग ३_मरकत मार्ग ४_मीन मार्ग
इनमें विहंगम मार्ग ही संत मार्ग होता है बाकि सब सिध्धों के मार्ग हैं । इसे ही सहज योग कहते है ।

कर्मों की गति और आत्मा

श्री महाराज जी कहतें हैं ...
भगवन श्रीकृष्ण अर्जुन को पूरा सृष्टिज्ञान बताते रहे पर जब अर्जुन ने कर्तव्य आदि के वारे मैं प्रश्न किया तो श्रीकृष्ण जैसा ज्ञानी भी ठिठक गया श्रीकृष्ण ने कहा की है अर्जुन ये कर्मों की गति वेहद कठिन है .सामान्य तौर पर इसको आजतक कोई समझ नहीं सका है ।
वास्तव मैं ये आत्मा न तो कुछ करता है और न ही कहीं आता जाता है फिर ये बड़े आश्चर्य की बात है के ये जीव रूप मैं कितने दुःख भोग रहा है । वास्तविक बात ये है के ये आत्मा अपने स्वरुप को भूल गया है और अपने आप को जीव मान बैठा है । जबकि सच बात ये है के आत्मा बहुत ऊंची चीज है ।
संत तुलसीदास ने कहा है
इश्वर अंश जीव अविनाशी , चेतन अमल सहज सुखराशी
वास्तव मैं ये आत्मा परमात्मा का ही अंश है । पर इसमें मैं उत्पन्न हो जाने के कारन ये सुख को छोड़कर घोर दुखों मैं आकर फँस गया । संत कभी न जन्म लेते है और न ही मरते है । वो सिर्फ जीव को इस मृत्य्लोक से निकलकर उसका वास्तविक परिचय बताते हैं और उसे सुखधाम तक जो की इस आत्मा का असली घर है जाने का तरीका और मार्ग बताते हैं । संतों का आगमन इसी हतु इस प्रथ्वीलोक पर होता है वर्ना तो वे अविनाशी लोक के निवासी हैं । जब अमरलोक से बिछड़ा जीव घोर दुखों और संकटों मैं प्रभु को याद करता है तो प्रभु उसको इन दुखों से मुक्त करने के लिए संत आत्माओं को इस लोक मैं भेजते है संत दुखी जीवों को दुःख से छुटकारा पाने का उपाय बताते हैं और हमेशा के आनंद का यानि मुक्ति का मार्ग भी बताते हैं । जिसे सहज योग के नाम से जाना जाता है
वास्तव मैं सहज योग न तो कुंडली जागरण को कहते हैं और न ही अस्तान्ग्योग और न ही प्रान्हायाम को और न ही किसी प्रकार के मेडिटेशन ध्यान को सहज योग कहते है और याद रखने योग्य बात ये है के सहजयोग के बिना मुक्ति हो ही नहीं सकती है इसका एक ही मत है और एक ही नाम है जिसे संतमत के नाम से और सहज योग के नाम से जानते हैं । वास्तव मैं ये ज्ञान गूढ़ है और हजारों बर्षों मैं प्रकट होता है और इसे सिर्फ संतों की कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है .

गुरुवार, मार्च 11, 2010

उस मुलाकात से मेरा पूरा जीवन बदल गया


मेरा नाम राधारमण है.मैं बहुत समय से ज्ञान की तलाश मैं भटक रहा था .इस के लिए मैंने कई योग धर्म ज्ञान ध्यान की किताबों का सहारा लिया .तथा मैंने कई धार्मिक गुरुओं का सत्संग भी सुना .मैंने आशाराम बापू से दीक्षा भी ली थी .बर्फानी बाबा का सत्संग भी लिया तथा कुछ समय भी उन के साथ गुजारा परन्तु मुझे लगा ki मेरी तलाश पूरी नहीं हो पारही है.उन्ही दिनों मेरे घर के पास राजीव भाई जो के अब मेरे गुरु भाई भी हैं.रहने के लिए आये .एक दिन जब मैं धुप मैं खड़ा था राजीव जी से मेरी पहली मुलाकात हुई.उस मुलाकात से मेरा पूरा जीवन बदल गया .दरअसल मेरी तरह राजीव भाई को अलोकिक ज्ञान के बारे मैं बहुत दिलचस्पी तथी .और उन्हें शास्त्रों वेड पुरानो और गीता रामायण का अछ्छा ज्ञान था .हमारी दिलचस्पी एक जैसी होने के कारन हमारी घंटों बातचीत होने लगी .उसी बात्चित्त मीन मुझे परमात्मा के गुप्त नाम का पता चला .जिस गुप्त नाम ?? के बारे मैं बहुत से धार्मिक ग्रिन्ठो मीन कहा तो गया है लेकिन उसको खोला नहीं गया है .तब ही मुझे परमपूज्य गुरुदेव श्री शिवानन्द जी महाराज परमहंस के बारे मैं पता चला .मेरी मा भी राजीव जी के पास सत्संग सुनती थी.उस समय तक हम लोंगों ने श्री महाराज जी के दर्शन नहीं किये थे। मेरी माँ को उनके दर्शन की बहुत इछ्छा थी.जैसे ही उनको ये विचार आया उसी रात जब माजी प्रभु का भजन कर रही थी उन्हें श्री महाराज जी के दर्शन हुए .मेरे लिए ये बहुत आशरी की बात थी .मुझे महाराज जी के साकार दर्शन की इछ्छा होने लगी .पर महाराज जी उस समय किसी अज्ञात स्थान पर थे.मेरे गुरुभाई राजीव जी ने उन्हें जल्द से जल्द मिलाने का वादा कीया । मई उस घडी की बेचईनी से प्रतीक्षा कर रहा था जब श्री गुरु महाराज जी के दर्शन होंगे । साथ ही मुझे वो गुप्त नाम जानने की बहुत इक्षा हो रही थी ??.जो प्रभु के दर्शन करवाने का एकमात्र नाम होता है.मेरी ये अभीलाषा दो महीने बाद पूरी हुई.
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