बुधवार, अप्रैल 28, 2010

कबीर और रजनीश

ऐसे और लोग भी हो सकते हैं जिन्होंने धार पार की बात कही हो पर मैं जिन दो के बारे में ठीक जानता हूँ वो हैं कबीर और रजनीश वैसे ये तुलना भी उचित नहीं हैं क्योंकि कबीर के समकक्ष रजनीश ठीक उसी तरह हैं जैसे सूर्य और दीपक..पर मैं यहाँ तुलना नहीं बात कहने का पैनापन पर जिक्र कर रहा हूँ और वैसे भी रजनीश ने बहुतों से उधार लेकर बांटा जिनमें कबीर सबसे ज्यादा देने वाले रहें होंगे..अब आप एक
विचित्र कथ्य देखे . कबीर ने कहा . काल काल सब कोय कहे काल न जानत कोय जेती मन की कल्पना काल कहावे सोय .
रजनीश ने इसी बात को यूँ कहा . नया निर्माण मत करो पुराना गिरा दो .इन तीन लाइनों का अगर सही अर्थ कोई समझ लें तो फ़िर जीवन में किसी ग्यान की आवश्यकता शेष न रहेगी
अब कबीर वाली बात लें जीव कल्पना से जुङा होने के कारण जीव उपाधि को प्राप्त है अर्थात ये कल्पना से अपने आप को मान बैठा है और निरंतर कल्पना में है इसीलिये जीवन मरण से जुङा है ये कल्पना क्या है तुलसी...ईश्वर अंश...अमल सहज सुखराशी .आगे की लाइन महत्वपूर्ण है जङ चेतन ग्रन्थ परि गयी जधपि मृषा छूटत कठिनई..ये जङ और चेतन की जो गांठ है ये मृषा यानी मिथ्या यानी झूठी यानी कल्पित है
अब सार जानिये कबीर तुलसी रजनीश यहाँ एक ही बात कह रहें
हैं . कबीर..कल्पना से बाहर आने की तरकीव खोज ले काल से परे
कालातीत जान सकेगा .रजनीश .संचित संस्कारों को ग्यान विशेष से नष्ट कर दे और नये पैदा मत कर ..सच्चाई जान लेगा . तुलसी .जङ चेतन की झूठी गांठ को खत्म कर दे फ़िर वही शेष रहेगा जो तू वास्तव में है..यानी चेतन अमल सहज सुखराशी . अब एक अजीव बात.. आप एक कल्पना करो कि हवाई जहाज का इंजन बस में लगा दो और शेष सिस्टम बस का ही हो तो बस उङने लगेगी..नहीं अगर बस को हवाई जहाज की तरह उङाना है तो प्लेन की अन्य तकनीक पुर्जों का भी इस्तेमाल करना होगा..तो आप मन माया (माना हुआ कल्पित ) में विचरण कर रहें
इसलिये सत्य नहीं देख पा रहे .
दूसरा उदाहरण ...जादू के खेल को हम कितनी दिलचस्पी से देखते हैं और वो जादू कैसे हुआ इसकी हमें बेहद उत्कन्ठा रहती है..लेकिन जादूगर के स्टाफ़ या उस जादू का मर्म जानने वाले को रहती है . नहीं क्योंकि उन्हें पता ही है कि इसकी वास्तविकता क्या है इसलिये तुम जब तक मन से कनेक्ट हो सच्चाई लाखों कोस दूर ही रहेगी लेकिन अमन होते ही वास्तविकता इस तरह सामने होगी जैसे पीछे मुङकर देखा हो और ये दुर्लभ नहीं है..हरेक जीव चोबीस घन्टे में इससे मिलती जुलती अवस्था से लगभग दो या तीन बार गुजरत्ता है पर तुम अपनी ही बात जान नहीं पाते .

रविवार, अप्रैल 25, 2010

क्या आपकी दीक्षा हुयी है ?

-- दीक्षा एक आदमी की हो सौ की हो हजार की अथवा
पाँच हजार की..दीक्षा के समय आपके सिर पर एक काला
कपङा या किसी भी गहरे रंग का कपङा होना चाहिये और दीक्षा स्थान पर पर्याप्त अंधेरा होना चाहिये...दीक्षा के
समय आपके दोनों हाथ की कोहनी किसी सहारा देने वाली चीज पर हों तथा एक एक उंगली कानों में तथा आंख और मुंह बन्द होना चाहिये..दीक्षा का समय एक घन्टा तक हो..दीक्षा वाले दिन किसी से मिलना जुलना नहीं चाहिये .
--मुक्ति या आत्मग्यान की दीक्षाएं अनेक नहीं है यह सिर्फ़
ढाई अक्षर के महामन्त्र से निर्वाणी ग्यान और हंसग्यान
की दीक्षा है इसको देने का अधिकार सिर्फ़ सतगुरु को ही
है..खास बात ये है कि इसमें जो नाम देते हैं उसको राम या भगवते वासुदेवाय इस तरह वाणी से नहीं जपते हैं बल्कि एक विशेष जगह ध्यान केन्द्रित करना होता है ..यदि आपने पूरे कायदे से दीक्षा ली है तो उसी दिन आपका ग्यान नेत्र खुल जाता है जिसे तीसरा नेत्र भी कहते है .कुछ जड प्रकृति के साधकों को एक महीने के अभ्यास में अंतरजगत के द्रश्य दिखने लगते हैं . इस दीक्षा का सबसे बङा लाभ ये है कि अब तक धर्मग्रन्थों में जो बाते आपको समझ में नहीं आती थी उनका बोध हो जाता है .
--दीक्षा का सबसे बङा लाभ ये है कि यदि आप किन्ही कारण वश साधना ठीक से नहीं कर पाये तो भी आप मनुश्य जन्म के अधिकारी हो जाते हैं और ये सिर्फ़ मुंहजबानी आपको भरमाया नहीं जाता आपको कुछ ऐसे अलोकिक अनुभव होते है जो आपकी समस्त शंकाओं का स्वयं समाधान करते है यदि आपको लगता है कि आपको अभी तक सतसंग से कुछ विशेष लाभ नहीं हुआ और आप ध्यान की ऊँचाई को पाना चाहते है जैसे शरीर से बाहर निकलना सूक्ष्मलोकों का भ्रमण करना तो आप सम्पर्क कर सकते है
यहाँ ये बात उल्लेखनीय है कि मैं नहीं आप को ये सब अनुभव कराऊंगा मैं तो सिर्फ़ आपको महाराज जी से
मिलवा दूँगा जिनसे मैंने ये सुर्ति साधना का दुर्लभ ग्यान पाया है . जय गुरुदेव की

शनिवार, अप्रैल 10, 2010

प्रिय इन्टरनेटी बन्धुओं ,मित्रों

प्रिय इन्टरनेटी बन्धुओं ,मित्रों
मैंने एक लेपटाप और नेट कनेक्शन (इसी होली पर ) महज इसलिये लिया था कि मैं अपने जैसे आध्यात्मिक विचारों वाले बन्धु बान्धवों से मिल सकूँ .जो जीवन को 100 बरस की वह पाठशाला मानते हों जिसमें हमें न सिर्फ़ इस भवसागर से पार होने का रास्ता खोजना है बल्कि उस स्कूल में दाखिला लेकर वह पढाई ( साधना ) भी पूरी करनी है. क्योंकि ग्यानीजन अच्छी तरह जानते हैं कि ये मानव देह हमें चार प्रकार की (अण्डज , पिण्डज , ऊश्मज ,स्थावर ) चौरासी लाख योनियों को जो कि लगभग साढे बारह लाख
साल में भोगी जाती है ,के बाद मिलता है .इतने कष्टों और इतने समय बाद मिले उस मानव शरीर को जिसके लिये देवता भी तरसते हैं . किस्से कहानियां लिखने पढने , चैटिंग सेटिंग करने , भोग विलास के रास्ते तलाशने , आलोचना समालोचना करने , मन और देह की आवश्यकता् पूर्ति (जो कभी पूरी नहीं होती ) हेतु लगाये रखना मेरे ख्याल से तो बुद्धिमानी नहीं है . सो इस हेतु क्योंकि ज्यादातर बुद्धिजीवी आत्माओं का अब इन्टरनेटी संस्करण और सम्पर्क ही उपलब्ध है और एक दूसरे का समय नष्ट किये बिना , चाय नाश्ते का कष्ट दिये बिना , सम्पर्क का इससे बेहतर साधन अभी तो कोई नहीं है . अपने इसी प्रयोजन हेतु मैंने कुछ प्रोफ़ाइल विभिन्न साइट
पर डाल दिये . पर इसके रिस्पाँस का जिक्र भी करना अखण्ड ब्रह्मचर्य को खतरे में डाल सकता है . सो हे अन्तर्जाल चक्रव्यूह के निपुण द्रोणाचार्यों मेरी मदद करो कि इस जाल पर उन लोगों का केम्प कहाँ लगा है जो सादा जीवन उच्च विचार , परमार्थ मुक्ति . ग्यान ,आत्मा ,परमात्मा जैसी बातों में भी दिलचस्पी रखते हैं . भला कर भला होगा को चरितार्थ करते हुये आप इतना तो कर ही सकते हैं .धन्यवाद . email -golu224@ yahoo.com या फ़िर satguru-satykikhoj.blogspot.com पर चिपका दें तो मेरे जैसे अन्य तलाशक भटकने से बच जांय .??

तप करने का अर्थ ये है कि...

शरीर और इन्द्रियों को तपाने से शक्तियों का संचय होने लगता है .तपाने या तप करने का अर्थ ये है कि मन को प्राण में और प्राण को परमात्मा में लगायें जब प्राण में प्राण का हवन किया जाता है तो प्राण में प्राण के संगत से प्राण सूक्ष्म होने लगता है तब इन्द्रियां शान्त होने लगती हैं .मन अपने दौङने की गति पर रुक कर चलता है तब बुद्धि में शुद्धता आने लगती है यानी प्राण व इन्द्रियों की गति समान होने लगती है . तब शुद्ध ध्यान परमात्मा की ओर चलता है और उस ध्यान से सारतत्व का बोध होने लगता है . लम्बा स्वर जो देर तक प्रतीत होता है . वह ध्वनि को प्रकट कर लेता है . सपेरा बीन में लगातार फ़ूँक मारकर ऐसी ध्वनि पैदा करता है तो सर्प मस्त होकर शरीर का ध्यान खो देता है इसी प्रकार शरीर रूपी बाँसुरी में जिसमें सात स्वर ऊपर की ओर और दो नीचे की ओर हो रहे हैं . उन दो नीचे वालों में एक सामने खुला , दूसरा नीचे मुख किये हुये है . ऐसी शरीर रूपी बाँसुरी में फ़ूँक मारता है तब इस शरीर रूपी बाँसुरी में वाक (वाणी ) पैदा हो जाती है जब स्वर निरन्तर ध्वनि करता है तब उस स्वर में ध्यान की संगति हो जाती है .

सुरति क्या है ?

जब अन्तकरण स्थिर होकर किसी ओर चलता है . यानी मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार एक होकर संगत की इच्छा करतें हैं . उसे सुरति कहा जाता है . उस सुरति से अंतर में देखो तो जीवात्मा का रहस्य मिल जाता है . जीव के रहस्य को जानकर पारब्रह्म परमात्मा का रहस्य या स्वरूप पहचाना जा सकता है . जीव कंठ देश में निवास करता है . जब साधक के ह्रदय में अभ्यास के द्वारा शान्ति की धारा बहने लगती है तब साधक शरीर का ध्यान न रखकर परमात्मा में निष्ठा करता हुआ संसार में विचरण करता है यानी सुरति के द्वारा अंतकरण में शून्यता प्रतीत होने लगती है तथा जगत निस्सार लगता है तब साधक अपने साधन में संगत होकर संसार में विचरता है . यही योगीजनों का क्रीङा रूप है ध्यान मनन चिन्तन सुमरण करता हुआ अन्य जीवों का भी उद्धार करता हुआ अन्दर बाहर विचरता है .

शून्य में हँस का जनम हुआ है

शून्य में हँस का जनम हुआ है जिस प्रकार आकाश में वायु की संभावना है तथा शरीर में जो परावाणी स्वतः अपना कार्य स्वांस को चलाने का कर रही है उसी प्रकार से बाहर जिह्वा के द्वारा बल देने पर वाक्य पैदा हो जाते है यानी शरीर के बाहर शून्य व्यापक ब्रह्म सर्वत्र समाया हुआ है . उससे ही शरीर में प्रवेश होने से " सो " तथा फ़ेंकने पर " हंग " शब्द उत्पन्न होते हैं . कहने का तात्पर्य यह है कि शून्य से ही स्वांसा " हँसो " का उच्चारण कर रही है . शून्य आकाश से प्राण में " हँस हँस " इस मन्त्र का उच्चारण करती हुयी स्वांस में बहती है . इस प्रकार से प्राणायाम का अभ्यास करने वाला पुरुष रात दिन
स्वांस प्रश्वांस के साथ 21600 जप सर्वदा करता है . सत्संग का आशय परमात्मा के संग से है चाहे वह परमात्मा की वाक द्वारा विवेचना करने में या समाधि द्वारा साक्षात्कार करने को ही सत्संग कहा जाता है . वह नाम या रूप के प्रसंग से परिपूर्ण हो यानी परमात्मा का निर्णय किसी भी भाव से किया जाय वह सत्संग ही है . ग्यानी पुरुष को चाहिये कि वह साधक की बुद्धि के आधार पर ही उसके मनन चिन्तन निदिध्यासन की उपेक्षा करे क्योंकि जीव में अलग अलग निष्ठा होती है .
भावनात्मक साधना को करता है और प्रतीक उपासना को ग्रहण करता है . साधना करने वाले की बुद्धि परीक्षा करके उसे वैसे ही परमात्मा का उपदेश करना चाहिये . बुद्धि मल विक्षेप आवरण से ढकी होती है जब यह आवरण हट जाते हैं तो
परमात्मा में स्वतः निष्ठा हो जाती है .

शरीरमें चक्रों की स्थिति क्या है ?

पाँच तत्वों से बने इस शरीर के अन्दर चक्रों का प्रतिपादन इस प्रकार है . शरीर में गुदाद्वार व लिंग के बीच " स्वाधिष्ठान चक्र " है . इसमें गणेश का निवास है . लिंगदेश में " मूलाधारचक्र " है . जिसमें ब्रह्मा का निवास है जो स्रष्टि की उत्पत्ति करता है . नाभि में " मणिपूरक चक्र " है . जिसमें शक्ति का निवास रहता है . यहाँ पर कुण्डलिनी भी चौबीस नाङियों के सहित निवास करती है .नाभि के ऊपर उदर में " अनाहत चक्र " है जिसमें पार्वती सहित शंकर निवास करतें हैं और संहारकर्ता की भूमिका निभाते है. और ह्रदय देश में कण्ठ के नीचे "विशुद्धचक्र " है . जिसमें विष्णु भगवान जो स्रष्टि का पालन करते हैं . वह इस क्षीर सागर में निवास करते हैं . कण्ठ पर जीव निवास करता है . जो शरीर को धारण किये हुये शरीर में
व्यापक है . मुख में कण्ठ के ऊपर तालु में एक छिद्र जो ऊपर की ओर गया है जिसे " ब्रह्मरन्ध्र " भी कहा जाता है . उसका द्वार ही "व्योमचक्र" है . जहाँ सरस्वती निवास करती है . दोनों भोहों के बीच में "आग्याचक्र" है . जहाँ गुरुदेव का निवास है .इसके ऊपर चोटी पर" सहस्रारचक्र " है जिसे सहस्रदल भी कहते हैं जहाँ हजार पँखुङियां है जिसके बीच में " हंग " नामक शक्ति रहती है . उसके ही प्रभाव से सारे शरीर में चेतना पहुँचती रहती है . " हंग " का बिम्ब पहले आग्याचक्र में पङता है जिसमें दो पँखुङी का कमल है . तिरछा बिम्ब पङने के कारण दो शब्द प्रकट हुये " हंग क्षंग " फ़िर उसका प्रतिबिम्ब नाभि पर पङा बीच में सभी चक्रों पर शब्द का ऐसा प्रताप हुआ कि सारे चक्रों पर शब्द प्रकट हो गया . चक्रों पर संयम करने से होने वाले लाभ क्या है ?
नाभिचक्र - नाङियों के ग्यान में पारंगत , शरीर की धातुओं का ग्यान , कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत . ब्रह्मपुर , वक्षस्थल - चित्त तथा शरीर स्थिर . कण्ठ - भूख प्यास पर विजय , जीव के स्वरूप को जानना .
तालू के छेद , व्योमचक्र - सूक्ष्म स्वरूप को जानना , इसमें प्रवेश होकर दसवें द्वार से होकर स्वर्ग तथा प्रथ्वी के बीच स्थित सभी सिद्ध लोगों को देखता हुआ लोक लोकांतरों में प्रवेश हो ब्रह्म में मिल जाता है .
आग्याचक्र , दोनों भोहों के बीच - त्राटक सिद्ध कर लेता है . सहस्रदलचक्र - आठों सिद्धियां , नौ निधियां , काफ़ी समय तक प्राण खींचकर समाधिस्थ रह सकता है .

संजीवनी विधा क्या है ?

जीव के स्थूल शरीर में जो सुषमना नाङी नाभि से लेकर टेङी मेङी नासिका तक आती है इसलिये इसे वक्रनाल भी कहा गया है . इसी नाङी में प्राण के द्वारा श्वसन हो रहा है उस प्राण के टेङी मेङी नाङी में टकराने से एक शब्द प्रतीत होता है . वह दो वर्णों वाला है .वह बाहर के शून्य अविनाशी अक्षर की संगति से प्रकट हुआ है और नाद में उसी में मिल जाता है जैसे घण्टी में हथौङा मारने पर घन्टी में एक शब्द प्रकट होता है और उसी पल ध्वनि रूप बनकर शून्य में पहुँच जाती है . वैसे ही उस स्वर में प्रवेश होने से इन्द्रियों में स्थिरता आ जाती है और उस स्थिरता के बाद शरीर का ध्यान तक नहीं रहता है .
तब जीव ध्वनात्मक सुरंग में प्रवेश होकर ब्रह्म से मिल जाता है यानी स्वर में जब ध्यान पहुँचता है उस समय ध्वनात्मक सुरंग प्रतीत होता है . तब वह विदेह सर्वत्र व्यापक सुरंग में विलीन हो जाता है . जो प्राण को उत्पन्न करने वाला तथा प्राण से भी परे प्राण का आधार ध्वनिमय विराट पुरुष का प्राण शब्द है . वह घट का शब्द नहीं तथा न वर्ण वाला है . वह सदा एकरस , विदेह तथा व्यापक अति सूक्ष्म एवं अति लम्बा लगातार होने वाला स्वर है . यहाँ पर यह भी कहना पङता है कि उसका ध्यान विराट पुरुष को ध्येय बनाकर करना होगा . उसका मरम सहज योग वाला है . क्योंकि तालू में जो ऊपर की ओर छिद्र गया है . वह एक रास्ता नासिका की इङा पिंगला नाङियों में मिल गया है और एक सीधा ऊपर की और
सहस्रदल कमल में तथा उसी से सटा हुआ एक सहज रास्ता दसवें द्वार से होता हुआ ऊपर की ओर धुर तक गया है . वही विदेह द्वार है . वहाँ से ही योगीजन ध्वनात्मक शब्द को पकङकर यानी प्राण में जो कंपन करने वाला है . निरन्तर तथा सनातन स्रष्टि का कारण है तथा प्राणों का प्राण है .
उसमें ध्यान लगाकर विराट पुरुष में लीन हो जाते हैं . ऐसी स्थिति हो जाने पर उसे काल नहीं मारता क्योंकि वह काल से भी परे विचरण करते हैं . काल समय को कहा गया है .समय सूर्य से उत्पन्न हुआ है . इसलिये वह देहमुक्त योगी सूर्य से भी परे लोकों में जाकर उससे भी आगे धुर तक जाता है तथा फ़िर वापस लौट भी आता है . वह इस प्रकार बार बार मृत्यु को प्राप्त होकर तथा पुनः जनम को धारण होने वाला मृत्यु तथा जनम के मरम को जानकर क्रीङा करता हुआ सारे बन्धनों से मुक्त एकरस निरन्तर सच्चिदानन्द भाव को प्राप्त हो जाता है . वास्तव में वही मेरा परम स्वरूप है . इसको पाकर सबको पाता है . इसे संजीवनी विधा , पारब्रह्म ग्यान आदि सनातन , विराट पुरुष के स्वरूप का माध्यम तथा बोध बताया गया है .

शब्द क्या है ?

सबद सबद सब कोय कहे , वो है सबद विदेह . जिह्वा पर आवे नहीं , निरख परख कर लेह .
शब्द का तात्पर्य है अक्षर यानी अविनाशी तत्व जो सदा रहने वाला है . जो जगत का कारण रूप है . वह शब्द ही सारी स्रष्टि लोक लोकांतरों तथा प्रथ्वी आकाश आदि का मिला हुआ गोल रूप सबसे घिरा हुआ आलोक प्रतीत होता है . वह ब्रह्माण्ड ही है
इसमें दो ध्रुव है . एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव के बीच एक ऐसा स्पंदन है . जिसमें अक्षर रूप ही स्पंदन है . यह शब्द दो प्रकार का है . वर्णात्मक , ध्वनात्मक . स्वांस लेने और छोङने में जो शब्द है वो वर्णात्मक है . ध्वनात्मक ध्वनिमय है . घन्टा में हथौङा मारने से एक ध्वनि पैदा होती है . वैसी ही ध्वनि इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में लगातार समायी हुयी है . जो ह्रदय भाव से लगातार प्रतीत होती है यानी तत्व बोध का मार्ग रूप है . आकाश का गुण शब्द है . इसलिये यह शब्द सब जगह आकाश होने के कारण समाया है . शब्द में सुरति के बांधने से सब प्रकार के ग्यान हो जाते हैं और यह अक्षर अविनाशी है जो कभी भी नष्ट नहीं होता है . शब्द के बारे में संतो ने भेद करके बताया कि एक शब्द घटाकाश में तथा एक आकाश में निवास करता है . जिसे निःअक्षर कहा गया है .
सबद सबद सब कोय कहे , वो है सबद विदेह .
जिह्वा पर आवे नहीं , निरख परख कर लेह .
शब्द का वाक्य सब लोग कहते हैं .परन्तु जो वास्तविक अक्षर है . वह विदेह है यानी शरीर के आखिरी सिरे पर प्रकट हो रहा है . जिसको देख और पहचान ले .जो जिह्वा पर नहीं आता और न ही वह घट वाले शब्द जैसा है . वह प्राण के वाक्य
से सूक्ष्म सर्वत्र समाया हुआ है . उसे ग्यानी ही जान सकता है . जिसे आँख खोलकर तथा कान के बिना प्रत्याहार से खुले रूप में ही प्रतीत होने वाला है . ऐसा वह सुन्न में तथा सुन्न के पार स्थित है . कुदरती काबे की तू महराब में सुन गौर से आ रही है धुर से सदा तेरे बुलाने के लिये क्यों भटकता फ़िर रहा तू ए तलाशे यार में रास्ता सहरग में है दिलवर पै जाने के लिये . कुदरत ने कावा रूपी शरीर दिया है . इसमें सुन . यदि तू उस शब्द को ध्यान से सुनेगा
तो जो उस धुर से यहाँ तक जो ध्वनात्मक शब्द हो रहा है . वह तेरे ध्यान पर पङ जायेगा और यह भी महसूस होगा कि वह विदेह शब्द धागे की तरह सम्बन्ध में किये हुये है . वह बुला रहा है .उससे मिलकर खुदा से मिल जा . जो साहरग का मार्ग दसवें द्वार से होकर गया है . उसमें निर्भय होकर रम जा . रास्ता तय होने में कोई समय नहीं लगता .उस परमात्मा का साक्षात्कार प्रवेश होने पर क्षण में ही हो जाता है . जहाँ पाँच तत्वों की गाँठ बनती है वहाँ जीव में चेष्टा होने लगती है . ब्रह्म में प्रीत न होकर बाह्य विषयों में आसक्ति है तभी तक विकल्प से उत्पन्न यह जगत दिखायी देता है . ब्रह्म में चित्त की स्थिरता होने पर केवल ब्रह्म ही दिखायी देता है . राग , द्वेश , काम ,क्रोध . लोभ , मोह , छह झूलों में झुलाकर ही ये काल क्रीङा कर रहा है .

शरीर का ध्रुव प्राण है . प्राण का केन्द्र आत्मा है .

शरीर का ध्रुव प्राण है . प्राण का केन्द्र आत्मा है . जब शरीर
की स्थिरता होती है तब प्राण का सूक्ष्म रूप साफ़ साफ़ प्रतीत
होने लगता है . जब वह प्राण का सूक्ष्म रूप ही जब जीव को
सुरति के द्वारा भाषने लगता है तब आत्मा का साक्षात्कार होने लगता है क्योंकि आत्मा प्राण से भी अति सूक्ष्म है .सूक्ष्म आत्मा में प्राण के प्रवेश होने पर प्रकाश होने लगता है .
सूक्ष्म द्रष्टि वाले पुरुषों द्वारा सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि से परमात्मा
देखा जाता है क्योंकि परमात्मा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है .
साधक सुरति पर सवार होकर अपने अन्तर में देखता है तथा
प्राण का अभ्यास करता है तब वह एक अदभुत ध्वनिमय शब्द को पाता है . वह ध्वनिमय शब्द देर तक अनुभव में आता है . तब वही लम्बा अभ्यास भूमा का रूप धारण कर लेता है . जो यह आत्मा से उसका स्वरूप पाँच स्वरूपों में आच्छादित किया गया तथा इसका स्वरूप विराटमय है . एक विराट प्रकाश का आलोक जिसमें पाँच महाभूत आकाश , वायु , जल प्रथ्वी , अग्नि आदि सम्मिलित है . यह पाँच कोष वाला है . प्राणमय , मनोमय , ग्यानमय , विग्यानमय , आनन्दमय पाँच कोषों में व्यापक स्वरूप वाला है .
ध्यान में-प्राण में प्रवेश कर प्राणमय कोष में , तब प्राण सूक्ष्म प्राण में अन्तःकरण होने के कारण मनोमय कोष में मन निर्मल- मन निर्मल हो तो ग्यानमयकोष में , स्वतः ग्यान का आनन्द , ग्यानमय कोष से विग्यानमय कोष में . इन चारों के बाद परमात्मा के वास्तविक सत्य सर्वत्र तथा निरन्तर
अविनाशी आनन्द मय कोष में पहुँचकर परमब्रह्म परमात्मा को भलीभांति पाकर आनन्दित हो जाता है .
परमात्मा ही शरीर रूपी वृक्ष पर जीव के साथ ह्रदय में बैठा हुआ है . साधक अभ्यास के द्वारा अन्तःकरण का एक भाव होकर एक दिशा में चलता है तब वही दिव्य नेत्र अन्तर ही ह्रदय में अपनी आत्मा के दर्शन करता है .
जब मनुष्य आत्मतत्व का दर्शन करने के अभ्यास में लग जाता है तब अचेतन शरीर आदि पदार्थों से उसका मोह छूट जाता है तब वह ग्यान नेत्रों के द्वारा अपने आत्म बल को देखता है .

परमात्मा का नाम क्या है ?

नाम - परमात्मा का नाम जिह्वा के द्वारा उच्चारण में आने वाला नहीं .जबकि सारे वर्ण उच्चारण में आते हैं . वह नाम ध्वनात्मक रूप वाला प्राण में निवास करता है जिससे वाणी आदि उत्पन्न हुयी . हम सारे नाम जानते हैं . राम ,कृष्ण , ईश्वर , खुदा ,गाड , बुद्ध ,परमात्मा , भगवान आदि को ही उस परमब्रह्मपरमेश्वर का नाम समझते हैं .
ब्रह्म राम ते नाम बङि , वरदायक वर दान .
राम चरित सत कोट मह , लिय महेश जिय जान . यह जो परमात्मा का नाम है वह राम से बङा तथा ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ है .
इससे यह सिद्ध होता है कि नाम कोई और है जो राम अक्षरों से भी विलक्षण है क्योंकि नाम के ही प्रभाव से राम के चरित्र को शिवजी ने सतकोट में ही जान लिया है . ऐसा वह नाम सबका वरदान तथा वरदाता है . ऐसा वह प्रभावशाली परमात्मा का नाम है .
जासु नाम सुमरति एक बारा , उतरहिं नर भव सिन्धु अपारा . राम नाम मनि दीप धरु , तुलसी भीतर बाहिरहु जो चाहिय उजियार . जीभ के आखिरी सिरे रखकर यानी प्राण के ध्वनात्मक नाम का दहलीज पर रखकर ध्यान करें तो अन्दर बाहर दोनों और उजाला हो जायेगा . ऐसा वह नाम गुण वाला है .

कम्पन ..वायव्रेशन को जानें .??

जो यह पढने सुनने या अनुभव में आने वाला सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है . वह दो ध्रुव वाला है . इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक ऐसा स्पंदन हो रहा है यानी ब्रह्माण्ड में एक कंपन वायव्रेशन हो रहा है . यह स्पंदन आत्मा के कारण ही ब्रह्म के होने से उत्पन्न हुआ है . जो सारे जल थल आकाश वायु प्रथ्वी सूर्य चन्द्र तारे लोक लोकान्तर इस परमात्मा के कंपन से गति कर रहे हैं . जैसे हवा की गति के कारण जल में लहर पैदा हो जाती है . यही स्पंदन जीवात्मा के शरीर में स्वांस की क्रिया को सक्रिय किये हुये है . इस स्पंदन में ही अक्षर की उत्पत्ति का होना
संभव है तथा शरीर में स्वांस के आने तथा जाने पर अक्षर प्रकट हो गयें हैं जिससे शरीर की सारी क्रियायें हो रही हैं . इस स्पंदन से ही वायु गति को धारण किये हुये है . स्पंदन में ही सुरति को प्रवेश किया जाय तो जिससे यह स्पंदन हो रहा है उसका कारण पारब्रह्म ही है .
उसका साक्षात्कार हो जाता है .यही स्पंदन पारब्रह्म के साक्षात्कार करने का माध्यम रूप है . जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में वह कंपन करता है . यानी स्पंदनमय है . इसके भय से ही सूर्य तप रहा है . प्राण गति कर रहा है . जिससे देवता दैत्य पशु पक्षी तथा कीट सभी लोकों में कंपन हो रहा है .
जो जीव भाव भाव को छोङकर शुद्ध चेतन अवस्था को पा जाता है जो जाग्रत सुषुप्त स्वप्न इन तीनों अवस्थाओं के परे तुरीय अवस्था में स्थित रहता है तथा भय निद्रा मैथुन आहार आदि में लिप्त नहीं रहता है . एवं जो अपने स्वरूप को पहचान लेता है . वह सीधा ब्रह्मरन्ध्र मार्ग से होता हुआ दसवें द्वार से निकलकर ब्रह्मालोक में जाता है .तथा जाने के पहले संकल्प के आधार पर स्थित हुआ पुनः उसी शरीर में आ जाता है ऐसा पुरुष जीवन मुक्त होकर जनम मरण से मुक्त शरीर में ही हो जाता है . विधाओं में परा विधा ही स्वरूप है जो मेरे में संगति करती है यह विधा सब विधाओ की माँ है क्योंकि यहाँ से ही तीनों प्रकार की वाणियाँ मध्यमा पश्यन्ति बैखरी प्रकट हुयी है . परा वाणी का एक सिरा शब्दों
को प्रकट करने वाला एवं एक सिरा बिन्दु पर रखा हुआ है . जब साधक इस परा विधा के अभ्यास के द्वारा शब्द में लीन हो जाता है तब वह परमात्मा के शुद्ध स्वरूप का साक्षात्कार कर लेता है . जब परमात्मा एक है तो उसका नाम भी एक होना चाहिये वास्तव में उस परमात्मा का नाम व स्वरूप एक ही है . जीव एक शरीर छोङने से पहले दूसरे शरीर की रूपरेखा में स्पर्श करता है . जब जीव देहाभिमान से रहित हो जाता है तब वह अपने अन्तर में पूरी तरह प्रवेश कर जाता है . ओंकार से शरीर की रचना हुयी है . ऊँ - यह ऊँ पाँच मात्राओं वाला है जिसमें तीन वर्णात्मक तथा चौथी सत्य एवं पाँचवीं मात्रा ध्वनात्मक रूप में है . जैसे अ उ म (ँ ) (ं ) आदि पाँच मात्राओं से मिलकर ऊँ की रचना हुयी है . अ से ईश्वर भाव उ से जीव भाव म से प्रकृति भाव अर्धचन्द्र से सत्य भाव नित्यता को दर्शाने वाला बिन्दु रूप व्यापक सर्वत्र परब्रह्म का विभुवत स्वरूप हैसाधक ऊँ को इस रूप में समझकर लम्बे स्वर से उच्चारण कर परमात्मा में निष्ठा रखता है तो मुझ परमात्मा को सर्वग्य को जान लेता है .
जव जीव अपनेपन के भाव को छोङकर शरीर से निकलने एवं प्रविष्ट होने की विधा में पारंगत हो जाता है तब उसे अलग होने में पल का समय नहीं लगता वह जनम मरण और मृत्यु को लाँघकर मुक्त रूप का साक्षात्कार कर लेता है उसकी इन्द्रियां अपने आप उससे संगति करती है . मुक्त पुरुष सम्पूर्ण ब्रह्माणड में अपनी अखण्ड शक्ति के साथ
विचरने लगता है . जनम मरण से रहित मुक्त आत्माएं संसार में निवास करती हैं

जीवात्मा का प्रमाण लिंग रूप में पाया गया है ??

जीवात्मा का प्रमाण लिंग रूप में पाया गया है . वह देखने में लिंग जैसा प्रतीत होता है . लिंग शरीर प्रकृति के साथ सम्बन्ध हो जाता है तो जनम मरण का चक्कर आरम्भ हो जाता है . इस जीवात्मा को अंगूठे के आकार वाला देखा गया है . जीवात्मा संकल्प के आधार पर आगे बङता है . योगी संकल्प से ही एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करता है . जब जीव आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है तब वह जीव भाव को त्यागकर अपने अविनाशी स्वरूप को प्राप्त हो जाता है . योग साधना रत साधक कुम्भक पूरक रेचक के अभ्यास के द्वारा ओंकारस्वरूप को पाता है . ओंकार को नाद में लय देखता है . ओंकार जब नाद में लय हो जाता है तब नाद प्राण की सूक्ष्मता का भाष करता हुआ बिन्दु रूप वाले एक रूप परमात्मा से मिले हुये बिन्दु में पहुँच जाता है बिन्दु के टूट जाने पर वह आत्मा में संगत होता हुआ जीव को अपने स्वरूप का दर्शन कराता है इसलिये उस तत्व को जानों जिससे प्राण नाद तथा अक्षर उत्पन्न हुआ है जिसे जानकर वह जीव ब्रह्म की संग्या वाला हो जाता है फ़िर वह अपनी इच्छा से आता जाता है .वह बन्धन मुक्त होकर आकाश की तरह सर्वत्र व्यापक रूप को धारण करता है .??

जीव की संरचना इस प्रकार की है .

जीव की संरचना इस प्रकार की है .
आकृति - तीन शरीर मुख्य है . स्थूल शरीर - बाह्य शरीर , ये कृतिम है और खोल या आवरण मात्र है .
सूक्ष्म शरीर - ये आता जाता है . और भोग और इच्छाओं या अन्य बहुत से प्रयोजनों के लिये आवरण धारण करता है .मत्यु के बाद यही जाता है .
कारण शरीर - जिस कारण हेतु ये शरीर धारण हुआ है वो कारण बीज में निहित है .
* इसके अतिरिक्त तीन शरीर और है पर वे योगियों के होते हैं . जीव इन तीन श्रेणियों को पारकर ही उन्हें जान सकता है और वह योग अवस्था कहलाती है .
स्थूल शरीर पाँच तत्वों का बना है . प्रथ्वी , जल , वायु , अग्नि , आकाश
शरीर में प्रथ्वी का अंश - त्वचा , हड्डी , नाङी , बाल , माँस हैं
जल का अंश - रक्त , वीर्य , पसीना , मूत्र , लार हैं
अग्नि का अंश - भूख , प्यास , आलस , नींद ,तेज हैं
वायु का अंश - चलना , बोलना , दौङना , फ़ैलाना , सिकोङना हैं
आकाश का अंश - काम , क्रोध , लोभ , मोह , भय , हैं
इनकी सहायक प्रकृतियां भी हैं तथा इस सम्बन्ध में ग्यानियों में मतभेद भी हैं पर एक नजर देखने पर इन मुख्य प्रकृतियों में कोई दोष नजर नहीं आता है .
नाभि में जो चक्र है उसमें शरीर की सारी नाङियाँ गुथी हुयीं है . उसमें संयम करने से शरीर के सारे व्यूह का ग्यान होता है . वक्षस्थल में कछुए की आकार की नाङी है . यहाँ साधक का चित्त और शरीर दोनों ही स्थिर हो जाते हैं . कण्ठ में संयम करने से अपने स्वरूप को जान लेता है तथा भूख प्यास से रहित हो जाता है .
जिह्वा के ऊपर जो कपाल में छिद्र गया है उसे ब्रह्माण्ड कहते हैं . उसमें संयम करने से साधक संसार सागर से उठकर स्वर्ग लोक तक विचरने वाले सिद्धों के दर्शन होते हैं क्योंकि ब्रह्माण्ड में वयान प्राण ( वायु ) विचरण करता है उससे सूक्ष्मता और हल्कापन आ जाता है . भगवान शंकर ने बताया कि जितनी योनियां एवं सूक्ष्म योनियां याने चौरासी लाख उतने ही आसन है . उनमें चौरासी श्रेष्ठ है . चौरासी में दस श्रेष्ठ हैं . दस में चार आसन मुख्य हैं .

दस मुद्राओं के बारे में जाने ??.

परमात्मा ने जैसे ब्रह्माण्ड की रचना की . उसी नमूना में मनुष्य शरीर की रचना की .
इच्छानि स्रष्टि - संकल्प द्वारा स्रष्टि करना ,जिसे योगी आज भी कर लेते हैं .
सासिद्धक स्रष्टि - इच्छानुसार शरीर बना लेना , मारीच हिरन बना .
मुद्राएं - परमात्म साक्षात्कार के लिये की गयी क्रिया अवस्था को मुद्रा कहतें हैं .
यह दस प्रकार की है .
1 - चाचरी - आँख बन्द कर अन्तर में नाभि से नासिका के अग्रभाग तक द्रण होकर देखना .
2 - खीचरी - जीभ को उलटकर ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचाकर स्थिर कर लें .
3 - भूचरी -परमात्मा का नाम ( हँसो ) अजपा जप को प्राण के मध्य ध्यान में रखकर मनन करना .
4 - अगोचरी - कानों को बन्द कर अन्दर की ध्वनि सुनना .
5 - उनमनी - द्रष्टि को भोंहों के मध्य टिकाना .
अन्य पाँच विशेष मुद्राएं है . उनका साक्षात्कार प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है .
1 - साम्भवी - जीवों में संकल्प से प्रवेश कर उनके अन्तकरण का अनुभव करना
2 - सनमुखी - संकल्प से ही कार्य होने लगे .
3 - सर्वसाक्षी - स्वयं को , तथा परमात्मा को सबमें देखना .
4 - पूर्णबोधिनी - जिसका विचार करता है उसकी पूर्ति तथा बोध पल भर में ही हो जाता है . एक ही जगह स्थित सम्पूर्ण जगत की बात जानना .
5 -उनमीलनी - अनहोने कार्य करने की सिद्धि .
.. भय उत्पन्न होने पर निसन्देह विनाश के गाल में पहुँच जाता है क्योंकि यह जीव के लक्षणों में संगति करता है . भय , निद्रा , मैथुन , आहार ,जब तक ये ह्रदय से बाहर नहीं होते तब तक वह परमात्मा की पूर्ण निष्ठा का दर्शन नहीं करता . हर जीव को मृत्यु का भय व्यापता है . इसी भय के कारण जीव मृत्यु को प्राप्त होता है . वरना तो जीव अविनाशी है .

अविनाशी अक्षर क्या है ?

वह शब्द जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में स्पंदन करता है सारी स्रष्टि
में समाया हुआ है .वह अविनाशी अक्षर ही स्वांस की आने
जाने की क्रिया को चलाता है तथा प्राण का कारण रूप है .
परमात्मा का अनुभव ध्यान , सुमरन, चिन्तन सुरति द्वारा
किया जाता है जब सुरति अक्षर में पूर्ण रूप से पहुँच जाती
है तब वह अक्षर से प्राण में और प्राण से सूक्ष्म भूमा में
पहुँच जाता है .
भूमा तत्व का उदाहरण - नींद में स्वप्न में आनन्द , इन्द्रियों
का आत्म बोध . साधक इन्द्रियों को स्थिर कर प्राण में अक्षर को जानता है अक्षर की संगत से वह बार बार अक्षर में ध्यान करता है ..तब अक्षर के घर्षण से भूमानन्द का अनुभव होता है वह भूमा आत्मा ही प्रथम पाद है .
आकाश अणुओं से भरा पङा है सुई की नोक के बराबर खाली स्थान नहीं है . उदाहरण - सूर्य के प्रकाश में दिखने वाले अणु परमाणु आदि . जिस प्रकार वाष्प से बिन्दु बनता है . बिन्दु से ध्वनात्मक शब्द उत्पन्न होता है तथा ध्वनात्मक से " हँसो " वर्ण का रूप धारण कर लेता है . जब प्राण से प्राण टकराता है तब एक झीना शब्द प्रकट कर लेता है .
आकाश अक्षर में स्थित है . आकाश का सूक्ष्म तत्व शब्द शून्यता चिन्ता मोह संदेह ये सारे गुण आकाश के ही हैं . जीव अपने को कर्ता मानता हुआ कार्य करता है इसलिये उसे
उसका भोग मिलता है . आत्म सुख में बाधा डालने वाली ये
विषय वासना ही है .??

आत्मा ज्योर्तिमय आनन्दमय है.. .

ओंकार को नेत पुकारा , यह सुन शब्द वेद से पारा . अंडा सुन्न में सैर करायी , सो वो शब्द परखिया भाई ..जो यह ओंकार शब्द है . वह वेद की वाणी से परे यानी उससे अलग है जिसमें प्रवेश होने से जो यह अंडाकार
ब्रह्मांड है उसमें पहुँच कर परमात्मा का दर्शन कराने वाला हैं जिसे विदेह स्थित में जानो . आत्मा सब भूत तत्वों में निवास करती है .
आत्मा ज्योर्तिमय आनन्दमय है . जब इन्द्रियां अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है तथा मन बुद्धि के निर्णय से शान्त हो जाता है और अहंग चित्त में स्थित होकर देखता है तब वह पराविधा को ही देखता है . जो वाणियों का माध्यम परावाणी है . वह आत्मा से ही उत्पन्न होती है जिस प्रकार आकाश का गुण वायु है आत्मा का गुण पराविधा है . बुद्धि आदि इन्द्रियों से सम्बद्ध होने के कारण आत्मा को साक्षी कहा जाता है . जब बुद्धि से अविवेक दूर हो जाता है तब आत्मा का साक्षीपन मोक्ष में बाधा नहीं डालता है .सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शून्य है क्योंकि ब्रह्माण्ड की आकृति शून्य जैसी गोल है . इससे सारी ही आकृतियां गोल है .सूर्य , चन्द्र , तारे
प्रथ्वी सभी शून्य जैसी आकृति वाले है .सभी अण्ड गोल वृक्ष पहाङ शून्य के समान प्रतीत होते हैं . अतः अण्ड पिण्ड ब्रह्माण्ड सब शून्य है . मन जब विचारों से शून्य हो जाता है तब समाधि में समा जाता है .

आत्मा के वारे में जानें ...know about your soul ??

आत्मा के वारे में जानें ...know about your soul..
आत्मा ( soul ) आकाश (sky )की तरह सूक्ष्म तथा सर्वत्र समाया हुआ है .आत्मा के स्वरूप का ग्यान होने पर जीव ( man ) अपने जीव होने के भाव को छोङ देता है . इसे (आत्मा ) जानकर जीव का स्वभाव आत्मा के समान न जनमने वाला न मरने वाला अविनाशी भाव हो जाता है . अविवेक अनित्य है यानि ग्यान होने पर नष्ट हो जाता है . ग्यान बिग्यान आत्मा के ही अधीन है . जिस प्रकार सर्वव्यापक आकाश में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड संगत पाता है . उसी प्रकार आत्मा ( soul ) भी आकाश की तरह इससे भी अति सूक्ष्म है . बिना आत्मा की संगति के शरीर( body ) चेष्टा नहीं पाता . आत्मा अपनी इच्छा से ही सिमट जाती है . शरीर का अस्तित्व नहीं रहता . शरीर के द्वारा ही वह ग्यान करता है . ध्यानावस्था में सुरति
के द्वारा स्वर में शब्द को पूरक कुम्भक रेचक स्थिति को पा जाता है ..फ़िर कुछ देर का अभ्यास वर्ण वाले शब्द को पार करके बिन्दु रूप में पहुँच जाता है. बिन्दु रूप में पहुँचकर वह बिन्दु परमात्मा(god ) में संगत पाता है . इस लिये बिन्दु (point ) के द्वारा ब्रह्म में मिलकर उस परमात्मा का साक्षात्कार ( interview ) करता है .
साधक इन्द्रियों को एकाग्र कर लेता है तथा सुष्मणा में प्रवेश करता है .तब सूक्ष्म शरीर सुष्मणा से ब्रह्मरन्ध्र में होता हुआ शरीर में ऊपर दसवें द्वार होकर आत्मा में लीन हो जाता है . इन्द्रियों के सब दरवाजे बन्द करें तब तन मन अन्दर ही जम जायेगा तथा दबाया हुआ मन ह्रदय में ही पङा रहेगा तब प्राण के द्वारा अक्षर का ध्यान करना चाहिये .जो प्राण तथा प्राण के परे भी है फ़िर ब्रह्मरन्ध्र से होता हुआ ध्यान को ऊपर की ओर ले जाकर परमात्मा में स्थिर कर दें जो परमात्मा सर्वत्र सर्वशक्तिमान प्रकाश स्वरूप आनन्द का भन्डार है . ऐसी स्थिति में योगी सुषमना से शब्द में मिलकर शरीर से निकल जाता है तथा परमात्मा का साक्षात्कार करता है . साधक जब ध्यानावस्था में स्थिति होकर अन्तःकरण को प्राण के समान सूक्ष्म तथा स्वच्छ बना लेता है तब वह वाणी से परावाणी का प्रत्यक्ष अनुभव कर उसमें लीन हो जाता है . उस परा में लीन होने पर वह एक ऐसी शक्ति ( power ) का अनुभव करता है जिसकी शक्ति से सारे संसार के जीव अपनी क्रिया कर रहे हैं तथा प्रकृति ( nature ) भी क्रीङा करती हुयी इसी जगत (world) में दिखायी देती है .यह सारे काम परमात्मा की सत्ता में ही क्रियावान है .साधक सुरति से पराशब्द का बोध करता है तो वह परा में प्रवेश होकर आत्मा का साक्षात्कार करता है .

बुधवार, अप्रैल 07, 2010

सब उपाय बेकार है भाई ..

सब उपाय बेकार है भाई ..निज अनुभव तोहि कहहुँ खगेशा .बिनु हरि भजन न मिटे कलेशा . कोऊ ना काहू सुख दुख कर दाता .निज करि करम भोग सब भ्राता .हरि व्यापक सर्वत्र समाना . प्रेम से प्रगट होत मैं जाना .
संत मत की द्रष्टि से ये दोहे अधिक कीमती नहीं है पर संसार की द्रष्टि से ये बहुमूल्य है क्योंकि संसारी जीव को सुख शांति की तलाश अधिक है इसलिये इन तीन दोहों में उसकी बहुत सी समस्याओं का हल छुपा हुआ है . निज अनुभव तोहि ..श्री शंकर जी ने गरुण से कहा है इसलिये इस दोहे को हल्का लेना कतई अक्लमंदी नहीं है . आप सोचिये शंकर जैसा देवता कह रहा है कि ये मेरा अनुभव है कि विना हरि भजन के कलेश नहीं कट सकते चाहे वह कितनी बङी हस्ती क्यों न हो..हरि भजन तो अपनी जानकारी में सभी करते है फ़िर कलेश क्यों नहीं कटते ..इसका अर्थ ये तो नहीं है कि शंकर झूठ बोल रहें हैं..सही बात ये है कि वो उस भजन की और इशारा कर रहे हैं जो गूढ है . गीता में श्रीकृष्ण ने जिस भजन की और इशारा किया ये उस भजन की बात है . शंकर भी मुक्ति हेतु इसी का उपदेश करते हैं . काशी मुक्ति हेतु उपदेशू , महामन्त्र जोइ जपत महेशू .
कोऊ ना काहू सुख दुख कर..जब हम सतसंगी भाई आपस में मिलकर चर्चा करते है और कोई निगुरा या बाहरी व्यक्ति हमारे वार्तालाप में शामिल होता है तो अक्सर ये बात अवश्य ही उठती है कि उसने उसके साथ ऐसा कर दिया उसकी वजह से उसको ये परेशानी हुयी ..ये ही प्रश्न लक्ष्मण ने राम से किया था कि प्रभो आप तो सब जानने वालें हैं फ़िर ये बतायें कि भाभी ( सीता ) किस बात का दुख भोग रही है . तब श्रीराम ने लक्ष्मण को यही जवाव दिया था . संत मत के लोग इसको बखूबी जानतें हैं कि कोई किसी के साथ कुछ नहीं कर रहा है. जीव परमात्मा के बनाये नियम के अनुसार अपनी करनी का ही फ़ल भोग रहा है .अच्छा है तो फ़ल ही है बुरा है तो फ़ल ही है .
हरि व्यापक सर्वत्र .......ये कितनी अजीव बात है कि हम रामायण आदि का अखंड पाठ आदि करते है अन्य कई तरह की उपासनाएं करते हैं पर रामायण की इस बात पर हमारा ध्यान ही नही जाता कि भगवान सब जगह हैं और प्रेम से प्रगट होते हैं .दरअसल इसके दो तरीके है एक तो भगवान से सतत प्रेम करना और दूसरा सबमें भगवान को ही देखना वास्तव में यह छोटी बात लगती अवश्य है पर है बङी चमत्कारिक . मेरी जानकारी में कई लोगों ने इस सूत्र का प्रयोग किया और बङे ही चमत्कारी नतीजे सामने आये .दूसरी बात ये भी है कि कोई माने तो, ना माने तो इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग है ही नही है क्योंकि आत्मा के स्तर पर सबमें वही परमात्मा ही है जब दूसरा है ही नही तो भेद किसके साथ हो .ना कुछ तेरा ना कुछ मेरा चिङिया रैन बसेरा .कितने शरीर बने बिगङे , कितने रिश्ते नाते बने बिगङे फ़िर भी तुम भरमाने वाले खेल मैं भरमाये हुये हो ...तमाशा देखने वाले तमाशा हो नहीं जाना . इसलिये ये सब उपाय बेकार है किसी सच्चे संत की तलाश करो उनसे प्रेम नाम (ढाई अक्षर का महामन्त्र ) विधिपूर्वक लो फ़िर तुम्हारी सारी तलाश खत्म हो जायेगी क्योंकि उसके पहले तथा उसके बाद न कोई था और न है और न होगा . एकोहम द्वितीयोनास्ति ,ना भूतो ना भविष्यति .
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...