रविवार, अगस्त 22, 2010

ग्वारी विलेज जहां आश्रम की शुरूआत हो चुकी है


आखिरकार वो दिन आ ही गया । जिसका हम महाराज जी । सतगुरु श्री शिवानन्द जी महाराज...परमहँसके शिष्यों को मुद्दत से इंतजार था । पहले महाराज जी फ़ोन भी अपने पास नही रखते थे । और प्रायः नहरआदि एकान्त स्थल या वनक्षेत्र में ही अक्सर रहते थे । इससे हम लोगों को महाराज जी के नित्यदर्शन और सतसंग लाभ आदि से वंचित रहना पडता था । जिससे सभी साधक एक बैचेनी महसूस करते थे । तब
महाराज जी के शिष्यों ने आग्रह किया ।महाराज जी कहीं एक छोटी कुटिया या छोटा आश्रम होना चाहिये । जिससे आपसे काफ़ी दूर से मिलने की आस ले के आया श्रद्धालु कुछ राहत महसूस कर सके । तब महाराज जी ने कहा । अभी नहीं । अभी स्थायी रूप से रहने का इरादा नहीं है । मैं राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ महाराज जी का लाडला होने के कारण पीछे पड गया कि महाराज जी सुबह शाम नित्य आपके दर्शन और सतसंग का लाभ हम बच्चों को कबसे प्राप्त होगा ? तब कुछ दिनों पहले महाराज जी ने आगामी क्वार महीने 2010 से स्थायी रूप से रहने की बात कही । लेकिन उन्होंने हम पर कृपा करते हुये एक मोबायल फ़ोन 0 96398 92934 रखना अवश्य स्वीकार कर लिया । इससे इतना फ़ायदा तो हो ही गया कि महाराज जी से किसी भी समय बात कर सकते थे । और उनके दर्शन हेतु उस स्थान पर जा सकते थे । खैर फ़िर भी हमें महाराज जी के एक निश्चित स्थान पर रहने का इंतजार अभी भी था । और आखिरकार महाराज जी ने
ग्वारी गांव में सघन वृक्षों के नीचे एकान्त स्थान में कुटिया बनाने की स्वीकृति दे दी । देखते ही देखते ट्रेक्टर
आदि से जमीन एक सी कराकर एक बीस फ़ुट लम्बी बीस फ़ुट चौडी कुटिया जिसे साधुओं की भाषा मेंबंगला कहते हैं । तैयार हो गयी । और शीघ्र ही उसके चारों तरफ़ फ़ूल आदि पेडों की बाड और गेट आदि बनाने का कार्य शुरू हो गया । उस स्थान पर बिजली और नल की बोरिंग पहले से ही मौजूद थी । आने जाने वालों की सुविधाओं का ध्यान रखते हुये महाराज जी ने आश्रम का स्थान मेन रोड से महज आधा किलोमीटर अन्दर समुचित रास्ते वाला ही चुना । उत्तर प्रदेश के जिला मैंनपुरी और जिला इटावा को आपस में जोडने वाली सडक पर । करहल तहसील और पूर्व मुख्यमन्त्री सपा मुखिया श्री मुलायम सिंह यादव का गांव सैफ़ई । इस आश्रम से लगभग चौदह किलोमीटर के अन्तर पर है । श्री मुलायम सिंह यादव का ग्रहनगर और क्षेत्र होने से मैंनपुरी से इटावा तक का अधिकांश क्षेत्र निर्माण और भव्यता के स्तर पर किसी अति आधुनिक शहर या विदेशी भूमि का अहसास दिलाता है । अति आधुनिक और चिकनी मजबूत सडकों का जाल पूरे क्षेत्र में बिछा हुआ है । सैफ़ई में हवाई अड्डा से लेकर उच्चस्तर के अस्पताल स्टेडियम और अन्य प्रकार की सुविधायें भी मौजूद है । जहां तक मेरी जानकारी है । सैफ़ई का विधुत उत्पादन उसी स्थान पर होता है । और चौबीस घन्टे बिजली रहती है । यह सब कहने का आशय यह है कि ना जानकारी वाले जो लोग मैंनपुरी को पिछडा क्षेत्र मानते हैं । यहां आकर चकाचौंध हो जाते हैं । मैंनपुरी से
इटावा के बीच में लगभग 55 किलोमीटर का अन्तर है । आगरा से मैंनपुरी और इटावा दोनों ही लगभग 125 किलोमीटर की दूरी पर है । मैंनपुरी से ग्वारी विलेज जहां आश्रम की शुरूआत हो चुकी है लगभग 18 किलोमीटर दूर है । इटावा से ग्वारी विलेज 37 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । दिल्ली से मैंनपुरी के लिये सीधी बस सेवा और रेल सेवा उपलव्ध है । कानपुर से भी सीधी बस सेवा उपलब्ध है । दिन रात चौबीस घन्टे के किसी भी समय इस स्थान पर पहुंचने में किसी प्रकार की दिक्कत और किसी प्रकार का भय नहीं है । फ़िलहाल आश्रम में और साधुओं के रहने तथा आने जाने वालों के ठहरने हेतु कुछ कमरों का निर्माण प्रारम्भ होने वाला है । और साथ ही कुछ ही दिनों में एक अलग आश्रम पर विचार चल रहा है ।
जिसका स्थान तय हो चुका है । जो लोग संत मत sant mat की आत्म दर्शन की परमात्मा से मिलाने वाली इस दिव्य साधना DIVY SADHNA का अनुभव करना चाहते हैं । वे महाराज जी सतगुरु श्री शिवानन्द जी महाराज...परमहँस के पास इस आश्रम में पहुंचकर ग्यान प्राप्त कर सकते हैं । परन्तु अच्छे परिणाम के लिये उन्हें कम से कम आठ दिन का समय लेकर आना होगा । मेडीटेसन या अन्य ध्यान साधनाओं का पूर्व में अभ्यास कर चुके साधक आठ दिन में दिव्य अनुभूतियों और समाधि का अनुभव आसानी से प्राप्त कर लेते हैं । ऐसा मेरा कई बार का अनुभव है । अंत में अपने सभी सतसंगी भाईयों और प्रेमीजनों को जय गुरुदेव की । जय जय श्री गुरुदेव ।

आत्म दर्शन के आध्यात्मिक विचारों का आदान प्रदान " करने हेतु

" जय जय श्री गुरुदेव " प्रातः स्मरणीय सतगुरु श्री शिवानन्द जी महाराज...परमहँस
मुख्य आश्रम - ग्वारी गांव । करहल । परमानन्द शोध संस्थान आगरा (उ .प्र .) भारत जिला - मैंनपुरी ।
Parmanand Research Institute Agra (u.p ) India ( मैंनपुरी इटावा रोड पर । बुझिया पुल से 6 km )
सम्पर्क- ( 0 ) 98087 42164 ( राजीव ) ( 0 ) 96398 92934 ( गुरुदेव )
blog- satguru-satykikhoj.blogspot.com shrishivanandjimaharaj.blogspot.com
निवेदन- समस्त विश्व समुदाय के भाई बहनों से निवेदन है कि हम विश्व स्तर पर दिव्य साधना DIVY SADHNA का एक "आध्यात्मिक मंच " का गठन करना चाहते हैं । जिसमें विश्व का कोई भी नागरिक अपनी भागीदारी कर सकता है । यह पूर्णतया निशुल्क और गैरलाभ उद्देश्य की "आपस में भाईचारा और आत्म दर्शन के आध्यात्मिक विचारों का आदान प्रदान " करने हेतु प्रारम्भ की गयी एक सीधी और सरल योजना है ।
उद्देश्य- आज के समय में विश्व में अनेकों मत और धर्म प्रचलित है । लेकिन अधिकतर लोग असन्तुष्ट हैं । प्रत्येक को अपने धर्म में अच्छाई और बुराई दोनों ही नजर आती है..लेकिन हमें इससे कोई लेना देना नहीं हैं । एक मनुष्य होने के नाते हमारे कर्तव्य हमारे अपने विचार क्या हैं..ये महत्वपूर्ण हैं । वास्तव में मनुष्य के रूप में हम एक ही है और सबकी आत्मा का एक ही धर्म है "सनातन धर्म "! आज अगर समाज के अंदर से बुराईयों का समूल नाश करना है तो इस विचार से ही , इस भावना से ही हो सकता है कि हम एक ही परमात्मा की संतान है । क्या आप मुझसे सहमत हैं । यदि हाँ तो हम अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिये क्या कर रहें हैं । हमारे ग्यान का अन्य
को क्या लाभ है और क्या लाभ हो सकता है ? इस पर एक "साझामंच " बनाने में हमारी यथासंभव मदद करें ।
यदि आप सहमत हैं तो कृपया निम्न जानकारी भरकर भेंजे और इसके अतिरिक्त आप कोई अन्य उत्तम विचार रखते हों तो कृपया अवश्य बतायें ।
आप का नाम...............................................माता /पिता का नाम..........................................
लिंग-स्त्री /पुरुष....................आयु................धर्म- यदि बताना चाहें............................................
विवाहित /अविवाहित /विधवा / विधुर .................................................................................
शहर /ग्राम...........................जिला.......................राज्य......................देश.......................
स्थायी पता .....................................................................................................................
वर्तमानपता.....................................................................................................................
कार्य /नौकरी / व्यवसाय....................................फ़ोन नम्बर,std कोड सहित.............................
मोबायल नम्बर...............................................
क्या आपने गुरुदीक्षा ली हैं......................यदि हाँ तो किस से....................................................
( अधिक गुरुओं से दीक्षा ली होने पर पाँच गुरुओं तक के नाम बताएं , जो आपको श्रेष्ठ लगे हों .)
1-.........................................................2-....................................................................
3-..........................................................4-...................................................................
5-...........................................................6-..................................................................
( क्षमा करें पर हमें और आपको भी ऐसे कई लोगों से वास्ता पङा होगा जो कई गुरुओं की शरण में जा चुके हैं और ये सच है कि जब तक सच्चे संत सच्चे गुरु न मिल जायं , हमें अपनी तलाश जारी रहनी चाहिये । कार्तिकेय जी ने कई गुरु किये थे , जब हम ग्यान को अक्सर थोङा ही समझते हैं तो अक्सर साधारण बाबा पुजारी आदि को गुरु बना लेते हैं और फ़िर अधिक समझ आने पर ऊँचा या पहुँचा हुआ गुरु बनाते हैं..ये उसी तरह है जब तक बीमारी कट न जाय हम डाक्टर बदलते रहते हैं.इस सम्बन्ध में अधिक जाननें के लिये ब्लाग देखें / फ़ोन करें / व्यक्तिगत मिलें ।
आपके गुरु ने जो मन्त्र दिया , उसमें अक्षरों की संख्या (गिनती ) कितनी थी. (मन्त्र न बताएं ).................
.......................यदि इस प्रश्न का उत्तर न देना चाहें तो कोई बात नहीं .
विशेष-इस प्रश्न का उद्देश्य मात्र इतना ही है कि आप संत मत sant mat के उस "महामन्त्र "को जानते हैं जो सिर्फ़ "ढाई अक्षर "का है और मुक्ति और आत्मकल्याण का इकलौता मन्त्र है और सतगुरु द्वारा दिये जाने पर बहुत जल्द प्रभाव दिखाता है.. सतगुरु कबीर साहेब मीरा ,दादू, पलटू , हनुमानजी ,बुद्ध, शंकरजी ,रामकृष्ण परमहँस ,तुलसीदास ,नानक वाल्मीक आदि ने जिसको जपा है और वर्तमान में भी कई संत जिसका उपदेश कर रहें है आप को उस मन्त्र का ग्यान है या नहीं ??
निम्न प्रश्नों का उत्तर हाँ या ना में ही दे , यदि नही देना चाहते तो भी कोई बात नहीं..हमारा उद्देश्य आपकोवास्तविक ग्यान से परिचय कराना ही है
1-दीक्षा के बाद आपको कोई अलौकिक अनुभव हुआ .हाँ / नहीं .............................
2-कितने दिन में हुआ..हाँ / नहीं.....................................................................
3-आपने सूक्ष्म लोकों या लोक लोकांतरों के भ्रमण का अनुभव किया या नहीं..हाँ / नहीं................
4-आपको प्रकाश दिखता है या नहीं...हाँ / नहीं...................................
5-आप मानते हैं मुक्ति जीते जी ही होती है मरने के बाद नही..हाँ / नही..................
6-आपको चेतन समाधि का अनुभव हुआ ..हाँ / नहीं ...................................
7-आपका ध्यान कितनी देर तक लग जाता है.. 1 घन्टे 2 घन्टे 3 घन्टे........................................
8- अन्य कोई अनुभव, यदि हो-......................................................................................
...................................................................................................................................
9-आपका कोई सुझाव-...................................................................................................
................................................................................................................................
................................................................................................................................
10-जो बात इस संदेश में आपको पसंद न आयी हो-...............................................................
.................................................................................................................................
विनीत-
समस्त " परमानन्द शोध संस्थान " साधक संघ
विशेष- हमारा उद्देश्य न तो किसी प्रकार का विवाद फ़ैलाना है और न ही किसी व्यक्ति या धर्म को ठेस पहुचाँना है ।
बल्कि हमारा उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों और साधकों से परिचय तथा संवाद करना है जो हमारी जैसी आत्म दर्शन की सोच रखते है तथा आत्मकल्याण हेतु सुरती शब्द साधना ,सहज योग या राजयोग साधना कर रहें और अन्य जीवों को चेताने में विश्वास रखते हैं ..फ़िर भी यदि किसी को कोई बात आपत्तिजनक लगती हो तो कृपया हमें Email करें । हम आपकी भावनाओं का सम्मान करते हुये अपनी कमीं अवश्य दूर करेंगे ।
golu224@yahoo.com ...satguru555@yahoo.com ....rajeevkumar23096@yahoo.com
बुरा जो देखन में चलया , बुरा न मिलया कोय ,जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय ।
कबीर सब ते हम बुरे, हम ते भले सब कोय , जिन ऐसा कर बूझिया मित्र हमारा सोय ।
धन्यवाद

शनिवार, अगस्त 21, 2010

हनुमान जी का जन्म


बहुत कम लोग ये बात जानते होंगे कि हनुमान जी का जन्म कैसे हुआ . श्री रामचन्द्रजी के पदस्पर्श से पत्थर से औरत बनी अहिल्या हनुमानजी की नानी थीं .और गौतम रिषी उनके नाना थे . हनुमान की माता अंजनी गौतम की पुत्री थीं . ये बात बहुत से लोगो को पता है कि इन्द्र अहिल्या पर आसक्त हो गया था.उसने एक दिन एक चाल चली .उसे पता था कि गौतम सुबह चार बजे गंगा स्नान के लिये जाते हैं .उसने अपने एक साथी के साथ मिल कर एक दिन रात के दो बजे सूर्य निकलने जैसा प्रकाश फ़ैला दिया . और मुर्गे की नकली बांग निकाली .होनी ही थी, कि गौतम ने उसे सच समझा और गंगास्नान के लिये चले गये .उधर इन्द्र ने गौतम का वेश बनाकर अहिल्या के साथ व्यभिचार किया .वास्तव में थोडी ही देर में अहिल्या को पता चल गया कि उसके साथ कामाचार करने वाला कोई कपटी है लेकिन उसने कोई एतराज नहीं किया . अंजनी यह द्रष्य देख रही थी. बाद में अहिल्या को पता चला कि अंजनी ने उसके साथ छ्ल होते देख लिया है.उसने अंजनी से कहा कि वह ये बात अपने पिता को न बताये,लेकिन अंजनी ने उसकी बात मानने से साफ़ इंकार कर दिया.तब क्रोधित होकर अंजनी ने उसे शाप दे दिया कि में करे हुये का भोगूंगी,पर तू बिना किये का भोगेगी. उधर थोडी ही देर में गौतम जी को पता चला कि उनके साथ छ्ल हुआ है.उन्होने वहीं ध्यान लगाया और सारा हाल जान लिया,अब उनके मन में एक ही बात थी कि देखें अहिल्या इस बात को छुपाती है या बता देती है. ऐसा ही हुआ अहिल्या इस बात को छुपा गयी और गौतम जी ने उसे पत्थर की हो जाने का शाप दे दिया .उस समय अहिल्या क्रोध में थी क्योंकि गौतम जी ने अंजनी से छल के बारे में पूछा था तो अंजनी ने साफ़ साफ़ सच बता दिया .इसीलिये अहिल्या ने अंजनी को शाप दिया कि वो बिना करे का भुगतेगी.इस पर अंजनी ने द्रणता से कहा कि वह अपने जीवन में किसी पुरुष की छाया भी अपने ऊपर नहीं पङ्ने देगी ऐसा कह कर वह उसी समय निर्जन वन में तप करने चली गयी.और अहिल्या रिषी के शाप से पत्थर की हो गयी अहिल्या के शाप देने के बाद अंजनी रिष्य्मूक पर्वत श्रंखला में चली गयी और घनघोर तप करने लगी. उधर सती के अपने पिता के घर यग्य में दाह करने के बाद बहुत समय बीत चुका था और भगवान शंकर में तेज का समावेश हो चुका था देवता विचार कर रहे थे कि शंकर जी को बहुत समय से सती का साथ नहीं है ऐसे में यदि उनका तेज (वीर्य) स्खलित हो गया तो हाहाकार मच जायेगा. इसके लिये वे एक ऐसी तपस्वनी की तलाश में थे जो शंकर का तेज सह सके. तब देवताओं ने ध्यान से देखा तो उन्हें अंजनी नजर आई .अंजनी संसार से ध्यान हटाकर घनघोर तपस्या में लीन थी और राम के अवतरण का समय आ चुका था. रुद्र के ग्यारहवें अंश हनुमान जी के अवतार का भी समय आ रहा था .तब कुछ देवता भगवान शंकर के साथ महात्माओं का वेश वनाकर अंजनी की कुटिया के सामने पहुँचे और पानी पीने की इच्छा जाहिर की .अंजनी ने प्रण कर रखा था कि किसी भी पुरुष की छाया तक अपने ऊपर न पङने देगी.लेकिन महात्माओं को जल पिलाने में उसे कोई बुराई नजर नही आयी.और महात्माओं को जल न पिलाने से उसकी तपस्या में दोष आ सकता था इसलिये वह महात्माओं को जल पिलाने के उद्देश्य से एक पात्र में जल ले आयी.जब वह जल पिलाने लगी तो महात्माओं ने पूछा कि बेटी तुमने गुरु किया या नहीं. अंजली ने कहा कि वह गुरु के विषय में कुछ नहीं जानती .तब महात्माओं ने कहा कि निगुरा (जिसका कोई गुरु न हो ) का पानी पीने से भी पाप लगता है अतः हम तुम्हारा जल नहीं पी सकते .अंजनी को जब गुरु का इतना महत्व पता चला तो उसने महात्माओं से गुरु के बारे में और अधिक जाना फ़िर उसने इच्छा जाहिर की कि वे महात्मा लोग उसे गुरुदीक्षा कराने में मदद करें. देवताओं ने कहा कि ये महात्मा (शंकर जी ) तुम्हें दीक्षा दे सकते हैं.अंजनी ने विधिवत दीक्षा ली और शंकर ने दीक्षा प्रदान करते समय उसके कान में मन्त्र फ़ूँकते समय अपना तेज उसके अंदर प्रविष्ट कर दिया .इससे अंजनी को गर्भ ठहर गया. उसे लगा कि महात्मा वेशधारी पुरुषों ने उसके साथ छल किया है. उसने अपनी अंजुली में जल लिया और उसी समय शाप देने को उद्धत हो गयी .तब शंकर आदि अपने असली वेश में आ गये और कहा कि वेटी तू अपनी तपस्या नष्ट न कर और ये सब होना था तेरा ये पुत्र युगों तक पूज्यनीय होगा और ये सब पहले से निश्चित था. अंजनी संतुष्ट हो गयी.
उधर केसरी वानर अंजनी पर आसक्त था और बाद में अंजनी का भी रुझान भी केसरी की तरफ़ हो गया और दोनों ने विवाह कर लिया इस तरह हनुमान जी के अवतार का कारण बना और अहिल्या का ये शाप कि तू विना किये का भोगेगी भी सच हो गया. वास्तव में अलौकिक घटनायें रहस्मय होती हैं और मानवीय बुद्धि से इनका आंकलन नहीं किया जा सकता है जो सच हमारे सामने आता है उसके पीछे भी कोई सच होता है .

मंगलवार, अगस्त 17, 2010

इस कंकाल का रहस्य क्या है ?


आइये आज कुछ अलग रहस्यों की बात करते हैं । जिन पर साधारण जीवन में चर्चा कम से कम मैंने तो नहीं सुनी । और लोगों ने सुनी हो तो वह अलग बात है ? आपने एक चीज कई बार देखी होगी । पर आपको यह पता नहीं होगा । कि वो चीज या आकृति है क्या ? यधपि योगियों और संतों के लिये वह रहस्य नहीं है ? ये चीज है । हमारी आंखों के ठीक सामने आठ नौ इंच दूरी से लेकर सात आठ फ़ुट दूर बनने वाली विभिन्न प्रकार की कंकाल जैसी आकृतियां । कई बार इस रहस्यमय चीज को मैंने बनाऊ ढोल टायप साधुओं से पूछा कि ये क्या है । तो उन्होंने जबाब दिया कि ये तुम्हारे जितने जन्म हो चुके हैं । उनके कंकाल दिखते हैं ? वास्तविकता ये नहीं है ? ये आकृतियां दरअसल हमारी चित्तवृतियां हैं । अब आप अलग अलग मानसिक स्थितियों में इसका प्रयोग करके देखना । जब चित्त में विचार घनीभूत होंगे आकृति बडी बनेगी । विचार हल्के होंगे आकृति छोटी बनेगी । मन में जिस तरह के और जितने विचार होंगे । ये आकृति उसी तरह की बनेगी । एक खास बात ये होती है कि मन की शुद्धता और गंदगी या तामसिकता के आधार पर इसका रंग काला सफ़ेद के अनुपात में अंतर होगा । दिव्यता य़ा पवित्र भाव होने पर सफ़ेद अधिक दिखेगा । और वासनात्मक या निराशात्मक भावों की अधिकता होने पर काला अधिक दिखेगा । अब मान लीजिये किसी समय आपके मन में विचार बना । कल मुझे दिल्ली जाना है । इस चित्त के विचार का एक वृत बन गया । तभी विचार आया । बच्चे की फ़ीस जमा करनी है । दूसरा वृत । बीबी के लिये साडी लानी है । तीसरा वृत । बिजली का बिल भरना है । एक और वृत । इस तरह इन विचारों के हल्के भारी भाव के अनुसार कंकाल सी दिखने वाली आकृति में गोले बनते हैं । जिनको ध्यान क्रिया का अच्छा अभ्यास है । वे
यह बात गौर करके देखें कि जिस समय अनुलोम विलोम क्रिया और ध्यान एकाग्रता से मन विचारशून्य हो जाता है । उस समय ये आकृति दिखाई देनी बन्द हो जाती है । त्राटक के अच्छे अभ्यासियों को भी ये दिखाई नहीं देगी । तो अब आप कई बार ये प्रयोग करके देखना । ये आपकी मानसिक स्थित का एकदम सही पता बताती है । इसको बार बार देखने से योग की अच्छी स्थिति बनती है । और बहुत से फ़ालतू विचार नष्ट हो जाते हैं । इसको बार बार देखने से कई रोग भी ठीक हो जाते हैं । और मन बडी तेजी से साफ़ होकर नियन्त्रण में होने लगता है । न मानों तो करके देखना । अगर पहले आपने कभी नहीं किया । तो शुरूआत में कालापन अधिक दिखाई देगा । और इसको प्रतिदिन देखते रहने पर उसमें सफ़ेदी की मात्रा बडती जायेगी । और तब आप एक अजीव सी फ़ुर्ती और उत्साह अनुभव करेंगे । ज्यों ज्यों आप इसको देखते जायेंगे । इसके कई रहस्य खुलते जायेंगे । हालांकि अलौकिक ग्यान के रहस्य में यह कोई बडी तोप नहीं है । पर जो कुछ नहीं जानते । उनके लिये बहुत है । दूसरे ये तीन काम खास करती है । चिडचिडापन और अवसाद हटाना । दूसरा कुम्भ स्नान की तरह आपके मन से पाप धोना या मन को शुद्ध करना ।तीसरा सभी बीमारियां या वासनायें मन के विकार के कारण हीं होती हैं । इसलिये ये क्रिया आश्चर्यजनक रूप से फ़ायदा करती है ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

मन को देखना ...?


मन । काल । कल्पना । सृष्टि । इन चारों शब्दों का अर्थ एक ही है । मन यानी जो माना जा रहा है । या जिससे माना जा रहा है । काल । क्योंकि मन से की गयी कल्पना या विचार मात्र काल्पनिक ही है इसलिये पानी के बुलबुले के समान उसका विचार के अनुसार अस्तित्व है । अब इसमें दूसरे घटक के अनुसार बुलबुले की आयु बड जाती है । जैसे । साफ़ पानी का बुलबुला है । तो कुछ ही सेकेंड रहेगा । साबुन के पानी का बुलबुला है तो साबुन के रूप में दूसरा घटक होने से बुलबुले की आयु पानी के बुलबुले की अपेक्षा बड जायेगी । यदि पानी में तेल का अंश मिला हुआ है । तो बुलबुला और देर तक रहेगा । कीचडयुक्त गन्दगी में बनने वाले बुलबुले और अधिक देर तक रहते हैं । इसी तरह हमारे विचार उनमें मिले भाव और घटक के अनुसार घने या क्षीण होते हैं । और यही आने वाली स्थिति परिस्थिति और यहां तक कि जन्म मरण को भी नियन्त्रित करते हैं । वास्तव में इनको सूक्ष्म रूप में जान लिया जाय । तो यही यम होते हैं । ईश्वर की सृष्टि और इंसान की सृष्टि ( यानी घर मकान शादी आदि अन्य उपक्रम ) लगभग एक ही नियम के अनुसार बनती है । फ़र्क सिर्फ़ इतना है । कि ईश्वर का दस्तावेज आरीजनल होता है । और मनुष्य़ का फ़ोटोस्टेट जैसा । वह संकल्प से बनती है । यह स्थूल क्रिया से । मन से जुडने पर ही आत्मा जीव भाव धारण कर जीवात्मा कहलाने लगता है । और मन से पार हो जाने पर या अमन हो जाने पर यह अविनाशी और जन्म मरण धर्म से मुक्त हो जाता है । काल काल सब कोय कहे । काल न जाने कोय । जो जो मन की कल्पना काल कहावे सोय । मन को योग स्थिति या त्राटक के अच्छे अभ्यास से आराम से देखा जा सकता है । और मजे की बात यह है । कि चित्तवृतियों की तरह इसको उसी तरह शरीर से बाहर देखा जा सकता है । जैसा अभी आप मेरा लेख देख रहे हैं । या किसी भी अन्य चीज को देखते हैं । मन की शेप डेढ सेमी व्यास की गोल बिन्दी के बराबर होती है । और चित्र के अनुसार इसमें अलग अलग अवस्थाओं में परिवर्तन होते हैं । साधारण जीव अवस्था होने पर इस बिन्दी में चार छिद्र होते हैं । जिन्हें मन । बुद्धि । चित्त । अहम । कहते हैं । इन्हीं से संसार बना है । और इन्हीं से संसार आपको नजर आ रहा है । वरना इसकी हकीकत कुछ और ही है ? क्योंकि संसार इन्हीं चारों से बना है । इसलिये इन्ही से बरताव में आता है । इन चारों छिद्रों के पास पानी में उठने वाले बेहद छोटे बुलबुलों के समान स्फ़ुरणा होती रहती है । इसी क्रिया से अनेकों भाव बनते और नष्ट होते रहते हैं । योग अवस्था में यह स्फ़ुरणा शान्त हो जाती है । योग में और अधिक अच्छी स्थिति हो जाने पर ये चारों छिद्र एक हो जाते हैं । तब उसको सुरति बोलते हैं ।
वास्तविक एकादशी इसी को कहते है । वास्तविक दशरथ होना इसी को कहते हैं । राम राम सब कोय कहे । दशरथ कहे न कोय । एक बार दशरथ कहो । फ़ेर मरन न होय । एकादशी यानी पांच कर्म और पांच ग्यानइन्द्रियों को एक करके प्रभु में लगा देना । दशरथ । मन राजा जो इन्द्रियों के रथ पर सवार होकर दसों दिशाओं में दौडता रहता है । उसे समेटकर एकाग्र और निश्चल अवस्था से प्रभु में लगा देना । एक बार दशरथ कहना होता है । संत मन होने पर इसमें जीव वासना रूपी कालिख मिट जाती है । और ये दिव्यता युक्त हो जाता है । परमहंस जो संत से ऊंची स्थिति है । इसमें मन खत्म हो जाता है । हंसा परमहंस जब हुय जावे । पारब्रह्म परमात्मा साफ़ साफ़ दिखलावे । इसके बाद की जो ऊंची स्थिति है । वह गोपनीय है । पारब्रह्म ही ईश्वर से ऊंची स्थिति है । हिरण्यगर्भ । ईश्वर और विराट ये तीन मुख्य स्थितियां होती हैं । जो समस्त ऐश्वर्य से युक्त हो उसको ईश्वर कहतें हैं ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

मंगलवार, अगस्त 10, 2010

आओ मेरी नैया में । मैं ले चलूं भव से पार ।

राम नाम की नैया लेकर । सदगुरु करे पुकार ।आओ मेरी नैया में । मैं ले चलूं भव से पार ।
इस नैया में जो चढ जायेगा ।
जन्म जन्म के पापों से मुक्ति को मिल जायेगा ।कटे चौरासी बंधन । पडे न समय की मार । राम नाम की नैया लेकर । सदगुरु करे पुकार ।पाप गठरिया शीश धरी कैसे आऊं में ।अपने ही अवगुण से खुद शरमाऊं में । नैया तेरी सांची गुरुवर । मेरे पाप हजार । राम नाम की नैया लेकर । सदगुरु करे पुकार । जीवन अपना सौंप दे मेरे हाथों में ।
स्वांस स्वांस को पोत ले मेरी यादों में ।
पाप पुन्य का बनकर । मैं आया ठेकेदार ।
राम नाम की नैया लेकर । सदगुरु करे पुकार ।करके दया सतगुरु ने चदरिया रंग डाली ।
जन्म जन्म की मैली चादर धो डाली ।
दाग भरी थी मेरी चदरिया । कर दी लाल ही लाल ।राम नाम की नैया लेकर । सदगुरु करे पुकार । बडे भाग से सदगुरु जी का ग्यान मिला । मुझ दुख हारी को जीने का आधार मिला । जलने लगी थी । बीच भंवर । आगे खेवनहार । राम नाम की नैया लेकर । सदगुरु करे पुकार । आओ मेरी नैया में । मैं ले चलूं भव से पार ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

घर बार छोडकर मैं । फ़िरता बेचारा हूं ।

गुरुदेव दया करके मुझको अपना लेना ।
मैं शरण पडा तेरी चरणों में जगह देना ।
तुम सुख के सागर हो । निर्बल के सहारे हो ।
नैनों में समाये हो । मुझे प्राण से प्यारे हो ।
नित माला जपूं तेरी । नहीं दिल से भुला देना ।
गुरुदेव दया करके मुझको अपना लेना ।
मैं शरण पडा तेरी चरणों में जगह देना ।
पापी हूं या कपटी हूं । जैसा भी हूं तेरा हूं ।
घर बार छोडकर मैं । फ़िरता बेचारा हूं ।
मैं दुख का मारा हूं । मेरे दुखडे मिटा देना ।
गुरुदेव दया करके मुझको अपना लेना ।
मैं शरण पडा तेरी चरणों में जगह देना ।
मैं तेरा सेवक हूं चरणों का चेला हूं ।
नहीं नाथ भुलाना मुझे । इस जग में अकेला हूं ।
तेरे दर का भिखारी हूं । मेरे दोष मिटा देना ।
गुरुदेव दया करके मुझको अपना लेना ।
मैं शरण पडा तेरी चरणों में जगह देना ।
करुणानिधि नाम तेरा । करुणा दिखलाओ ।
तुम सोये हुये भाग्यों को । हे नाथ जगाओ ।
मेरी नाव भंवर डोले । इसे पार लगा देना ।
गुरुदेव दया करके मुझको अपना लेना ।
मैं शरण पडा तेरी चरणों में जगह देना ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

चाहे दुश्मन हों हजार । मुझे डर किसका है ।

मुझे मिला सतगुरु का प्यार मुझे डर किसका है ।
मुझे मिला सतगुरु का प्यार मुझे डर किसका है ।
दिन रात आनन्द मनाय रही । मैं गीत प्रभु के गाय रही ।
चाहे कुछ भी कहे संसार मुझे डर किसका है ।
मुझे मिला सतगुरु का प्यार मुझे डर किसका है ।
कष्टों में उमर बितायी थी । दुष्टों ने बहुत सतायी थी ।
मैं अब न सहूंगी मार मुझे डर किसका है ।
मुझे मिला सतगुरु का प्यार मुझे डर किसका है ।
मुझे भक्ति बहुत ही प्यारी है । मेरे रक्षक सतगुरु प्यारे हैं ।
चाहे दुश्मन हों हजार । मुझे डर किसका है ।
मुझे मिला सतगुरु का प्यार मुझे डर किसका है ।
एक प्रभु की प्रेम दीवानी हूं । जिन रमझ गुरु की जानी हूं ।
गुरु कर दो बेडा पार । अब डर किसका है ।
मुझे मिला सतगुरु का प्यार मुझे डर किसका है ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "
" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

हरि ओम बोलो । हरि ओम बोलो ।

हरि ओम बोलो ।
जब से गुरु का नाम लिया है । गिरतों को गुरु ने थाम लिया है । सतगुरु ही मेरा सहारा है । मुझे भव से पार उतारा है । हरि ओम बोलो ।
ये गुरु जो तारनहार हुये । ये कलयुग के अवतार हुये । सारा जग माने सदगुरु को ।सदगुरु को । मेरे सदगुरु को ।
हरि ओम बोलो । हरि ओम बोलो ।
जो प्रेम गुरु से करते हैं । वो भव सागर से तरते हैं । हो उसका बेडा पार सदा । जो गुरु से करते प्यार सदा ।
हरि ओम बोलो । हरि ओम बोलो ।
आंगन में बहारें फ़ूलों की । पावन चरणों की धूलों की । यहां स्वर्गीय हवायें चलती हैं । जो नित नित पावन करती हैं ।
हरि ओम बोलो । हरि ओम बोलो ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "
विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
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आते तेरे द्वार सतगुरु । एक तुम्ही आधार सतगुरु ।

एक तुम्ही आधार सतगुरु । एक तुम्ही आधार सतगुरु ।
जब तक मिलो न तुम जीवन में । शांति कहां मिल सकती मन में ।
खोज फ़िरा संसार सतगुरु । एक तुम्ही आधार सतगुरु ।
कैसा भी हो तैरनहारा । मिले न जब तक शरण तुम्हारा ।
हो न सका उस पार सतगुरु । एक तुम्ही आधार सतगुरु ।
हे प्रभु तुम्ही विविध रूपों में । हमें बचाते भवकूपों में ।
ऐसे परम उदार सतगुरु । एक तुम्ही आधार सतगुरु ।
हम आये हैं द्वार तुम्हारे । दुख उद्धार करो दुख हारे ।
सुन लो दास पुकार सतगुरु । एक तुम्ही आधार सतगुरु ।
छा जाता जग में अंधियारा । तब पाने प्रकाश की धारा । आते तेरे द्वार सतगुरु । एक तुम्ही आधार सतगुरु ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

तू है अकाल तुझको । नही काल का डर है ।

ये ग्यान का मंदिर । मेरे गुरुदेव का घर है ।
ये ग्यान का मंदिर । मेरे गुरुदेव का घर है ।
तू है अकाल तुझको । नही काल का डर है ।
तू है अकाल तुझको । नही काल का डर है ।
आवागमन चक्र जो दुनियां में चल रहा ।
हर जीव जन्म मृत्यु की ज्वाला में जल रहा ।
इस जीव का इस चक्र में । चलता हुनर है ।
ये ग्यान का मंदिर । मेरे गुरुदेव का घर है ।
अब दुख से निकलने का कोई रास्ता नहीं ।
सतगुरु के सिवा अन्य कहीं आस्था नहीं ।
पड जाय वो जिस पर । दाता की नजर है ।
ये ग्यान का मंदिर । मेरे गुरुदेव का घर है ।
श्रद्धा ही से तो । वो तेरा राम मिलेगा ।
अंतस में ही अखण्ड परमधाम मिलेगा ।
इस द्वार में माया का नहीं कोई असर है ।
ये ग्यान का मंदिर । मेरे गुरुदेव का घर है ।
जीवन में महामुक्ति का परिणाम पा लिया ।
परिपूर्ण परमानन्दमय विश्राम पा लिया ।
तू है जीवात्म ब्रह्म । जो व्यापक अमर है ।ये ग्यान का मंदिर । मेरे गुरुदेव का घर है ।तू है अकाल तुझको । नही काल का डर है ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

सोमवार, अगस्त 09, 2010

मैं मैं चिल्लाते हुये मनुष्य़ को कालरूपी भेडिया मार डालता है ।

कालरूपी इस महासागर में यह सम्पूर्ण जगत डूबता उतराता रहता है । मृत्यु । रोग । बुडापा । जैसे भयंकर जाल में फ़ंसा और जकडा हुआ भी यह मनुष्य सच को जानने की कोशिश नहीं करता । मनुष्य के लिये प्रतिक्षण भय है । समय तेजी से बीत रहा है । कब काल झपट्टा मार दे । किन्तु अग्यानता के वशीभूत यह उसी प्रकार से दिखाई नहीं दे रहा । जैसे जल में पडा हुआ कच्चा घडा गलते हुये दिखाई नहीं देता । एक बार के लिये वायु को बांध सकते हैं । आकाश को बांट सकते हैं ( खन्ड होना ) तरंगों को सूत्र में पिरो सकते हैं । किन्तु आयु का विश्वाश नहीं कर सकते हैं । जिस प्रकार प्रलय अग्नि के प्रभाव से प्रथ्वी दहकती है । सुमेर जैसे पर्वत बिखरने लगते हैं । समुद्र का जल सूख जाता है । फ़िर इस क्षण भंगुर शरीर के सम्बन्ध में क्या कहा जा सकता है ? ये मेरा पुत्र है । ये मेरी पत्नी है । ये मेरा धन है । इस प्रकार बकरे के समान मैं मैं चिल्लाते हुये इस मनुष्य़ को कालरूपी भेडिया जबरदस्ती मार डालता है । यह मैंने किया है । यह मुझे करना है । यह किया गया । यह नही किया गया । इस प्रकार की भावना वाला मनुष्य स्वतः ही मृत्यु के वश में हो जाता है । कल किये जाने वाले कार्य को आज ही कर लो । जो आज करना है अभी कर लो । क्योंकि तुम्हारा कार्य हो गया या अभी अधूरा है । या बिलकुल नही हुआ । मृत्यु कभी इसका विचार नहीं करती । वृद्धावस्था ( मृत्यु को ) राह दिखा रही है । भयंकर रोग इसके सैनिक हैं । मृत्यु इसकी प्रबल शत्रु है । फ़िर भी आदमी इसका भक्ति रूपी रक्षा करने वाला अमोघ हथियार प्राप्त नहीं करता । इससे बडी मूर्खता क्या होगी । तृष्णा रूपी सुई से छेदा हुआ । विषय रूपी घी में डूबा हुआ । राग द्वेश रूपी अग्नि में पके हुये इस मनुष्य रूपी पकवान को मृत्यु बडे चाव से तत्काल ही खा लेती है । बालक । युवा । बूडे । और गर्भ में स्थित सभी प्राणियों को मृत्यु अपने में समाहित कर लेती है । इस जगत का ऐसा ही हाल देखा जाता है । यह जीव अपने शरीर को भी त्यागकर यमलोक चला जाता है । तो भला माता पिता स्त्री पुत्र जो सम्बन्ध हैं । वे किस कारण से बनाये गये हैं । संसार दुख का मूल है । फ़िर वह किसका होकर रहा है । अर्थात जो इस संसार में रम गया । उसने सदा के लिये दुख को पाल लिया । जिसने इस संसार के मोह का त्याग कर दिया । वह सदा के लिये सुखी हो गया । इसके अतिरिक्त दूसरा कोई भी सुखी नही हो सकता । यह संसार सभी दुखों का जनक । समस्त आपदाओं का घर । सब प्रकार के पापों का आश्रय है । अतः ग्यान होते ही मनुष्य को क्षण भर में इसका त्याग कर देना चाहिये । लोहे की जंजीरों में फ़ंसा मनुष्य एक बार को मुक्त हो सकता है । किन्तु स्त्री धन और पुत्र मोह में फ़ंसा व्यक्ति मुक्त नहीं हो पाता । मन को प्रिय लगने वाली जितनी चीजों से मनुष्य सम्बन्ध जोड लेता है । उतनी ही दुख की कीलें उसके ह्रदय में गडती जाती हैं । विषय का आहार करने वाले देह में स्थित देवता । तथा तुम्हारी सभी प्रकार की सामर्थ्य को खत्म कर देने वाले इन्द्रिय रूपी चोरों द्वारा तुम्हारे सभी लोक नष्ट हो रहे हैं । फ़िर भी तुम अग्यान में हो । ये बडे कष्ट की बात है । जिस प्रकार मांस के लोभ में फ़ंसी मछली को अन्दर छुपा कांटा दिखाई नहीं देता । वैसे ही जूठे सुखों के लालच में फ़ंसा हुआ ये मनुष्य यम की फ़ांस को नहीं देख पाता ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

तो परलोक में जाकर क्या करेगा ?

यहां यदि इस जीवन में । इसी मृत्यु लोक में । इस शरीर में । तुमने नरक रूपी महा व्याधि का पूर्व उपचार नहीं किया । तो परलोक में जाकर रोगी मुक्ति के लिया क्या उपाय करेगा । जहां इसके उपचार के लिये कोई औषधि ही प्राप्त नहीं होती । बुडापा तो बाघिन के समान है । जिसे प्रकार चटके हुये घडे का जल धीरे धीरे बह जाता है । उसी प्रकार तुम्हारी आयु भी निरन्तर घटती ही जा रही है । शरीर में विधमान रोग भयंकर शत्रु के समान कष्ट देते हैं । इसलिये वास्तविक कल्याण इसी में है । कि इन सब व्याधियों से मुक्ति प्राप्त करने का प्रयास किया जाय । जब तक शरीर स्वस्थ है । उसमें किसी प्रकार का दुख नही है । जब तक विपत्तियां सामने नहीं हैं । जब तक शरीर की इन्द्रिया सबल हैं । यानी शरीर की जर्जरता से शिथिल नहीं हुयी हैं । तब तक ही आत्मा के कल्याण का प्रयास किया जा सकता है । तत्व ग्यान की प्राप्ति हेतु प्रयत्न किया जा सकता है । बाद में आग लगने पर कुंआ खोदने पर क्या लाभ होगा ? ये मनुष्य अनेक प्रकार के कार्यों में व्यस्त और उलझा हुआ रहने से तेजी से बीत रहे समय को नही जान पाता । वह दुख सुख तथा आत्मा के हित को भी ठीक से नहीं जानता । जन्म लेने वालों को । मरने वालों को । आपत्ति ग्रस्त लोगों को । रोग से पीडित लोगों को । अत्यन्त दुखी लोगों को देखकर भी मनुष्य ममता मोह लालच लोभ के नशे में ऐसा चूर रहता है । कि जन्म मरण आदि नाना प्रकार के दुख वाले संसार से भी नही डरता और इसमें मगन हो जाता है । यहां की सभी सम्पदा स्वप्न के समान ही तो है । यौवन फ़ूल के समान है । अर्थात शीघ्र कुम्हला जाने वाला है । आयु चंचल बिजली के समान नष्ट हो जाने वाली है । ऐसा जानकर भी धैर्य बना रहना क्या उचित जान पडता है । ये सौ वर्ष का जीवन बहुत छोटा है । जो आधा तो आलस और नींद में ही चला जाता है । कुछ बचपन । रोग और वृद्धावस्था और अन्य दुखों में व्यतीत हो जाता है । युवावस्था का जो थोडा सा महत्वपूर्ण है । वो भोग विलास और अन्य लोभ में खत्म हो जाता है । जो कार्य तुरन्त करना चाहिये । उसके सम्बन्ध में सोच विचार नहीं है । जहां जागते रहना चाहिये । वहां तुम सोते हो । भय के स्थान पर बिना कारण आश्वस्त हो । ऐसा कौन सा मनुष्य है । जो मारा नही जायेगा ? जल के बुलबुले के समान जीव इस शरीर में स्थित है । यहां जिन वस्तुओं का साथ हैं । वे अनित्य हैं । फ़िर भी जीव कैसे निर्भयता से नितान्त अनित्य । शरीर । भोग । पुत्र । स्त्री । कुल आदि के साथ भ्रम में रहता है । कि यही सच है ? क्या ये वास्तव में सच है ? जो अहित में हित । अनिश्चित में निश्चित । अनर्थ में अर्थ को समझता है । ऐसा व्यक्ति अपने मुख्य प्रयोजन से निश्चय ही दूर है । जो पत्थर को देखते हुये भी ठोकर खाता है । जो सुनते हुये भी सत्य ग्यान को प्राप्त नहीं कर पाता । जो सद ग्रन्थों को पडते हुये भी उनके रहस्य को नही समझ पाता । वह निश्चय ही देव माया से विमोहित है और अन्त में दुर्दशा को प्राप्त होने वाला है । इसमें कोई संशय की बात नहीं है । अपने भूल का फ़ल उसे स्वयं ही भोगना होगा । ये तय ही है ?
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

संसार में कोई सुखी नहीं है ।

अपनी अग्यानता के कारण ही जीव ( सभी योनियां ) इस संसार में पैदा होता है । सभी प्रकार के दुखों से युक्त और मलिन ( मैला ) इस असार संसार में अनेक प्रकार के शरीरों में प्रविष्ट जीवात्माओं की अनन्तराशियां हैं । जो इसी संसार में जन्म लेते हैं । इसी में मर जाते हैं । किन्तु उनका अन्त नहीं होता । और वे दुख से सदैव व्याकुल रहते हैं । इस संसार में कोई सुखी नहीं है । इस जगत से परे । पारब्रह्मस्वरूप । निरवयव । सर्वग्य । सर्वकर्ता । सर्वेश । निर्मल । अद्वय तत्व । स्वयं प्रकाश । आदि अन्त से रहित । विकारशून्य । परात्पर । निर्गुण । सच्चिदानन्द शिव हैं । ये जीव उन्हीं का
अंश है । जो अनादि अविध्या से वैसे ही आच्छादित हैं । जैसे अग्नि में विस्फ़ुल्लिंग होते हैं । अनादि कर्मों के प्रभाव से प्राप्त शरीर आदि अनेकों उपाधियों में होने के कारण भिन्न भिन्न हो गये हैं । सुख दुख देने वाले पुन्य और पाप संग्रह का इस शरीर पर नियन्त्रण है । अपने कर्म के अनुसार ही जीव को जाति देह ( योनि ) आयु तथा भोग की प्राप्ति होती है । सूक्ष्म या लिंग शरीर के बने रहने तक ये जन्म मरण का । आवागमन का चक्र चलता ही रहता है । स्थावर ( पेड पौधे । पहाड आदि ) कृमि कीट । पशु पक्षी । मनुष्य । धार्मिक देवता और मुमुक्ष । यथाक्रम चार प्रकार के शरीरों को धारणकर हजारों बार उनका परित्याग करते हैं । यदि पुन्य कर्म के प्रभाव से उनमें से किसी को मानव योनि मिल जाय तो उसे ग्यानमार्ग अपनाकर मोक्ष प्राप्त करना चाहिये । समस्त चौरासी लाख योनियों में स्थित जीवात्माओं को इसी एक मात्र मानव योनि में तत्वग्यान का लाभ होकर मोक्ष मिल सकता है । इस मृत्युलोक में हजारों नहीं बल्कि करोडों बार जन्म लेने पर जीव को कभी कभी ही पूर्व संचित पुन्य के प्रभाव से मानव योनि प्राप्त होती है । यह मानव योनि मोक्ष की सीडी है । इस देवताओं को भी दुर्लभ योनि को प्राप्त कर जो प्राणी स्वयं अपना उद्धार नहीं करता । उससे बडकर पापी कोई नहीं हो सकता । अन्य योनियों की अपेक्षा सुन्दर इन्द्रियों वाले इस जन्म का लाभ लेकर जो मनुष्य आत्मा का हित नहीं सोचता । वह आत्मघाती के समान है । कोई भी पुरुषार्थ शरीर के बिना सम्भव नहीं है । इसलिये शरीर रूपी धन की जतन से रक्षा करते हुये पुन्य कर्म और ग्यान लाभ करना चाहिये । आत्मा ही सबका पात्र है । इसलिये उसकी रक्षा में मनुष्य हमेशा तत्पर रहे । जो व्यक्ति आजीवन आत्मा के प्रति सचेष्ट रहता है । वह जीवित ही । इसी जन्म में अपना कल्याण होते देखता है । मनुष्य को ग्राम क्षेत्र धन घर शुभ अशुभ कर्म और शरीर बार बार प्राप्त नहीं होते । अतः विद्वान ये जानकर जतन से शरीर की रक्षा करते हैं । कोढ आदि जैसे महा भयंकर रोग हो जाने पर भी मनुष्य इस शरीर को नही छोडना चाहता । नाम जपत ( ढाई अक्षर का महामन्त्र ) कोढी भला । कंचन भली न देह ) इसलिये शरीर की रक्षा धर्म के लिये । धर्म की रक्षा ग्यान के लिये । और ग्यान की रक्षा ध्यान योग के लिये । ध्यान योग की रक्षा तत्काल इसी जीवन में मुक्ति प्राप्त हेतु जतन से करनी चाहिये । यदि आत्मा ही अहितकारी कर्म से अपने को दूर करने में समर्थ नहीं हो सकता । तो अन्य दूसरा कौन हितकारी है ? जो आत्मा को सुख प्रदान करेगा ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

शुक्रवार, अगस्त 06, 2010

राजा प्रियवृत का वंश वर्णन

राजा प्रियवृत के आग्नीध । अग्निबाहु । वपुष्मान । धुतिमान । मेधा । मेधातिथि । भव्य ।शवल । पुत्र । ज्योतिष्मान ये दस पुत्र हुये । इन पुत्रों में से मेधा । अग्निबाहु । पुत्र । नाम के तीन पुत्र योगी और जातिस्मर
यानी पूर्व जन्म की याद रखने वाले थे । इन लोगों ने राज्य के प्रति कोई रुचि प्रकट नहीं की । अतः प्रियवृत ने सप्तदीपा प्रथ्वी को अपने अन्य सात पुत्रों में विभक्त कर दिया । पचास करोड योजन में विस्त्रत ( एक योजन में चार कोस या बारह किलोमीटर होते है । ) पूरी प्रथ्वी नदी में तैरती हुयी नाव के समान । चारों और अवस्थित अथाह जल के ऊपर स्थित है । इसमें जम्बू । प्लक्ष । शाल्मल । कुश । क्रौंच । शाक । पुष्कर
ये सात दीप हैं । जो सात समुद्रों से घिरे हुये हैं । इन सात समुद्रों के नाम । लवण । इक्षु । सुरा । घृत । दधि । दुग्ध और जल सागर हैं । ये सभी दीप तथा समुद्र इस क्रम में एक दूसरे से दुगने परिमाण में अवस्थित हैं । जम्बू दीप में मेरु नामक पर्वत है । जो एक लाख योजन में फ़ैला हुआ है । इसकी ऊंचाई चौरासी हजार योजन है । ये प्रथ्वी में सौलह हजार योजन धंसा हुआ है । और शिखर बत्तीस हजार योजन फ़ैला हुआ है । इसका अधोभाग जो प्रथ्वी के ऊपर सन्निहित है । वह भी सोलह हजार योजन के विस्तार में कर्णिका के रूप में अवस्थित है । इसके दक्षिण में हिमालय । हेमकूट । तथा निषध । उत्तर में नील । श्वेत और श्रंगी नामक वर्ष पर्वत हैं । प्लक्ष आदि दीपों के निवासी मरण धर्म से मुक्त हैं । उनमें युग और अवस्था के आधार पर विषमता नहीं होती । जम्बू दीप के राजा आग्नीध के नौ पुत्र हुये । उनके नाम । नाभि । किम्पुरुष । हरिवर्ष । इलावृत । रम्य । हिरण्यमय । कुरु । भद्राश्व । केतुमाल थे । राजा आग्नीध ने उन सब पुत्रों को उनके नाम से प्रसिद्ध भूखण्ड दिया । राजा नाभि और उनकी पत्नी मेरुदेवी से ऋषभ नाम का पुत्र हुआ । उनसे भरत हुये । भरत का पुत्र सुमति हुआ । सुमति के तेजस नाम के पुत्र हुये । तेजस के इन्द्रधुम्न । इन्द्रधुम्न के परमेष्ठी । परमेष्ठी के प्रतीहार । प्रतीहार के प्रतिहर्ता । प्रतिहर्ता के प्रस्तार । प्रस्तार के विभु । विभु के नक्त । नक्त के गय । गय का नर । नर से विराट । विराट से धीमान । धीमान से भौवन । भौवन से त्वष्टा । त्वष्टा के विरजा । विरजा के रज । रज के शतजित । शतजित के विष्वग्ज्योति नामक पुत्र हुआ
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।
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