बुधवार, सितंबर 22, 2010

जीवन के पार का रहस्य अंधेरे की काली चादर के पीछे है ।


शाम के लगभग आठ बजने को हैं । मैं गांव के बाहर के एक मन्दिर में हूं । ये मन्दिर शाम सात बजे की आरती के बाद सुनसान हो जाता है । तब इसमें पिछले सात वर्षों से रह रहा एक नागा बाबा ही रह जाता है । नागा बाबा किसी सिद्धि के उल्टा पड जाने के कारण विक्षिप्त हो चुका है । मन्दिर गांव से काफ़ी दूर है । और लगभग जंगली और पहाडी इलाका है । मैं मन्दिर के पिछले हिस्से में काफ़ी दूर बने एक समाधि जैसे चबूतरे पर बैठा हूं । नागा बाबा मन्दिर में गांजा पीने में व्यस्त है । मेरा उससे कोई लेना देना नहीं है । इस वक्त मेरा किसी से कोई लेना देना नहीं है । मैं एक अनोखा संगीत सुनने के लिये यहां रुका हूं । जिसके लिये अंधेरा । एकांत और जंगल होना जरूरी है । संगीत हो रहा है । संगीत निरन्तर है । बस मुझे उसको सुनना है । एकान्त का संगीत । अंधेरे का संगीत । यहां काफ़ी सर्प होते है । काफ़ी अन्य निशाचरी जीव जन्तु होते हैं । जिनसे लोग डरते है । इसलिये वे यहां से अंधेरा होते ही भागते हैं । पर जीवन का रहस्य शायद अंधेरे से ही निकलकर आता है । जब तक हम अंधेरे में नहीं जाते । जब तक उस एकान्त में नहीं जाते । हम रहस्य को ठीक से नहीं जान सकते । जीवन के पार का रहस्य अंधेरे की काली चादर के पीछे है । प्रकृति के संगीत में छुपा है । ये संगीत उन ध्वनियों का है । जो जंगल का अटूट हिस्सा है । झींगुरों की आवाज । टिटहरी की आवाज । कीट पतंगो की आवाज । सारा जंगल संगीतमय हो उठा है । ये ध्वनियां बडी मनमोहक है । अगर कोई इन्हें सुनना जानता हो । मैं इन्हें अक्सर सुनता हूं । जंगल में नहीं होता । तब भी सुनता हूं । इनमें बडे बडे रहस्य है । पहले सभी ध्वनियां एक साथ सुनाई देती हैं । फ़िर कुछ अपने आप सुनाई देना बन्द हो जाती है । फ़िर तीन चार ध्वनियां ही सुनाई देती है । फ़िर किसी एक ध्वनि से आपका अस्तित्व जुड जाता है । बुद्ध ने कहा है । गुफ़ा की शान्ति व्यर्थ है । वह तुम्हारी नहीं गुफ़ा की शान्ति है । गुफ़ा छोडते ही अशान्ति फ़िर से हाजिर हो जायेगी । तुम्हें भीड में शान्त होना है । भीड दो है । एक बाहर की भीड है । एक तुम्हारे अन्दर भीड है । एक कोलाहल बाहर है । एक कोलाहल तुम्हारे अन्दर है । गुफ़ा बाहर का कोलाहल शान्त कर सकती है । उससे क्या होगा ? शान्त अन्दर से होना है । इसके लिये किसी से जुडना
जरूरी है । और वो प्रकृति ही हो सकती है । सभी रहस्य प्रकृति के अन्दर ही तो हैं । तब ये आवाजें क्यों हो रही हैं ? ये किसको पुकार रहीं हैं । ये खुद हमें बताती हैं । बस इनसे पूछना होता है । पूछने के लिये संवाद जरूरी है । पहले सबको सुनो । फ़िर कुछ को सुनो । फ़िर एक को चुनो । ये साधारण बात नहीं । बडी गहन बात है । खास कोई एक होता है । दो होते हैं । बहुत नहीं होते । वो खास तुमसे बात करने का इच्छुक है । पर यदि तुम खुद खास हो जाओ । हां । सच है । खास होना पडता है । खास कोई होता नहीं । बल्कि होना पडता है । खास होने के लिये खास की तरफ़ जाना होता है । तो.. ये सारा संगीत एक रहस्य बताता है । मगर । एक रुकावट हो जाती है । डर की रुकावट । तुम ऐसे माहौल के अभ्यस्त नहीं हो । डर लगता है । डर तुम्हें संगीत नहीं सुनने देता । कोई बात नहीं । अपने घर के पास ही सुनो । ऐसे शुरू करो । तुम्हें यहां भी अजीव सा अहसास होगा । पर याद रखो । डर को दूर करने के लिये डर के पास जाना जरूरी है । जव तुम डर के पास रहने लगते हो । तो डर तुम्हारा पडोसी हो जाता है ।

गुरुवार, सितंबर 16, 2010

जानों । जानने से लाभ होता है । मानो मत ।




मेरी समझ से internet को हम सूचनाओं का खजाना तो कह सकते हैं । पर ग्यान का खजाना नहीं कह सकते । हो सकता है । इस point पर मैं गलत होऊं । पर मैंने जितने भी समय internet को use किया है । और इच्छित चीजों को search किया है । तो उनके result से मुझे निराशा ही हाथ लगी है । ये तुलना मैं library से कर रहा हूं । library में कुछ देर के प्रयास के बाद कोई ऐसी अनमोल और पुरानी पुस्तक हाथ लग ही जाती थी । जो अगले आठ दिनों तक न सिर्फ़ ग्यान में भारी इजाफ़ा करती । बल्कि मानसिक खुराक का काम भी देती थी । ये घटना लगभग दस साल पहले की है । जब प्राचीन रहस्यों और प्राचीन ग्यान पर एक शोधकर्ता विद्धान की पुस्तक मुझे मिली । मैंने इस पुस्तक को खरीदने हेतु बहुत पता किया । पर वह बाजार आदि में उपलब्ध नहीं थी । और संक्षेप में वह पुस्तक मुझे नहीं मिल पायी । तब मैंने उसके महत्वपूर्ण अंशो को एक डायरी में लिख लिया । लेकिन बाद के साधनाकाल में बहुत कुछ ऐसा घटित हुआ कि वो डायरी ही कहीं खो गयी । खैर । उस डायरी की याद मुझे एक तोतलाते बालक को देखकर याद आयी । उस diary में चार या पांच अक्षरों का एक ऐसा शब्द था । जिससे हकलाना और तुतलाना ठीक हो जाता था । ये बात एक दिन मुझे महाराज जी के सामने याद आ गयी । मैंने कहा । महाराज जी वह कौन सा शब्द हो सकता है ? आत्मग्यान के साधक को जैसा उत्तर मिल सकता था । वैसा ही मुझे महाराज जी से मिला । थोपे हुये ग्यान को ग्रहण मत करो । तुम्हारी आत्मा के पास हर उत्तर है । और जीवन का वास्तविक लक्ष्य हमेशा याद रखो । ये शरीर तुम्हें बारबार मिलने वाला नहीं है ? सीधी सी बात थी । महाराज जी उस दिन अलग तरह के मूड में थे । इंसान के दिमाग में एक खासियत होती है कि एक बार कोई बात आ जाय । तो सहज निकलती नहीं है । शायद महाराज जी ने यह बात जान ली थी । इसके लगभग दो तीन महीने बाद की बात है । महाराज जी के पास उनका एक शिष्य मिलने आया । जिसके साथ दस साल का बालक था । वह क शब्द को त बोलता था । और भी शब्दों में तुतलाने का अधिक समावेश था । वह शिष्य बालक को यूं ही ले आया था । उसके साथ क्या होने वाला है । ये शायद उसको भी पता नहीं था ? पापा दे तौन एं ? पापा ये कौन हैं ? उसने एक आदमी की तरफ़ इशारा करके पूछा । महाराज जी ने कहा । क बोलो । ता बोलई ना पात । ज बोलो । दा । उसने बोला । मैंने महाराज जी की तरफ़ देखा । उनके चेहरे पर वही शान्ति थी । उनका किसी की तरफ़ कोई ध्यान नहीं था । फ़िर वे उस बालक को बताने लगे । देखो क यहां से निकलता है ? यहां से जोर देकर बोलो । बालक ने वैसा ही किया । कुछ अस्पष्ट खरखराहट उसके कंठ से निकली । इसके बाद लगभग पचास बार के प्रयास में वह तुरन्त क बोलने लगा । अब ज इस तरह से बोलो । यहां जोर देना हैं ..। पांच छह दिन में ही बालक बिना किसी दवा के
एकदम साफ़ उच्चारण करने लगा । उसका पिता इसको चमत्कार बताते हुये महाराज जी के पैरों में गिर गया । महाराज जी ने कहा । ये कोई चमत्कार नहीं है । इसका स्वर यन्त्र अवरुद्ध था । क च प द ग ह आदि अक्षर कंठ तालु नाभि आदि स्थानों से आते हैं । उन स्थानों पर जोर देकर बोलने से उच्चारण सही होने लगता है । और यन्त्र बखूबी कार्य करने लगता है । जाहिर था । महाराज जी ने मेरी शंका का समाधान निराले अंदाज में किया था । बहुत साधारण तरीका । प्रक्टीकल । और एक जीव का भला ।
यही महाराज जी अपने प्रवचन में हमेशा कहते है कि जानों । जानने से लाभ होता है । मानो मत । मानने से कोई लाभ नहीं होता । उलटे तरह तरह के विचारों से आदमी धर्म को लेकर भृमित हो जाता है । सनातन धर्म के बारे में अनेक धारणायें मानने का ही परिणाम है ।

सोमवार, सितंबर 06, 2010

महाराज जी के प्रवचन का अंश..



जब प्रलय़ होती है । तब प्रथ्वी जल में । जल वायु में । वायु अग्नि में । अग्नि आकाश में । आकाश महतत्व में लय हो जाता है । इसके बाद गूंज रह जाती है । इस तरह प्रलय हो जाती है । इसी गूंज को शब्द कहते हैं । क्योंकि यह ध्वनि जैसा है । इसलिये इसे गूंज कहते हैं । आदि सृष्टि में । जब सबसे पहले परमात्मा द्वारा
प्रथम बार सृष्टि का निर्माण हुआ । इसी गूंज में । हुं । उत्पन्न हुआ । हुं । यानी अहम भाव । या अहम भाव
की स्फ़ुरणा । तब मूल माया उत्पन्न हुयी । इसके बाद दो प्रकृतियां उत्पन्न हुयीं । परा और अपरा । तब इच्छा उत्पन्न हुयी । इच्छा से चाह उत्पन्न हुयी । चाह से वासना पैदा हुयी । और तब उसने सोचा कि कुछ करना चाहिये । तब पांच महाभूत यानी पांच महाशक्तियां उत्पन्न हुयी । फ़िर ये पांच महाभूत आपस में मिश्रित हो गये । और पांच तत्वों की रचना हुयी । प्रथ्वी । जल । वायु । अग्नि । आकाश । उस समय ये सार तत्व या चेतन या परमात्मा पूर्ण था । उसने संकल्प किया कि मैं एक से अनेक हो जाऊं । तब इसके पहले संकल्प से अन्डज की रचना हुयी । दूसरे संकल्प से जलचर यानी कच्छ मच्छ आदि की रचना हुयी । उस समय ये पहली बार घबराया । तब फ़िर से संकल्प किया । और तब वनचर शेर तेंदुआ आदि की रचना हुयी । फ़िर इसके चौथे संकल्प से मनुष्य़ की रचना हुयी । जो आदि मानव हुआ । वायु में प्रथ्वी का भार होता है । अग्नि का तेज होता है । जल की शीतलता होती है । आकाश की मधुरता होती है । उदाहरण जल में से धुंआ निकलता है । वह अग्नि तत्व का होता है । आग पर कपडा रखने से वह भीग ( पसीज ) जाता है । प्रथ्वी में ज्वालामुखी फ़ूटते हैं । ये अग्नि तत्व के उदाहरण हैं । आकाश तत्व में पांचों तत्व सूक्ष्म रूप से मिले हुये हैं । इच्छा खत्म हुयी तो चाह खत्म हो गयी । चाह खत्म हो गयी तो वासना खत्म हो गयी । और ये जैसा का तैसा हो गया । यही वास्तविक मुक्ति है । श्री महाराज जी के प्रवचन से ..।
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लेखकीय - इधर व्यस्तता अधिक है । ब्लाग्स का कार्य न के बराबर हो रहा है । सतसंग में सुने गये दुर्लभ
रहस्य को आपके लिये संक्षेप में प्रकाशित कर रहा हूं ।

महाराज जी के प्रवचन से गूढ दोहे


राम खुदा सब कहें । नाम कोई बिरला नर पावे । है । बिन अक्षर नाम । मिले बिन दाम । सदा सुखकारी ।बाई शख्स को मिले । आस जाने मारी ।
बहुतक मुन्डा भये । कमन्डल लये ।
लम्बे केश । सन्त के वेश । दृव्य हर लेत । मन्त्र दे कानन भरमावे ।
ऐसे गुरु मत करे । फ़न्द मत परे । मन्त्र सिखलावें ।
तेरो रुक जाय कन्ठ । मन्त्र काम नहि आवे । ऐसे गुरु करि भृंग । सदा रहे संग । लोक तोहि चौथा दरसावें ।
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जहां लगि मुख वाणी कहे । तंह लगि काल का ग्रास । वाणी परे जो शब्द है । सो सतगुरु के पास ।
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कोटि नाम संसार में । उनसे मुक्ति न होय । आदि नाम जो गुप्त है । बूझे बिरला कोय ।
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कृत रत नाम जपे तेरी जिह्वा । सत्य नाम सतलोक में लियो महेशी जानि ।
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इन्ड पिन्ड ब्रह्मान्ड से न्यारा । कहो कैसे लख पायेगा । गुरु जौहरी जो भेद बतावे । तब इसको लख पायेगा ।
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घाट घाट चले सो मानवा । औघट चले सो साधु । घाट औघट दोनों तजे । ताको मतो अगाध ।
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अलख लखूं । अलखे लखूं । लखूं निरंजन तोय । हूं सबको लखूं । हूं को लखे न कोय ।
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तोमें राम । मोमें राम । खम्ब में राम । खडग में राम । सब में राम ही राम । श्री महाराज जी के प्रवचन से ..।
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लेखकीय - इधर व्यस्तता अधिक है । ब्लाग्स का कार्य न के बराबर हो रहा है । सतसंग में सुने गये दुर्लभ
रहस्य को आपके लिये संक्षेप में प्रकाशित कर रहा हूं ।

गुरुवार, सितंबर 02, 2010

गुरु मंडल के बारें में जानकारी ।






internet पर कई लोगों ने मुझसे कहा है । कि गुरु जी के सभी फ़ोटो किसी एक ही स्थान पर उपलब्ध करायें । और हम सरलता से आपके गुरुमंडल से जुड सकें । तथा अपनी बात कह सकें । अपने संदेश आप तक भेज सकें । इसलिये कोई व्यवस्था ऐसी होनी चाहिये । इसलिये शीघ्र एक साइट बनाने का विचार हो रहा है । लेकिन तब तक आप ये सुबिधायें अपना सकते हैं । क्योंकि बहुत से लोग ब्लाग comment के द्वारा अपनी बातें कहना पसन्द नहीं करते । ऐसे लोग Face Book पर Rajeev kumar kulshrestha सर्च करके महाराज जी के फ़ोटो और अन्य फ़ोटो जानकारी एक साथ देख सकते हैं । और जुड भी सकते हैं । अपनी बात भी कर सकते हैं । व्यक्तिगत रूप से golu224@yahoo.com और Rajeevkumar230969@yahoo.com पर मेल कर सकते हैं । फ़ोन द्वारा बात करने के लिये श्री महाराज जी ( गुरु जी ) सतगुरु श्री शिवानन्द जी महाराज " परमहंस " का नम्बर 0 9639892934 और मेरा राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ का नम्बर 0 9808742164 है । English में बात करने के लिये shri vinay sharma का नम्बर Mobile No : 0 9873495770 है । English में ही बात करने के लिये एक अनुभवी साधक श्री राधारमण गौतम का नम्बर 0 9760232151 है । internet पर ही मेरे सभी ब्लाग देखने के लिये । राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ । को google search में Copy Pest करें । english में Rajeev kumar kulshrestha को भी Copy Pest कर सकते हैं । satuguru-satykikhoj को भी Copy Pest कर सकते हैं । इसी के साथ अमेरिका के मेरे मित्र त्रयम्बक उपाध्याय ने जो मुझे गुरुजी के नये नये फ़ोटो खींचने का शौक लगा दिया । वह भी मैं गुरु जी के भक्तों शिष्यों के लिये प्रकाशित कर रहा हूं ।

जीव माया की मोह निद्रा में है ।




तेरी अजर बनी अबनौती । इसमें बिगडा बनी न होती ।
कई दिनों बाद पूज्य श्री महाराज जी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ । अबकी बार श्री महाराज जी से एकान्त में गम्भीर वार्ता का काफ़ी समय मिला । और काफ़ी अलौकिक रहस्यों के बारे में जाना । पहले काफ़ी चिल्ला ( डांट ) खायी । क्योंकि आत्म ग्यान में बडे से बडे रहस्य को मौखिक तौर पर जानना तुच्छ समझा जाता है । मुंहजबानी जानने के बजाय साधना से उसे practical स्तर पर जानने का अधिक महत्व होता है । तब मैंने निवेदन किया । महाराज जी सामान्य जन के लिये मौखिक ग्यान प्रेरणा का कार्य करता है । इस पर पहले तो चिल्ला पडी । कि जीव ( आम आदमी ) कहीं भक्ति करना चाहता है ? वह तो धन वासना के पीछे भागता हुआ निरन्तर काल के गाल में जाता हुआ खुश हो रहा है ? तब मैंने निवेदन किया । महाराज जी जीव माया की मोह निद्रा में है । साधु संतों का कार्य ही है । जीव को इस मोह निद्रा से जगाना । हे गुरुदेव । मुझ तुच्छ को आपने ही अहसास कराया । मोह का क्षय हो जाना ही वास्तविक मोक्ष है । न सिर्फ़ बताया । बल्कि मोह का क्षय कैसे होता है । ये सिखाया भी । निर्मल आत्मा का । निज स्वरूप का दर्शन कैसे होता है । इसका सप्रमाणिक रास्ता दिखाया । जिस पर चलते हुये अनेक साधक वास्तविक भक्ति का स्वरूप जान गये । और ग्रहस्थ में रहते हुये भली प्रकार वह भक्ति कर रहे हैं । जो पूर्व में अग्यानतावश समझी जाता था कि हिमालय पर बैठकर ही की जा सकती है ? खैर । अबकी बार जो भी जाना । उसे लगभग सात आठ लेखों में अपने ब्लाग्स में प्रकाशित कर रहा हूं । जो धार्मिक । ऐतहासिक । और ज्योतिष आदि का शोध करने के साथ साथ भक्तों के भी बेहद काम आयेगा । इसी के साथ अमेरिका के मेरे मित्र त्रयम्बक उपाध्याय ने जो मुझे गुरुजी के नये नये फ़ोटो खींचने का शौक लगा दिया । वह भी मैं गुरु जी के भक्तों शिष्यों के लिये प्रकाशित कर रहा हूं ।
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