बुधवार, जनवरी 26, 2011

ज्योति पर ही समस्त योनियों के शरीर बनते हैं ।

अद्वैत वैराग कठिन है भाई । अटके मुनिवर जोगी । अक्षर ही को सत्य बतायें । वे हैं मुक्त वियोगी ।
अक्षरतीत शब्द एक बाँका । अजपा हू से है जो नाका । जाहि लखे जो जोगी । फ़ेर जन्म नहिं होई ।
सही अर्थ..अद्वैत वैराग यानी दूसरा कोई नहीं है । सर्वत्र एक परमात्मा ही है । इस प्रकार का भाव बना पाना अत्यन्त कठिन ही है । जबकि शाश्वत सत्य यही है । अगर इस बात का पक्का निश्चय हो जाय । तो सहज योग साधना एकदम सरल हो जाती है । मामूली धार्मिक जानकारी रखने वाला भी इस बात को जानता है । मगर व्यवहार के तौर पर स्वीकार नहीं कर पाता । तब दो हो जाते हैं । दो होते ही अनेक हो जाते हैं । फ़िर अहम या मैं अत्यन्त प्रबल हो जाता है । और सहज योग जटिल योग जैसा लगने लगता है । इसलिये अद्वैत भाव को कठिन कहा गया है । और ग्यान की बङी बङी खोजों के बाद भी योगी मुनि ऋषि इसी मैं के चलते अटक जाते हैं । यहाँ कुछ लोग क्षणिक भावना में सोच लेते हैं कि मैं मैं को बाधा नहीं बनने दूँगा । पर ये भावनात्मक बात अधिक है । आपका आंतरिक मैं बङा ही प्रबल है । जिस पर करोङों जन्मों का आवरण चङा हुआ है । अक्षर यानी ज्योति को ही सत्य बताने वाले योगी मुक्त वियोगी होते हैं । ये अक्षर पर पहुँचकर रुक जाते हैं । और उसी को अंतिम सत्य मान लेते हैं । अक्षर यानी जिसका क्षय या क्षरण कभी नहीं होता । जो सदा एक ही स्थिति में रहता है । इसी ज्योति पर ही समस्त योनियों के शरीर बनते हैं । एक मामूली मच्छर से लेकर हाथी जैसे शरीर भी इसी ज्योति पर ही बनते हैं ।..अगर इसी को अंतिम सत्य मान लिया जाय । तो यह बात बची रहेगी कि ऐसा आखिर किसकी इच्छा । किसके नियम से हो रहा है ?? इसका मास्टर आखिर कौन है ?? सहज योग इसके भी ( अक्षर ) पार ले जाता है । जहाँ जाप । अजपा । अनहद के मरने की स्थिति बनती है । तब शाश्वत सत्य प्रकट होता है । और इसके बाद आवागमन मिट जाता है ।..वास्तव में जितनी सरलता से यह बात लिखी है । अक्सर मामला उतना सरल होते हुये भी सरल नहीं हो पाता । क्योंकि इस परम ग्यान को भी इंसान सांसारिक व्यवहार की तरह निभाना चाहता है । इसमें सुमरन ( खुद का मरना । शरीर का मरना न समझें ) करना होता है । और यही बात अटकाव वाली है । परमात्मा को पाने में भी इंसान समय । मजबूरी । बिजनेस । परिवार । परिस्थिति का रोना रोता है । ये मेरा 25 साल का अनुभव है । और इस बात से मुझे बङी ही हैरत होती है ।
ग्यान को पन्थ कृपाण की धारा । कहो खगेस को बरनै पारा ।
सही अर्थ...यह प्रसंग कागभुशुण्डि जी द्वारा पक्षिराज गरुण के लिये तुलसी के रामचरितमानस में कहा गया है । इस बात को सुनकर अक्सर ही साधु अकारण भयभीत हो उठते हैं । वे इसका स्थूल अर्थ लगा लेते हैं । कृपाण पर चलना तो बहुत दुखदायी है । परमात्मा के पास जाने में तलवार की धार पर चलना होगा । राम भजो भई राम भजो । ग्यान का मार्ग कृपाण की धार इसलिये कहा गया है कि किसी भी भक्तिमार्ग में चाहे वह द्वैत की हो या अद्वैत की । एक कठिन परीक्षा से गुजरना होता है । जिसमें सांसारिक चुनौतियाँ अंतर में देवताओं अप्सराओं द्वारा पैदा किये विघ्न साधक को कङी अग्निपरीक्षा से गुजारते हैं । और कोई भी साधक इन कङी परिस्थितियों से गुजरकर ही तप की भट्टी में तपकर दैदीप्यमान हो सकता है । जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण मीरा प्रहलाद ध्रुव आदि हुये हैं । ये कृपाण धार पर ही चले थे । अगर जीवन में भी देखा जाय । तो सब कुछ क्या हमें बिना प्रयत्न के हासिल हो जाता है । क्षणभंगुर और किसी भी पल विनाश हो जाने वाली इस उपलब्धि के लिये भी हमें लोहे के चने चबाने पङते हैं । तो दिव्य साधना तो स्थायी सुख शान्ति और भोग ऐश्वर्य प्रदान करती है । तब उसको बातों बातों में सिर्फ़ बातों से कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? क्या ये सोचने की बात नहीं है ।
राम खुदा सब कहें । नाम कोई बिरला नर पावे । है । बिन अक्षर नाम । मिले बिन दाम । सदा सुखकारी ।
बाई शख्स को मिले । आस जाने मारी । बहुतक मुन्डा भये । कमन्डल लये । लम्बे केश । सन्त के वेश । दृव्य हर लेत । मन्त्र दे कानन भरमावे । ऐसे गुरु मत करे । फ़न्द मत परे । मन्त्र सिखलावें । तेरो रुक जाय कन्ठ । मन्त्र काम नहि आवे । ऐसे गुरु करि भृंग । सदा रहे संग । लोक तोहि चौथा दरसावें ।
सही अर्थ - राम खुदा अल्लाह गाड आदि जाने कितने नामों से इंसान भगवान को पुकारता है । और ये अलग अलग उपमायें ही एक बङे कभी न हल होने वाले विवाद का कारण बन चुकी हैं । मेरा भगवान अच्छा । तेरा बुरा । मेरा धर्म अच्छा । तेरा बुरा । ये बात एक बीमारी की तरह फ़ैल गयी है । जबकि कामन रूप से सभी यह मानते हैं कि सबका मालिक एक है । और वो सिर्फ़ एक ही है । फ़िर उसके संदेश द्वेश फ़ैलाने वाले कैसे हो सकते हैं ? वह अपनी ही संतति को झगङे में क्यों डालेगा ? वास्तव में उसका संदेश भी एक ही है । हमारी अल्प समझ और भाषांतर ने एक अबूझ भृम पैदा कर दिया है । इसलिये इस धार्मिक झगङे के बीच वास्तविक नाम कोई बिरला ही जान पाता है । और आश्चर्य कि उस नाम में विश्व की तमाम भाषाओं को कोई अक्षर है ही नहीं । नाम है । लेकिन बिना अक्षर नाम है । अब अक्षर नहीं है । तो वाणी से बताना असंभव ही है । ये नाम अनमोल होने के बाद भी संतो द्वारा पात्र को बिनमोल दिया जाता है । हमेशा के लिये सुखी कर देने वाला यह नाम उसी को मिलता है । जो अपनी समस्त इच्छाओं का त्याग कर पाता है । इसीलिये अब तक आदिकाल से अनगिनत कमन्डल लेकर । लम्बे केश । और संत का वेश बनाकर दूसरों के धन को ठगने वाले । उलटे सीधे मन्त्र बताकर जीव को उचित मार्ग देने के बजाय भृमित और कर देते हैं । इसलिये ऐसे गुरुओं के फ़न्दे से तुम बचकर रहो । सतर्क रहो । जो तुम्हें परमात्मा की प्राप्ति के नाम पर वाणी से जपा जाने वाला कोई मन्त्र बताते हैं । असली नाम जपा नहीं जाता । वह थोङे अभ्यास के बाद चेतनधारा में भूचरी योग से स्वतः प्रकट हो जाता है । तब सिर्फ़ उसको देखा सुना जाता है । इसी को वास्तविक ध्यान । वास्तविक भजन करना कहा जाता है । इसलिये मृत्यु के समय जब गला रुक जाता है । तो वाणी का नाम बोलना असंभव ही होता है । पर असली नाम तो वो है । जिसको बोलना ही नहीं है । इसलिये हमें भृंगी गुरु की ही तलाश करनी चाहिये । जो नाम की गुंजार सुनाता हुआ हमें काल सीमा से परे चौथा लोक दिखाते हैं । कोटि जन्म मुनि जतन कराहीं । अंत राम कह आवत नाहीं ।

क्या यही परमात्मा है ?

2009 may की एक चिलचिलाती दोपहर थी । मैं अपने गुरुभाई गौतम के साथ तपोभूमि में बैठा हुआ था । उधर से गुजरते हुये मेरा इरादा किसी महात्मा के साथ बात करते हुये समय का सदुपयोग करना था । लेकिन अन्दर जाकर पता चला कि सभी महात्मा अपने अपने कक्ष में या पेङों की छाँह में औंघ रहे थे । एकाध महात्मा को राम राम श्याम श्याम करते हुये छेङने की कोशिश भी की । तो उन्होंने अधमुंदी आँखों से ही.. जय हो जय हो.. कहते हुये पुनः निद्रासन लगा लिया ।..जाने भी दो यारो..सोचते हुये मैं एक वृक्ष के नीचे बैठे हुये उस समय के बारे में सोचने लगा । जब 110 वर्ष पूर्व यह स्थान एक जंगल था । जहाँ दोपहर के इस समय तमाम चरवाहे आकर विश्राम करते हुये एकत्र महात्माओं से दुर्लभ ग्यान सुनते थे । पर इन सबसे बेखबर जमीन में अन्डरग्राउन्ड बनी एक छोटी सी कच्ची गुफ़ा में एक तपस्वी वर्षों से साधना में लीन थे । साधना उस स्तर पर पहुँच गयी थी कि गुफ़ा की दीवारों से स्वतः ही हरिहर..हरिहर का शब्द अनेक स्थानों से उच्चरित हो रहा था । इस बिना किसी माध्यम के होते शब्द को सुनने तमाम लोग आये । और तपस्वी का नाम ही हरिहर बाबा पङ गया । सच्चे संतो की इस तरह की तपस्थली की खासियत ही यह होती है कि यदि आप गहराई से किसी पूर्व समय का चिंतन करते हैं । तो TRANS होकर TRANCE में पहुँच जाते हैं । मेरे इस TRANCE को उस समय झटका सा लगा । जब तपोभूमि में एक ई बाइक आकर रुकी । और उससे दो युवतियाँ उतरी । मैंने गौतम की तरफ़ देखा । वह मन्त्रमुग्ध सा पेङ पर चहचहाती चिङियों को देख रहा था । ई बाइक से आने वाली महिलाओं में एक लगभग 37 वर्ष की सरदारनी थी । और दूसरी उसकी 17 साल की बेटी थी । उन्होंने एक उङती सी निगाह हम दोनों पर डाली । और सीधी दर्शन हेतु दिव्यगुफ़ा में चली गयीं । गूलर के वृक्ष से हर दो तीन सेकेंड में टपटप गूलर गिर रहे थे ।
दर्शन के बाद बाहर आकर उन दोनों ने किसी बुजुर्ग महात्मा की तलाश में इधर उधर देखा । पर सभी सोये हुये थे । वे अपनी बाइक की तरफ़ बङी । मैंने गौतम को इशारा किया । उसने एक्सक्यूज मी..कहते हुये मेरी तरफ़ इशारा कर दिया । दोनों ने कुछ आश्चर्य से मेरी तरफ़ देखा । मैंने जय गुरुदेव की अभिवादन करते हुये उनसे बात शुरू की ।
दरअसल मेरी जिग्यासा उनके बारे में जानने की थी । मैंने उनके गुरूजी के बारे में । उनके निवास आदि के बारे में बात की । जिसका उन्होंने बेहद झिझकते हुये उत्तर दिया । उन्हें नामदान लिये हुये लगभग आठ साल हो गये थे । बस यही तो वो बात थी । जिसके लिये मैंने उन्हें रोका था । मैंने कहा । कितनी देर तक अभ्यास कर लेती हो ? और अभ्यास कहाँ तक पहुँचा ?
इस पर माँ ने उत्सुकता से कहा । हमें जी । हमारे गुरुजी का दर्शन होता है । लङकी कुछ न बोलते हुये हमें देख रही थी । जब गौतम की हँसी न रुकने में आयी । तो वह चिङियों के बहाने ऊपर पेङ की ओर देखने लगा । ठहाका लगाने को इच्छुक अंतर्मन को मैंने बलपूर्वक नियंत्रित किया । और ऊपर से शालीनता से बोला । बहुत सुन्दर..अंतर में गुरुजी का दर्शन होना बङी उपलब्धि होती है । वैसे आपने और क्या क्या अनुभव किया ? क्योंकि गुरु के दर्शन से पहले बहुत कुछ रमणीय स्थल । चित्र विचित्र स्थान । डरावने सुखद अनुभव भी होते हैं ।
इस पर सरदारनी जी सकपका गयीं । झूठ आखिर कोई इंसान कितना बोल सकता है ? मैंने भी ये जाहिर नहीं किया । कि उनकी बात मुझे झूठ लगी थी । और कुछ सामान्य बातें करते हुये उन्हें सही बात बताने लगा । पहले कुछ बोरियत सी महसूस कर रही युवा लङकी सतर्क होकर दिलचस्पी से मेरी बात सुनने लगी । अच्छा जी । आप लोग कभी घर अवश्य आना । कहकर वे चली गयीं ।
मैं फ़िर से सोचने लगा । मैंने कहा । गौतम कितने ताज्जुब की बात है । शाश्वत सत्य का मार्ग चुनने के बाद । सत्यनाम की दीक्षा के बाद भी इंसान व्यवहारिक जिन्दगी की तरह यहाँ भी झूठ बोलता है । तुम एक अनुभवी साधक हो । यही प्रश्न अगर मैं तुमसे करता । तो क्या जबाब देते ?
गौतम ने कहा । राम भजो महाराज । अंतर में गुरु के दर्शन की विलक्षता को वाणी बयान भी नहीं कर सकती । अभी तो..वहाँ तक पहुँचने की बात मेरे लिये एक हसीन सपने के समान ही है ।
तमाम मत । तमाम मंडल । तमाम पंथ । तमाम साधुओं से जब भी मेरी बात होती है । तो मेरी समस्त जिग्यासा इसी बात को लेकर होती है । कि साधना का जो पथ चुनते हुये उन्होंने किसी मन्त्र से दीक्षित होकर जिन्दगी से पलायन किया । तो आखिर इस वैराग का फ़ल क्या मिला ?
कहीं ..दुविधा में दोनों गये । माया मिली ना राम..वाला हिसाब तो नहीं हो रहा । और आश्चर्य इस बात का अपनी प्राप्ति को जोरशोर से बताने वाले कुछ ही देर में लङखङा गये । और..महाराज..महाराज करने लगे । झूठ बोलने से क्या लाभ हो सकता है ? सिर्फ़ दूसरे के सामने अपने को ऊँचा साबित करना या अपने झूठे अहम की तुष्टि । 70 साल तक के हो चुके अनुभवी बुजुर्ग । जो किसी साधना मार्ग में 40 साल से हैं । वही एक । कई लोगों से सुनी सुनाई बात दोहराते हैं ।.. कुछ धुँधले धुँधले से चित्र दिखते हैं । जिसमें पहाङ घाटियाँ वृक्ष आदि दिखते हैं । ( और ये सच भी है । कुछ लगनशीलों को इतना दिखता भी है । ) पर क्या यही परमात्मा है ? यही दिव्य साधना है ? यही वो ग्यान है ? जिसके लिये करोङो वर्षों से तमाम ऋषि मुनि महर्षि अपने शरीर को गलाते रहे हैं । वृक्ष । पहाङ । घाटियाँ आदि सुरम्य स्थल मेरे घर से सिर्फ़ दो किमी दूर हैं । अगर वर्षों की साधना का फ़ल इन्हीं को देखना है । तो बिना किसी साधना के मैं प्रत्यक्ष इन्हें न सिर्फ़ कुछ ही मिनटों में देख सकता हूँ । बल्कि साथ में छोटे छोटे बच्चों को भी दिखा सकता हूँ ।
वास्तव में अंतर के तमाम बेहद निचले मंडलों में भी शुरूआत के समय यही दृश्य अक्सर पहले आता है । और इसका महत्वपूर्ण कारण ये है कि समस्त दृश्य अदृश्य सृष्टि अन्दर बाहर लगभग एक समान ही है । बस कहीं ये दिव्य । कहीं अति दिव्य । कहीं साधारण । और कहीं निम्न है । इसी हिसाब से इनकी निर्धनता और ऐश्वर्य झलकता है । इस तरह आप किसी बेहद निचले मंडल । तांत्रिक मंडल । प्रेतलोक आदि में भृमण कर भी लेते हैं ? और आपको सही बोध न होने के कारण । उसी को साधना का पूर्ण होना मान लेते हैं । यह कितनी बङी भूल है । सही मार्गदर्शन न होने से ऐसे ही साधक किसी नीच मंडल की आत्माओं से अटैच्ड होकर छोटे मोटे चमत्कार दिखाने लगते हैं । और पतन की उस गहरी घाटी में चले जाते हैं । जिसका अंत लाखों वर्ष का कठोर नर्क ही है । तब ऐसी साधना से क्या लाभ ? इससे अच्छा तो आप साधारण जीवन गुजारें । जिससे व्यर्थ का नर्क तो नहीं भोगना होगा ।
अद्वैत वैराग कठिन है भाई । अटके मुनिवर जोगी । अक्षर ही को सत्य बतायें । वे हैं मुक्त वियोगी ।
अक्षरतीत शब्द एक बाँका । अजपा हू से है जो नाका । जाहि लखे जो जोगी । फ़ेर जन्म नहिं होई ।

संतों को धोखा देने का मतलब ।

2009 के april महीने की बात है । दोपहर का समय था । मैं अपने घर से 400 मीटर की दूरी पर कंज के वृक्ष के नीचे बैठा था । कंज की घनी छाया और मन्द मन्द चलती हवा एक अजीव सा सकून दे रही थी । तभी मेरे पास एक तन्दुरुस्त 36 साल का व्यक्ति आया । और जय सियाराम महाराज करके बैठ गया । उस समय मैं अपनी ही सोचों में खोया था । मैं अपनी इस जीवन यात्रा को शीघ्र समाप्त कर वापस जाना चाहता था । जब सच्चा वैराग्य जागृत हो जाता है । संसार असार और नीरस हो जाता है । फ़िर देर तक ठहरने की इच्छा समाप्त हो जाती है । रामकृष्ण परमहँस । विवेकानन्द । रामतीर्थ । आदि शंकराचार्य । ग्यानेश्वर आदि सभी लगभग 40 की आयु से पहले ही चले गये । लेकिन ग्यान में अपनी मर्जी नहीं चलती । जो जिसका निमित्त है । उसे वो कार्य करना ही होगा । भले ही वो उसे रुचिकर लगे । अथवा न लगे ।
मैं इसी प्रकार की सोच में डूबा हुआ था । जबकि उस आदमी की बात पर मेरा ध्यान भंग हुआ । वह मुझसे कह रहा था । महाराज जी । अगर इजाजत हो तो एक बात पूछना चाहता हूँ ? जिसकी मुझे अन्दर से प्रेरणा सी हो रही है ।
मेरे..कहिये..कहने पर उसके चेहरे पर एकदम आशा की किरणें सी चमकने लगी । और वह बोला । बस इतना सही सही बता दीजिये कि मैं जीवित रहूँगा या मर जाऊँगा ? बात चाहे जो भी हो । बताना । एकदम सही ।
तब पहली बार मेरा ध्यान उस पर गया ।
उसका नाम गोपालदास । काल्पनिक । था । गोपालदास को मुँह का भयानक केंसर हुआ था । जिसका आपरेशन हो चुका था । और जिसका घुमावदार चीरे का लगभग आठ इंच निशान उसके गाल पर मौजूद था । गोपालदास आगरा से 150 किमी दूर एक स्थान का रहने वाला था । और केंसर के कीटाणु नष्ट करने हेतु होने वाली सिकाई के लिये आगरा में रुका हुआ था ।
उसने एक ऐसा विचित्र सवाल किया था । जो सबकी जिन्दगी का एक महत्वपूर्ण सवाल था । पर विपदा और मृत्यु सम स्थिति में ही याद आता है ।..लेकिन पता होने पर भी जिसका कोई ज्यों का त्यों उत्तर नहीं दे सकता । अतः मैंने कहा । इस तरह निराश क्यों होते हो । आजकल बङे बङे रोग ठीक हो जाते हैं ।
पर उसे न जाने क्यों आभास हो रहा था कि अब वह मर जायेगा । तब मैंने उसे नाम ( ढाई अक्षर का महामन्त्र ) की महिमा सुनाकर सतसंग दिया । जिसके अनुसार मृत्यु भी टल जाती है । हालात कुछ ऐसे हो गये कि उसके बेहद गिङगिङाने पर मैंने उसकी अर्जी लगा दी । क्योंकि उसने कहा । यदि फ़िर से उसे नया जीवन मिल जाता है । तो वह पूरी श्रद्धाभक्ति से नाम की कमाई करेगा । और अपनी कमाई का 25 % धार्मिक कार्यों में लगायेगा । इस प्रकार के दो कौल उसने भरे । मैंने उसकी गुरूजी से भी बात करा दी ।
अब वह रोज ही मेरे पास बैठने लगा । उसकी सिकाई सप्ताह में दो दिन ही होती थी । एक दिन उसने कहा । जब वह मेरे पास बैठकर प्रभु का नाम सतसंग सुनता है । तो उसका दर्द एकदम गायब हो जाता है । जबकि वैसे उसे काफ़ी परेशानी होती है । मैंने कहा । जब स्थिति थोङा ठीक हो जाय । तब वह महाराज जी से विधिवत नामदान ले लें । उसने खुशी से कहा । मैं स्वयँ भी ऐसा ही चाहता हूँ ।
..कुछ ही दिनों में उसके स्वास्थय में सुधार होने लगा । उसके चेहरे पर जिन्दगी की उमंग फ़ैलने लगी । मरने की बात तो मानों वह भूल ही गया । खैर..दो महीने बाद सिकाई करा के वह वापस घर चला गया । दीक्षा भी उसने बीच में समय मिलने पर ले ली थी । वह मुझसे समय समय पर फ़ोन पर बात भी करता रहता था । और दस बीस मिनट भजन का अभ्यास भी करता । चार महीने बाद वह थोङी थोङी रोटी भी खाने लगा । और पुनः अपने काम पर जाने लगा ।
लेकिन..धीरे धीरे ठीक होने के साथ साथ उसके महाराज जी में भाव कम होने लगे । नाम अभ्यास भी ठीक से नहीं होता था । कौल भंग होने से महाराज जी पर उस बीमारी का प्रभाव होने लगा । और उनके जाँघ में लम्बे फ़ोङे होने लगे । पर महाराज जी ने इस बारे में मुझे कभी कुछ नहीं बताया । मुझे महाराज जी के फ़ोङे होने पर बेहद आश्चर्य हो रहा था । तब एक बार उन्होंने कहा । जरूरी नहीं । हरेक परेशानी अपनी ही हो । कोई भी अर्जी भावना में बहकर लगाना उचित नहीं होता । दूसरे का दन्ड भोगना पङ सकता है । मैंने सबक लेते हुये आगे के लिये । हमेशा के लिये कान पकङ लिये । कुछ दिन में फ़ोङे ठीक हो गये ।
उधर गोपालदास तेजी से ठीक होने लगा । पर एक दिन वह बङी गलती कर ही गया । हुआ ये कि महाराज जी और उसका बीस कदम की दूरी से भेंटा हो गया । और उसने मर्यादा अनुसार गुरु को प्रणाम करने की कोई कोशिश नहीं की । उल्टे वह निगाह चुराने की कोशिश करने लगा । गुरूजी और गोपालदास दोनों को ही जानने वाले एक आदमी ने कहा भी । कि तुम्हारे गुरूजी हैं वहाँ ।
उसने कहा । बने रहने दो गुरूजी ?
बस यही गलती हो गयी । सतनाम में हर बात जिन्दगी की तरह हँसीमजाक नहीं होती । वह नहीं जानता था कि कितनी बङी भूल हो गयी । उसी क्षण उसकी अरजी केंसिल हो गयी ? महाराज जी ने उससे कुछ नहीं कहा । और अपने गंतव्य चले गये ।
दो महीने बाद...महाराज जी उसी के गाँव के पास थे । जब गोपालदास के पिताजी बङी विनती करते हुये महाराज जी को अपने घर ले गये । गोपालदास और उसकी पत्नी उसके पिता आदि सभी रोते हुये महाराज जी के पैरों में गिर पङे । और रोते हुये बोले । हमसे बङी भूल हुयी । हमने आपको पहचानने में गलती कर दी । किसी तरह इस बार और बचा लो ।
गोपालदास का रोग उखङ गया था । और उसे भयंकर TB भी हो गयी थी । वह एकदम कमजोर और शक्तिहीन हो गया था । वह और उसका घर बारबार महाराज जी से कृपा करने की कहने लगे । मेरे द्वारा सिम बदल लेने पर उनके पास मेरा नम्बर नहीं था । अन्यथा वह मुझसे भी कहते । उस सिम के खो जाने से उनका नम्बर भी मेरे पास नहीं रहा था ।
महाराज जी ने कहा । हर बात हँसीमजाक नहीं होती । सच्ची भक्ति और साधु का अकारण तिरस्कार बेहद दन्डनीय होता है । इसकी सहज माफ़ी नहीं होती । फ़िर भी तुम अधिक से अधिक नाम की कमाई करो । भले ही तुम मर भी जाओ । तो भी इससे बहुत लाभ होगा । और कृपा हो गयी । तो जीते भी रह सकते हो । इससे ज्यादा कहने को मेरे पास कुछ भी नहीं है । बाद में..यह बात श्री महाराज जी ने मुझे बतायी । पर कौल भंग और मर्यादा न निभाने के कारण मुझे अब कोई सहानुभूति नहीं थी ।
साहिब से सांचे मिलो । साधु मिलो सतभाव । दुनियाँ से ऐसे मिलो । जैसो जाको भाव ।

शनिवार, जनवरी 01, 2011

ईश्वर भी वहीं से आए ?


अनामी पुरूष सबके कर्ता धर्ता हैं । इन्होंने अपनी इच्छा से । अपनी मौज से अगम लोक की रचना की । और अगम पुरूष को स्थापित किया । फिर अलख लोक की रचना की । और अलख पुरूष को स्थापित किया । ये ही वो मालिक हैं । जिन्होंने सतलोक की रचना की । और सतपुरूष को स्थापित किया । अनामी पुरूष ने जो तीनों लोक अपने से अलग स्थापित किए । ये तीनों लोक । तीनों देश एकरस हैं । नीचे की रचना का विस्तार सतपुरूष ने किया । एक आवाज ?? इतनी जोर की सतपुरूष में से निकली । जो अनन्तों मण्डल । अनन्तों लोक । जो गिनती में नहीं आ सकते । उसकी रचना कर दी । ये सारे के सारे मण्डल । लोक इसी सतपुरूष की आवाज पर टिके हुऐ हैं । जब ये लोक सतपुरूष ने तैयार कर दिए । तो अपने देश से दो धाराएं निकाली । एक काल की । और दूसरी दयाल की धारा । फिर एक आवाज चली । जो उसमें से निकाल कर ले आई । उन्होंने अपने देश से अलग ईश्वर । ब्रह्म । पारब्रह्म और महाकाल को उसी आवाज पर स्थापित कर दिया । उसी आवाज पर ? उसी शब्द पर ? उसी वाणी पर ? उसी नाम पर ? ये सबके सब उसी सतपुरूष का अखण्ड ध्यान करते रहे । तपस्या करते करते इतने युग बीत गए कि कलम स्याही और कागज नहीं है । जो लिखा जा सके । तब जाकर सतपुरूष प्रसन्न हुए । और पूछा कि तुम क्या चाहते हो ? उन्होंने कहा कि हमको एक राज्य दे दीजिए । जीवात्माओं के बगैर राज्य नहीं हो सकता था । तब उन्होंने जीवात्माओं को दे दिया । ये सभी जीवात्माए । जो सभी मण्डलों में हैं । उसी सतपुरूष के देश सतलोक से उतार कर नीचे लाईं गईं । ईश्वर भी वहीं से आए ? ब्रह्म भी वहीं से आए । और पारब्रह्म भी वहीं से आए । सभी जीव वहीं से आए । पूरा मसाला जितना भी कारण का । सूक्ष्म का । लिंग का । स्थूल का । ये सब तथा जिसमें आप रहते हें । यानि पंचभौतिक शरीर । पृथ्वी । जल । वायु । अग्नि । आकाश ये सब मसाले वहीं से आए । सभी जीवात्माओं । रूहों यानि सुरतों का एक ही रास्ता आने का और जाने का है । सभी एक ही रास्ते । शब्द । आवाज । देववाणी से उतार कर लाई गईं । और दूसरा कोई रास्ता है ही नहीं । बहुत युग बीत गए । जीवात्माओं को उतारते उतारते । जब उतारकर ले आए । तो पहला कपड़ा कारण का । दूसरा सूक्ष्म का । तीसरा कपड़ा लिंग का । और चौथा कपड़ा मनुष्य शरीर । पांच तत्वों का । पृथ्वी । जल । अग्नि । वायु और आकाश । इसके ऊपर यानी आँखों के ऊपर स्वर्गलोक है । बैकुण्ठलोक है । यह लिंगतत्व है । स्थूल का नहीं यानी पृथ्वी । जल । अग्नि । वायु और आकाश वहाँ नहीं हैं । दस इन्द्रियाँ । चतुष अन्तःकरण । बुद्धि । चित्त और अहंकार । फिर तीन गुण । सतोगुण । रजोगुण और तमोगुण । इन सत्रह तत्वों का लिंग शरीर है । और वह स्वर्ग बैकुण्ठलोक है । इनके परे नौ तत्वों का शरीर । शब्द । स्पर्श । रूप । रस । गंध फिर मन । बुद्धि । चित्त और अहंकार का सूक्ष्म कपड़ा है । इसके बाद कारण कपड़ा पहनाया गया । जो पांच तत्वों का है । शब्द । स्पर्श । रूप । रस और गंध । इसकी भी हदबंदी है । फिर इसके बाद जीवात्मा । जो दोनों आँखों के बीचोंबीच बैठी है । जब कारण कपड़ा छोड़ दिया । तो शब्द रूप हो जाती है । इतने कपड़ों में बांधकर ये जीवात्मा लाई गई । अब बिना महापुरूषों की दया के वापस अपने घर सतलोक नहीं जा सकती । आने जाने वाला मिलना चाहिए । जो इन कपड़ों को उतार चुका हो । और जिसकी सुरत शब्द रूप हो गई हो । वही इन जीवों को ले जा सकता है । और कोई नहीं ।
** श्री Udit bhargava जी द्वारा मेरे लेख after 10 year साधना इसको देख सकते हैं । पर । comment के रूप में दी गयी ये जानकारी । जो किसी संत मत sant mat की पुस्तक से ली गयी है । उपयोगी होने के कारण प्रकाशित कर रहा हूं । इसमें जो विवरण हैं । वह काफ़ी हद तक ठीक कहा जा सकता है । पर इसमें सत्यता प्रतीकात्मक रूप में है । जो मेरे विचार से दुर्लभ संत मत sant mat ग्यान को न जानने वाले को थोडा सा उलझाती और भृमित सी करती है । तथापि ये जानकारी अन्य धार्मिक लेखों की तुलना में बेहद उपयोगी है । बस इसको पढते समय यही ध्यान रखें कि ये प्रतीकात्मक अधिक है । आपका बहुत बहुत आभार । श्री Udit bhargava जी । राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ।

मौत का आहवान


महापुरूष रामतीर्थ - 22 अक्टूबर । 1873 को गुजरांवाला में एक बालक जन्मा । नाम रखा गया । तीर्थराम । पढने लिखने में कुशल तीर्थराम ने पंजाब भर में प्रथम स्थान प्राप्त एंट्रेंस परीक्षा उत्तीर्ण की । लाहौर जैसे शहर में छात्रवृति एवं टयूशन द्वारा खर्च निकालकर वे पढते रहे । बीए. में फिर वे प्रथम आए । एम.ए. का फार्म भर रहे थे तो अँगरेज प्रिंसिपल ने बडे़ स्नेह से पूछा, "क्या मैं तुम्हारा नाम इंडियन सिविल सर्विसेज (आई.सी.एस.) के लिए भेज दूँ । तुम योग्य हो । " तीर्थराम बोले ," मैंने यह ज्ञान का खजाना धन या उच्च पद पाने के लिए नहीं पाया । मै इस दौलत को बाँटना चाहता हूँ । मै सारा जीवन प्रभु की इस मानव जाति की सेवा करुँगा । तीर्थराम पर स्वामी विवेकानंद । जो उनसे दस वर्ष बडे थे । का बड़ा प्रभाव था । एक दिन वे उत्तराखंड के जंगलों की और निकल गए । नारायण स्वामी से उनका साक्षात्कार हुआ । यहीं वे रामतीर्थ बने । टेहरी नरेश के आग्रह पर । वे टोकियो में आयोजित विश्वधर्म सम्मेलन में गए । जापान । अमेरिका । यूरोप तथा मिस्र में उनने व्यावहारिक वेदांत की शिक्षा दी । सन 1906 की दीपावली पर उनकी लिखी । मौत का आहवान । नामक रचना अपने शिष्य को सौपने के बाद तैतीस वर्ष आयु में ही भागीरथी में जल समाधि ले ली । धन्य है यह देश । भारत । जहाँ ऐसे महापुरूष जन्मे ।
मौत का आहवान - 1909 की बात है । मथुरा नगर में आयोजित एक धर्म सम्मेलन में सभी धर्मों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया । सम्मेलन के अध्यक्ष थे । स्वामी रामतीर्थ । जिनकी प्रसिद्धि अच्छी खासी तब तक हो चुकी थी । न उनका कोई मठ था । न कोई आश्रम । ईसाइ धर्म के प्रतिनिधि फादर स्कॉट ने अपने धर्म का विवेचन करते हुए हिंदू धर्म पर कुछ भोंडे आक्षेप किए । यह उसने जान बूझकर किया था । ताकि लोग उत्तेजित हों । श्रोतागण क्षुब्ध हो गए । स्वामी जी ने सबको शांत रहने का आग्रह करते हुए बड़ी विनम्रता से फादर स्कॉट के एक एक आक्षेप का विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया । सबके समक्ष फादर ने माफी माँगी । वस्तुत: यह स्वामी जी के व्यक्तित्व । वाणी के तेज एवं उनके वाक चातुर्य के साथ अगाध ज्ञान का ही परिणाम था । तीर्थराम से रामतीर्थ बने स्वामी जी ने 1906 की दीपावली के दिन । मौत का आह्वान । नामक लेख लिखा और यह कहते हुए ," ऐ माँ की गोद के समान । शांतिदायिनी मृत्यु । आओ । इस भौतिक शरीर को ले जाओ । मैं शुद्ध । बुद्ध । निरूपाधि ब्रह्म हूँ । " गंगा में जलसमाधि ले ली । धन्य है भारतवर्ष । जिसे ऐसे संत । महापुरूषों की थाती मिली है ।
माथे पर तो भारत ही रहेगा - अपने ढाई वर्ष के अमरीकी प्रवास में स्वामी रामतीर्थ को भेंटस्वरूप जो प्रचुर धनराशि मिली थी । वह सब उन्होंने अन्य देशों के बुभुक्षितों के लिए समर्पित कर दी । उनके पास रह गयी । केवल एक अमरीकी पोशाक । स्वामी राम ने अमरीका से वापस लौट आने के बाद वह पोशाक पहनी । कोट पैंट तो पहनने के बजाय उन्होंने कंधों से लटका लिये और अमरीकी जूते पाँव में डालकर खड़े हो गये । किंतु कीमती टोपी की जगह उन्होंने अपना सादा साफा ही सिर पर बाँधा ।
जब उनसे पूछा गया कि इतना सुंदर हैट तो आपने पहना ही नहीं ? तो बड़ी मस्ती से उन्होंने जवाब दिया ." राम के सिर माथे पर तो हमेशा महान भारत ही रहेगा । अलबत्ता अमरीका पाँवों में पड़ा रह सकता है..। " इतना कह उन्होंने नीचे झुककर मातृभूमि की मिट्टी उठायी और उसे माथे पर लगा लिया ।
** श्री राजेंद्र माहेश्वरी जी द्वारा मेरे लेख जब सृष्टि 3 घन्टे को रुक गयी ?? पर comment के रूप में दी गयी । स्वामी रामतीर्थ । के बारे में यह जानकारी उपयोगी होने के कारण लेख रूप में प्रकाशित कर रहा हूं । श्री राजेंद्र माहेश्वरी जी । आपका बहुत बहुत आभार । महान संत स्वामी रामतीर्थ । के बारे में और जानने के लिये जब सृष्टि 3 घन्टे को रुक गयी ?? को भी पढें । राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ।
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