शुक्रवार, जून 24, 2011

आत्मस्वरूप परमात्मा का वास्तविक नाम विदेह है

कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! जब तक देह से परे विदेह नाम का ध्यान होने में नहीं आता । तब तक जीव इस असार संसार में ही भटकता रहता है । विदेह ध्यान और विदेह नाम इन दोनों को अच्छी तरह से समझ लेता है । तो उसके सभी संदेह मिट जाते हैं ।
जब लग ध्यान विदेह न आवे । तब लग जिव भव भटका खावे ।
ध्यान विदेह और नाम विदेहा । दोउ लखि पावे मिटे संदेहा ।
मनुष्य का 5 तत्वों से बना यह शरीर जङ परिवर्तनशील तथा नाशवान है । यह अनित्य है । इस शरीर का एक नाम रूप होता है । परन्तु वह स्थायी नहीं रहता । राम कृष्ण ईसा लक्ष्मी दुर्गा शंकर आदि जितने भी नाम इस संसार में बोले जाते हैं । ये सब शरीरी नाम हैं । वाणी के नाम हैं ।
लेकिन इसके विपरीत इस जङ और नाशवान देह से परे उस अविनाशी चैतन्य शाश्वत और निज आत्मस्वरूप परमात्मा का वास्तविक नाम विदेह है । और ध्वनि रूप है । वही सत्य है । वही सर्वोपरि है । अतः मन से सत्यनाम का सुमरन करो । वहाँ दिन रात की स्थिति तथा प्रथ्वी अग्नि वायु आदि 5 तत्वों का स्थान नहीं है ।  वहाँ ध्यान लगाने से किसी भी योनि के जन्म मरण का दुख जीव को प्राप्त नहीं होता । वहाँ के सुख ( ध्यान में मिलने वाला ) आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता । जैसे गूँगे को सपना दिखता है । वैसे ही जीवित जन्म को देखो । जीते जी इसी जन्म में देखो ।
हे धर्मदास ! ध्यान करते हुये जब साधक का ध्यान क्षण भर के लिये भी विदेह परमात्मा में लीन हो जाता है । तो उस क्षण की महिमा आनन्द का वर्णन करना असंभव ही है । भगवान आदि के शरीर के रूप तथा नामों को याद करके सब पुकारते हैं । परन्तु उस विदेह स्वरूप के विदेह नाम को कोई विरला ही जान पाता है ।
 जो कोई चारों युगों सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग में पवित्र कही जाने वाली काशी नगरी में निवास करे । नैमिषारण्य बद्रीनाथ आदि तीर्थों पर जाये । और गया द्वारका प्रयाग में स्नान करे । परन्तु सार शब्द ( निर्वाणी नाम ) का रहस्य जाने बिना वह जन्म मरण के दुख और बेहद कष्टदायी यमपुर में ही जायेगा । और वास करेगा ।
हे धर्मदास ! चाहे कोई 68 तीर्थों मथुरा काशी हरिद्वार रामेश्वर गंगासागर आदि में स्नान कर ले । चाहे सारी प्रथ्वी की परिकृमा कर ले । परन्तु सार शब्द का ग्यान जाने बिना उसका भृम अग्यान नहीं मिट सकता ।
हे धर्मदास ! मैं कहाँ तक उस सार शब्द के नाम के प्रभाव का वर्णन करूँ । जो उसका हँसदीक्षा लेकर नियम से उसका सुमरन करेगा । उसका मृत्यु का भय सदा के लिये समाप्त हो जायेगा ।
सभी नामों से अदभुत सत्यपुरुष का सार नाम सिर्फ़ सदगुरु से ही प्राप्त होता है । उस सार नाम की डोर पकङकर ही भक्त साधक सत्यलोक को जाता है । उस सार नाम का ध्यान करने से सदगुरु का वह हँस भक्त 5 तत्वों से परे परम तत्व में समा जाता है । अर्थात वैसा ही हो जाता है ।

सार शब्द रहस्य पर लेख शीघ्र प्रकाशित होगा ।

हरेक के लिये एक बेहद प्रभावी सरल सहज सत्यपुरुष की स्तुति

हमारे कई साधकों पाठकों मित्रों ने एक ऐसी सहज सरल स्तुति की माँग की । जिससे दीक्षा वाले लोग जिनका ध्यान कठिनाई से लगता है । आसानी से ध्यान लगा सकें ।
तथा जिन लोगों की दीक्षा अभी नहीं हुयी है । वे भी कुछ तो सत्य का बोध कर सके । धर्म में प्रचलित कई चालीसाओं आदि की तरह ये बेहद प्रभावी स्तुति है । आप इसको जीवन में अपना कर देखें । और तुरन्त इसका लाभ महसूस करें । ये स्तुति भाव परमात्मा को ध्यान रखकर करें ।

सत्यनाम सुमिरो मन माँही । जहँवा रजनी वासर नाहीं ।
आदि अंत नहीं धरन अकाशा । पावक पवन न नीर निवासा ।
चन्द सूर तहँवा नहि कोई । प्रात सांझ तहवां नहि दोई ।
कर्म धर्म पुन्य नही पापा । तहवां जपियो अजपा जापा ।
झलमलाट चहुँ दिस उजियारा । वरषे जहाँ अगर की धारा ।
तँह सतगुरु को आसन होई । कोटि माहिं जन पहुँचे कोई ।
दसों दिशा झिलमिल तहाँ छाजा । बाजे तहाँ सु अनहद बाजा ।
तहवां हँसा ध्यान लगावे । बहुरि न जोनी संकट आवे ।
जहवां को सुख वरनि न जाई । सतगुरु मिले तो देय लखाई ।
ज्यों गूँगा को सपना देखो । ऐसो जीवित जन्म को लेखो ।
छन इक ध्यान विदेह समाई । ताकी महिमा वरणि न जायी ।
काया नाम सबै गोहरावे । नाम विदेह विरला कोई पावे ।
जो युग चार रहे कोई कासी । सार शब्द बिन यमपुर वासी ।
नीमसार बद्री पर धामा । गया द्वारका प्राग अस्नाना ।
अङसठ तीरथ भू परकरमा । सार शब्द बिन मिटे न भरमा ।
कँह लग कहों नाम परभाऊ । जो सुमरे जम त्रास नसाऊ ।
सार नाम सतगुरु सों पावे । नाम डोर गहि लोक सिधावे ।
धर्मराय ताको सिर नावे । जो हँसा निःतत्व समाबे ।
सार शब्द विदेह स्वरूपा । निःअक्षर वह रूप अनूपा ।
तत्व प्रकृति भाव सब देहा । सार शब्द निःतत्व विदेहा ।
कहन सुनन को शब्द चौधारा । सार शब्द सों जीव उबारा ।
पुरुष सो नाम सार परवाना । सुमिरन पुरुष सार सहिदाना ।
बिनु रसना के जाप समाई । तासों काल रहे मुरझाई ।
सूच्छम सहज पँथ है पूरा । ता पर चढो रहे जन सूरा ।
नहिं वह शब्द न सुमरन जापा । पूरन वस्तु काल दिखदापा ।
हँस भार तुम्हरे सिर दीन्हा । तुमको कहो शब्द को चीन्हा ।
पदम अनंत पंखुरी जाने । अजपा जाप डोर सो ताने ।
सूच्छम द्वार तहाँ जब दरसे । अगम अगोचर सतपद परसे ।
अंतर शून्य मंह होय परकासा । तहवां आदि पुरुष का वासा ।
ताहि चीन्ह हँसा तंह जायी । आदि सुरति तहं लै पहुँचायी ।
आदि सुरति पुरुष को आही । जीव सोहंगम बोलिये ताही ।
धर्मदास तुम संत सुजाना । परखो सार शब्द निरवाना ।
अजपा जाप हो सहज धुनि । परखि गुरु गम लागिये ।
मन पवन थिर कर शब्द निरखै । करम मनमथ त्यागिये ।
होत धुनि रसना बिना । करमाल बिनु निखारिये ।
शब्द सार विदेह निरखत। अमरलोक सिधारिये ।
शोभा अगम अपार । कोटि भानु शशि रोम इक ।
षोडश रवि छिटकार । एक हँस उजियार तन ।

अनल पक्षी का रहस्य

कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! गुरु की महान कृपा से मनुष्य साधु कहलाता है । संसार से विरक्त मनुष्य के लिये गुरुकृपा से बढकर कुछ भी नहीं है । फ़िर ऐसा साधु अनल पक्षी के समान होकर सत्यलोक को जाता है ।
हे धर्मदास ! तुम इस अनल पक्षी के रहस्य उपदेश को सुनो । अनल पक्षी निरंतर आकाश में ही विचरण करता रहता है । और उसका अण्डे से उत्पन्न बच्चा भी स्वतः जन्म लेकर वापस अपने घर को लौट जाता है । प्रथ्वी पर बिलकुल नहीं उतरता ।
अनल पक्षी जो सदैव आकाश में ही रहता है । और केवल दिन रात पवन यानी हवा की ही आशा करता है । अनल पक्षी की रति क्रिया या मैथुन केवल दृष्टि से होता है । यानी वे जब एक दूसरे से मिलते हैं । तो प्रेमपूर्वक एक दूसरे को रति भावना की गहन दृष्टि से देखते हैं । उनकी इस रति क्रिया विधि से मादा पक्षी को गर्भ ठहर जाता है ।
हे धर्मदास ! फ़िर कुछ समय बाद वह मादा अनल पक्षी अण्डा देती है । पर उनके निरन्तर उङने के कारण अण्डा के ठहरने का कोई आधार तो होता नहीं ।

वहाँ तो बस केवल निराधार शून्य 0 ही शून्य 0 है । तब आधारहीन होने के कारण उसका अण्डा धरती की ओर गिरने लगता है । और नीचे रास्ते में आते आते ही पूरी तरह पककर तैयार हो जाता है । और रास्ते में ही वह अण्डा फ़ूटकर शिशु बाहर निकल आता है । और नीचे गिरते ही गिरते रास्ते में वह अनल पक्षी आँखे खोल लेता है । तथा कुछ ही देर में उसके पंख उङने लायक हो जाते हैं ।
नीचे गिरते हुये जब वह प्रथ्वी के निकट आता है । तब उसे स्वतः पता लग जाता है कि यह प्रथ्वी मेरे रहने का स्थान नहीं है । तब वह अनल पक्षी अपनी सुरति के सहारे वापस अंतरिक्ष की ओर लौटने लगता है । जहाँ पर उसके माता पिता का निवास है । अनल पक्षी कभी भी अपने बच्चे को लेने प्रथ्वी की ओर नहीं आते । बल्कि उनका बच्चा स्वयँ ही पहचान लेता है कि यह प्रथ्वी मेरा घर नहीं है । और वापस पलटकर अपने असली घर की ओर चला जाता है ।

हे धर्मदास ! इस संसार में बहुत से पक्षी रहते हैं । परन्तु वे अनल पक्षी के समान गुणवान नहीं होते । ऐसे ही कुछ ही विरले जीव है । जो सदगुरु के ग्यान अमृत को पहचानते हैं ।
निर्धनियाँ सब संसार है । धनवन्ता नहिं कोय । धनवन्ता ताही कहो । जा ते नाम रतन धन होय ।
हे धर्मदास ! इसी अनल पक्षी की तरह जो जीव ग्यान युक्त होकर होश में आ जाता है । तो वह इस काल कल्पना लोक को पार करके सत्यलोक मुक्तिधाम में चला जाता है ।
हे धर्मदास ! जो मनुष्य जीव इस संसार के सभी आधारों को त्यागकर एक सदगुरु का आधार और उनके नाम से विश्वासपूर्वक लगन लगाये रहता है । और सब प्रकार का अभिमान त्यागकर रात दिन गुरु चरणों के अधीन रहता हुआ दास भाव से उनकी सेवा में लगा रहता है । तथा धन घर और परिवार आदि का मोह नहीं करता ।
पुत्र स्त्री तथा समस्त विषयों को संसार का ही सम्बन्ध मानकर गुरु चरणों को ह्रदय से पकङे रहता है । ताकि चाहकर भी अलग न हो । इस प्रकार जो मनुष्य साधु संत गुरु भक्ति के आचरण में लीन रहता है । सदगुरु की कृपा से उसके जन्म मरण रूपी अत्यन्त दुखदायी कष्ट का नाश हो जाता है । और वह साधु सत्यलोक को प्राप्त होता है ।
साधक या भक्त मनुष्य मन वचन कर्म से पवित्र होकर सदगुरु का ध्यान करे । और सदगुरु की आग्यानुसार सावधान होकर चले । तब सदगुरु उसे इस जङ देह से परे नाम विदेह जो शाश्वत सत्य है । उसका साक्षात्कार करा के सहज मुक्ति प्रदान करते हैं ।

मंगलवार, जून 21, 2011

परन्तु काल वास्तव में है क्या ?

कबीर साहब बोले - ऐसे जो कल्याण मोक्ष चाहने वाले सच्चे अनुरागी हैं । वह  प्रभु के सत्यनाम ग्यान से सच्ची लगन लगाये । और भक्ति भाव में कुल परिवार सभी को भुला दे । पुत्र और स्त्री आदि का मोह मन में कभी न आने दे । और जन्म से लेकर मृत्यु तक सम्पूर्ण जीवन को स्वपन के समान समझे ।
हे धर्मदास ! इस संसार में जीवन बहुत थोङा है । और अंत में मृत्यु समय कोई मददगार कोई सहायक नहीं होता । इसलिये व्यर्थ की मोह ममता में नहीं पङना चाहिये । क्योंकि अंत में तो सभी साथ छोङ देते हैं । और जीव अपने कर्म के अनुसार अपनी गति को प्राप्त होता है । इस संसार में प्राय सभी को स्त्री बहुत प्यारी होती है । जन्म देने वाले और पालन पोषण करने वाले माता पिता भी उसके समान प्यारे नहीं लगते ।

उस पत्नी के लिये यदि उसका पति अपना सिर भी कटा दे । तो भी वह जीवन के अंत में मृत्यु के समय प्रेम करने वाली सहायक सिद्ध नहीं होती । केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये ही रोना धोना करती है । स्वार्थ पूरा न होने पर वह शीघ्र ही अपने पति को भूलकर पीहर जाने का मन बना लेती है ।
हे धर्मदास ! जैसे सपने में  राज्य । मान सम्मान । धन संपदा । प्रेम करने वाला परिवार । एवं सहायक  मित्र आदि सभी मिल जाते हैं । परन्तु सपना समाप्त हो जाने पर नींद से जागने पर वास्तविकता का पता चलता है कि ये सब जो देखा था । वह सब केवल एक सपना ही था । ठीक वैसे ही स्त्री पुत्र परिवार के लोग धन संपत्ति आदि सपने के प्रेमी दिखाई पङते हैं । अंततः ये सब सपने की तरह ही खो जायेंगे ।
ऐसी स्थिति में उचित यही है कि इन सब सम्बन्धों को केवल कर्तव्य समझकर निबाहता हुआ परमात्मा के सत्यनाम ग्यान को स्वीकार करके इंसान अपना उद्धार करे । ये दुर्लभ नाम भक्ति ही इस लोक और परलोक में सदैव ही सहायक है ।
इस असार संसार में अपने शरीर के समान प्रिय और कोई दूसरा नहीं होता । परन्तु अंत समय में यह शरीर भी अपना साथ नहीं देता । तब ये भी साथ छोङ देता है ।
हे धर्मदास ! इस संसार में ऐसा कोई भी सामर्थ्यवान दिखाई नहीं देता । जो जीव को अंत समय में मृत्यु के मुँह में जाने से बचा ले । उस समय मनुष्य के सभी नाते रिश्तेदार यार दोस्त प्रियजन आदि सभी वेवश और असमर्थ होते हैं ।
हाँ सिर्फ़ एक हस्ती ऐसी अवश्य होती है । जिसको मैं निश्चय से कहता हूँ । लेकिन जिसके ह्रदय में उनके प्रति सच्ची प्रेम भक्ति होगी । वही उनसे लाभ प्राप्त कर पायेगा । और वह एक सदगुरु ही होते हैं । जो इस जीव को समस्त सांसारिक काल बंधनों से और काल माया जाल से मुक्त कराते हैं । मेरी यह बात तुम बिना किसी संशय के निश्चय पूर्वक मानो ।

काल यानी मृत्यु प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में घटित होने वाला एक सत्य है । लेकिन काल काल सभी कहते तो फ़िरते हैं । परन्तु काल वास्तव में है क्या ? यह कोई नहीं जानता । सिर्फ़ इस शरीर का छूटना मरना ही काल नहीं है । वास्तव में जीव के मन में जितनी भी कल्पना है । वह सब काल ही कहलाती है ।
इन्हीं कल्पनाओं के बंधन में पङा हुआ जीव काल को प्राप्त होता है । इस संसार में जीव जिस शरीर के साथ उत्पन्न होता है । उसकी मृत्यु अवश्य होती है । लेकिन जिसका जन्म ही न हुआ हो । उसकी मृत्यु कैसे हो सकती है ?
यह सत्य है । जो पैदा होता है । केवल वही मरता है । इसलिये काल से बचने का उपाय है । जीव का पुनर्जन्म ही न हो । इसके लिये वह जिन कारण संस्कारों से यहाँ पङा हुआ है । उसे ही समूल नष्ट कर दिया जाय ।
सांसारिक मोह माया और विषय वासनाओं के बंधन में पङा हुआ अग्यानी जीव बारबार शरीर को धारण करके पैदा होता है । और मरता है । इस प्रकार वह मोहवश आवागमन के चक्र में पङा हुआ अनन्त काल से अनन्त दुखों को भोग रहा है ।
जीव की इस अग्यानता को किसी भी अस्त्र शस्त्र से काटा नहीं जा सकता । दूर नहीं किया जा सकता है । इसे केवल ग्यान युक्ति से ही काटा जा सकता है । परन्तु वह अति विलक्षण ग्यान युक्ति सिर्फ़ पूर्ण सदगुरु देव से ही प्राप्त होती है । जिस जिग्यासु इंसान के ह्रदय में मोक्ष कामना के लिये सत्य अनुराग होता है । उसे ही सदगुरु दयाभाव से सत्यग्यान प्रदान करते हैं । उस ग्यान की सच्ची भक्ति साधना से जीव आवागमन के चक्र से छूट जाता है ।  

सोमवार, जून 20, 2011

अनुरागी के लक्षण

कबीर साहब बोले - जो शब्द की जाँच करता है ।  और गुणों को भली भांति परखता है । ऐसा ही कोई श्रद्धा रखने वाला जिग्यासु ही सत्यग्यान को पायेगा । सदगुरु के सद उपदेश को सच्चे ग्यान का अधिकारी मन लगाकर ध्यानपूर्वक सुनता है । जब चमकते हुये सूर्य के समान सदगुरु का सत्यग्यान ह्रदय में प्रकाशित होता है । तब मोह माया रूपी अँधकार नष्ट होकर सब कुछ अपने वास्तविक रूप में दिखाई देने लगता है । और सब भृम मिट जाते हैं ।
लाखों करोंङो में से कोई एक ग्यानवान संत सज्जन होता है । जो सार शब्द को गम्भीरता से विचार करके अपने ह्रदय में धरता है । जिनके ह्रदय में परम पिता परमात्मा के प्रति सच्चा भक्ति प्रेम निवास करता है । वही ग्यानी जन सभी बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष पद प्राप्त करता है ।
तब धर्मदास बोले - हे साहिब ! अनुरागी मनुष्य के लक्षण और उसकी वास्तविक पहचान क्या है ? आपके कहने के अनुसार बिना अनुराग के जीव इस संसार रूपी भवसागर से पार जा नहीं सकता । अतः हे प्रभु ! वह अनुराग कैसा है ? यह आप मुझे उदाहरण से समझाकर कहें ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! अनुरागी के लक्षण सुनो ।
जैसे हिरन नाद शब्द को सुनकर दौङता हुआ । उसमें पूर्णतया मगन होकर शिकारी के पास दौङा चला आता है । और पकङा जाता है । उस मनोहारी शब्द की मधुरता में हिरन के मन में अपने पकङे जाने या मरने का भी डर नहीं होता । और उस स्वर में इतना लीन हो जाता है कि शिकारी द्वारा पकङे जाने पर भी अपना सिर कटाते हुये भी नहीं डरता । जिस प्रकार नाद शब्द के प्रेमी हिरन ने शिकारी को अपना सिर दे दिया । ऐसे ही सच्चे प्रेमी को भी पहचानो ।

इसी तरह हे धर्मदास ! जिस प्रकार पतंगा का स्वभाव दीपक से प्रेम करते हुये जलकर मरना होता है । वैसे ही सच्चे भक्त प्रेमी का भाव परमात्मा के लिये होता है ।
हे धर्मदास ! इसके अलावा भी अनुरागी के लक्षण सुनो ।
जिस प्रकार अपने पति के अगाध प्रेम में डूबी सती नारी अपने पति के साथ जलकर मर जाती है । और जलते समय अपने अंगो को जरा भी मोङती सिकोङती नहीं । और न ही जरा भी विचलित होकर घबराती है । सुन्दर घर धन परिवार संसार तथा सखी सहेलियों को विरक्त भाव से छोङकर वह अपने पति की प्रिय सती नारी पति के मृतक शरीर के साथ स्वयँ ही उठकर चल देती है ।
तब उस नारी को सती होने से रोकने के लिये उसके प्रियजन नाते रिश्तेदार पङोसी आदि उसके बच्चों को उसके सामने लाकर उसके प्रति उसके मोह ममता कर्तव्य आदि का बारबार बोध कराते हुये उसे समझाते हैं कि - देख ये तेरा अबोध बालक बहुत कमजोर है । जो तेरे प्यार ममता के बिना ऐसे ही मर जायेगा । अब तो तेरा घर भी सूना हो गया । फ़िर कैसे क्या उपाय होगा ?
देख तेरे घर परिवार में बहुत धन संपत्ति है ।  ऐसे निराश न होकर घर वापस लौट चल । परन्तु उन लोगों के बारबार कहने सुनने का उस पर कोई प्रभाव नहीं पङता । उसके ह्रदय में तो केवल अपने प्राण से प्रिय पति का अद्वितीय प्रेम ही बसता है । और उसे इसके अतिरिक्त कुछ भी दिखायी नहीं देता ।
सभी ने उसको अलग अलग अपने अपने ढंग से बहुत समझाया । परन्तु पति प्रेम में आकंठ डूबी वह वियोगिनी सती नारी किसी की कोई बात न समझ सकी ।
और स्थिर अविचल भाव से उत्तर देती है - अपने प्राणों से प्रिय पति के बिछुङने से मैं ऐसी दीवानी हुयी हूँ कि अब मुझे कुछ भी नहीं सुहाता । धन घर परिवार आदि की अब मुझे जरा भी कामना नहीं है । इस संसार में चार दिन का ही जीवन जीना है । फ़िर अंत समय में मृत्यु के समय सब यहीं छूट जाता है । तब अकेले ही जाना पङता है । इस प्रकार हे सखी ! मैंने सब कुछ अच्छी तरह से सोच समझकर देखा है । और उसके बाद ही पति के साथ सती होने का निश्चय किया है । ऐसा कहकर वह पति प्रेम अनुरागी नारी सती अपने मृतक पति का शरीर हाथों में उठाकर चिता पर चढ जाती है । और प्राणप्रिय पति के मृत शरीर को गोद में रखकर परम पिता परमात्मा अंतर्यामी प्रभु का नाम लेते हुये जल जाती है ।
हे धर्मदास ! भक्त अनुरागी के लक्षण इस प्रकार मैंने तुम्हें कहे ।

यह नर अस चातुर बुधिमाना

कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! अब मैं तुमसे परमार्थ वर्णन करता हूँ । ग्यान को प्राप्त हुआ । ग्यान के शरणागति हुआ कोई जीव समस्त अग्यान और काल जाल को छोङे । तथा लगन लगाकर सत्यनाम का सुमरन करे । असत्य को छोङकर सत्य की चाल चले । और मन लगाकर परमार्थ मार्ग को अपनाये ।
हे धर्मदास ! एक गाय को परमार्थ गुणों की खान जानो । हे ग्यानी धर्मदास ! गाय की चाल और गुणों को समझो । गाय खेत बाग आदि में घास चरती है । जल पीती है । और अंत में दूध देती है । उसके दूध घी से देवता और मनुष्य दोनों ही तृप्त होते हैं । गाय के बच्चे दूसरों का पालन करने वाले होते हैं । उसका गोबर भी मनुष्य के बहुत काम आता है । परन्तु पाप कर्म करने वाला मनुष्य अपना जन्म यूँ ही गँवाता है ।
बाद में आयु पूरी होने पर गाय का शरीर नष्ट हो जाता है । तब उसे राक्षस के समान मनुष्य उसका शरीर का माँस लेकर खाते हैं । मरने पर भी उसके शरीर का चमढा मनुष्य के लिये बहुत सुख देने वाला होता है । हे भाई ! जन्म से लेकर मृत्यु तक गाय के शरीर में इतने गुण होते हैं ।

इसलिये गाय के समान गुण वाला होने का यह वाणी उपदेश सज्जन पुरुष गृहण करे । तो काल निरंजन जीव की कभी हानि नहीं कर सकता । मनुष्य शरीर पाकर जिसकी बुद्धि ऐसी शुद्ध हो । और उसे सदगुरु मिले । तो वह हमेशा को अमर हो जाये ।
हे धर्मदास ! परमार्थ की वाणी परमार्थ के उपदेश सुनने से कभी हानि नहीं होती । इसलिये सज्जन परमार्थ का सहारा आधार लेकर भवसागर से पार हो । दुर्लभ मनुष्य जीवन के रहते मनुष्य सार शब्द के उपदेश का परिचय और ग्यान प्राप्त करे । फ़िर परमार्थ पद को प्राप्त हो । तो वह सत्यलोक को जाये । अहंकार को मिटा दे । और निष्काम सेवा की भावना ह्रदय में लाये । जो अपने कुल बल धन ग्यान आदि का अहंकार रखता है । वह सदा दुख ही पाता है ।
यह मनुष्य ऐसा चतुर बुद्धिमान बनता है कि सदगुण और शुभ कर्म होने पर कहता है कि मैंने ऐसा किया है । और उसका पूरा श्रेय अपने ऊपर लेता है । और अवगुण द्वारा उल्टा विपरीत परिणाम हो जाने पर कहता है कि भगवान ने ऐसा कर दिया ।
यह नर अस चातुर बुधिमाना । गुण शुभ कर्म कहे हम ठाना ।
ऊँच क्रिया आपन सिर लीन्हा । औगण को बोले हरि कीन्हा ।
तब ऐसा सोचने से उसके शुभ कर्मों का नाश हो जाता है । हे धर्मदास ! सब आशाओं को छोङकर तुम निराश ( उदास विरक्त वैरागी भाव ) भाव जीवन में अपनाओ । और केवल एक सत्यनाम कमाई की ही आशा करो । और अपने किये शुभ कर्म को किसी को बताओ नहीं ।
सभी देवी देवताओं भगवान से ऊँचा सर्वोपरि गुरु पद है । उसमें सदा लगन लगाये रहो । जैसे जल में अभिन्न रूप से मछली घूमती है । वैसे ही सदगुरु के श्रीचरणों में मगन रहे । सदगुर द्वारा दिये शब्द नाम में सदा मन लगाता हुआ उसका सुमरन करे ।

जैसे मछली कभी जल को नहीं भूलती । और उससे दूर होकर तङपने लगती है । ऐसे ही चतुर शिष्य गुरु से उपदेश कर उन्हें भूले नहीं । सत्यपुरुष के सत्यनाम का प्रभाव ऐसा है कि हँस जीव फ़िर से संसार में नहीं आता ।
तुम कछुए के बच्चे की कला गुण समझो । कछवी जल से बाहर आकर रेत मिट्टी में गढ्ढा खोदकर अण्डे देती है । और अण्डो को मिट्टी से ढककर फ़िर पानी में चले जाती है । परन्तु पानी में रहते हुये भी कछवी का ध्यान निरंतर अण्डों की ओर ही लगा रहता है । वह ध्यान से ही अण्डों को सेती है । समय पूरा होने पर अण्डे पुष्ट होते हैं । और उनमें से बच्चे बाहर निकल आते हैं । तब उनकी माँ कछवी उन बच्चों को लेने पानी से बाहर नहीं आती । बच्चे स्वयँ चलकर पानी में चले जाते हैं । और अपने परिवार से मिल जाते हैं ।
हे धर्मदास ! जैसे कछुये के बच्चे अपने स्वभाव से अपने परिवार से जाकर मिल जाते हैं । वैसे ही मेरे हँस जीव अपने निज स्वभाव से अपने घर सत्यलोक की तरफ़ दौङें । उनको सत्यलोक जाते देखकर काल निरंजन के यमदूत बलहीन हो जायेंगे । तथा वे उनके पास नहीं जायेंगे । वे हँस जीव निर्भय निडर होकर गरजते और प्रसन्न होते हुये नाम का सुमरन करते हुये आनन्द पूर्वक अपने घर जाते हैं । और यमदूत निराश होकर झक मारकर रह जाते हैं ।
सत्यलोक आनन्द का धाम अनमोल और अनुपम है । वहाँ जाकर हँस परमसुख भोगते हैं । हँस से हँस मिलकर आपस में क्रीङा करते हैं । और सत्यपुरुष का दर्शन पाते हैं ।
जैसे भंवरा कमल पर बसता है । वैसे ही अपने मन को सदगुरु के श्रीचरणों में बसाओ । तब सदा अचल सत्यलोक मिलता है । अविनाशी शब्द और सुरति का मेल करो । यह बूँद और सागर के मिलने के खेल जैसा है । इसी प्रकार जीव सत्यनाम से मिलकर उसी जैसा सत्यस्वरूप हो जाता है ।
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