रविवार, अगस्त 14, 2011

हे प्रभु ! ज्ञान और मुक्ति कैसे प्राप्त होती है ? अष्टावक्र गीता । अध्याय 1

कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति । वैराग्य च कथं प्राप्तमेतद ब्रूहि मम प्रभो । 1-1
राजा जनक ।  अष्टावक्र जी से बोले - हे प्रभु ! ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है ? मुक्ति कैसे प्राप्त होती है ? वैराग्य कैसे प्राप्त किया जाता है ? ये सब मुझे बतायें ।
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान विषवत्त्यज । क्षमार्जवदयातोष सत्यं पीयूषवद्भज । 1-2
तब अष्टावक्र बोले - यदि आप । मुक्ति चाहते हैं । तो अपने मन से । विषयों ( वस्तुओं के उपभोग की इच्छा ) को । विष की तरह । त्याग दीजिये । क्षमा । सरलता । दया । संतोष । तथा सत्य का । अमृत की तरह । सेवन कीजिये ।
न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुर्द्यौर्न वा भवान । एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये । 1-3
आप न । पृथ्वी हैं । न जल । न अग्नि । न वायु । अथवा आकाश ही हैं । मुक्ति के लिये । इन तत्त्वों के । साक्षी । चैतन्यरूप आत्मा को ही । जानिये ।
यदि देहं पृथक कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि । अधुनैव सुखी शान्तो बन्धमुक्तो भविष्यसि । 1-4
यदि आप । स्वयं को । इस शरीर से । अलग करके । चेतना में । विश्राम करें । तो तत्काल ही । सुख । शांति । और बंधन मुक्त । अवस्था को । प्राप्त होंगे ।
न त्वं विप्रादिको वर्ण: नाश्रमी नाक्षगोचर: । असङगोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव । 1-5
आप ब्राह्मण । आदि सभी जातियों । अथवा बृह्मचर्य आदि । सभी आश्रमों से । परे हैं । तथा आँखों से । दिखाई न पड़ने वाले हैं । आप निर्लिप्त । निराकार । और इस विश्व के साक्षी हैं । ऐसा जानकर सुखी हो जायें ।
धर्माधर्मौ सुखं दुखं मानसानि न ते विभो । न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा । 1-6
धर्म । अधर्म । सुख । दुख । मस्तिष्क से । जुड़े हैं । सर्व व्यापक । आपसे नहीं । न आप । करने वाले हैं । और न । भोगने वाले हैं । आप सदा । मुक्त ही हैं ।
एको दृष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा । अयमेव हि ते बन्धो दृष्टारं पश्यसीतरम । 1-7
आप । समस्त विश्व के । एकमात्र दृष्टा हैं । सदा मुक्त ही हैं । आपका बंधन । केवल इतना है । कि आप । दृष्टा । किसी और को । समझते हैं ।
अहं कर्तेत्यहंमानमहाकृष्णाहिदंशितः । नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखं भव । 1-8
अहंकार रूपी । महा सर्प के । प्रभाववश । आप । मैं कर्ता हूँ । ऐसा मान लेते हैं । मैं कर्ता नहीं हूँ । इस । विश्वास रूपी । अमृत को । पीकर सुखी हो जाइये ।
एको विशुद्धबोधोऽहं इति निश्चयवह्निना । प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव । 1-9
मैं एक । विशुद्ध ज्ञान हूँ । इस निश्चय रूपी । अग्नि से । गहन । अज्ञान वन को । जला दें । इस प्रकार । शोक रहित होकर । सुखी हो जायें ।
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत । आनंदपरमानन्दः स बोधस्त्वं सुखं चर । 1-10
जहाँ ये विश्व । रस्सी में सर्प की तरह । अवास्तविक लगे । उस आनंद । परम आनंद की । अनुभूति करके । सुख से रहें ।
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि । किवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत । 1-11
स्वयँ को । मुक्त मानने वाला । मुक्त ही है । और बद्ध । मानने वाला । बंधा हुआ ही है । यह कहावत । सत्य ही है कि । जैसी बुद्धि । होती है । वैसी ही । गति होती है ।
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः । असंगो निःस्पृहः शान्तो भृमात्संसारवानिव । 1-12
आत्मा साक्षी । सर्वव्यापी । पूर्ण । एक । मुक्त । चेतन । अक्रिय । असंग । इच्छा रहित । एवं शांत है । भृमवश ही । ये सांसारिक प्रतीत होती है ।
कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मानं परिभावय । आभासोऽहं भृमं मुक्त्वा भावं बाह्यमथान्तरम । 1-13
अपरिवर्तनीय । चेतन व अद्वैत । आत्मा का । चिंतन करें । और " मैं " के । भृम रूपी । आभास से मुक्त होकर । बाह्य विश्व की । अपने अन्दर ही भावना करें ।
देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक । बोधोऽहं ज्ञानखंगेन तन्निष्कृत्य सुखी भव । 1-14
हे पुत्र ! बहुत समय से । आप - मैं शरीर हूँ । इस भाव बंधन से । बंधे हैं । स्वयँ को । अनुभव कर । ज्ञान रूपी तलवार से । इस बंधन को । काटकर । सुखी हो जायें ।
निःसंगो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः । अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठति । 1-15
आप असंग । अक्रिय । स्वयं प्रकाशवान । तथा सर्वथा । दोषमुक्त हैं । आपका ध्यान द्वारा । मस्तिष्क को शांत रखने का । प्रयत्न ही । बंधन है ।
त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः । शुद्धबुद्धस्वरुपस्त्वं मा गमः क्षुद्रचित्तताम । 1-16
यह विश्व । तुम्हारे द्वारा । व्याप्त किया हुआ है । वास्तव में तुमने । इसे व्याप्त किया हुआ है । तुम शुद्ध । और ज्ञानस्वरुप हो । छोटेपन की । भावना से । गृस्त मत हो ।
निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः । अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासन: । 1-17
आप इच्छारहित । विकार रहित । घन ( ठोस ) शीतलता के धाम । अगाध बुद्धिमान हैं । शांत होकर । केवल चैतन्य की । इच्छा वाले । हो जाइये ।
साकारमनृतं विद्धि निराकारं तु निश्चलं । एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसंभव: । 1-18
आकार को । असत्य जानकर । निराकार को ही । चिर स्थायी मानिये । इस तत्त्व को । समझ लेने के बाद । पुनः जन्म लेना । संभव नहीं है ।
यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेऽन्तः परितस्तु सः । तथैवाऽस्मिन शरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः । 1-19
जिस प्रकार । दर्पण में । प्रतिबिंबित रूप । उसके अन्दर भी है । और बाहर भी । उसी प्रकार । परमात्मा । इस शरीर के । भीतर भी । निवास करता है । और उसके बाहर भी ।
एकं सर्वगतं व्योम बहिरन्तर्यथा घटे । नित्यं निरन्तरं बृह्म सर्वभूतगणे तथा । 1-20
जिस प्रकार । एक ही आकाश । पात्र के भीतर । और बाहर व्याप्त है । उसी प्रकार । शाश्वत । और सतत । परमात्मा । समस्त प्राणियों में । विद्यमान है ।

उसी प्रकार यह समस्त विश्व मैं ही हूँ - अष्टावक्र गीता । अध्याय 2

अहो निरंजनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः । एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडंबितः । 2-1
तब जनक बोले - आश्चर्य । मैं निष्कलंक । शांत । प्रकृति से परे । ज्ञान स्वरुप हूँ । इतने समय तक । मैं मोह से । संतप्त किया गया ।
यथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत । अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किंचन । 2-2
जिस प्रकार मैं । इस शरीर को । प्रकाशित करता हूँ । उसी प्रकार । इस विश्व को भी । अतः मैं । यह समस्त । विश्व ही हूँ । अथवा । कुछ भी नहीं ।
स शरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाधुना । कुतश्चित् कौशलाद् एव परमात्मा विलोक्यते । 2-3
अब शरीर सहित । इस विश्व को । त्याग कर । किसी कौशल द्वारा ही । मेरे द्वारा । परमात्मा का । दर्शन । किया जाता है ।
यथा न तोयतो भिन्नास्तरंगाः फेनबुदबुदाः । आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम । 2-4
जिस प्रकार । पानी । लहर । फेन । और बुलबुलों से । पृथक नहीं है । उसी प्रकार । आत्मा भी । स्वयँ से निकले । इस विश्व से । अलग नहीं है ।
तन्तुमात्रो भवेद एव पटो यद्वद विचारितः । आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद विश्वं विचारितम । 2-5
जिस प्रकार । विचार करने पर । वस्त्र तंतु ( धागा ) मात्र ही । ज्ञात होता है । उसी प्रकार । यह समस्त विश्व । आत्मा मात्र ही है ।
यथैवेक्षुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा । तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम । 2-6
जिस प्रकार । गन्ने के । रस से बनी । शक्कर । उससे ही । व्याप्त होती है । उसी प्रकार । यह विश्व । मुझसे ही । बना है । और निरंतर । मुझसे ही । व्याप्त है ।
आत्मज्ञानाज्जगद भाति आत्मज्ञानान्न भासते । रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद भासते न हि । 2-7
आत्मा । अज्ञानवश ही । विश्व के । रूप में । दिखाई देती है । आत्मज्ञान । होने पर । यह विश्व । दिखाई नहीं । देता है । रस्सी । अज्ञानवश । सर्प जैसी । दिखाई देती है । रस्सी का । ज्ञान हो जाने पर । सर्प । दिखाई नहीं देता है ।
प्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः । यदा प्रकाशते विश्वं तदाहं भास एव हि । 2-8
प्रकाश । मेरा स्वरुप है । इसके अतिरिक्त । मैं कुछ और । नहीं हूँ । वह प्रकाश । जैसे । इस विश्व को । प्रकाशित । करता है । वैसे ही । इस " मैं " भाव को । भी ।
अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते । रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा । 2-9
आश्चर्य । यह कल्पित विश्व । अज्ञान से । मुझमें दिखाई देता है । जैसे सीप में चाँदी । रस्सी में सर्प । और सूर्य किरणों में पानी ।
मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति । मृदि कुंभो जले वीचिः कनके कटकं यथा । 2-10
मुझसे । उत्पन्न हुआ । विश्व । मुझमें ही । विलीन । हो जाता है । जैसे घड़ा मिटटी में । लहर जल में । और कड़ा सोने में । विलीन । हो जाता है ।
अहो अहं नमो मह्यं विनाशो यस्य नास्ति मे । बृह्मादिस्तंबपर्यन्तं जगन्नाशोऽपि तिष्ठतः । 2-11
आश्चर्य है । मुझको । नमस्कार है । समस्त विश्व के । नष्ट हो जाने पर भी । जिसका विनाश । नहीं होता । जो तृण से । बृह्मा तक । सबका विनाश । होने पर भी । विद्यमान रहता है ।
अहो अहं नमो मह्यं एकोऽहं देहवानपि । क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः । 2-12
आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । मैं एक हूँ । शरीर वाला । होते हुये भी । जो न कहीं । जाता है । और न कहीं । आता है । और समस्त विश्व को । व्याप्त करके स्थित है ।
अहो अहं नमो मह्यं दक्षो नास्तीह मत्समः । असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिरं धृतम । 2-13
आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । जो कुशल है । और जिसके समान । कोई और । नहीं है । जिसने । इस शरीर को । बिना स्पर्श करते हुये । इस विश्व को । अनादि काल से । धारण किया हुआ है ।
अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किंचन । अथवा यस्य मे सर्वं यद वाङ्मनसगोचरम । 2-14
आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । जिसका यह । कुछ भी नहीं है । अथवा जो भी । वाणी । और मन से । समझ में । आता है । वह सब । जिसका है ।
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम । अज्ञानाद भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरंजनः । 2-15
ज्ञान । ज्ञेय । और ज्ञाता । यह तीनों । वास्तव में । नहीं हैं । यह जो । अज्ञानवश । दिखाई देता है । वह निष्कलंक । मैं ही हूँ ।
द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्याऽस्ति भेषजम । दृश्यमेतन मृषा सर्वं एकोऽहं चिद्रसोमलः । 2-16
द्वैत ( भेद ) सभी दुखों का । मूल कारण है । इसकी । इसके अतिरिक्त । कोई और । औषधि नहीं है । कि यह सब । जो दिखाई दे रहा है । वह सब । असत्य है । मैं एक । चैतन्य । और निर्मल हूँ ।
बोधमात्रोऽहमज्ञानाद उपाधिः कल्पितो मया । एवं विमृशतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम । 2-17
मैं केवल । ज्ञान स्वरुप हूँ । अज्ञान से ही । मेरे द्वारा । स्वयँ में । अन्य गुण । कल्पित । किये गये हैं । ऐसा विचार करके । मैं सनातन । और कारण रहित । रूप से । स्थित हूँ ।
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षोवा भ्रान्तिः शान्तो निराश्रया । अहो मयिस्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम । 2-18
न मुझे । कोई बंधन है । और न कोई । मुक्ति का भृम । मैं शांत । और । आश्रय रहित हूँ । मुझमें स्थित । यह विश्व भी । वस्तुतः । मुझमें स्थित नहीं है ।
सशरीरमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चितम । शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन कल्पनाधुना । 2-19
यह निश्चित है । कि इस शरीर सहित । यह विश्व । अस्तित्वहीन है । केवल शुद्ध । चैतन्य । आत्मा का ही । अस्तित्व है । अब इसमें । क्या कल्पना । की जाये ।
शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा । कल्पनामात्रमेवैतत किं मे कार्यं चिदात्मनः । 2-20
शरीर । स्वर्ग । नरक । बंधन । मोक्ष । और भय । ये सब । कल्पना । मात्र ही हैं । इनसे मुझ । चैतन्य स्वरुप का । क्या प्रयोजन है ?
अहो जनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम । अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम । 2-21
आश्चर्य कि मैं । लोगों के । समूह में भी । दूसरे को । नहीं देखता हूँ । वह भी । निर्जन ही । प्रतीत होता है । अब मैं । किससे मोह करूँ ?
नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित । अयमेव हि मे बन्ध आसीद्या जीविते स्पृहा । 2-22
न मैं । शरीर हूँ । न यह शरीर । ही मेरा है । न मैं । जीव हूँ । मैं चैतन्य हूँ । मेरे अन्दर । जीने की इच्छा ही । मेरा बंधन थी ।
अहो भुवनकल्लोलैर्विचित्रैर्द्राक समुत्थितम । मय्यनंतमहांभोधौ चित्तवाते समुद्यते । 2-23
आश्चर्य । मुझ अनंत । महासागर में । चित्त वायु । उठने पर । बृह्माण्ड रूपी । विचित्र तरंगें । उपस्थित । हो जाती हैं ।
मय्यनंतमहांभोधौ चित्तवाते प्रशाम्यति । अभाग्याज्जीववणिजो जगत्पोतो विनश्वरः । 2-24
मुझ अनंत । महासागर में । चित्त वायु के । शांत होने पर । जीव रूपी । वणिक का । संसार रूपी । जहाज । जैसे । दुर्भाग्य से । नष्ट हो जाता है ।
मय्यनन्तमहांभोधावाश्चर्यं जीववीचयः । उद्यन्ति घ्नन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावतः । 2-25
आश्चर्य । मुझ अनंत । महासागर में । जीव रूपी । लहरें । उत्पन्न होती हैं । मिलती हैं । खेलती हैं । और स्वभाव से । मुझमें । प्रवेश कर जाती हैं ।

स्थिर प्रज्ञा वाले व्यक्ति को मृत्यु भी कैसे भयभीत कर सकती है ? अष्टावक्र गीता । अध्याय 3

अविनाशिनमात्मानं एकं विज्ञाय तत्त्वतः । तवात्मज्ञानस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः । 3-1
अष्टावक्र बोले - आत्मा को । अविनाशी और । 1 । जानो । उस आत्म ज्ञान को । प्राप्त कर । किसी बुद्धिमान व्यक्ति की । रूचि । धन अर्जित करने में । कैसे हो सकती है ।
आत्माज्ञानादहो प्रीतिर्विषयभृमगोचरे । शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभृमे । 3-2
स्वयं के । अज्ञान से । भृमवश । विषयों से । लगाव हो जाता है । जैसे । सीप में । चाँदी का । भृम होने पर । उसमें । लोभ उत्पन्न । हो जाता है ।
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे । सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि । 3-3
सागर से । लहरों के समान । जिससे । यह विश्व । उत्पन्न होता है । वह - मैं ही हूँ । जानकर । तुम एक दीन  जैसे । कैसे भाग सकते हो ।
श्रुत्वापि शुद्धचैतन्य आत्मानमतिसुन्दरम । उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति । 3-4
यह सुनकर भी । कि आत्मा । शुद्ध । चैतन्य । और अत्यंत । सुन्दर है । तुम कैसे । जननेंद्रिय में । आसक्त होकर । मलिनता को । प्राप्त हो सकते हो ।
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते । 3-5
सभी प्राणियों में । स्वयँ को । और स्वयँ में । सब प्राणियों को । जानने वाले । मुनि में । ममता की । भावना का । बने रहना । आश्चर्य ही है ।
आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः । आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया । 3-6
एक बृह्म का । आश्रय लेने वाले । और मोक्ष के । अर्थ का । ज्ञान रखने वाले । का आमोद प्रमोद द्वारा । उत्पन्न । कामनाओं से । विचलित होना । आश्चर्य ही है ।
उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः । आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत कालमन्तमनुश्रितः । 3-7
अंत समय के । निकट पहुँच चुके । व्यक्ति का । उत्पन्न ज्ञान के । अमित्र काम की । इच्छा रखना । जिसको धारण करने में । वह अत्यंत अशक्त है । आश्चर्य ही है ।
इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः । आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षाद् एव विभीषिका । 3-8
इस लोक । और परलोक से । विरक्त । नित्य । और अनित्य का । ज्ञान रखने वाले । और मोक्ष की । कामना । रखने वालों का । मोक्ष से डरना । आश्चर्य ही है ।
धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा । आत्मानं केवलं पश्यन् न तुष्यति न कुप्यति । 3-9
सदा । केवल आत्मा का । दर्शन करने वाले । बुद्धिमान व्यक्ति । भोजन कराने पर । या पीड़ित करने पर । न प्रसन्न होते हैं । और न क्रोध । ही करते हैं ।
चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत । संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः । 3-10
अपने कार्यशील । शरीर को । दूसरों के । शरीरों की । तरह । देखने वाले । महापुरुषों को । प्रशंसा । या निंदा । कैसे विचलित । कर सकती है ।
मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः । अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः । 3-11
समस्त जिज्ञासाओं से रहित । इस विश्व को । माया में । कल्पित देखने वाले । स्थिर प्रज्ञा वाले । व्यक्ति को । आसन्न मृत्यु भी । कैसे भयभीत कर सकती है ?
निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः । तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते । 3-12
निराशा में भी । समस्त इच्छाओं से रहित । स्वयं के ज्ञान से । प्रसन्न । महात्मा की तुलना । किससे की जा सकती है ?
स्वभावाद एव जानानो दृश्यमेतन्न किंचन । इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः । 3-13
स्वभाव से ही । विश्व को । दृश्यमान जानो । इसका । कुछ भी । अस्तित्व नहीं है । यह । गृहण करने । योग्य है । और यह । त्यागने योग्य । देखने वाला । स्थिर प्रज्ञायुक्त । व्यक्ति क्या देखता है ?
अंतस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः । यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये । 3-14
विषयों की । आतंरिक । आसक्ति का त्याग । करने वाले । संदेह से परे । बिना किसी इच्छा वाले । व्यक्ति को । स्वतः आने वाले । भोग । न दुखी कर सकते है । और न सुखी ।

उस बृह्म को जानने वाले को पाप पुण्य नहीं लगता - अष्टावक्र गीता । अध्याय 4

हन्तात्मज्ञानस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया । न हि संसारवाही कैर्मूढैः सह समानता । 4-1
अष्टावक्र बोले - स्वयं को । जानने वाला । बुद्धिमान व्यक्ति । इस संसार की । परिस्थितियों को । खेल की तरह । लेता है । उसकी । सांसारिक परिस्थितियों का । बोझ ( दबाव ) लेने वाले । मोहित व्यक्ति । के साथ । बिलकुल भी । समानता नहीं है ।
यत पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः । अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति । 4-2
जिस पद की । इन्द्र आदि । सभी देवता । इच्छा रखते हैं । उस पद में । स्थित होकर भी । योगी । हर्ष नहीं । करता है ।
तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते । न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः । 4-3
उस ( बृह्म ) को । जानने वाले । के । अन्तःकरण से । पुण्य और पाप । का । स्पर्श नहीं । होता है । जिस प्रकार । आकाश में । दिखने वाले । धुयें से । आकाश का । संयोग नहीं । होता है ।
आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना । यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः । 4-4
जिस महापुरुष ने । स्वयँ को ही । इस समस्त । जगत के रूप में । जान लिया है । उसके स्वेच्छा से । वर्तमान में । रहने को । रोकने की । सामर्थ्य । किसमें है ?
आबृह्मस्तंबपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे । विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने । 4-5
बृह्मा से तृण तक । चारों प्रकार के । प्राणियों में । केवल आत्मज्ञानी ही । इच्छा और अनिच्छा का । परित्याग करने में । समर्थ है ।
आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानाति जगदीश्वरम । यद वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित । 4-6
आत्मा को । एक और जगत का । ईश्वर । कोई कोई ही । जानता है । जो ऐसा । जान जाता है । उसको । किसी से भी । किसी प्रकार का । भय नहीं है ।

शनिवार, अगस्त 13, 2011

अधर्म फैल जाने पर कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 1

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय । 1-1
धृतराष्ट्र बोले - हे संजय ! धर्मक्षेत्र में । युद्ध की इच्छा से । इकठ्ठे हुये । मेरे और । पाण्डव के पुत्रों ने । क्या किया ?

दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमबृवीत । 1-2
संजय बोले -  हे राजन ! पाण्डवों की सेना व्यवस्था देखकर । दुर्योधन ने । अपने आचार्य के पास । जाकर । उनसे कहा ।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता । 1-3
हे आचार्य ! आपके तेजस्वी शिष्य । द्रुपद पुत्र द्वारा । व्यवस्थित की । इस विशाल पाण्डु सेना को । देखिये ।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः । 1-4
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः । 1-5
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः । 1-6
इसमें भीम और अर्जुन के ही समान । बहुत से महान । शूरवीर योद्धा हैं । जैसे युयुधान । विराट और महारथी द्रुपद । धृष्टकेतु । चेकितान । बलवान काशिराज । पुरुजित । कुन्तिभोज । तथा नरश्रेष्ट शैब्य । विक्रान्त । युधामन्यु । वीर्यवान उत्तमौजा । सुभद्रापुत्र ( अभिमन्यु ) और द्रोपदी के पुत्र सभी महारथी हैं ।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम । नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्बृवीमि ते । 1-7
हे द्विजोत्तम ! हमारी ओर भी । जो विशिष्ट योद्धा हैं । उन्हें आपको बताता हूँ । हमारी सैन्य के जो प्रमुख नायक हैं । उनके नाम । मैं आपको बताता हूँ ।
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च । 1-8
आप स्वयँ । भीष्म पितामह । कर्ण । कृप । अश्वत्थामा । विकर्ण । तथा सौमदत्त ( सोमदत्त के पुत्र )  यह सभी प्रमुख योद्धा हैं ।
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः । 1-9
हमारे पक्ष में युद्ध में कुशल । तरह तरह के शस्त्रों में माहिर । और भी अनेकों योद्धा हैं । जो मेरे लिये अपना जीवन तक त्यागने को तैयार हैं ।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम  । 1-10
भीष्म पितामह द्वारा रक्षित । हमारी सेना का बल पर्याप्त नहीं है । परन्तु भीम द्वारा रक्षित । पाण्डवों की सेना । बल पूर्ण है ।
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि  । 1-11
इसलिये सब लोग । जिन जिन स्थानों पर नियुक्त हों । वहां से सभी । हर ओर से । भीष्म पितामह की । रक्षा करें ।
तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । सिंहनादं विनद्योच्चैः शङखं दध्मौ प्रतापवान । 1-12
तब कुरुवृद्ध । प्रतापवान । भीष्म पितामह ने । दुर्योधन के हृदय में । हर्ष उत्पन्न करते हुये । उच्च स्वर में । सिंहनाद किया । और शंख बजाना आरम्भ किया ।
ततः शङखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत । 1-13
तब अनेक शंख । नगारे । ढोल । शृंगी आदि बजने लगे । जिनसे घोर नाद उत्पन्न हुआ ।
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङखौ प्रदध्मतुः । 1-14
तब श्वेत अश्वों से वहित । भव्य रथ में विराजमान । भगवान माधव । और पाण्डव पुत्र अर्जुन ने भी । अपने अपने शंख बजाये ।
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः । पौण्ड्रं दध्मौ महाशङखं भीमकर्मा वृकोदरः  । 1-15
भगवान हृषिकेश ने पांचजंय नामक अपना शंख बजाया । और धनंजय ( अर्जुन ) ने देवदत्त नामक शंख बजाया । तथा भीम कर्मा भीम ने । अपना पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया ।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः। नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ । 1-16
कुन्ती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने । अपना अनन्त विजय नामक शंख । नकुल ने सुघोष । और सहदेव ने अपना मणि पुष्पक । नामक शंख बजाये ।
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः । 1-17
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथ्वीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक  । 1-18
धनुर्धर काशिराज । महारथी शिखण्डी । धृष्टद्युम्न । विराट तथा अजेय सात्यकि । द्रुपद । द्रोपदी के पुत्र । तथा अन्य सभी राजाओं ने । तथा महाबाहु सौभद्र ( अभिमन्यु ) ने  सभी ने । अपने अपने शंख बजाये ।
स घोषो धर्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत । नभश्च पृथ्वीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन  । 1-19
शंखों की उस महाध्वनि से । आकाश और पृथ्वी गूँजने लगी । तथा धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय भिन्न गये ।
अथ व्यवस्थितान्दृष्टवा धृर्तराष्ट्रान्कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः । 1-20

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते । सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत । 1-21
यावदेतान्निरिक्षेऽहं योद्धकामानवस्थितान । कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे । 1-22
तब धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्यवस्थित देख । कपिध्वज ( जिनके ध्वज पर हनुमान विराजमान थे ) अर्जुन ने शस्त्र उठाकर । भगवान हृषिकेश से । यह वाक्य कहे ।
अर्जुन बोले -  हे अच्युत ! मेरा रथ । दोनों सेनाओं के मध्य में । स्थापित कर दीजिये । ताकि मैं । युद्ध की इच्छा रखने वाले । इन योद्धाओं का निरीक्षण कर सकूँ । जिनके साथ मुझे युद्ध करना है ।
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः । धृर्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः । 1-23
दुर्बुद्धि दुर्योधन का । युद्ध में प्रिय चाहने वाले राजाओं को । जो यहाँ युद्ध के लिये एकत्रित हुये हैं । मैं देख लूँ ।

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम । 1-24
संजय बोले - हे भारत ! ( धृतराष्ट्र )  गुडाकेश के इन वचनों पर । भगवान हृषिकेश ( श्रीकृष्ण ) ने । उस उत्तम रथ को । दोनों सेनाओं के मध्य में । स्थापित कर दिया ।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम । उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति  । 1-25
रथ को भीष्म पितामह । द्रोण । तथा अन्य सभी प्रमुख राजाओं के सामने ( उन दोनों सेनाओं के बीच में ) स्थापित कर । श्रीकृष्ण  ने अर्जुन से कहा कि -  हे पार्थ ! इन कुरुवंशी राजाओं को देखो ।
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान । आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा । 1-26
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान  । 1-27
वहाँ पार्थ ने उस सेना में । अपने पिता के भाईयों । पितामहों ( दादा ) आचार्यों । मामों । भाईयों । पुत्रों । मित्रों । पौत्रों । स्वसुरों ( ससुर ) संबन्धियों को । दोनों तरफ की सेनाओं में देखा ।

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत । दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम । 1-28
इस प्रकार । अपने सगे संबन्धियों । और मित्रों को । युद्ध में उपस्थित देख । अर्जुन का मन । करुणा पूर्ण हो उठा । और उसने विषाद पूर्वक । कृष्ण से यह कहा - हे कृष्ण ! मैं अपने लोगों को । युद्ध के लिये तत्पर । यहाँ खडा देख रहा हूँ ।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते । 1-29
इन्हें देखकर । मेरे अंग । ठण्डे पड रहे है । और मेरा मुख । सूख रहा है । और मेरा शरीर । काँपने लगा है ।
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भृमतीव च मे मनः । 1-30
मेरे हाथ से । गाण्डीव धनुष । गिरने को है । और मेरी सारी त्वचा । मानों आग में । जल उठी है । मैं अवस्थित रहने में । अशक्त हो गया हूँ । मेरा मन । भृमित हो रहा है ।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे  । 1-31
हे केशव ! जो निमित्त है । उसमें भी मुझे । विपरीत ही दिखाई दे रहे हैं । क्योंकि हे केशव ! मुझे अपने ही । स्वजनों को । मारने में । किसी भी प्रकार का । कल्याण दिखाई नहीं देता ।
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगेर्जीवितेन वा । 1-32
हे कृष्ण ! मुझे विजय । या राज्य । और सुखों की । इच्छा नहीं है । हे गोविंद ! ( अपने प्रियजनों की हत्या कर ) हमें राज्य से । या भोगों से ।  यहाँ तक कि जीवन से भी । क्या लाभ है ?
येषामर्थे काङिक्षतं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च । 1-33
जिनके लिये ही हम । राज्य । भोग । तथा सुख । और धन की । कामना करें । वे ही । इस युद्ध में । अपने प्राणों की बलि । चढने को तैयार । यहाँ अवस्थित हैं ।
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाः स्वसुराः पौत्राः श्यालाः संबन्धिनस्तथा । 1-34
गुरुजन । पिता जन । पुत्र । तथा पितामह । मातुल ।  ससुर । पौत्र । साले । आदि सभी सम्बन्धी । यहाँ प्रस्तुत हैं ।
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते । 1-35
हे मधुसूदन ! इन्हें हम । त्रैलोक्य के राज के लिये भी । नहीं मारना चाहेंगें । फिर इस धरती के लिये । तो बात ही क्या है । चाहे ये हमें । मार भी दें ।
निहत्य धृर्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः । 1-36
धृतराष्ट्र के इन पुत्रों को मारकर । हमें भला क्या । प्रसन्नता प्राप्त होगी । हे जनार्दन ! इन आततायियों को मार कर । हमें पाप ही प्राप्त होगा ।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धृर्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान । स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव । 1-37
इसलिये धृतराष्ट्र के पुत्रों । तथा अपने अन्य संबन्धियों को मारना । हमारे लिये उचित नहीं है । हे माधव ! अपने ही स्वजनों को मारकर । हमें किस प्रकार । सुख प्राप्त हो सकता है ?
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम । 1-38
यद्यपि ये लोग । लोभ के कारण । जिनकी बुद्धि । हरी जा चुकी है । अपने कुल के ही । क्षय में । और अपने मित्रों के साथ । द्रोह करने में । कोई दोष नहीं । देख पा रहे ।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम । कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यदभर्जनार्दन । 1-39
परन्तु हे जनार्दन ! हम लोग तो । कुल का क्षय करने में । दोष देख सकते हैं । हमें इस पाप से । निवृत्त क्यों नहीं । होना चाहिये ( अर्थात इस पाप करने से टलना चाहिये )
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत । 1-40
कुल के क्षय हो जाने पर । कुल के सनातन ( सदियों से चल रहे ) कुलधर्म भी नष्ट हो जाते हैं । और कुल के धर्म नष्ट हो जाने पर । सभी प्रकार के अधर्म बढने लगते हैं ।
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः । 1-41
अधर्म फैल जाने पर । हे कृष्ण ! कुल की स्त्रियाँ भी । दूषित हो जाती हैं । और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर । वर्ण धर्म नष्ट हो जाता है ।
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः । 1-42
कुल के कुलघाती वर्णसंकर ( वर्ण धर्म के न पालन से ) नरक में गिरते हैं । इनके पितृजन भी । पिण्ड और जल की परम्पराओं के नष्ट हो जाने से ( श्राद्ध आदि का पालन न करने से ) अधोगति को । प्राप्त होते हैं ( उनका उद्धार नहीं होता ) ।
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः । उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः । 1-43
इस प्रकार वर्ण भृष्ट । कुलघातियों के दोषों से । उनके सनातन कुल । धर्म और जाति धर्म । नष्ट हो जाते हैं ।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम । 1-44
हे जनार्दन ! कुलधर्म भृष्ट हुये मनुष्यों को । अनिश्चित समय तक । नरक में वास करना पडता है । ऐसा हमने सुना है ।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः । 1-45
अहो ! हम इस महापाप को । करने के लिये । आतुर हो । यहाँ खडे हैं । राज्य और सुख के लोभ में । अपने ही स्वजनों को । मारने के लिये । व्याकुल हैं ।
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धृर्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत । 1-46
यदि मेरे विरोध रहित रहते हुये । शस्त्र उठाये बिना भी । यह धृतराष्ट्र के पुत्र । हाथों में शस्त्र पकङे । मुझे इस युद्ध भूमि में । मार डालें । तो वह मेरे लिये ( युद्ध करने की जगह ) ज्यादा अच्छा होगा ।

एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः । 1-47
संजय बोला - यह कहकर । शोक से उद्विग्न हुये । मन से । अर्जुन अपने धनुष बाण छोडकर । रथ के पिछले भाग में बैठ गये ।

जिसने जन्म लिया है उसका मरना निश्चित है - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 2

तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः । 2-1
संजय बोले - तब चिंता और विशाद में डूबे अर्जुन को जिसकी आँखों में आँसू भर आऐ थे । मधुसूदन ने यह वाक्य कहे ।

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन । 2-2
श्रीकृष्ण बोले -  हे अर्जुन ! यह तुम किन विचारों में डूब रहे हो ? जो इस समय गलत हैं । और स्वर्ग और कीर्ति के बाधक हैं ।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप । 2-3
तुम्हारे लिये इस दुर्बलता का साथ लेना ठीक नहीं । इस नीच भाव । हृदय की दुर्बलता का । त्याग करके उठो । हे परन्तप !
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन । 2-4
अर्जुन बोला - हे अरिसूदन ! मैं किस प्रकार भीष्म । संख्य और द्रोण से युद्ध करुँगा ? वे तो मेरी पूजा के हकदार हैं ।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान रुधिरप्रदिग्धान । 2-5
इन महानुभाव गुरुओं की हत्या से तो भीख माँगकर जीना ही बेहतर होगा । इनको मारकर जो भोग हमें प्राप्त होंगे । वे सब तो खून से रँगे होंगे ।
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषाम  स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धृर्तराष्ट्राः । 2-6
हम तो यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे । या नहीं ? और यह भी नहीं कि दोनों में से बेहतर क्या है ? उनका जीतना । या हमारा । क्योंकि जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहेंगे । वही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने खड़े हैं ।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम । 2-7
इस दुख चिंता ने । मेरे स्वभाव को छीन लिया है । और मेरा मन शंका से घिरकर । सही धर्म को नहीं देख पा रहा है । मैं आपसे पूछता हूँ । जो मेरे लिये निश्चित प्रकार से अच्छा हो । वही मुझे बताइये । मैं आपका शिष्य हूँ । और आपकी ही शरण लेता हूँ ।
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम । 2-8
मुझे नहीं दिखता । कैसे इस दुख का । जो मेरी इन्द्रियों को सुखा रहा है । अन्त हो सकता है । भले ही मुझे इस भूमि पर । अति समृद्ध । और शत्रुहीन राज्य । या देवताओं का भी राज्य पद । क्यों न मिल जाये ।
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप । न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह । 2-9
संजय बोला - हृषिकेश ! श्री गोविन्द को परन्तप अर्जुन ! गुडाकेश यह कहकर चुप हो गये कि मैं युद्ध नहीं करुँगा ।
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः । 2-10
हे भारत ! दो सेनाओं के बीच में । शोक और दुख से घिरे । अर्जुन को । प्रसन्नता से । हृषीकेश ने यह बोला ।
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः । 2-11
श्रीकृष्ण बोले - जिनके लिये । शोक नहीं करना चाहिये । उनके लिये । तुम शोक कर रहे हो । और बोल तुम बुद्धिमानों की तरह रहे हो । ज्ञानी लोग । न उनके लिये । शोक करते हैं । जो चले गये । और न उनके लिये । जो हैं ।
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम । 2-12
न तुम्हारा । न मेरा । और न ही । यह राजा । जो दिख रहे हैं । इनका कभी । नाश होता है । और यह भी नहीं । कि हम भविष्य में । नहीं रहेंगे ।
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति । 2-13
आत्मा । जैसे देह के बाल । युवा । या बूढे होने पर भी । वैसी ही रहती है । उसी प्रकार । देह का अन्त होने पर भी । वैसी ही रहती है । बुद्धिमान लोग । इस पर व्यथित नहीं होते ।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत । 2-14
हे कौन्तेय ! सरदी । गरमी । सुख । दुख । यह सब तो । केवल स्पर्श मात्र हैं । आते । जाते । रहते हैं । हमेशा नहीं रहते । इन्हें सहन करो । हे भारत !
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते । 2-15
हे पुरुषर्षभ ! वह धीर पुरुष । जो इनसे । व्यथित नहीं होता । जो दुख और सुख में । 1 सा रहता है । वह अमरता के लायक । हो जाता है ।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः । 2-16
न असत । कभी रहता है । और सत । न रहे । ऐसा हो नहीं सकता । इन दोनों की ही असलियत । वह देख चुके हैं । जो सार को देखते हैं ।
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति । 2-17
तुम यह जानो । कि उसका ? नाश नहीं किया जा सकता । जिसमें ? यह सब कुछ । स्थित है । क्योंकि । जो अमर है । उसका नाश करना । किसी के बस में नहीं ।
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत । 2-18
यह देह तो । मरणशील है । लेकिन । शरीर में बैठने वाला । अन्तहीन । कहा जाता है । इस आत्मा का । न तो अन्त है । और न ही इसका । कोई मेल है । इसलिये । युद्ध करो । हे भारत !
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते । 2-19
जो इसे । मारने वाला । जानता है । या फिर । जो इसे । मरा मानता है । वह दोनों ही । नहीं जानते । यह न मारती है । और न मरती है ।
न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे । 2-20
यह न कभी । पैदा होती है । और न कभी । मरती है । यह तो अजन्मी । अन्तहीन । शाश्वत । और अमर है । सदा से है । कब से है । शरीर के मरने पर भी । इसका अन्त नहीं होता ।
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम । कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम । 2-21
हे पार्थ ! जो पुरुष । इसे अविनाशी । अमर । और जन्महीन । विकारहीन । जानता है । वह किसी को । कैसे मार सकता है । या खुद भी । कैसे मर सकता है ?
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही । 2-22
जैसे कोई व्यक्ति । पुराने कपड़े उतार कर । नये कपड़े । पहनता है । वैसे ही । शरीर धारण की हुई । आत्मा । पुराना शरीर त्याग कर । नया शरीर । प्राप्त करती है ।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः । 2-23
न शस्त्र इसे । काट सकते हैं । और न ही आग इसे । जला सकती है । न पानी इसे । भिगो सकता है । और न ही हवा इसे । सुखा सकती है ।
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः । 2-24
यह अछेद है । जलाई नहीं जा सकती । भिगोई नहीं जा सकती । सुखाई नहीं जा सकती । यह हमेशा रहने वाली है । हर जगह है । स्थिर है । अन्तहीन है ।
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि । 2-25
यह दिखती । नहीं है । न इसे । समझा जा सकता है । यह बदलाव से । रहित है । ऐसा कहा जाता है । इसलिये इसे । ऐसा जानकर । तुम्हें शोक । नहीं करना चाहिये ।
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम । तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि । 2-26
हे महाबाहो ! अगर तुम । इसे बार बार । जन्म लेती । और । बार बार मरती । भी मानो । तब भी । तुम्हें । शोक नहीं । करना चाहिये ।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि । 2-27
क्योंकि । जिसने । जन्म लिया है । उसका । मरना निश्चित है । मरने वाले का । जन्म भी । तय है । जिसके बारे में । कुछ किया नहीं । जा सकता । उसके बारे में । तुम्हें । शोक नहीं । करना चाहिये ।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना । 2-28
हे भारत ! जीव शुरू में अव्यक्त । मध्य में व्यक्त । और मृत्यु के बाद फिर अव्यक्त हो जाते हैं । इसमें दुखी होने की क्या बात है ।
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित । 2-29
कोई इसे आश्चर्य से देखता है । कोई इसके बारे में आश्चर्य से बताता है । और कोई इसके बारे में आश्चर्यचित होकर सुनता है । लेकिन सुनने के बाद भी कोई इसे नहीं जानता ।
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि । 2-30
हे भारत ! हर देह में । जो आत्मा है । वह नित्य है । उसका वध नहीं किया जा सकता । इसलिये किसी भी जीव के लिये । तुम्हें शोक नहीं । करना चाहिये ।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते । 2-31
अपने खुद के धर्म से । तुम्हें हिलना नहीं चाहिये । क्योंकि न्याय के लिये किये गये । युद्ध से बढकर । 1 क्षत्रिय के लिये कुछ नहीं है ।
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम । 2-32
हे पार्थ ! सुखी हैं । वे क्षत्रिय । जिन्हें ऐसा युद्ध मिलता है । जो स्वयं ही आया हो । और स्वर्ग का खुला दरवाजा हो ।
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि । 2-33
लेकिन यदि तुम यह न्याय युद्ध नहीं करोगे । तो अपने धर्म और यश की हानि करोगे । और पाप प्राप्त करोगे ।
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम । सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते । 2-34
तुम्हारे अन्तहीन अपयश की लोग बातें करेंगे । ऐसी अकीर्ति 1 प्रतिष्ठित मनुष्य के लिये । मृत्यु से भी बढकर है ।
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम । 2-35
महारथी योद्धा । तुम्हें युद्ध के भय से भागा समझेंगें । जिनके मत में तुम ऊँचे हो । उन्हीं की नजरों में गिर जाओगे ।
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम । 2-36
अहित की कामना से । बहुत ना बोलने लायक वाक्यों से । तुम्हारे विपक्षी । तुम्हारे सामर्थ्य की निन्दा करेंगें । इससे बढकर दुखदायी क्या होगा ?
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः । 2-37
यदि तुम युद्ध में मारे जाते हो । तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा । और यदि जीतते हो । तो इस धरती को भोगोगे । इसलिये उठो । हे कौन्तेय ! और निश्चय करके युद्ध करो ।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि । 2-38
सुख दुख को । लाभ हानि को । जय और हार को । 1 सा देखते हुये ही । युद्ध करो । ऐसा करते हुये तुम्हें पाप नहीं मिलेगा ।
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु । बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि । 2-39
यह मैंने तुम्हें । साँख्य योग की दृष्टि से बताया । अब तुम कर्म योग की । दृष्टि से सुनो । इस बुद्धि को धारण करके । तुम कर्म के बन्धन से । छुटकारा पा लोगे ।
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात । 2-40
न इसमें की गई । मेहनत व्यर्थ जाती है । और न ही इसमें । कोई नुकसान होता है । इस धर्म का जरा सा पालन करना भी । महान डर से बचाता है ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम । 2-41
इस धर्म का पालन करती बुद्धि । 1 ही जगह स्थिर रहती है । लेकिन जिनकी बुद्धि । इस धर्म में नहीं है । वह अन्तहीन दिशाओं में । बिखरी रहती है ।
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः । 2-42
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम । क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति । 2-43
हे पार्थ ! जो घुमाई हुईं फूलों जैसीं बातें करते है । वेदों का भाषण करते हैं । और जिनके लिये उससे बढकर । और कुछ नहीं है । जिनकी आत्मा । इच्छाओं से जकड़ी हुई है । और स्वर्ग । जिनका मकसद है । वह ऐसे कर्म करते हैं । जिनका फल दूसरा जन्म है । तरह तरह के कर्मों में फँसे हुये । और भोग ऐश्वर्य की इच्छा करते हुये । वे ऐसे लोग ही । ऐसे भाषणों की तरफ खिंचते हैं ।
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते । 2-44
भोग ऐश्वर्य से जुड़े । जिनकी बुद्धि । हरी जा चुकी है । ऐसी बुद्धि कर्म योग में । स्थिरता ग्रहण नहीं करती ।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान । 2-45
वेदों में 3 गुणों का वखान है । तुम इन तीनों 3 गुणों का त्याग करो । हे अर्जुन ! द्वन्द्वता और भेदों से मुक्त हो । सत में खुद को स्थिर करो । लाभ और रक्षा की चिंता छोड़ो । और खुद में स्थित हो ।
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके । तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः । 2-46
हर जगह पानी होने पर । जितना सा काम 1 कूँयें का होता है । उतना ही काम ज्ञानमंद को । सभी वेदों से है । मतलब यह कि । उस बुद्धिमान पुरुष के लिये । जो सत्य को जान चुका है । वेदों में बताये भोग प्राप्ति के कर्मों से । कोई मतलब नहीं है ।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि । 2-47
कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है । लेकिन फल की इच्छा से । कभी नहीं । कर्म को फल के लिये । मत करो । और न ही काम न करने से । जुड़ो ।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङग त्यक्त्वा धनंजय । सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते । 2-48
योग में स्थित रहकर । कर्म करो । हे धनंजय ! उससे बिना जुड़े हुये । काम सफल हो । न हो । दोनों में 1 से रहो । इसी समता को । योग कहते हैं ।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः । 2-49
इस बुद्धि योग के द्वारा । किया काम तो बहुत ऊँचा है । इस बुद्धि की शरण लो । काम को फल की इच्छा से करने वाले । तो कंजूस होते हैं ।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम । 2-50
इस बुद्धि से युक्त होकर । तुम अच्छे और बुरे कर्म । दोनों से छुटकारा पा लोगे । इसलिये योग को । धारण करो । यह योग ही । काम करने में । असली कुशलता है ।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम । 2-51
इस बुद्धि से युक्त होकर । मुनि लोग । किये हुये काम के । नतीजों को । त्याग देते हैं । इस प्रकार । जन्म बन्धन से । मुक्त होकर । वे दुख से परे । स्थान प्राप्त करते हैं ।
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च । 2-52
जब तुम्हारी बुद्धि । अन्धकार से ऊपर । उठ जायेगी । तब क्या सुन चुके हो । और क्या सुनने वाला है । उसमें तुम्हें । कोई मतलब नहीं रहेगा ।
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि । 2-53
1 दूसरे को काटते उपदेश । और श्रुतियां सुन सुनकर । जब तुम अडिग स्थिर रहोगे । तब तुम्हारी बुद्धि । स्थिर हो जायेगी । और तुम योग को । प्राप्त कर लोगे ।
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत वृजेत किम । 2-54
अर्जुन बोला - हे केशव ! जिसकी बुद्धि । ज्ञान में स्थिर हो चुकी है । वह कैसा होता है ? ऐसा स्थिरता प्राप्त किया व्यक्ति । कैसे बोलता । बैठता । चलता । फिरता है ?
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते । 2-55
श्रीकृष्ण बोले - हे पार्थ ! जब वह ( व्यक्ति ) अपने मन में स्थित । सभी कामनाओं को । निकाल देता है । और अपने आप में ही । अपनी आत्मा को । संतुष्ट रखता है । तब उसे ज्ञान । और बुद्धिमता में । स्थित कहा जाता है ।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते । 2-56
जब वह दुख से । विचलित नहीं होता । और सुख से । उसके मन में । कोई उमंगे नहीं उठतीं । इच्छा और तड़प । डर और गुस्से से मुक्त । ऐसे स्थित हुये धीर मनुष्य को ही । मुनि कहा जाता है ।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम । नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता । 2-57
किसी भी ओर । न जुड़ा रह । अच्छा या बुरा । कुछ भी पाने पर । जो न उसकी । कामना करता है । और न उससे । नफरत करता है । उसकी बुद्धि । ज्ञान में स्थित है ।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता । 2-58
जैसे कछुआ । अपने सारे अंगों को । खुद में समेट लेता है । वैसे ही । जिसने । अपनी इन्द्रियों को । उनके विषयों से निकाल कर । खुद में समेट रखा है । वह ज्ञान में स्थित है ।
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते । 2-59
विषयों को त्याग देने पर । उनका स्वाद ही बचता है । परम को देख लेने पर । वह स्वाद भी । मन से । छूट जाता है ।
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः । 2-60
हे कौन्तेय ! सावधानी से । संयमता का अभ्यास करते हुये । पुरुष के मन को भी । उसकी चंचल इन्द्रियाँ । बलपूर्वक छीन लेती हैं ।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता । 2-61
उन सबको । संयम कर । मेरा ध्यान करना चाहिये । क्योंकि जिसकी । इन्द्रियाँ वश में है । वही ज्ञान में । स्थित है ।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते । 2-62
चीजों के बारे में । सोचते रहने से । मनुष्य को । उनसे । लगाव हो जाता है । इससे उसमें । इच्छा पैदा होती है । और इच्छाओं से । गुस्सा पैदा होता है ।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभृंशादबुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति । 2-63
गुस्से से । दिमाग खराब होता है । और उससे । याददाश्त पर । परदा पड़ जाता है । याददाश्त पर । परदा पड़ जाने से । आदमी की बुद्धि । नष्ट हो जाती है । और बुद्धि नष्ट हो जाने पर । आदमी खुद ही का । नाश कर बैठता है ।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति । 2-64
इन्द्रियों को । राग और द्वेष से मुक्त कर । खुद के वश में कर । जब मनुष्य । विषयों को । संयम से । ग्रहण करता है । तो वह । प्रसन्नता और शान्ति । प्राप्त करता है ।
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते । 2-65
( और ) शान्ति से । उसके । सारे दुखों का । अन्त हो जाता है । क्योंकि । शान्त चित्त मनुष्य की । बुद्धि । जल्द ही । स्थिर हो जाती है ।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम । 2-66
जो संयम से । युक्त नहीं है । जिसकी इन्द्रियाँ । वश में नहीं हैं । उसकी बुद्धि भी । स्थिर नहीं हो सकती । और न ही । उसमें शान्ति की । भावना हो सकती है । और जिसमें । शान्ति की । भावना नहीं है । वह शान्त । कैसे हो सकता है ? जो शान्त नहीं है । उसे सुख कैसा ?
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनु विधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि । 2-67
मन अगर । विचरती हुई इन्द्रियों । के पीछे । कहीं भी । लग लेता है । तो वह । बुद्धि को भी । अपने साथ । वैसे ही । खींच कर ले जाता है । जैसे एक नाव को । हवा खींच ले जाती है ।
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता । 2-68
इसलिये । हे महाबाहो ! जिसकी सभी इन्द्रियाँ । अपने विषयों से । पूरी तरह । हटी हुई हैं । सिमटी हुई हैं । उसी की बुद्धि । स्थिर होती है ।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः । 2-69
जो सबके लिये । रात है । उसमें संयमी । जागता है । और जिसमें सब । जागते हैं । उसे मुनि । रात की तरह । देखता है ।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी । 2-70
नदियाँ जैसे । समुद्र जो । एकदम भरा अचल और स्थिर । रहता है । में आकर शान्त हो जाती हैं । उसी प्रकार । जिस मनुष्य में । सभी इच्छायें आकर । शान्त हो जाती हैं । वह शान्ति प्राप्त करता है । न कि वह । जो उनके पीछे भागता है ।
विहाय कामान्यः सर्वान पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति । 2-71
सभी कामनाओं का । त्याग कर । जो मनुष्य । स्पृह रहित । रहता है । जो मैं । और मेरा रूपी । अहंकार को । भूल विचरता है । वह शान्ति को । प्राप्त करता है ।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि बृह्मनिर्वाणमृच्छति । 2-72
बृह्म में स्थित मनुष्य । ऐसा होता है । हे पार्थ ! इसे प्राप्त करके । वो फिर । भटकता नहीं । अन्त समय भी । इसी स्थिति में स्थित । वह बृह्म निर्वाण । प्राप्त करता है ।

अपने काम में मृत्यु भी होना अच्छा है बजाय किसी और के काम से - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 3

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव । 3-1
अर्जुन बोला - हे केशव ! अगर आप । बुद्धि को । कर्म से अधिक । मानते हैं । तो मुझे इस घोर कर्म में क्यों न्योजित कर रहे हैं ?
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव में । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम । 3-2
मिले हुये से वाक्यों से । मेरी बुद्धि । शंकित हो रही है । इसलिये मुझे । वह 1 रास्ता बताईये । जो निश्चित प्रकार से । मेरे लिये अच्छा हो ।
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम । 3-3
श्रीकृष्ण बोले - हे नि़ष्पाप ! इस लोक में । मेरे द्वारा । 2 प्रकार की निष्ठायें । पहले बताई गयीं थीं । ज्ञान योग । सन्यास से जुङे लोगों के लिये । और कर्म योग । उनके लिये । जो कर्मयोग से जुड़े हैं ।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति । 3-4
कर्म का आरम्भ न करने से । मनुष्य नैष्कर्म सिद्धि । नहीं प्राप्त कर सकता । अतः कर्म योग के अभ्यास में । कर्मों का करना जरूरी है । और न ही केवल त्याग कर देने से । सिद्धि प्राप्त होती है ।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजेर्गुणेः । 3-5
कोई भी । एक क्षण के लिये भी । कर्म किये बिना । नहीं बैठ सकता । सब प्रकृति से पैदा हुये गुणों से । विवश होकर कर्म करते हैं ।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते । 3-6
कर्म की इन्द्रियों को तो रोककर । जो मन ही मन । विषयों के बारे में सोचता है । उसे मिथ्या अतः ढोंग आचारी कहा जाता है ।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते । 3-7

हे अर्जुन ! जो अपनी इन्द्रियों । और मन को । नियमित कर । कर्म का आरम्भ करते हैं । कर्म योग का आसरा लेते हुये । वह कहीं बेहतर हैं ।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः । 3-8
जो तुम्हारा काम है । उसे तुम करो । क्योंकि कर्म से ही । अकर्म पैदा होता है । मतलब कर्म योग द्वारा । कर्म करने से ही । कर्मों से छुटकारा मिलता है । कर्म किये बिना तो । यह शरीर की यात्रा भी संभव नहीं हो सकती । शरीर है । तो कर्म तो करना ही पड़ेगा ।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर । 3-9
केवल यज्ञ समझ कर । तुम कर्म करो । हे कौन्तेय ! वरना इस लोक में । कर्म बन्धन का कारण बनता है । उसी के लिये कर्म करते हुये । तुम संग से मुक्त रहकर । समता से रहो ।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक । 3-10
यज्ञ के साथ ही । बहुत पहले । प्रजापति ने । प्रजा की सृष्टि की । और कहा कि - इसी प्रकार कर्म यज्ञ करने से । तुम बढोगे । और इसी से । तुम्हारे मन की । कामनायें पूरी होंगी ।
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ । 3-11
तुम देवताओं को प्रसन्न करो । और देवता तुम्हें प्रसन्न करेंगे । इस प्रकार परस्पर । एक दूसरे का खयाल रखते । तुम परम श्रेय को प्राप्त करोगे ।
इष्टान्भोगान्हि वह देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः । 3-12
यज्ञों से संतुष्ट हुये देवता । तुम्हें मन पसंद । भोग प्रदान करेंगे । जो उनके दिये हुये भोगों को । उन्हें दिये बिना । खुद ही भोगता है । वह चोर है ।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । भुञ्जते ते त्वघं पापा यह पचन्त्यात्मकारणात । 3-13
जो यज्ञ से निकले । फल का आनंद लेते हैं । वह सब पापों से । मुक्त हो जाते हैं । लेकिन जो पापी । खुद पचाने के लिये ही । पकाते हैं । वे पाप के भागीदार बनते हैं ।
अन्नादभवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञादभवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुदभवः । 3-14
जीव अनाज से होते हैं । अनाज बारिश से होता है । और बारिश यज्ञ से होती है । यज्ञ कर्म से होता है ।
( यहाँ प्रकृति के चलने को यज्ञ कहा गया है )
 कर्म बृह्मोदभवं विद्धि बृह्माक्षरसमुदभवम । तस्मात्सर्वगतं बृह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम । 3-15
कर्म बृह्म से सम्भव होता है । और बृह्म अक्षर से होता है । इसलिये हर ओर स्थित बृह्म । सदा ही यज्ञ में स्थापित है ।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति । 3-16
इस तरह चल रहे । इस चक्र में । जो हिस्सा नहीं लेता । सहायक नहीं होता । अपनी इन्द्रियों में । डूबा हुआ वह । पाप जीवन जीने वाला । व्यर्थ ही । हे पार्थ ! जीता है ।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते । 3-17
लेकिन । जो मानव । खुद ही में स्थित है । अपने आप में ही । तृप्त है । अपने आप में ही । सन्तुष्ट है । उसके लिये । कोई भी । कार्य नहीं बचता ।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः । 3-18
न उसे कभी । किसी काम के । होने से । कोई मतलब है । और न ही । न होने से । और न ही । वह किसी भी । जीव पर । किसी भी । मतलब के लिये । आश्रय लेता है ।
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः । 3-19
इसलिये कर्म से जुड़े बिना । सदा अपना कर्म करते हुये । समता का । आचरण करो । बिना जुड़े । कर्म का । आचरण करने से । पुरुष परम को । प्राप्त कर लेता है ।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि । 3-20
कर्म के । द्वारा ही । जनक आदि । सिद्धि में । स्थापित हुये थे । इस लोक समूह । इस संसार के । भले के लिये । तुम्हें भी । कर्म करना चाहिये ।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते । 3-21
क्योंकि । जो । 1  श्रेष्ठ पुरुष । करता है । दूसरे लोग भी । वही करते हैं । वह जो करता है । उसी को । प्रमाण मानकर । अन्य लोग भी । पीछे वही करते हैं ।
न में पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि । 3-22
हे पार्थ ! तीनों लोकों में । मेरे लिये । कुछ भी । करने वाला । नहीं है । और न ही । कुछ पाने वाला है । लेकिन फिर भी । मैं कर्म में लगता हूँ ।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः । 3-23
हे पार्थ ! अगर मैं । कर्म में । नहीं लगूँ । तो सभी । मनुष्य भी । मेरे पीछे । वही करने लगेंगे ।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम । संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः । 3-24
अगर मैं । कर्म न करूँ । तो इन लोकों में । तबाही मच जायेगी । और मैं । इस प्रजा का । नाशकर्ता हो जाऊँगा ।
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम । 3-25
जैसे अज्ञानी लोग । कर्मों से जुड़कर । कर्म करते हैं । वैसे ही । ज्ञानमन्दों को । चाहिये । कि कर्म से । बिना जुड़े । कर्म करें । इस संसार चक्र के । लाभ के लिये । ही कर्म करें ।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम । जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन । 3-26
जो लोग । कर्मो के । फलों से । जुड़े हैं । कर्मों से । जुड़े हैं । ज्ञानमंद । उनकी बुद्धि को । न छेदें । सभी कामों को । कर्मयोग बुद्धि से । युक्त होकर । समता का । आचरण करते हुये । करें ।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते । 3-27
सभी कर्म । प्रकृति में स्थित । गुणों द्वारा ही । किये जाते हैं । लेकिन । अहंकार से । विमूढ हुआ । मनुष्य । स्वयँ को ही । कर्ता समझता है ।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते । 3-28
हे महाबाहो ! गुणों और कर्मों के । विभागों को । सार तक । जानने वाला । यह मानकर । कि गुण ही गुणों से । वरत रहे हैं । जुड़ता नहीं ।
प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत । 3-29
प्रकृति के गुणों से । मूर्ख हुये । गुणों के कारण हुये । उन कर्मों से । जुड़े रहते है । सब जानने वाले को । चाहिये । कि वह अधूरे ज्ञान वालों को । विचलित न करे ।
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः । 3-30
सभी कर्मों को । मेरे हवाले कर । अध्यात्म में । मन को लगाओ । आशाओं से । मुक्त होकर । " मैं " को । भूलकर । बुखार मुक्त होकर । युद्ध करो ।
यह में मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः । 3-31
मेरे इस मत को । जो मानव । श्रद्धा । और बिना दोष निकाले । सदा धारण करता है । और मानता है । वह कर्मों से । मु्क्ति प्राप्त करता है ।
यह त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति में मतम । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः । 3-32
जो इसमें । दोष निकाल कर । मेरे इस मत का । पालन नहीं करता । उसे तुम । सारे ज्ञान से वंचित । मूर्ख हुआ । और नष्ट बुद्धि । जानो ।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति । 3-33
सब वैसा ही । करते हैं । जैसा उनका । स्वभाव होता है । चाहे वह । ज्ञानवान भी हो । अपने स्वभाव से ही । सभी प्राणी होते हैं । फिर सयंम से क्या होगा ?
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ । 3-34
इन्द्रियों के लिये । उनके विषयों में । खींच और घृणा । होती है । इन दोनों के । वश में । मत आओ । क्योंकि । यह रास्ते के रुकावट हैं ।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः । 3-35
अपना काम ही । अच्छा है । चाहे उसमें । कमियाँ भी हों । किसी और के । अच्छी तरह किये । काम से । अपने काम में । मृत्यु भी । होना अच्छा है । किसी और के । काम से । चाहे उसमें । डर न हो ।
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः । 3-36
अर्जुन बोला -  लेकिन । हे वार्ष्णेय ! किसके जोर में । दबकर पुरुष । पाप करता है । अपनी मरजी के । बिना भी । जैसे कि । बल से । उससे पाप । करवाया जा रहा हो ।
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुदभवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम । 3-37
श्रीकृष्ण बोले - इच्छा । और गुस्सा । जो रज गुण से होते हैं । महा विनाशी । महापापी । इसे तुम । यहाँ । दुश्मन जानो ।
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च । यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम । 3-38
जैसे आग को । धूआँ । ढक लेता है । शीशे को । मिट्टी । ढक लेती है । शिशु को । गर्भ । ढक लेता है । उसी तरह । वह इनसे । ढका रहता है । ( क्या ढका रहता है ? अगले श्लोक में )
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च । 3-39
यह ज्ञान को । ढकने वाला । ज्ञानमंद पुरुष का । सदा वैरी है । इच्छा का । रूप लिये । हे कौन्तेय ! जिसे । पूरा करना । संभव नहीं ।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम । 3-40
इन्द्रियाँ । मन । और बुद्धि । इसके स्थान । कहे जाते हैं । यह देहधारियों को । मूर्ख बना । उनके ज्ञान को । ढक लेती है ।
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम । 3-41
इसलिये । हे भरतर्षभ ! सबसे पहले । तुम । अपनी इन्द्रियों को । नियमित करो । और इस । पापमयी । ज्ञान और विज्ञान का । नाश करने वाली । इच्छा का त्याग करो ।
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः । 3-42
इन्द्रियों को । उत्तम । कहा जाता है । और इन्द्रियों से । उत्तम । मन है । मन से । ऊपर । बुद्धि है । और बुद्धि से । ऊपर । आत्मा है ।
एवं बुद्धेः परं बुदध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम । 3-43
इस प्रकार । स्वयँ को । बुद्धि से । ऊपर जानकर । स्वयँ को । स्वयँ के । वश में कर । हे महाबाहो ! इस इच्छा रूपी । शत्रु पर । जीत प्राप्त कर लो । जिसे जीतना । कठिन है ।

मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 4

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽबृवीत । 4-1
श्रीकृष्ण बोले - इस अव्यय योग को । मैंने विवस्वान को बताया । विवस्वान ने इसे मनु को कहा । और मनु ने इसे इक्ष्वाक को बताया ।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप । 4-2
हे परन्तप ! इस तरह यह योग परम्परा से । राज ऋषियों को प्राप्त होता रहा । लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया । बहुत समय बाद । इसका ज्ञान नष्ट हो गया ।
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम । 4-3
उसी पुरातन योग को । मैंने आज फिर तुम्हें बताया है । तुम मेरे भक्त हो । मेरे मित्र हो । और यह योग एक उत्तम रहस्य है ।
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति । 4-4
अर्जुन बोला - आपका जन्म तो अभी हुआ है । विवस्वान तो बहुत पहले हुऐ हैं । कैसे मैं यह समझूँ कि आपने इसे शुरू में बताया था ।
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप । 4-5
श्रीकृष्ण बोले - अर्जुन ! मेरे बहुत से जन्म बीत चुके हैं । और तुम्हारे भी । उन सबको मैं तो जानता हूँ । पर तुम नहीं जानते । हे परन्तप !
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया । 4-6
यद्यपि मैं अजन्मा । और अव्यय । सभी जीवों का महेश्वर हूँ । यद्यपि मैं । अपनी प्रकृति को । अपने वश में कर । अपनी माया से ही । संभव होता हूँ ।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम । 4-7
हे भारत ! जब जब धर्म का लोप होता है । और अधर्म बढता है । तब तब मैं स्वयँ की । रचना करता हूँ ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे । 4-8
सा्धु पुरुषों के कल्याण के लिये । और दुष्कर्मियों के विनाश के लिये । तथा धर्म की स्थापना के लिये । मैं युगों युगों में जन्म लेता हूँ ।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन । 4-9
मेरे जन्म और कर्म । दिव्य हैं । इसे जो सार वत जानता है । देह को त्यागने के बाद । उसका पुनर्जन्म नहीं होता । बल्कि वो मेरे पास आता है । हे अर्जुन !
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मदभावमागताः । 4-10
लगाव । भय और क्रोध से मुक्त । मुझमें ही मन को लगाये हुये । ( और सिर्फ़ एक ) मेरा ही आश्रय लिये लोग । ज्ञान और तप से पवित्र हो । मेरे पास पहुँचते हैं ।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः । 4-11
जो मेरे पास जैसे आता है । मैं उसे वैसे ही मिलता हूँ । हे पार्थ ! सभी मनुष्य हर प्रकार से मेरा ही अनुगमन करते हैं ।
काङक्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा । 4-12
जो किये काम में सफलता चाहते हैं । वो देवताओं का पूजन करते हैं । इस मनुष्य लोक में कर्मों से सफलता शीघ्र ही मिलती है ।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम । 4-13
ये चारों 4 वर्ण । मेरे द्वारा ही रचे गये थे । गुणों और कर्मों के विभागों के आधार पर । इन कर्मों का कर्ता होते हुऐ भी । परिवर्तन रहित मुझको । तुम अकर्ता ही जानो ।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते । 4-14
न मुझे । कर्म रंगते हैं । और न ही मुझमें । कर्मों के फलों के लिये । कोई इच्छा है । जो मुझे इस प्रकार जानता है । उसे कर्म नहीं बाँधते ।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वेरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कर्मेव तस्मात्वं पूर्वेः पूर्वतरं कृतम । 4-15
पहले भी यह जानकर ही । मोक्ष की इच्छा रखने वाले । कर्म करते थे । इसलिये तुम भी कर्म करो । जैसे पूर्वों ने । पुरातन समय में किये ।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात । 4-16
कर्म क्या है ? और अकर्म क्या है ? विद्वान भी इसके बारे में मोहित हैं । तुम्हें मैं कर्म क्या है ? ये बताता हूँ । जिसे जानकर । तुम अशुभ से मुक्ति पा लोगे ।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः । 4-17
कर्म को । जानना जरूरी है । और न करने लायक । कर्म को भी । अकर्म को भी । जानना जरूरी है । क्योंकि कर्म । रहस्यमयी है ?
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत । 4-18
कर्म करने में । जो अकर्म देखता है । और कर्म न करने में भी । जो कर्म होता देखता है । वही मनुष्य बुद्धिमान है । और इसी बुद्धि से युक्त होकर । वो अपने सभी कर्म करता है ।
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः । 4-19
जिसके द्वारा आरम्भ किया सब कुछ । इच्छा संकल्प से मुक्त होता है । जिसके सभी कर्म । ज्ञान रूपी अग्नि में । जलकर । राख हो गये हैं । उसे ज्ञानमंद लोग । बुद्धिमान कहते हैं ।
त्यक्त्वा कर्मफलासङगं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः । 4-20
कर्म के फल से । लगाव त्याग कर । सदा तृप्त । और आश्रयहीन रहने वाला । कर्म मे लगा हुआ होकर भी । कभी कुछ नहीं करता है ।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शरीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम । 4-21
मोघ आशाओं से मुक्त । अपने चित्त और आत्मा को । वश में कर । घर सम्पत्ति आदि । मानसिक परिग्रहों को त्याग । जो केवल । शरीर से कर्म करता है । वो कर्म करते हुये भी । पाप नहीं प्राप्त करता ।
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते । 4-22
स्वयँ ही चलकर आये । लाभ से ही सन्तुष्ट । द्वन्द्वता से ऊपर उठा हुआ । और दिमागी जलन से मुक्त । जो सफलता असफलता में । 1 सा है । वो कार्य करता हुआ भी । नहीं बँधता ।
गतसङगस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते । 4-23
संग छोड़ । जो । मुक्त हो चुका है । जिसका चित्त । ज्ञान में स्थित है । जो केवल । यज्ञ के लिये । कर्म कर रहा है । उसके सम्पूर्ण कर्म । पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं ।
बृह्मार्पणं बृह्म हविर्बृह्माग्नौ बृह्मणा हुतम । बृह्मैव तेन गन्तव्यं बृह्मकर्मसमाधिना  । 4-24
बृह्म ही । अर्पण करने का साधन है । बृह्म ही । जो अर्पण हो रहा है । वो है । बृह्म ही । वो अग्नि है । जिसमें अर्पण किया जा रहा है । और अर्पण करने वाला भी । बृह्म ही है । इस प्रकार कर्म करते समय । जो बृह्म में समाधित हैं । वे बृह्म को ही । प्राप्त करते हैं ।
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । बृह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुहवति । 4-25
कुछ योगी । यज्ञ के द्वारा । देवों की पूजा करते हैं । और कुछ बृह्म की ही । अग्नि में । यज्ञ की आहुति देते हैं ।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुहवति । शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुहवति । 4-26
अन्य सुनने आदि इन्द्रियों की । संयम अग्नि में । आहुति देते हैं । और अन्य । शब्द आदि विषयों की । इन्द्रियों रूपी अग्नि में । आहूति देते हैं ।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुहवति ज्ञानदीपिते । 4-27
और दूसरे कोई । सभी इन्द्रियों और प्राणों को । कर्म में लगाकर । आत्म संयम द्वारा । ज्ञान से जल रही । योग अग्नि में अर्पित करते हैं ।
दृव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितवृताः । 4-28
इस प्रकार कोई । धन पदार्थों द्वारा । यज्ञ करते हैं । कोई तप द्वारा । यज्ञ करते हैं । कोई कर्म योग द्वारा । यज्ञ करते हैं । और कोई स्वाध्याय द्वारा । ज्ञान यज्ञ करते हैं । अपने अपने वृतों का । सावधानी से पालन करते हु्ये ।
अपाने जु्हवति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायाम परायणाः । 4-29
और भी कई अपान में । प्राण को अर्पित कर । और प्राण में । अपान को अर्पित कर । इस प्रकार प्राण और अपान की । गतियों को । नियमित कर । प्राणायाम में लगते हैं ।
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः । 4-30
अन्य कुछ । आहार न लेकर । प्राणों को प्राणों में । अर्पित करते हैं । ये सभी ही । यज्ञों द्वारा क्षीण पाप हुये । यज्ञ को जानने वाले हैं ।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम । 4-31
यज्ञ से उत्पन्न । इस अमृत का । जो पान करते हैं । अर्थात जो यज्ञ कर । पापों को क्षीण कर । उससे उत्पन्न शान्ति को प्राप्त करते हैं । वे सनातन बृह्म को । प्राप्त करते हैं । जो यज्ञ नहीं करता । उसके लिये यह लोक ही सुखमयी नहीं है । तो और कोई लोक भी । कैसे हो सकता है ? हे कुरुसत्तम !
एवं बहुविधा यज्ञा वितता बृह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे । 4-32
इस प्रकार बृह्म से । बहुत से यज्ञों का विधान हुआ । इन सभी को तुम । कर्म से उत्पन्न हुआ जानो । और ऐसा जान जाने पर । तुम भी कर्म से । मोक्ष पा जाओगे ।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते । 4-33
हे परन्तप ! धन आदि पदार्थों के यज्ञ से । ज्ञान यज्ञ । ज्यादा अच्छा है । सारे कर्म । पूर्ण रूप से । ज्ञान मिल जाने पर । अन्त पाते हैं ।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः । 4-34
सार को । जानने वाले । ज्ञानमंदों को । तुम प्रणाम करो । उनसे प्रश्न करो । और उनकी सेवा करो । वे तुम्हें । ज्ञान में । उपदेश देंगे ।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि । 4-35
हे पाण्डव ! उस ज्ञान में । जिसे जान लेने पर । तुम फिर से मोहित नहीं होगे । और अशेष सभी जीवों को । तुम अपने में । अन्यथा मुझमें देखोगे ।
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि । 4-36
यदि तुम । सभी पाप करने वालों से भी । अधिक पापी हो । तब भी । ज्ञान रूपी नाव द्वारा । तुम उन सब पापों को । पार कर जाओगे ।
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा । 4-37
जैसे समृद्ध अग्नि । घास को भस्म कर डालती है । हे अर्जुन ! उसी प्रकार ज्ञान अग्नि । सभी कर्मों को । भस्म कर डालती है ।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति । 4-38
ज्ञान से अधिक पवित्र । इस संसार पर । और कुछ नहीं है । तुम स्वयँ ही । योग में सिद्ध हो जाने पर । समय के साथ । अपनी आत्मा में ज्ञान को प्राप्त करोगे ।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति । 4-39
श्रद्धा रखने वाले । अपनी इन्द्रियों का संयम कर । ज्ञान लभते हैं । और ज्ञान मिल जाने पर । जल्द ही परम शान्ति को प्राप्त होते हैं ।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः । 4-40
ज्ञानहीन और श्रद्धाही्न । शंकाओं मे डूबी आत्मा वालों का । विनाश हो जाता है । न उनके लिये ये लोक है । न कोई और । न ही शंका में डूबी हुयी आत्मा को । कोई सुख है ।
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय । 4-41
योग द्वारा । कर्मों का त्याग किये हुआ । ज्ञान द्वारा शंकाओं को छिन्न भिन्न किया हुआ । आत्म मे स्थित व्यक्ति को कर्म नहीं बाँधते । हे धनंजय !
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः । छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत । 4-42
इसलिये । अज्ञान से जन्मे । इस संशय को । जो तुम्हारे हृदय मे घर किया हुआ है । ज्ञान रूपी तलवार से । चीर डालो । और योग को । धारण कर उठो । हे भारत !

भगवान किसी के पाप को ग्रहण नहीं करते - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 5

संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम । 5-1
अर्जुन बोला - हे कृष्ण ! आप कर्मों के त्याग की प्रशंसा कर रहे हैं । और फिर योग द्वारा कर्मों को करने की भी । इन दोनों में से जो 1 मेरे लिये ज्यादा अच्छा है । वही आप निश्चित करके मुझे कहिये ।
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते । 5-2
श्रीकृष्ण बोले - संन्यास और कर्म योग । ये दोनों ही श्रेय हैं । परम की प्राप्ति कराने वाले हैं । लेकिन कर्मों से संन्यास की जगह । योग द्वारा । कर्मों का करना अच्छा है ।
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते । 5-3
उसे तुम । सदा संन्यासी ही जानो । जो न घृणा करता है । और न इच्छा करता है । हे महाबाहो ! द्वन्दता से मुक्त व्यक्ति । आसानी से ही । बंधन से मुक्त हो जाता है ।
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम । 5-4
संन्यास अथवा सांख्य को । और कर्म योग को । बालक ही भिन्न भिन्न देखते हैं । ज्ञानमंद नहीं । किसी भी 1 में ही स्थित मनुष्य । दोनों के ही फलों को । समान रूप से पाता है ।
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स: पश्यति । 5-5
सांख्य से । जो स्थान । प्राप्त होता है । वही स्थान । योग से भी । प्राप्त होता है । जो सांख्य और कर्म योग को । 1 ही देखता है । वही वास्तव में देखता है ।
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्बृह्म नचिरेणाधिगच्छति । 5-6
संन्यास अथवा त्याग । हे महाबाहो ! कर्म योग के बिना । प्राप्त करना कठिन है । लेकिन योग से युक्त मुनि । कुछ ही समय में बृह्म को प्राप्त कर लेते है ।
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते । 5-7
योग से युक्त हुआ । शुद्ध आत्मा वाला । स्वयँ पर । और अपनी इन्द्रियों पर । जीत पाया हुआ । सभी जगह । और सभी जीवों में । 1 ही परमात्मा को देखता हुआ । ऐसा मुनि कर्म करते हुऐ भी लिपता नहीं है ।
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित । पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन । 5-8
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन । 5-9
सार को जानने वाला । यही मानता है । कि वो कुछ नहीं कर रहा । देखते हुये । सुनते हुये । छूते हुये । सूँघते हुये । खाते हुये । चलते फिरते हुये । सोते हुये । साँस लेते हुये । बोलते हुये । छोड़ते या पकड़े हुये । यहाँ तक कि आँखें खोलते । या बन्द करते हुये । अर्थात कुछ भी करते हुये । वो इसी भावना से युक्त रहता है  । कि वो कुछ नहीं कर रहा । वो यही धारण किये रहता है । कि इन्द्रियाँ अपने विषयों के साथ वरत रही हैं ।
बृह्मण्याधाय कर्माणि सङगं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पदमपत्रमिवाम्भसा । 5-10
कर्मों को बृह्म के हवाले कर । संग को त्याग कर । जो कार्य करता है । वो पाप में नहीं लिपता । जैसे कमल का पत्ता । पानी में भी । गीला नहीं होता ।
कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङगं त्यक्त्वात्मशुद्धये । 5-11
योगी । आत्मशुद्धि के लिये । केवल शरीर । मन । बुद्धि । और इन्द्रियों से । कर्म करते हैं । संग को त्याग कर ।
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते । 5-12
कर्म के फल का । त्याग करने की । भावना से युक्त होकर । योगी परम शान्ति पाता है । लेकिन जो । ऐसे युक्त नहीं हैं । इच्छा पूर्ति के लिये । कर्म के फल से । जुड़े होने के कारण । वो बँध जाता है ।
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन । 5 -13
सभी कर्मों को । मन से त्याग कर । देही इस 9 दरवाजों के देश । मतलब इस शरीर में । सुख से बसती है । न वो कुछ करती है । और न करवाती है ।
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते । 5-14
प्रभु । न तो कर्ता होने की । भावना की । और न कर्म की । रचना करते हैं । न ही वे कर्म का फल से । संयोग कराते हैं । यह सब तो । स्वयँ के कारण ही । होता है ।
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः । 5-15
न भगवान किसी के । पाप को ग्रहण करते हैं । और न किसी के । अच्छे कार्य को । ज्ञान को अज्ञान । ढक लेता है । इसलिये जीव । मोहित हो जाते हैं ।
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम । 5-16
जिनके आत्म में स्थित । अज्ञान को । ज्ञान ने नष्ट कर दिया है । वह ज्ञान । सूर्य की तरह । सब प्रकाशित कर देता है ।
तदबुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः । 5-17
ज्ञान द्वारा । उनके सभी पाप धुले हुये । उसी ज्ञान में बुद्धि लगाये । उसी में आत्मा को लगाये । उसी में श्रद्धा रखते हुये । और उसी में डूबे हुये । वे ऐसा स्थान प्राप्त करते हैं । जिससे फिर लौटकर नहीं आते ।
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः । 5-18
ज्ञानमंद व्यक्ति । 1 विद्या विनय सम्पन्न । ब्राह्मण को । गाय को । हाथी को । कुत्ते को । और 1 नीच व्यक्ति को । इन सभी को । समान दृष्टि से देखता है ।
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं बृह्म तस्मादबृह्मणि ते स्थिताः । 5-19
जिनका मन । समता में स्थित है । वे यहीं इस जन्म में । मृत्यु को जीत लेते हैं । क्योंकि बृह्म । निर्दोष है । और समता पूर्ण है । इसलिये वे बृह्म में ही स्थित हैं ।
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम । स्थिरबुद्धिरसंमूढो बृह्मविदबृह्मणि स्थितः । 5-20
न प्रिय लगने वाला प्राप्त कर । वे प्रसन्न होते हैं । और न अप्रिय लगने वाला । प्राप्त करने पर । व्यथित होते हैं । स्थिर बुद्धि वाले । मूर्खता से परे । बृह्म को जानने वाले । ऐसे लोग बृह्म में ही स्थित हैं ।
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत सुखम । स बृह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते । 5-21
बाहरी स्पर्शों से । न जुड़ी आत्मा । अपने आप में ही । सुख पाती है । ऐसी बृह्म योग से युक्त  आत्मा । कभी न अन्त होने वाले । निरन्तर सुख का । आनन्द लेती है ।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः । 5-22
बाहरी स्पर्श से उत्पन्न । भोग तो । दुख का ही घर हैं । शुरू और अन्त हो जाने वाले । ऐसे भोग । हे कौन्तेय ! उनमें बुद्धिमान लोग । रमा नहीं करते ।
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात । कामक्रोधोदभवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः । 5-23
यहाँ इस शरीर को त्यागने से पहले ही । जो काम और क्रोध से । उत्पन्न वेगों को । सहन कर पाने में । सफल हो पाये । ऐसा ( योग ) युक्त नर सुखी है ।
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी बृह्मनिर्वाणं बृह्मभूतोऽधिगच्छति । 5-24
जिसकी अन्तर आत्मा । सुखी है । अन्तर आत्मा में ही । जो तुष्ट है । और जिसका अन्तःकरण । प्रकाशमयी है । ऐसा योगी । बृह्म निर्वाण प्राप्त कर । बृह्म में ही । समा जाता है ।
लभन्ते बृह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः । 5-25
ॠषि । जिनके पाप । क्षीण हो चुके हैं । जिनकी द्वन्द्वता । छिन्न हो चुकी है । जो स्वयँ की ही तरह । सभी जीवों के हित में । रमे हैं । वो बृह्म निर्वाण प्राप्त करते हैं ।
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम । अभितो बृह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम । 5-26
काम और क्रोध को त्यागे । साधना करते हुये । अपने चित को । नियमित किये । आत्मा का ज्ञान । जिन्हें हो चुका है । वे यहाँ होते हुये भी । बृह्म निर्वाण में ही स्थित हैं ।
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ । 5 -27
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः । 5 -28
बाहरी स्पर्शों को । बाहर कर । अपनी दृष्टि को । अन्दर की ओर । भ्रुवों के मध्य में । लगाये । प्राण और अपान का । नासिकाओं में । 1 सा बहाव कर । इन्द्रियों । मन । और बुद्धि को । नियमित कर । ऐसा मुनि । जो मोक्ष प्राप्ति में ही । लगा हुआ है । इच्छा । भय । और क्रोध से मुक्त । वह सदा ही मुक्त है ।
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति । 5-29
मुझे ही । सभी यज्ञों । और तपों का । भोक्ता । सभी लोकों का । महान ईश्वर । और सभी जीवों का । सुहृद जानकर । वह शान्ति को । प्राप्त करता है ।

त्याग के संकल्प के बिना कोई योगी नहीं बनता - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 6

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः । 6-1
श्रीकृष्ण बोले - कर्म के फल का । आश्रय न लेकर । जो कर्म करता है । वह संन्यासी भी है । और योगी भी । वह नहीं । जो अग्निहीन है । न वह । जो अक्रिय है ।
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन । 6-2
जिसे सन्यास कहा जाता है । उसे ही तुम योग भी जानो । हे पाण्डव ! क्योंकि सन्यास । अर्थात त्याग के । संकल्प के बिना । कोई योगी नहीं बनता ।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते । 6-3
1 मुनि के लिये । योग में स्थित होने के लिये । कर्म साधन कहा जाता है । योग में स्थित हो जाने पर । शान्ति उसके लिये । साधन कही जाती है ।
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते । 6-4
जब वह । न इन्द्रियों के । विषयों की ओर । और न । कर्मों की ओर । आकर्षित होता है । सभी संकल्पों का त्यागी । तब उसे । योग में । स्थित कहा जाता है ।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन । 6-5
स्वयँ से । अपना उद्धार करो । स्वयँ ही । अपना पतन नहीं । मनुष्य स्वयँ ही । अपना मित्र होता है । और स्वयँ ही । अपना शत्रु ।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत । 6-6
जिसने । अपने आप पर । जीत पा ली है । उसके लिये । उसका आत्मा । उसका मित्र है । लेकिन ( जिसने ) स्वयँ पर । जीत नहीं प्राप्त की है । उसके लिये । उसका आत्मा ही । शत्रु की तरह वरतता है ।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः । 6-7
अपने आत्मन पर । जीत प्राप्त किया । सरदी गरमी । सुख दुख । तथा मान अपमान में । 1 सा रहने वाला । । प्रसन्न चित्त मनुष्य । परमात्मा में बसता है ।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः । 6-8
ज्ञान और अनुभव से । तृप्त हुई आत्मा । अ हिल । अपनी इन्द्रियों पर । जीत प्राप्त किये । इस प्रकार युक्त । व्यक्ति को ही । योगी कहा जाता है । जो लोहे । पत्थर । और सोने को । 1 सा देखता है ।
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते । 6-9
जो अपने सुहृद को । मित्र को । वैरी को । कोई मतलब न रखने वाले को । बिचौले को । घृणा करने वाले को । सम्बन्धी को । यहाँ तक कि 1 साधु पुरूष को । और ( 1 ) पापी पुरूष को । 1 ही बुद्धि से । देखता है । वह उत्तम है ।
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः । 6-10
योगी को । एकान्त स्थान पर । स्थित होकर । सदा अपनी आत्मा को । नियमित करना चाहिये । एकान्त में । इच्छाओं । और घर । धन आदि । मानसिक परिग्रहों से रहित हो । अपने चित्त । और आत्मा को । नियमित करता हुआ ।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम । 6-11
उसे  । ऐसे आसन पर । बैठना चाहिये । जो साफ । और पवित्र स्थान पर । स्थित हो । स्थिर हो । और जो । न ज़्यादा ऊँचा हो । और न ज़्यादा नीचा हो । और कपड़े । खाल । या कुश । नामक घास से बना हो ।
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये । 6-12
वहाँ अपने मन को एकाग्र कर । चित्त । और इन्द्रियों को अक्रिय कर । उसे आत्म शुद्धि के लिये । ध्यान योग का । अभ्यास करना चाहिये ।
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन । 6-13
अपनी काया । सिर और गर्दन को । 1 सा सीधा । धारण कर । अचल रखते हुये । स्थिर रहकर । अपनी नाक के । आगे वाले भाग की ओर । एकाग्रता से देखते हुये । और किसी दिशा में । नहीं देखना चाहिये ।
प्रशान्तात्मा विगतभीर्बृह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः । 6-14
प्रसन्न आत्मा । भय मुक्त । बृह्मचर्य के वृत में स्थित । मन को संयमित कर । मुझमें चित्त लगाये हुये । इस प्रकार युक्त हो । मेरी ही परम चाह रखते हुये ।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति । 6-15
इस प्रकार योगी । सदा अपने आपको । नियमित करता हुआ । नियमित मन वाला । मुझमें स्थित होने के कारण । परम शान्ति । और निर्वाण को । प्राप्त करता है ।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन । 6-16
हे अर्जुन ! न बहुत खाने वाला । योग प्राप्त करता है । ( और ) न वह । जो बहुत ही कम खाता है । ( और ) न वह । जो बहुत सोता है । और न वह । जो जागता ही रहता है ।
युक्ताहारविहारस्य  युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा । 6-17
जो नियमित आहार लेता है । और नियमित निर आहार रहता है । नियमित ही कर्म करता है । नियमित ही सोता और जागता है । उसके लिये । यह योग । दुखों का अन्त कर देने वाला । हो जाता है ।
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा । 6-18
जब स्वयँ ही । उसका चित्त । बिना हलचल के । और सभी कामनाओं से मुक्त । उसकी आत्मा में । विराजमान रहता है । तब उसे ( योग ) युक्त कहा जाता है ।
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः । 6-19
जैसे एक दीपक । वायु न होने पर । हिलता नहीं है । उसी प्रकार योग द्वारा । नियमित किया हुआ । योगी का चित्त । होता है ।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति । 6-20
जब । उस योगी का । चित्त । योग द्वारा । विषयों से । हट जाता है । तब । वह स्वयँ । अपनी आत्मा को । स्वयँ । अपनी आत्मा द्वारा । देख तुष्ट होता है ।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः । 6-21
( तब ) वह अत्यन्त सुख । जो इन्द्रियों से पार । उसकी बुद्धि में । समाता है । उसे देख लेने के बाद । योगी । उसी में । स्थित रहता है । और सार से । हिलता नहीं ।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते । 6-22
तब बड़े से बड़ा । लाभ । प्राप्त कर लेने पर भी । वह उसे । अधिक नहीं मानता । और न ही । उस सुख में स्थित । वह भयानक से भयानक । दुख से भी । विचलित होता है ।
तं विद्याददुः खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा । 6-23
दुख से । जो जोड़ ( जुङाव ) है । उसके । इस टूट जाने को ही । योग का नाम दिया जाता है । निश्चय कर । और पूरे मन से । इस योग मे जुटना चाहिये ।
संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः । 6-24
शुरू होने वाली । सभी कामनाओं को । त्याग देने का । संकल्प कर । मन से । सभी इन्द्रियों को । हर ओर से । रोक कर ।
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत । 6-25
धीरे धीरे । बुद्धि की स्थिरता । ग्रहण करते हुये । मन को । आत्म में स्थित कर । कुछ भी नहीं सोचना चाहिये ।
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत । 6-26
जब जब । चंचल और अस्थिर मन । किसी भी ओर । जाये । तब तब । उसे नियमित कर । अपने वश में । कर लेना चाहिये ।
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम । उपैति शान्तरजसं बृह्मभूतमकल्मषम । 6-27
ऐसे प्रसन्न चित्त । योगी को । उत्तम सुख । प्राप्त होता है । जिसका । रजो गुण । शान्त हो चुका है । जो पाप मुक्त है । और बृह्म में । समा चुका है ।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन बृह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते । 6-28
अपनी आत्मा को । सदा योग में लगाये । पाप मुक्त हुआ । योगी । आसानी से । बृह्म से । स्पर्श होने का । अत्यन्त सुख भोगता है ।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः । 6-29
योग से युक्त आत्मा । अपनी आत्मा को । सभी जीवों में देखते हुये । और सभी जीवों में । अपनी आत्मा को । देखते हुये । हर जगह एक सा रहता है ।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति । 6-30
जो मुझे । हर जगह । देखता है । और हर चीज़ को । मुझमें देखता है । उसके लिये । मैं कभी । ओझल । नहीं होता । और न ही । वो । मेरे लिये । ओझल होता है ।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते । 6-31
सभी भूतों में । स्थित । मुझे । जो अनन्य भाव से । स्थित होकर । भजता है । वह । सब कुछ । करते हुये भी । मुझ ही में । रहता है ।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः । 6-32
हे अर्जुन ! जो सदा । दूसरों के दुख सुख । और अपने दुख सुख । को एक सा देखता है । वही योगी । सबसे परम है ।
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम । 6-33
अर्जुन बोला - हे मधुसूदन ! जो आपने । यह समता भरा । योग बताया है । इसमें मैं । स्थिरता नहीं देख पा रहा हूँ । मन की चंचलता के कारण ।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवददृढम । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम । 6-34
हे कृष्ण ! मन तो चंचल । हलचल भरा । बलवान । और दृण होता है । उसे रोक पाना तो । मैं वैसे ही अत्यन्त कठिन मानता हूँ । जैसे वायु को रोक पाना ।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते । 6-35
श्रीकृष्ण बोले - बेशक !  हे महाबाहो ! चंचल मन को । रोक पाना कठिन है । लेकिन । हे कौन्तेय ! अभ्यास और वैराग्य से इसे काबू किया जा सकता है ।
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः । 6-36
मेरे मत में । आत्म संयम बिना । योग प्राप्त करना । अत्यन्त कठिन है । लेकिन । अपने आपको वश में कर । अभ्यास द्वारा । इसे प्राप्त किया जा सकता है ।
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति । 6-37
अर्जुन बोला - हे कृष्ण ! श्रद्धा होते हुए भी । जिसका मन । योग से हिल जाता है । योग सिद्धि को । प्राप्त न कर पाने पर । उसका क्या परिणाम होता है ?
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो बृह्मणः पथि । 6-38
क्या वह । दोनों पथों में असफल हुआ । टूटे बादल की तरह । नष्ट नहीं हो जाता । हे महाबाहो ! अप्रतिष्ठित और बृह्म पथ से विमूढ हुआ ।
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते । 6-39
हे कृष्ण ! मेरे इस संशय को । आप पूरी तरह । मिटा दीजिये । क्योंकि । आपके अलावा । और कोई नहीं है । जो इस संशय को छेद पाये ।
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिददुर्गतिं तात गच्छति । 6-40
श्रीकृष्ण बोले - हे पार्थ ! उसके लिये । विनाश न यहाँ है । और न कहीं और ही । क्योंकि हे तात ! कल्याणकारी कर्म करने वाला । कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता ।
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभृष्टोऽभिजायते । 6-41
योग पथ में । भृष्ट हुआ मनुष्य । पुण्यवान लोगों के । लोकों को प्राप्त कर । वहाँ । बहुत समय तक । रहता है । और फिर । पवित्र और श्रीमान । घर में जन्म लेता है ।
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम । 6-42
या फिर । वह बुद्धिमान योगियों के घर में । जन्म लेता है । ऐसा जन्म मिलना । इस संसार में बहुत मुश्किल है ।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन । 6-43
वहाँ उसे । अपने पहले वाले जन्म की ही । बुद्धि से । फिर से संयोग प्राप्त होता है । फिर दोबारा अभ्यास करते हुये । हे कुरुनन्दन ! वह सिद्धि प्राप्त करता है ।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्द बृह्मतिवर्तते । 6-44
पूर्व जन्म में । किये अभ्यास की तरफ । वह बिना वश ही । खिंच जाता है । क्योंकि । योग में । जिज्ञासा रखने वाला भी । वेदों से ऊपर । उठ जाता है ।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम । 6-45
अनेक जन्मों में । किये प्रयत्न से । योगी । विशुद्ध और पाप मुक्त हो । अन्त में । परम सिद्धि को । प्राप्त कर लेता है ।
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन । 6-46
योगी । तपस्वियों से अधिक है । विद्वानों से भी अधिक है । कर्म से जुड़े । लोगों से भी अधिक है । इसलिये । हे अर्जुन ! तुम योगी बनो ।
योगिनामपि सर्वेषां मदभतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः । 6-47
और सभी योगियों में । जो अन्तर आत्मा को । मुझमें ही बसाकर । श्रद्धा से मुझे याद करता है । वही सबसे उत्तम है ।
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