शनिवार, नवंबर 26, 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 50


अष्टावक्र उवाच - तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा । तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यं एकाकी रमते तु यः । 17-1
अष्टावक्र बोले - जो पुरुष । नित्य तृप्त है । शुद्ध इन्द्रिय वाला है । और अकेला रमता है । उसे ही ज्ञान का फल । और योग के अभ्यास का फल प्राप्त होता है । 1  
न कदाचिज्जगत्यस्मिन तत्त्वज्ञा हन्त खिद्यति । यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम । 17-2
तत्व ज्ञानी । इस जगत के लिए । कभी भी । खेद को । प्राप्त नहीं होता है । क्योंकि ( वह जानता है कि ) उसी एक से । यह बृह्मांड मंडल पूर्ण है । 2 
न जातु विषयाः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी । सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निंबपल्लवाः । 17-3
ये कोई भी बिषय । स्वात्माराम ( आत्मा में रमण करने वाले ) को । कभी भी । हर्षित नहीं करते हैं । जैसे सल्लकी ( गन्नों ) के पत्तों से प्रसन्न हुए । हाथी को । नीम के पत्ते । हर्षित नहीं करते । 3
यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासिता । अभुक्तेषु निराकांक्षी तदृशो भवदुर्लभः । 17-4
जो भोगे हुए । भोगों में । आसक्त नहीं । होता है । और अभुक्त । पदार्थों के प्रति । आकांक्षा रहित है । ऐसा मनुष्य । संसार में दुर्लभ है । 4
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 49


बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते । भोगमोक्षनिराकांक्षी विरलो हि महाशयः । 17-5
इस संसार में । भोग और मोक्ष की । इच्छा वाले ( अनेकों मनुष्य ) देखे जाते हैं । परन्तु । भोग और मोक्ष की । आकांक्षा से रहित । कोई विरला ही महापुरुष है । 5
धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा । कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता न हि । 17-6
धर्म । अर्थ । काम । मोक्ष । जीवन । और मरण । किस उदार चित्त के लिए । गृहण और त्याग करने योग्य । नहीं है ? ( अर्थात इनसे कौन उदासीन है ।) 6
वांछा न विश्वविलये न द्वेषस्तस्य च स्थितौ । यथा जीविकया तस्माद धन्य आस्ते यथा सुखम । 17-7
विश्व के । लय होने में । जिसका राग नहीं है । उसकी स्थिति में । जिसको द्वेष नहीं है । यथा प्राप्य जीविका द्वारा । जो पुरुष । सुख पूर्वक रहता है । इसी कारण । वह धन्य है । 7
कृतार्थोऽनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधीः कृती । पश्यन शृण्वन स्पृशन जिघ्रन्न अश्नन्नास्ते यथा सुखम । 17-8
इस ज्ञान से । मैं कृतार्थ हूँ । इस प्रकार । जिसकी बुद्धि । गलित ( निष्ठ ) हो गयी है । ऐसा ज्ञानी पुरुष । देखता हुआ । सुनता हुआ । स्पर्श करता हुआ । सूंघता हुआ । खाता हुआ । सुख पूर्वक रहता है । 8
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 48


शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च । न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे । 17-9
जिसके लिए । संसार सागर । नष्ट हो गया है । ऐसे पुरुष की । दृष्टि । शून्य हो जाती है । चेष्टाएँ ( व्यापार ) व्यर्थ हो जाती हैं । इन्द्रियाँ विकल हो जाती हैं । उसकी ( संसार में ) कोई इच्छा । अथवा विरक्ति नहीं रहती है । 9
न जागृति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति । अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः । 17-10
न जागता है । न सोता है । न पलक को खोलता है । और न पलक को बंद करता है । आश्चर्य है । मुक्त चित्त ( ज्ञानी ) कैसी उत्कृष्ट दशा में । वरतता ( रहता ) है । 10
सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः । समस्तवासना मुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते । 17-11
जीवन मुक्त ज्ञानी । सब जगह । स्वस्थ ( शांत ) सब जगह । निर्मल । अन्तःकरण वाला । दिखलाई देता है । और सब जगह । सब वासनाओं से रहित होकर । विराजता ( रहता ) है । 11
पश्यन शृण्वन स्पृशन जिघ्रन्न अश्नन गृण्हन वदन व्रजन । ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः । 17-12
देखता हुआ । सुनता हुआ । स्पर्श करता हुआ । सूंघता हुआ । खाता हुआ । ग्रहण करता हुआ । बोलता हुआ । जाता हुआ । निश्चय ही । राग द्वेष से मुक्त ( छूटा ) हुआ । ऐसा महापुरुष मुक्त ( ज्ञानी ) है । 12
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 47


न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति । न ददाति न गृण्हाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः । 17-13
न निंदा करता है । न स्तुति करता है । न हर्ष को प्राप्त होता है । न क्रोध करता है । न देता है । न लेता है । ज्ञानी सर्वत्र रस रहित है । 13
सानुरागां स्त्रियं दृष्टवा मृत्युं वा समुपस्थितम । अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशयः । 17-14
प्रीति युक्त स्त्री को । और समीप में स्थित । मृत्यु को देख कर । व्याकुलता से रहित । और शांत महापुरुष । निश्चय ही मुक्त ( ज्ञानी ) है । 14
सुखे दुःखे नरे नार्यां संपत्सु विपत्सु च । विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः । 17-15
सुख में । दुःख में । नर ( पुरुष ) में । नारी ( स्त्री ) में । संपत्तियों में । विपत्तियों में । ज्ञानी बिशेष रूप से । सर्वत्र समदर्शी ( भेद रहित ) है । 15
न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता । नाश्चर्यं नैव च क्षोभः क्षीणसंसरणे नरे । 17-16
जिस मनुष्य के लिए । न हिंसा है । न दयालुता है । न उदंडता है । न दीनता है । न आश्चर्य है । और न क्षोभ है । उसी का संसार क्षीण हुआ है । ( वही जीवन मुक्त है ) 16
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 46


न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुपः । असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते । 17-17
जो न बिषयों में । द्वेष करने वाला । और न ( ही ) बिषयों में । लोभ करने वाला है । तथा जो सदा । आसक्ति रहित । मन से प्राप्त । और अप्राप्त । वस्तुओं का । भोग करता है । वही जीवनमुक्त है । 17
समाधानासमाधानहिताहितविकल्पनाः । शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः । 17-18
जो समाधान । और असमाधान । हित और अहित की । कल्पना को । नहीं जानता है । ऐसा शून्य चित्त वाला ( ज्ञानी ) कैवल्य को प्राप्त हुआ ( मोक्ष रूप से ) स्थित है । वही जीवनमुक्त है । 18
निर्ममो निरहंकारो न किंचिदिति निश्चितः । अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि करोति न । 17-19
जो ममता । और अहंकार । रहित है । जिसकी आशाएं । उसके अभ्यंतर में । गल ( विलीन हो ) गयी हैं । जो कुछ भी ( मेरा ) नहीं है । ऐसा निश्चय करके । कर्म करता है । वह ( कर्मों में कभी ) लिप्त । नहीं होता है । 19
मनःप्रकाशसंमोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः । दशां कामपि संप्राप्तो भवेद गलितमानसः । 17-20
जिसका मन । गल ( नष्ट हो ) गया है । वह मन के प्रकाश से । चित्त की शांति से । स्वपन और सुषुप्ति से भी । ऊपर उठकर । अनिर्वचनीय ( आत्मानंद ) की दशा को प्राप्त होता है । ( वही जीवन मुक्त है ) 20
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।


अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 45


अष्टावक्र उवाच - आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकशः । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद ऋते । 16-1
अष्टावक्र बोले - हे तात ! अनेक प्रकार से । अनेक शास्त्रों को । कह या सुन लेने से भी । बिना सबका विस्मरण किये । तुम्हें शांति नहीं मिलेगी । 1
भोगं कर्म समाधिं वा कुरु विज्ञ तथापि ते । चित्तं निरस्तसर्वाशमत्यर्थं रोचयिष्यति । 16-2  
हे विज्ञ ( पुत्र ) ! चाहे तुम । भोगों का भोग करो । कर्मों को करो । चाहे तुम । समाधि को लगाओ । परन्तु सब आशाओं से । रहित होने पर ही । तुम अत्यंत सुख को । प्राप्त कर सकोगे । 2
आयासात्सकलो दुःखी नैनं जानाति कश्चन । अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निर्वृतिम । 16-3
शरीर निर्वाहार्थ ) परिश्रम करने के कारण ही । सभी मनुष्य दुखी हैं । इसको कोई नहीं जानता है । सुकृती ( महा ) पुरुष इसी उपदेश से । परम सुख को प्राप्त होते हैं । 3
व्यापारे खिद्यते यस्तु निमेषोन्मेषयोरपि । तस्यालस्य धुरीणस्य सुखं नन्यस्य कस्यचित । 16-4
जो नेत्रों के ढकने । और खोलने के । व्यापार से । खेद को प्राप्त होता है । उस आलसी पुरुष को ही सुख है । दूसरे किसी को नहीं । 4
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 44


इदं कृतमिदं नेति द्वंद्वैर्मुक्तं यदा मनः । धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत । 16-5
यह किया गया है । यह नहीं किया गया है । मन जब । ऐसे द्वन्द से । मुक्त हो जाय । तब वह धर्म । अर्थ । काम । और मोक्ष आदि से । निरपेक्ष ( इच्छा रहित ) होता है । 5
विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः । ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान । 16-6
बिषय का द्वेषी । विरक्त है । बिषय का लोभी । रागी है । ग्रहण और त्याग से रहित पुरुष । न ही त्यागी है । और न ही राग वान है । 6
हेयोपादेयता तावत्संसारविटपांकुरः । स्पृहा जीवति यावद वै निर्विचारदशास्पदम । 16-7
जब तक तृष्णा । जब तक अविवेक दशा की स्थिति है । तृष्णा युक्त पुरुष । तब तक जीता है । त्याज्य और ग्राह्य भाव । संसार रुपी वृक्ष का अंकुर है । 7
प्रवृत्तौ जायते रागो निर्वृत्तौ द्वेष एव हि । निर्द्वन्द्वो बालवद धीमान एवमेव व्यवस्थितः । 16-8
प्रवृत्ति में राग होता है । निवृत्ति में द्वेष होता है । इसीलिए बुद्धिमान पुरुष । द्वन्द रहित होकर । जैसे है । उसी भाव में स्थित रहते हैं । 8
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 43

हातुमिच्छति संसारं रागी दुःखजिहासया । वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति । 16-9
रागवान पुरुष । दुःख निवृत्ति की । इच्छा से । संसार को । त्यागना चाहता है ।  राग रहित पुरुष । निश्चय करके । दुःख से मुक्त होकर । संसार के बने रहने पर भी । खेद को नहीं प्राप्त होता है । 9
यस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा ।  न च ज्ञानी न वा योगी केवलं दुःखभागसौ । 16-10
जिसको मोक्ष । और देह का भी । अभिमान है । वह न ही । ज्ञानी है । और न ही । योगी है । वह केवल दुःख का भागी है । 10
हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा । तथापि न तव स्वाथ्यं सर्वविस्मरणादृते । 16-11
अगर तुम्हारा उपदेशक ( गुरु ) शिव । विष्णु अथवा बृह्मा भी हो । तो भी बिना सबके विस्मरण ( त्याग ) के तुम्हें शांति नहीं मिलेगी । 11  
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 42


अष्टावक्र उवाच - यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान । आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति । 15-1
 अष्टावक्र बोले - सात्विक बुद्धि से । युक्त मनुष्य । साधारण प्रकार के उपदेश से भी कृतकृत्य ( मुक्त ) हो जाता है । परन्तु ऐसा न होने पर । आजीवन जिज्ञासु होने पर भी । परबृह्म का । यथार्थ ज्ञान नहीं होता है । 1
मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः । एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु । 15-2 
विषयों से उदासीन होना । मोक्ष है । और विषयों में रस लेना । बंधन है । ऐसा जानकर । तुम्हारी जैसी इच्छा हो । वैसा ही करो । 2
वाग्मिप्राज्ञामहोद्योगं जनं मूकजडालसं । करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षभिः । 15-3
वाणी । बुद्धि । और कर्मों से । महान कार्य करने वाले । मनुष्यों को तत्त्व ज्ञान शांत । स्तब्ध । और कर्म न करने वाला । बना देता है । अतः सुख की इच्छा रखने वाले । इसका त्याग कर देते हैं । 3
न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान । चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर । 15-4 
न तुम शरीर हो । और न यह शरीर । तुम्हारा है । न ही तुम । भोगने वाले । अथवा करने वाले हो । तुम चैतन्य रूप हो । शाश्वत साक्षी हो । इच्छा रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो । 4
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।


अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 41


रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन । निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर । 15-5 
राग ( प्रियता ) और द्वेष ( अप्रियता ) मन के धर्म हैं । और तुम किसी भी प्रकार से मन नहीं हो ।  तुम कामना रहित हो । ज्ञान स्वरुप हो । विकार रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो । 5
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव । 15-6
समस्त प्राणियों को । स्वयं में । और स्वयं को । सभी प्राणियों में । स्थित जानकर । अहंकार और आसक्ति से । रहित होकर । तुम सुखी हो जाओ । 6
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरंगा इव सागरे । तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव । 15-7 
इस विश्व की उत्पत्ति । तुमसे । उसी प्रकार होती है । जैसे कि समुद्र से । लहरों की । इसमें संदेह नहीं है । तुम चैतन्य स्वरुप हो । अतः चिंता रहित हो जाओ । 7
श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोऽहं कुरुष्व भोः । ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः । 15-8 
हे प्रिय ! इस अनुभव पर । निष्ठा रखो । इस पर । श्रद्धा रखो । इस अनुभव की सत्यता के । सम्बन्ध में मोहित मत हो । तुम ज्ञान स्वरुप हो । तुम प्रकृति से परे । और आत्म स्वरुप भगवान हो । 8
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

गुरुवार, नवंबर 17, 2011

यदि आप मुक्ति चाहते हैं - अष्टावक्र गीता अध्याय - 1

जनक उवाच -  कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति । वैराग्य च कथं प्राप्तमेतद ब्रूहि मम प्रभो । 1-1
वयोवृद्ध राजा जनक बालक अष्टावक्र से पूछते हैं - हे प्रभु ! ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है ? मुक्ति कैसे प्राप्त होती है ? वैराग्य कैसे प्राप्त किया जाता है ? ये सब मुझे बतायें । 1
अष्टावक्र उवाच - मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान विषवत्त्यज । क्षमार्जवदयातोष सत्यं पीयूषवद्भज । 1-2
अष्टावक्र बोले - यदि आप मुक्ति चाहते हैं । तो अपने मन से विषयों ( वस्तुओं के उपभोग की इच्छा ) को विष की तरह त्याग दीजिये । क्षमा । सरलता । दया । संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन कीजिये । 2
न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुर्द्यौर्न वा भवान । एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये । 1-3
आप न पृथ्वी हैं । न जल । न अग्नि । न वायु । अथवा । आकाश ही हैं । मुक्ति के लिये । इन तत्त्वों के । साक्षी । चैतन्यरूप । आत्मा को जानिये । 3
यदि देहं पृथक् कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि । अधुनैव सुखी शान्तो बन्धमुक्तो भविष्यसि । 1-4
यदि आप । स्वयं को । इस शरीर से । अलग करके । चेतना में । विश्राम करें । तो तत्काल ही । सुख । शांति । और बंधन मुक्त । अवस्था को । प्राप्त होंगे । 4
न त्वं विप्रादिको वर्ण: नाश्रमी नाक्षगोचर: । असङगोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव । 1-5
आप ब्राह्मण आदि । सभी जातियों । अथवा बृह्मचर्य आदि । सभी आश्रमों । से परे हैं । तथा आँखों से । दिखाई न पड़ने वाले हैं । आप निर्लिप्त । निराकार । और इस विश्व के । साक्षी हैं । ऐसा जान कर । सुखी हो जाएँ । 5
धर्माधर्मौ सुखं दुखं मानसानि न ते विभो । न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा । 1-6
धर्म । अधर्म । सुख । दुःख । मस्तिष्क से । जुड़ें हैं । सर्व व्यापक । आपसे नहीं । न आप । करने वाले हैं । और न । भोगने वाले हैं । आप सदा । मुक्त ही हैं । 6
एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा । अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम । 1-7
आप । समस्त विश्व के । एकमात्र दृष्टा हैं । सदा मुक्त ही हैं । आपका बंधन । केवल इतना है कि आप । दृष्टा किसी और को । समझते हैं । 7
अहं कर्तेत्यहंमानमहाकृष्णाहिदंशितः । नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखं भव । 1-8
अहंकार रूपी । महा सर्प के । प्रभाव वश । आप - मैं कर्ता हूँ । ऐसा मान लेते हैं । मैं कर्ता नहीं हूँ । इस विश्वास रूपी । अमृत को । पीकर सुखी हो जाइये । 8
एको विशुद्धबोधोऽहं इति निश्चयवह्निना । प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव । 1-9
मैं एक । विशुद्ध । ज्ञान हूँ । इस निश्चय रूपी । अग्नि से । गहन अज्ञान वन को । जला दें । इस प्रकार शोक रहित होकर । सुखी हो जाएँ । 9
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत । आनंदपरमानन्दः स बोधस्त्वं सुखं चर । 1-10
जहाँ । ये विश्व । रस्सी में । सर्प की तरह । अवास्तविक लगे । उस आनंद । परम आनंद की । अनुभूति करके । सुख से रहें । 10
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि । किवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत । 1-11
स्वयं को । मुक्त मानने वाला । मुक्त ही है । और बद्ध मानने वाला । बंधा हुआ ही है । यह कहावत । सत्य ही है कि जैसी बुद्धि होती है । वैसी ही गति होती है । 11
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः । असंगो निःस्पृहः शान्तो भृमात्संसारवानिव । 1-12
आत्मा । साक्षी । सर्वव्यापी । पूर्ण । एक । मुक्त । चेतन । अक्रिय । असंग । इच्छा रहित । एवं शांत है । भृमवश ही ये । सांसारिक । प्रतीत होती है । 12
कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मानं परिभावय । आभासोऽहं भृमं मुक्त्वा भावं बाह्यमथान्तरम । 1-13
अपरिवर्तनीय । चेतन । व अद्वैत । आत्मा का । चिंतन करें । और मैं के । भृम रूपी । आभास से । मुक्त होकर । बाह्य विश्व की । अपने अन्दर ही भावना करें । 13
देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक । बोधोऽहं ज्ञानखंगेन तन्निष्कृत्य सुखी भव । 1-14
हे पुत्र ! बहुत समय से । आप - मैं शरीर हूँ । इस भाव बंधन से । बंधे हैं । स्वयं को । अनुभव कर । ज्ञान रूपी तलवार से । इस बंधन को । काटकर सुखी हो जाएँ । 14
निःसंगो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः । अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठति । 1-15
आप । असंग । अक्रिय । स्वयं प्रकाशवान । तथा सर्वथा । दोषमुक्त हैं । आपका ध्यान द्वारा । मस्तिष्क को । शांत रखने का । प्रयत्न ही बंधन है । 15
त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः । शुद्धबुद्धस्वरुपस्त्वं मा गमः क्षुद्रचित्तताम । 1-16
यह विश्व । तुम्हारे द्वारा । व्याप्त किया । हुआ है । वास्तव में । तुमने इसे । व्याप्त किया हुआ है । तुम शुद्ध और । ज्ञानस्वरुप हो । छोटेपन की । भावना से गृस्त मत हो । 16
निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः । अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासन: । 1-17
आप । इच्छा रहित । विकार रहित । घन ( ठोस )  शीतलता के धाम । अगाध बुद्धिमान हैं । शांत होकर । केवल । चैतन्य की इच्छा वाले । हो जाइये । 17
साकारमनृतं विद्धि निराकारं तु निश्चलं । एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसंभव: । 1-18
आकार को । असत्य जानकर । निराकार को ही । चिर स्थायी । मानिये । इस तत्त्व को । समझ लेने के बाद । पुनः जन्म लेना । संभव नहीं है । 18
यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेऽन्तः परितस्तु सः । तथैवाऽस्मिन् शरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः । 1-19
जिस प्रकार । दर्पण में । प्रतिबिंबित रूप । उसके अन्दर भी है । और बाहर भी । उसी प्रकार । परमात्मा । इस शरीर के । भीतर भी । निवास करता है । और उसके बाहर भी । 19
एकं सर्वगतं व्योम बहिरन्तर्यथा घटे । नित्यं निरन्तरं बृह्म सर्वभूतगणे तथा । 1-20
जिस प्रकार । एक ही आकाश । पात्र के भीतर । और बाहर । व्याप्त है । उसी प्रकार । शाश्वत और । सतत परमात्मा । समस्त प्राणियों में । विद्यमान है । 20

अब मैं किससे मोह करूँ - अष्टावक्र गीता अध्याय - 2

जनक उवाच - अहो निरंजनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः । एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडंबितः । 2-1
जनक बोले - आश्चर्य । मैं निष्कलंक । शांत । प्रकृति से परे । ज्ञान स्वरुप हूँ । इतने समय तक मैं मोह से संतप्त किया गया । 1
यथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत । अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किंचन । 2-2
जिस प्रकार । मैं इस शरीर को । प्रकाशित करता हूँ । उसी प्रकार । इस विश्व को भी । अतः मैं । यह समस्त विश्व ही हूँ । अथवा कुछ भी नहीं । 2
स शरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाधुना । कुतश्चित कौशलाद एव परमात्मा विलोक्यते । 2-3
अब शरीर सहित । इस विश्व को । त्याग कर । किसी कौशल द्वारा ही । मेरे द्वारा । परमात्मा का दर्शन किया जाता है । 3
यथा न तोयतो भिन्नास्तरंगाः फेनबुदबुदाः । आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम । 2-4
जिस प्रकार । पानी लहर । फेन और बुलबुलों से । पृथक नहीं है । उसी प्रकार । आत्मा भी । स्वयं से निकले । इस विश्व से अलग नहीं है । 4
तन्तुमात्रो भवेद एव पटो यद्वद विचारितः । आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद विश्वं विचारितम । 2-5
जिस प्रकार । विचार करने पर । वस्त्र तंतु ( धागा ) मात्र ही । ज्ञात होता है । उसी प्रकार । यह समस्त विश्व । आत्मा मात्र ही है । 5
यथैवेक्षुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा । तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम । 2-6
जिस प्रकार । गन्ने के रस से बनी शक्कर । उससे ही व्याप्त होती है । उसी प्रकार । यह विश्व । मुझसे ही बना है । और निरंतर । मुझसे ही व्याप्त है । 6
आत्मज्ञानाज्जगद भाति आत्मज्ञानान्न भासते । रज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद भासते न हि । 2-7
आत्मा । अज्ञानवश ही । विश्व के रूप में । दिखाई देती है । आत्म ज्ञान होने पर । यह विश्व । दिखाई नहीं देता । रस्सी अज्ञानवश । सर्प जैसी । दिखाई देती है । रस्सी का ज्ञान हो जाने पर । सर्प दिखाई नहीं देता है  । 7
प्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः । यदा प्रकाशते विश्वं तदाहं भास एव हि । 2-8
प्रकाश । मेरा स्वरुप है । इसके अतिरिक्त । मैं । कुछ और । नहीं हूँ । वह प्रकाश । जैसे इस विश्व को । प्रकाशित करता है । वैसे ही इस " मैं " भाव को भी । 8
अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते । रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा । 2-9
आश्चर्य । यह कल्पित विश्व । अज्ञान से । मुझमें दिखाई देता है । जैसे सीप में चाँदी । रस्सी में सर्प । और सूर्य किरणों में पानी । 9
मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति । मृदि कुंभो जले वीचिः कनके कटकं यथा । 2-10
मुझसे । उत्पन्न हुआ । विश्व । मुझमें ही । विलीन हो जाता है । जैसे घड़ा मिटटी में । लहर जल में । और कड़ा सोने में विलीन हो जाता है । 10
अहो अहं नमो मह्यं विनाशो यस्य नास्ति मे । बृह्मादिस्तंबपर्यन्तं जगन्नाशोऽपि तिष्ठतः । 2-11
आश्चर्य है । मुझको । नमस्कार है । समस्त विश्व के । नष्ट हो जाने पर भी । जिसका । विनाश नहीं होता । जो तृण से बृह्मा तक । सबका विनाश होने पर भी । विद्यमान रहता है । 11
अहो अहं नमो मह्यं एकोऽहं देहवानपि । क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः । 2-12
आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । मैं एक हूँ । शरीर वाला होते हुए भी । जो न कहीं जाता है । और न कहीं आता है । और समस्त विश्व को व्याप्त करके स्थित है । 12
अहो अहं नमो मह्यं दक्षो नास्तीह मत्समः । असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिरं धृतम । 2-13
आश्चर्य है । मुझको । नमस्कार है । जो कुशल है । और जिसके समान । कोई और । नहीं है । जिसने इस शरीर को । बिना स्पर्श करते हुए । इस विश्व को । अनादि काल से । धारण किया हुआ है । 13
अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किंचन । अथवा यस्य मे सर्वं यद् वाङ्मनसगोचरम । 2-14
आश्चर्य है । मुझको । नमस्कार है । जिसका यह । कुछ भी नहीं है । अथवा जो भी । वाणी और मन से । समझ में । आता है । वह सब । जिसका है । 14
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम । अज्ञानाद भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरंजनः । 2-15
ज्ञान । ज्ञेय । और ज्ञाता । यह तीनों । वास्तव में नहीं हैं । यह जो । अज्ञानवश । दिखाई देता है । वह निष्कलंक । मैं ही हूँ । 15
द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्याऽस्ति भेषजम । दृश्यमेतन मृषा सर्वं एकोऽहं चिद्रसोमलः । 2-16
द्वैत ( भेद ) सभी दुखों का । मूल कारण है । इसकी । इसके अतिरिक्त । कोई और । औषधि नहीं है कि यह सब जो । दिखाई दे रहा है । वह सब । असत्य है । मैं एक । चैतन्य और निर्मल हूँ । 16
बोधमात्रोऽहमज्ञानाद उपाधिः कल्पितो मया । एवं विमृशतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम । 2-17
मैं केवल । ज्ञान स्वरुप हूँ । अज्ञान से ही । मेरे द्वारा । स्वयं में । अन्य गुण । कल्पित किये गए हैं । ऐसा विचार करके । मैं सनातन । और कारण रहित । रूप से । स्थित हूँ । 17
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्तो निराश्रया । अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम । 2-18
न मुझे । कोई बंधन है । और न कोई । मुक्ति का भृम । मैं शांत । और । आश्रयरहित हूँ । मुझमें स्थित । यह विश्व भी । वस्तुतः मुझमें स्थित नहीं है । 18
सशरीरमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चितम । शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन् कल्पनाधुना । 2-19
यह निश्चित है कि इस शरीर सहित । यह विश्व । अस्तित्वहीन है । केवल शुद्ध चैतन्य । आत्मा का ही । अस्तित्व है । अब इसमें क्या । कल्पना की जाये । 19
शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा । कल्पनामात्रमेवैतत किं मे कार्यं चिदात्मनः । 2-20
शरीर । स्वर्ग । नरक । बंधन । मोक्ष । और भय । ये सब । कल्पना मात्र ही हैं । इनसे मुझ । चैतन्य स्वरुप का । क्या प्रयोजन है । 20
अहो जनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम । अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम । 2-21
आश्चर्य कि मैं । लोगों के । समूह में भी । दूसरे को । नहीं देखता हूँ । वह भी निर्जन ही । प्रतीत होता है । अब मैं । किससे मोह करूँ । 21
नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित । अयमेव हि मे बन्ध आसीद्या जीविते स्पृहा । 2-22
न मैं । शरीर हूँ । न यह । शरीर ही । मेरा है । न मैं । जीव हूँ । मैं चैतन्य हूँ । मेरे अन्दर । जीने की इच्छा ही । मेरा बंधन थी । 22
अहो भुवनकल्लोलैर्विचित्रैर्द्राक समुत्थितम । मय्यनंतमहांभोधौ चित्तवाते समुद्यते । 2-23
आश्चर्य । मुझ अनंत । महासागर में । चित्त वायु । उठने पर । बृह्माण्ड रूपी । विचित्र तरंगें । उपस्थित हो जाती हैं । 23
मय्यनंतमहांभोधौ चित्तवाते प्रशाम्यति । अभाग्याज्जीववणिजो जगत्पोतो विनश्वरः । 2-24
मुझ अनंत । महासागर में । चित्त वायु के । शांत होने पर । जीव रूपी । वणिक का । संसार रूपी जहाज । जैसे दुर्भाग्य से । नष्ट हो जाता है । 24
मय्यनन्तमहांभोधावाश्चर्यं जीववीचयः । उद्यन्ति घ्नन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावतः । 2-25
आश्चर्य । मुझ अनंत । महासागर में । जीव रूपी । लहरें । उत्पन्न होती हैं । मिलती हैं । खेलती हैं । और स्वभाव से । मुझमें । प्रवेश कर जाती हैं । 25

आत्मा शुद्ध चैतन्य और अत्यंत सुन्दर है - अष्टावक्र गीता अध्याय - 3

अष्टावक्र उवाच - अविनाशिनमात्मानं एकं विज्ञाय तत्त्वतः । तवात्मज्ञानस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः । 3-1
अष्टावक्र बोले - आत्मा को । अविनाशी । और एक जानो । उस आत्म ज्ञान को । प्राप्त कर । किसी बुद्धिमान व्यक्ति की  रूचि । धन अर्जित करने में । कैसे हो सकती है । 1
आत्माज्ञानादहो प्रीतिर्विषयभृमगोचरे । शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभृमे । 3-2
स्वयं के । अज्ञान से । भृमवश । विषयों से । लगाव हो जाता है । जैसे सीप में । चाँदी का । भृम होने पर । उसमें लोभ । उत्पन्न हो जाता है । 2
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे । सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि । 3-3
सागर से । लहरों के समान । जिससे यह विश्व । उत्पन्न होता है । वह मैं ही हूँ । जानकर । तुम एक दीन जैसे । कैसे भाग सकते हो । 3
श्रुत्वापि शुद्धचैतन्य आत्मानमतिसुन्दरम । उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति । 3-4
यह सुनकर भी । कि आत्मा । शुद्ध । चैतन्य । और अत्यंत सुन्दर है । तुम कैसे । जननेंद्रिय में । आसक्त होकर । मलिनता को । प्राप्त हो सकते हो । 4
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते । 3-5
सभी प्राणियों में । स्वयं को । और स्वयं में । सब प्राणियों को । जानने वाले । मुनि में । ममता की । भावना का । बने रहना । आश्चर्य ही है । 5
आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः । आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया । 3-6
एक बृह्म का । आश्रय लेने वाले । और मोक्ष के । अर्थ का । ज्ञान रखने वाले का । आमोद प्रमोद द्वारा । उत्पन्न कामनाओं से । विचलित होना । आश्चर्य ही है । 6
उदभूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः । आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत कालमन्तमनुश्रितः । 3-7
अंत समय के । निकट पहुँच चुके । व्यक्ति का । उत्पन्न ज्ञान के अमित्र । काम की इच्छा रखना । जिसको धारण करने में । वह अत्यंत अशक्त है । आश्चर्य ही है । 7
इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः । आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षाद् एव विभीषिका । 3-8
इस लोक । और परलोक से । विरक्त । नित्य । और अनित्य का । ज्ञान रखने वाले । और मोक्ष की । कामना रखने वालों का । मोक्ष से डरना । आश्चर्य ही है । 8
धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा । आत्मानं केवलं पश्यन् न तुष्यति न कुप्यति । 3-9
सदा । केवल आत्मा का । दर्शन करने वाले । बुद्धिमान व्यक्ति । भोजन कराने पर । या पीड़ित करने पर । न प्रसन्न होते हैं । और न । क्रोध ही करते हैं । 9
चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत । संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत महाशयः । 3-10
अपने । कार्यशील शरीर को । दूसरों के । शरीरों की तरह । देखने वाले । महापुरुषों को । प्रशंसा या निंदा । कैसे विचलित कर सकती है । 10
मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन विगतकौतुकः । अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः । 3-11
समस्त । जिज्ञासाओं से रहित । इस विश्व को । माया में । कल्पित देखने वाले । स्थिर प्रज्ञा वाले । व्यक्ति को । आसन्न मृत्यु भी । कैसे भयभीत कर सकती है । 11
निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः । तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते । 3-12
निराशा में भी । समस्त । इच्छाओं से रहित । स्वयं के ज्ञान से । प्रसन्न महात्मा की । तुलना । किससे की जा सकती है । 12
स्वभावाद एव जानानो दृश्यमेतन्न किंचन । इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः । 3-13
स्वभाव से ही । विश्व को । दृश्यमान जानो । इसका कुछ भी । अस्तित्व नहीं है । यह गृहण करने योग्य है । और यह । त्यागने योग्य । देखने वाला । स्थिर प्रज्ञायुक्त व्यक्ति । क्या देखता है ? 13
अंतस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः । यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये । 3-14
विषयों की । आतंरिक । आसक्ति का । त्याग करने वाले । संदेह से परे । बिना किसी इच्छा वाले । व्यक्ति को । स्वतः आने वाले । भोग । न दुखी कर सकते है । और न सुखी । 14

बुद्धिमान संसार को खेल की तरह लेता है - अष्टावक्र गीता अध्याय - 4

जनक उवाच - हन्तात्मज्ञानस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया । न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता । 4-1
अष्टावक्र बोले - स्वयं को । जानने वाला । बुद्धिमान व्यक्ति । इस संसार की । परिस्थितियों को । खेल की तरह । लेता है । उसकी । सांसारिक परिस्थितियों का । बोझ ( दबाव ) लेने वाले । मोहित व्यक्ति के साथ । बिलकुल भी । समानता नहीं है । 1
यत पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः । अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति । 4-2
जिस पद की । इन्द्र आदि । सभी देवता । इच्छा रखते हैं । उस पद में । स्थित होकर भी । योगी हर्ष नहीं करता है । 2
तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते । न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः । 4-3
उस ( बृह्म ) को । जानने वाले के । अन्तःकरण से । पुण्य और पाप का । स्पर्श नहीं होता है । जिस प्रकार । आकाश में । दिखने वाले धुएँ से । आकाश का संयोग नहीं होता है । 3
आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना । यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः । 4-4
जिस महापुरुष ने । स्वयं को ही । इस समस्त जगत के । रूप में । जान लिया है । उसके स्वेच्छा से । वर्तमान में । रहने को । रोकने की । सामर्थ्य किसमें है । 4
आबृह्मस्तंबपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे । विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने । 4-5
बृह्मा से । तृण तक । चारों प्रकार के । प्राणियों में । केवल आत्मज्ञानी ही । इच्छा और अनिच्छा का । परित्याग करने में । समर्थ है । 5
आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानाति जगदीश्वरम । यद वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित । 4-6
आत्मा को । एक और जगत का । ईश्वर । कोई कोई ही । जानता है । जो ऐसा । जान जाता है । उसको । किसी से भी । किसी प्रकार का । भय नहीं है । 6

तुम क्या त्यागना चाहते हो - अष्टावक्र गीता अध्याय - 5

अष्टावक्र उवाच - न ते संगोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि । संघातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज । 5-1
अष्टावक्र बोले - तुम्हारा । किसी से भी । संयोग नहीं है । तुम शुद्ध हो । तुम क्या । त्यागना चाहते हो । इस ( अवास्तविक ) सम्मिलन को । समाप्त करके । बृह्म से । योग ( एकरूपता ) को । प्राप्त करो । 1
उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुद्बुदः । इति ज्ञात्वैकमात्मानं एवमेव लयं व्रज । 5-2
जिस प्रकार । समुद्र से । बुलबुले । उत्पन्न होते हैं । उसी प्रकार । विश्व । एक आत्मा से ही । उत्पन्न होता है । यह जानकर । बृह्म से । योग ( एकरूपता ) को । प्राप्त करो । 2
प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद् विश्वं नास्त्यमले त्वयि । रज्जुसर्प इव व्यक्तं एवमेव लयं व्रज । 5-3
यद्यपि । यह विश्व । आँखों से । दिखाई देता है । परन्तु । अवास्तविक है । विशुद्ध । तुममें । इस विश्व का । अस्तित्व । उसी प्रकार । नहीं है । जिस प्रकार । कल्पित सर्प का । रस्सी में । यह जानकर । बृह्म से योग ( एकरूपता ) को । प्राप्त करो । 3
समदुःखसुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः । समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज । 5-4
स्वयं को । सुख और दुःख में । समान । पूर्ण । आशा । और निराशा में । समान । जीवन और मृत्यु में । समान । सत्य जानकर । बृह्म से योग ( एकरूपता ) को । प्राप्त करो । 4

मैं महासागर के समान हूँ - अष्टावक्र गीता अध्याय - 6

जनक उवाच - आकाशवदनन्तोऽहं घटवत प्राकृतं जगत । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः । 6-1
जनक बोले - आकाश के समान । मैं अनंत हूँ । और यह जगत । घड़े के समान । महत्त्वहीन है । यह ज्ञान है । इसका न । त्याग करना है । और न गृहण । बस इसके साथ । एकरूप होना है । 1
महोदधिरिवाहं स प्रपंचो वीचिसऽन्निभः । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः । 6-2
मैं । महासागर के । समान हूँ । और यह । दृश्यमान संसार । लहरों के समान । यह ज्ञान है । इसका न । त्याग करना है । और न गृहण । बस इसके साथ । एकरूप होना है । 2
अहं स शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद विश्वकल्पना । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः । 6-3
यह विश्व । मुझमें । वैसे ही । कल्पित है । जैसे कि सीप में चाँदी । यह ज्ञान है । इसका न । त्याग करना है । और न गृहण । बस इसके साथ । एकरूप होना है । 3
अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः । 6-4
मैं । समस्त । प्राणियों में हूँ । जैसे सभी । प्राणी । मुझमें हैं । यह ज्ञान है । इसका न । त्याग करना है । और न गृहण । बस इसके साथ । एकरूप होना है । 4

विश्व एक स्वपन है - अष्टावक्र गीता अध्याय - 7

जनक उवाच - मय्यनंतमहांभोधौ विश्वपोत इतस्ततः । भृमति स्वांतवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता । 7-1
जनक बोले - मुझ । अनंत महासागर में । विश्व रूपी जहाज । अपनी अन्तः वायु से । इधर उधर घूमता है । पर इससे । मुझमें । विक्षोभ नहीं होता है । 1
मय्यनंतमहांभोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः । 7-2
मुझ अनंत । महासागर में । विश्व रूपी लहरें । माया से । स्वयं ही । उदित और अस्त । होती रहती हैं । इससे मुझमें । वृद्धि या क्षति नहीं होती है । 2
मय्यनंतमहांभोधौ विश्वं नाम विकल्पना । अतिशांतो निराकार एतदेवाहमास्थितः । 7-3
मुझ अनंत महासागर में विश्व एक अवास्तविकता ( स्वपन ) है । मैं अति शांत और निराकार रूप से स्थित हूँ । 3
नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरंजने । इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्तितः । 7-4
उस अनंत । और निरंजन । अवस्था में । न मैं का भाव है । और न कोई । अन्य भाव ही । इस प्रकार असक्त । बिना किसी इच्छा के । और शांत रूप से । मैं स्थित हूँ । 4
अहो चिन्मात्रमेवाहं इन्द्रजालोपमं जगत । इति मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना । 7-5
आश्चर्य है । मैं शुद्ध चैतन्य हूँ । और यह जगत । असत्य जादू के समान है । इस प्रकार । मुझमें । कहाँ और कैसे । अच्छे (उपयोगी) और बुरे (अनुपयोगी) की । कल्पना आ जाती है । 5

जब मन इच्छा करता है - अष्टावक्र गीता अध्याय - 8

अष्टावक्र उवाच - तदा बन्धो यदा चित्तं किन्चिद वांछति शोचति । किंचिन मुंचति गृण्हाति किंचिद दृष्यति कुप्यति । 8-1
अष्टावक्र बोले - तब । बंधन है । जब । मन इच्छा करता है । शोक करता है । कुछ त्याग करता है । कुछ गुहण करता है । कभी प्रसन्न होता है । या कभी क्रोधित होता है । 1
तदा मुक्तिर्यदा चित्तं न वांछति न शोचति । न मुंचति न गृण्हाति न हृष्यति न कुप्यति । 8-2
तब । मुक्ति है । जब मन । इच्छा नहीं करता है । शोक नहीं करता है । त्याग नहीं करता है । ग्रहण नहीं करता है । प्रसन्न नहीं होता है । या क्रोधित नहीं होता है । 2
तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं काश्वपि दृष्टिषु । तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु । 8-3
तब बंधन है । जब मन किसी भी । दृश्यमान वस्तु में । आसक्त है । तब मुक्ति है । जब मन किसी भी । दृश्यमान वस्तु में । आसक्ति रहित है । 3
यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा । मत्वेति हेलया किंचिन्मा गृहाण विमुंच मा । 8-4
जब तक । मैं या मेरा । का भाव है । तब तक बंधन है । जब । मैं या मेरा । का भाव नहीं है । तब मुक्ति है । यह जानकर । न कुछ त्याग करो । और न कुछ गृहण ही करो । 4

ऐसा करके ही शांति प्राप्त होती है - अष्टावक्र गीता अध्याय - 9

अष्टावक्र उवाच - कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा । एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद भव त्यागपरोऽव्रती । 9-1
अष्टावक्र बोले - यह कार्य । करने योग्य है । अथवा । न करने योग्य । और ऐसे ही । अन्य द्वंद्व ( हाँ या न रूपी संशय ) कब । और किसके । शांत हुए हैं । ऐसा विचार करके । विरक्त ( उदासीन ) हो जाओ । त्यागवान बनो । ऐसे किसी नियम का । पालन न करने वाले बनो । 1
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात । जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमः गताः । 9-2
हे पुत्र ! इस संसार की ( व्यर्थ ) चेष्टा को । देखकर । किसी धन्य पुरुष की ही । जीने की इच्छा । भोगों के । उपभोग की इच्छा । और भोजन की इच्छा । शांत हो पाती है । 2
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रयदूषितम । असरं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति । 9-3
यह सब । अनित्य है । तीन प्रकार के कष्टों ( दैहिक । दैविक । और भौतिक ) से घिरा है । सारहीन है । निंदनीय है । त्याग करने योग्य है । ऐसा निश्चित करके ही । शांति प्राप्त होती है । 3
कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम । तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात । 9-4
ऐसा । कौन सा समय । अथवा उम्र है । जब मनुष्य के । संशय । नहीं रहे है । अतः । संशयों की । उपेक्षा करके । अनायास । सिद्धि को प्राप्त करो । 4
ना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा  दृष्टवा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः । 9-5
महर्षियों । साधुओं । और योगियों के । विभिन्न मतों को देखकर । कौन मनुष्य । वैराग्यवान होकर । शांत नहीं हो जायेगा । 5
कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः । निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः । 9-6
चैतन्य का । साक्षात ज्ञान प्राप्त करके । कौन वैराग्य । और समता से युक्त । कौन गुरु । जन्म और मृत्यु के । बंधन से । तार नहीं देगा । 6
पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान यथार्थतः । तत्क्षणाद बन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि । 9-7
तत्त्वों के । विकार को । वास्तव में । उनकी मात्रा के । परिवर्तन के । रूप में देखो । ऐसा देखते ही । उसी क्षण । तुम । बंधन से मुक्त होकर । अपने स्वरुप में । स्थित हो जाओगे । 7
वासना एव संसार इति सर्वा विमुंच ताः । तत्त्यागो वासनात्यागात्स्थितिरद्य यथा तथा । 9-8
इच्छा ही । संसार है । ऐसा जानकर । सबका । त्याग कर दो । उस त्याग से । इच्छाओं का । त्याग हो जायेगा । और तुम्हारी । यथारूप । अपने स्वरुप में । स्थिति हो जाएगी । 8

माया से मन को शांति नहीं मिली - अष्टावक्र गीता अध्याय - 10

अष्टावक्र उवाच - विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसंकुलम । धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रादरं कुरु । 10-1
अष्टावक्र बोले - कामना । और अनर्थों के समूह । धन रूपी । शत्रुओं को त्याग दो । इन दोनों के । त्याग रूपी धर्म से । युक्त होकर । सर्वत्र विरक्त ( उदासीन ) हो जाओ । 1
स्वप्नेन्द्रजालवत पश्य दिनानि त्रीणि पंच वा । मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसंपदः । 10-2
मित्र । जमीन । कोषागार । पत्नी । और अन्य संपत्तियों को । स्वपन की । माया के समान । तीन या पाँच दिनों में । नष्ट होने वाला देखो । 2
यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै । प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव । 10-3
जहाँ जहाँ । आसक्ति हो । उसको ही । संसार जानो । इस प्रकार । परिपक्व वैराग्य के । आश्रय में । तृष्णा रहित होकर । सुखी हो जाओ । 3
तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते । भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः । 10-4
तृष्णा ( कामना ) मात्र ही । स्वयं का । बंधन है । उसके नाश को ।  मोक्ष कहा जाता है । संसार में । अनासक्ति से ही । निरंतर । आनंद की प्राप्ति होती है । 4
त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा । अविद्यापि न किंचित्सा का बुभुत्सा तथापि ते । 10-5
तुम एक ( अद्वितीय ) चेतन । और शुद्ध हो । तथा यह विश्व । अचेतन । और असत्य है । तुममें । अज्ञान का । लेश मात्र भी । नहीं है । और जानने की । इच्छा भी । नहीं है । 5
राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च । संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि । 10-6
पूर्व जन्मों में । बहुत बार । तुम्हारे । राज्य । पुत्र । स्त्री । शरीर । और सुखों का । तुम्हारी । आसक्ति होने पर भी । नाश हो चुका है । 6
अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा । एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून मनः । 10-7
पर्याप्त धन । इच्छाओं । और । शुभ कर्मों द्वारा भी । इस संसार रूपी माया से । मन को शांति नहीं मिली । 7
कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा । दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम । 10-8
कितने जन्मों में । शरीर । मन । और वाणी से । दुःख के कारण । कर्मों को । तुमने नहीं किया ? अब उनसे । उपरत ( विरक्त ) हो जाओ । 8

वह अपार शांति को प्राप्त करता है - अष्टावक्र गीता अध्याय - 11

अष्टावक्र उवाच - भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी  । निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति । 11-1
अष्टावक्र बोले - भाव ( सृष्टि । स्थिति ) और अभाव ( प्रलय । मृत्यु ) रूपी विकार । स्वाभाविक हैं । ऐसा निश्चित रूप से । जानने वाला । विकार रहित । दुख रहित होकर । सुख पूर्वक । शांति को । प्राप्त हो जाता है । 1
ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी । अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते । 11-2
ईश्वर । सबका । सृष्टा है । कोई अन्य नहीं । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाले की । सभी । आन्तरिक इच्छाओं का । नाश हो जाता है । वह शांत पुरुष । सर्वत्र । आसक्ति रहित । हो जाता है । 2
आपदः संपदः काले दैवादेवेति निश्चयी । तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति । 11-3
संपत्ति ( सुख ) और विपत्ति ( दुःख ) का समय । प्रारब्धवश ( पूर्वकृत कर्मों के अनुसार ) है । ऐसा । निश्चित रूप से जानने वाला । संतोष । और निरंतर । संयमित इन्द्रियों से । युक्त हो जाता है । वह न । इच्छा करता है । और न शोक । 3
सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी । साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते । 11-4
सुख दुःख । और । जन्म मृत्यु । प्रारब्धवश ( पूर्वकृत कर्मों के अनुसार ) हैं । ऐसा । निश्चित रूप से जानने वाला । फल की इच्छा । न रखने वाला । सरलता से । कर्म करते हुए भी । उनसे लिप्त नहीं होता है । 4
चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी । तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः । 11-5
चिंता से ही । दुःख । उत्पन्न होते हैं । किसी । अन्य कारण से नहीं । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाला । चिंता से रहित होकर । सुखी । शांत । और सभी इच्छाओं से । मुक्त हो जाता है । 5
नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी । कैवल्यं इव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम । 11-6
न मैं । यह शरीर हूँ । और न यह । शरीर मेरा है । मैं ज्ञानस्वरुप हूँ । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाला । जीवन मुक्ति को । प्राप्त करता है । वह किये हुए ( भूतकाल ) और न किये हुए ( भविष्य के ) कर्मों का । स्मरण नहीं करता है । 6
आबृह्मस्तंबपर्यन्तं अहमेवेति निश्चयी । निर्विकल्पः शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः । 11-7
तृण से लेकर । बृह्मा तक । सब कुछ । मैं ही हूँ । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाला । विकल्प ( कामना ) रहित । पवित्र । शांत । और प्राप्त अप्राप्त से । आसक्ति रहित । हो जाता है । 7
नाश्चर्यमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चयी । निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किंचिदिव शाम्यति । 11-8
अनेक । आश्चर्यों से युक्त । यह विश्व । अस्तित्वहीन है । ऐसा । निश्चित रूप से । जानने वाला । इच्छा रहित । और शुद्ध अस्तित्व । हो जाता है । वह । अपार शांति को । प्राप्त करता है । 8

वह मुक्त हो जाता है - अष्टावक्र गीता अध्याय - 12

जनक उवाच - कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः । अथ चिन्तासहस्तस्माद एवमेवाहमास्थितः । 12-1
जनक बोले - पहले मैं । शारीरिक कर्मों से । निरपेक्ष ( उदासीन ) हुआ । फिर वाणी से । निरपेक्ष ( उदासीन ) हुआ । अब चिंता से । निरपेक्ष ( उदासीन ) होकर । अपने स्वरुप में स्थित हूँ । 1
प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः । विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः । 12-2
शब्द आदि । विषयों में । आसक्ति रहित होकर । और आत्मा के । दृष्टि का । विषय न होने के कारण । मैं निश्चल । और एकाग्र ह्रदय से । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 2
समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये । एवं विलोक्य नियमं एवमेवाहमास्थितः । 12-3
अध्यास ( असत्य ज्ञान ) आदि । असामान्य स्थितियों । और समाधि को । एक नियम के । समान देखते हुए । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 3
हेयोपादेयविरहाद एवं हर्षविषादयोः । अभावादद्य हे बृह्मन्न एवमेवाहमास्थितः । 12-4
हे बृह्म को । जानने वाले । त्याज्य ( छोड़ने योग्य ) और संगृहणीय से । दूर होकर । और सुख दुःख के । अभाव में । मैं अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 4
आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनं । विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः । 12-5
आश्रम । अनाश्रम । ध्यान और मन द्वारा । स्वीकृत । और निषिद्ध । नियमों को देखकर । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 5
कर्मानुष्ठानमज्ञानाद यथैवोपरमस्तथा । बुध्वा सम्यगिदं तत्त्वं एवमेवाहमास्थितः । 12-6
कर्मों के । अनुष्ठान रूपी । अज्ञान से । निवृत्त होकर । और तत्त्व को । सम्यक रूप से जानकर । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 6
अचिंत्यं चिंत्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ । त्यक्त्वा तदभावनं तस्माद् एवमेवाहमास्थितः । 12-7
अचिन्त्य के । सम्बन्ध में । विचार करते हुए भी । विचार पर ही । चिंतन । किया जाता है । अतः । उस विचार का भी । परित्याग करके । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 7
एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ । एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ । 12-8
जो । इस प्रकार से । आचरण करता है । वह कृतार्थ ( मुक्त ) हो जाता है । जिसका । इस प्रकार का । स्वभाव है । वह कृतार्थ ( मुक्त ) हो जाता है । 8

सोने में मेरी हानि नहीं है - अष्टावक्र गीता अध्याय - 13

जनक उवाच - अकिंचनभवं स्वास्थं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम । त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम । 13-1
जनक बोले - अकिंचन ( कुछ अपना न ) होने की सहजता केवल कौपीन पहनने पर भी मुश्किल से प्राप्त होती है । अतः त्याग और संग्रह की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 1
कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते । मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम । 13-2
शारीरिक दुःख भी कहाँ ( अर्थात नहीं ) हैं । वाणी के दुःख भी कहाँ हैं । वहाँ मन भी कहाँ है । सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 2
कृतं किमपि नैव स्याद इति संचिन्त्य तत्त्वतः । यदा यत्कर्तुमायाति तत कृत्वासे यथासुखम । 13-3
किये हुए किसी भी कार्य का वस्तुतः कोई अस्तित्व नहीं है । ऐसा तत्त्व पूर्वक विचार करके जब जो भी कर्त्तव्य है । उसको करते हुए सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 3
कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावा देहस्थयोगिनः ।  संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम । 13-4
शरीर भाव में स्थित योगियों के लिए कर्म और अकर्म रूपी बंधनकारी भाव होते हैं । पर संयोग और वियोग की प्रवृत्तियों को छोड़कर । सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 4
अर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या न शयनेन वा ।  तिष्ठन गच्छन स्वपन तस्मादहमासे यथासुखम । 13-5
विश्राम । गति । शयन । बैठने । चलने और स्वप्न में वस्तुतः मेरे लाभ और हानि नहीं हैं । अतः सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 5
स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा । नाशोल्लासौ विहायास्मदहमासे यथासुखम । 13-6
सोने में मेरी हानि नहीं है । और उद्योग । अथवा अनुद्योग में । मेरा लाभ नहीं है । अतः हर्ष और शोक की । प्रवृत्तियों को छोड़कर । सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 6
सुखादिरूपा नियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः । शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम । 13-7
सुख । दुःख आदि स्थितियों के क्रम से आने के नियम पर बार बार विचार करके । शुभ ( अच्छे ) और अशुभ ( बुरे ) की  प्रवृत्तियों को छोड़कर । सभी स्थितियों में । मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ । 7

मुझे मोक्ष की चिंता भी नहीं है - अष्टावक्र गीता अध्याय - 14

जनक उवाच -  प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादाद भावभावनः । निद्रितो बोधित इव क्षीणसंस्मरणो हि सः । 14-1
जनक बोले -  जो स्वभाव से ही विचार शून्य है । और शायद ही कभी कोई इच्छा करता है । वह पूर्व स्मृतियों से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है । जैसे कि नींद से जागा हुआ व्यक्ति अपने सपनों से । 1
 क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः । क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा । 14-2
 जब मैं । कोई इच्छा नहीं करता । तब मुझे धन । मित्रों । विषयों । शास्त्रों और विज्ञान से क्या प्रयोजन है । 2
 विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे । नैराश्ये बंधमोक्षे च न चिंता मुक्तये मम । 14-3
 साक्षी पुरुष रूपी । परमात्मा या ईश्वर को । जानकर मैं बंधन और मोक्ष से । निरपेक्ष हो गया हूँ । और मुझे मोक्ष की चिंता भी नहीं है । 3
अंतर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः । भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते । 14-4
आतंरिक इच्छाओं से रहित । बाह्य रूप में चिंता रहित । आचरण वाले । प्रायः मत्त पुरुष जैसे ही दिखने वाले प्रकाशित पुरुष अपने जैसे प्रकाशित पुरुषों द्वारा ही पहचाने जा सकते हैं । 4

तुम केवल चैतन्य रूप हो - अष्टावक्र गीता अध्याय - 15

अष्टावक्र उवाच - यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान । आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति । 15-1
 अष्टावक्र बोले - सात्विक बुद्धि से । युक्त मनुष्य । साधारण प्रकार के उपदेश से भी कृतकृत्य ( मुक्त ) हो जाता है । परन्तु ऐसा न होने पर । आजीवन जिज्ञासु होने पर भी । परबृह्म का । यथार्थ ज्ञान नहीं होता है । 1
मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः । एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु । 15-2
विषयों से उदासीन होना । मोक्ष है । और विषयों में रस लेना । बंधन है । ऐसा जानकर । तुम्हारी जैसी इच्छा हो । वैसा ही करो । 2
वाग्मिप्राज्ञामहोद्योगं जनं मूकजडालसं । करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षभिः । 15-3
वाणी । बुद्धि । और कर्मों से । महान कार्य करने वाले । मनुष्यों को तत्त्व ज्ञान शांत । स्तब्ध । और कर्म न करने वाला । बना देता है । अतः सुख की इच्छा रखने वाले । इसका त्याग कर देते हैं । 3
न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान । चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर । 15-4
न तुम शरीर हो । और न यह शरीर । तुम्हारा है । न ही तुम । भोगने वाले । अथवा करने वाले हो । तुम चैतन्य रूप हो । शाश्वत साक्षी हो । इच्छा रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो । 4
रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन । निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर । 15-5
राग ( प्रियता ) और द्वेष ( अप्रियता ) मन के धर्म हैं । और तुम किसी भी प्रकार से मन नहीं हो ।  तुम कामना रहित हो । ज्ञान स्वरुप हो । विकार रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो । 5
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव । 15-6
समस्त प्राणियों को । स्वयं में । और स्वयं को । सभी प्राणियों में । स्थित जानकर । अहंकार और आसक्ति से । रहित होकर । तुम सुखी हो जाओ । 6
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरंगा इव सागरे । तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव । 15-7
इस विश्व की उत्पत्ति । तुमसे । उसी प्रकार होती है । जैसे कि समुद्र से । लहरों की । इसमें संदेह नहीं है । तुम चैतन्य स्वरुप हो । अतः चिंता रहित हो जाओ । 7
श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोऽहं कुरुष्व भोः । ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः । 15-8
हे प्रिय ! इस अनुभव पर । निष्ठा रखो । इस पर । श्रद्धा रखो । इस अनुभव की सत्यता के । सम्बन्ध में मोहित मत हो । तुम ज्ञान स्वरुप हो । तुम प्रकृति से परे । और आत्म स्वरुप भगवान हो । 8
गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च । आत्मा न गंता नागंता किमेनमनुशोचसि । 15-9
गुणों से निर्मित । यह शरीर स्थिति । जन्म और मरण को प्राप्त होता है । आत्मा न आती है । और न ही जाती है । अतः तुम क्यों शोक करते हो । 9
देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः । क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः । 15-10
यह शरीर । सृष्टि के अंत तक रहे । अथवा । आज ही । नाश को प्राप्त हो जाये । तुम तो चैतन्य स्वरुप हो ।  इससे तुम्हारी क्या हानि या लाभ है । 10
त्वय्यनंतमहांभोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः । 15-11
अनंत महासमुद्र रूप तुम में । लहर रूप । यह विश्व । स्वभाव से ही । उदय और अस्त । को प्राप्त होता है । इसमें तुम्हारी । क्या वृद्धि या क्षति है । 11
तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत । अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना । 15-12
हे प्रिय ! तुम केवल चैतन्य रूप हो । और यह विश्व । तुमसे अलग नहीं है । अतः किसी की किसी से । श्रेष्ठता या निम्नता । की कल्पना । किस प्रकार की जा सकती है । 12
 एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि । कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहंकार एव च । 15-13
इस अव्यय । शांत । चैतन्य । निर्मल आकाश में । तुम अकेले ही हो । अतः तुममें जन्म । कर्म और अहंकार की कल्पना किस प्रकार की जा सकती है । 13
यत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे । किं पृथक भासते स्वर्णात कटकांगदनूपुरम । 15-14
तुम एक होते हुए भी । अनेक रूप में । प्रतिबिंबित होकर । दिखाई देते हो । क्या स्वर्ण कंगन । बाज़ूबन्द और पायल से अलग दिखाई देता है । 14
अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति संत्यज । सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव । 15-15
यह मैं हूँ । और यह मैं नहीं हूँ । इस प्रकार के भेद को त्याग दो । सब कुछ आत्मस्वरूप तुम ही हो । ऐसा निश्चय करके । और कोई संकल्प न करते हुए । सुखी हो जाओ । 15
तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः । त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन । 15-16
अज्ञानवश तुम ही । यह विश्व हो । पर ज्ञान दृष्टि से । देखने पर । केवल एक तुम ही हो । तुमसे अलग कोई । दूसरा संसारी । या असंसारी । किसी भी प्रकार से नहीं है । 16
भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चयी । निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किंचिदिव शाम्यति । 15-17
यह विश्व केवल भृम ( स्वप्न की तरह असत्य ) है । और कुछ भी नहीं । ऐसा निश्चय करो । इच्छा और चेष्टा रहित हुए । बिना कोई भी । शांति को प्राप्त नहीं होता है । 17
एक एव भवांभोधावासीदस्ति भविष्यति । न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृत्यकृत्यः सुखं चर । 15-18
एक ही भवसागर ( सत्य ) था । है । और रहेगा । तुममें न मोक्ष है । और न बंधन । आप्त काम होकर सुख से विचरण करो । 18
मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय । उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे । 15-19
हे चैतन्यरूप ! भाँति भाँति के संकल्पों । और विकल्पों से । अपने चित्त को । अशांत मत करो । शांत होकर । अपने आनंद रूप में । सुख से स्थित हो जाओ । 19
त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किंचिद् हृदि धारय । आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि । 15-20
सभी स्थानों से अपने ध्यान को हटा लो । और अपने हृदय में कोई विचार न करो । तुम आत्मरूप हो । और मुक्त ही हो । इसमें विचार करने की क्या आवश्यकता है । 20

बुद्धिमान पुरुष द्वन्द रहित हैं - अष्टावक्र गीता अध्याय - 16

अष्टावक्र उवाच - आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकशः । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद ऋते । 16-1
अष्टावक्र बोले - हे तात ! अनेक प्रकार से । अनेक शास्त्रों को । कह या सुन लेने से भी । बिना सबका विस्मरण किये । तुम्हें शांति नहीं मिलेगी । 1
भोगं कर्म समाधिं वा कुरु विज्ञ तथापि ते । चित्तं निरस्तसर्वाशमत्यर्थं रोचयिष्यति । 16-2
हे विज्ञ ( पुत्र ) ! चाहे तुम । भोगों का भोग करो । कर्मों को करो । चाहे तुम । समाधि को लगाओ । परन्तु सब आशाओं से । रहित होने पर ही । तुम अत्यंत सुख को । प्राप्त कर सकोगे । 2
आयासात्सकलो दुःखी नैनं जानाति कश्चन । अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निर्वृतिम । 16-3
शरीर निर्वाहार्थ ) परिश्रम करने के कारण ही । सभी मनुष्य दुखी हैं । इसको कोई नहीं जानता है । सुकृती ( महा ) पुरुष इसी उपदेश से । परम सुख को प्राप्त होते हैं । 3
व्यापारे खिद्यते यस्तु निमेषोन्मेषयोरपि । तस्यालस्य धुरीणस्य सुखं नन्यस्य कस्यचित । 16-4
जो नेत्रों के ढकने । और खोलने के । व्यापार से । खेद को प्राप्त होता है । उस आलसी पुरुष को ही सुख है । दूसरे किसी को नहीं । 4
इदं कृतमिदं नेति द्वंद्वैर्मुक्तं यदा मनः । धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत । 16-5
यह किया गया है । यह नहीं किया गया है । मन जब । ऐसे द्वन्द से । मुक्त हो जाय । तब वह धर्म । अर्थ । काम । और मोक्ष आदि से । निरपेक्ष ( इच्छा रहित ) होता है । 5
विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः । ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान । 16-6
बिषय का द्वेषी । विरक्त है । बिषय का लोभी । रागी है । ग्रहण और त्याग से रहित पुरुष । न ही त्यागी है । और न ही राग वान है । 6
हेयोपादेयता तावत्संसारविटपांकुरः । स्पृहा जीवति यावद वै निर्विचारदशास्पदम । 16-7
जब तक तृष्णा । जब तक अविवेक दशा की स्थिति है । तृष्णा युक्त पुरुष । तब तक जीता है । त्याज्य और ग्राह्य भाव । संसार रुपी वृक्ष का अंकुर है । 7
प्रवृत्तौ जायते रागो निर्वृत्तौ द्वेष एव हि । निर्द्वन्द्वो बालवद धीमान एवमेव व्यवस्थितः । 16-8
प्रवृत्ति में राग होता है । निवृत्ति में द्वेष होता है । इसीलिए बुद्धिमान पुरुष । द्वन्द रहित होकर । जैसे है । उसी भाव में स्थित रहते हैं । 8
हातुमिच्छति संसारं रागी दुःखजिहासया । वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति । 16-9
रागवान पुरुष । दुःख निवृत्ति की । इच्छा से । संसार को । त्यागना चाहता है ।  राग रहित पुरुष । निश्चय करके । दुःख से मुक्त होकर । संसार के बने रहने पर भी । खेद को नहीं प्राप्त होता है । 9
यस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा ।  न च ज्ञानी न वा योगी केवलं दुःखभागसौ । 16-10
जिसको मोक्ष । और देह का भी । अभिमान है । वह न ही । ज्ञानी है । और न ही । योगी है । वह केवल दुःख का भागी है । 10
हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा । तथापि न तव स्वाथ्यं सर्वविस्मरणादृते । 16-11
अगर तुम्हारा उपदेशक ( गुरु ) शिव । विष्णु अथवा बृह्मा भी हो । तो भी बिना सबके विस्मरण ( त्याग ) के तुम्हें शांति नहीं मिलेगी । 11

ज्ञानी सर्वत्र रस रहित है - अष्टावक्र गीता अध्याय - 17

अष्टावक्र उवाच - तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा । तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यं एकाकी रमते तु यः । 17-1
अष्टावक्र बोले - जो पुरुष । नित्य तृप्त है । शुद्ध इन्द्रिय वाला है । और अकेला रमता है । उसे ही ज्ञान का फल । और योग के अभ्यास का फल प्राप्त होता है । 1
न कदाचिज्जगत्यस्मिन तत्त्वज्ञा हन्त खिद्यति । यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम । 17-2
तत्व ज्ञानी । इस जगत के लिए । कभी भी । खेद को । प्राप्त नहीं होता है । क्योंकि ( वह जानता है कि ) उसी एक से । यह बृह्मांड मंडल पूर्ण है । 2
न जातु विषयाः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी । सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निंबपल्लवाः । 17-3
ये कोई भी बिषय । स्वात्माराम ( आत्मा में रमण करने वाले ) को । कभी भी । हर्षित नहीं करते हैं । जैसे सल्लकी ( गन्नों ) के पत्तों से प्रसन्न हुए । हाथी को । नीम के पत्ते । हर्षित नहीं करते । 3
यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासिता । अभुक्तेषु निराकांक्षी तदृशो भवदुर्लभः । 17-4
जो भोगे हुए । भोगों में । आसक्त नहीं । होता है । और अभुक्त । पदार्थों के प्रति । आकांक्षा रहित है । ऐसा मनुष्य । संसार में दुर्लभ है । 4
बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते । भोगमोक्षनिराकांक्षी विरलो हि महाशयः । 17-5
इस संसार में । भोग और मोक्ष की । इच्छा वाले ( अनेकों मनुष्य ) देखे जाते हैं । परन्तु । भोग और मोक्ष की । आकांक्षा से रहित । कोई विरला ही महापुरुष है । 5
धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा । कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता न हि । 17-6
धर्म । अर्थ । काम । मोक्ष । जीवन । और मरण । किस उदार चित्त के लिए । गृहण और त्याग करने योग्य । नहीं है ? ( अर्थात इनसे कौन उदासीन है ।) 6
वांछा न विश्वविलये न द्वेषस्तस्य च स्थितौ । यथा जीविकया तस्माद धन्य आस्ते यथा सुखम । 17-7
विश्व के । लय होने में । जिसका राग नहीं है । उसकी स्थिति में । जिसको द्वेष नहीं है । यथा प्राप्य जीविका द्वारा । जो पुरुष । सुख पूर्वक रहता है । इसी कारण । वह धन्य है । 7
कृतार्थोऽनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधीः कृती । पश्यन शृण्वन स्पृशन जिघ्रन्न अश्नन्नास्ते यथा सुखम । 17-8
इस ज्ञान से । मैं कृतार्थ हूँ । इस प्रकार । जिसकी बुद्धि । गलित ( निष्ठ ) हो गयी है । ऐसा ज्ञानी पुरुष । देखता हुआ । सुनता हुआ । स्पर्श करता हुआ । सूंघता हुआ । खाता हुआ । सुख पूर्वक रहता है । 8
शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च । न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे । 17-9
जिसके लिए । संसार सागर । नष्ट हो गया है । ऐसे पुरुष की । दृष्टि । शून्य हो जाती है । चेष्टाएँ ( व्यापार ) व्यर्थ हो जाती हैं । इन्द्रियाँ विकल हो जाती हैं । उसकी ( संसार में ) कोई इच्छा । अथवा विरक्ति नहीं रहती है । 9
न जागर्ति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति । अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः । 17-10
न जागता है । न सोता है । न पलक को खोलता है । और न पलक को बंद करता है । आश्चर्य है । मुक्त चित्त ( ज्ञानी ) कैसी उत्कृष्ट दशा में । वरतता ( रहता ) है । 10
सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः । समस्तवासना मुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते । 17-11
जीवन मुक्त ज्ञानी । सब जगह । स्वस्थ ( शांत ) सब जगह । निर्मल । अन्तःकरण वाला । दिखलाई देता है । और सब जगह । सब वासनाओं से रहित होकर । विराजता ( रहता ) है । 11
पश्यन शृण्वन् स्पृशन जिघ्रन्न अश्नन गृण्हन वदन व्रजन । ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः । 17-12
देखता हुआ । सुनता हुआ । स्पर्श करता हुआ । सूंघता हुआ । खाता हुआ । ग्रहण करता हुआ । बोलता हुआ । जाता हुआ । निश्चय ही । राग द्वेष से मुक्त ( छूटा ) हुआ । ऐसा महापुरुष मुक्त ( ज्ञानी ) है । 12
न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति । न ददाति न गृण्हाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः । 17-13
न निंदा करता है । न स्तुति करता है । न हर्ष को प्राप्त होता है । न क्रोध करता है । न देता है । न लेता है । ज्ञानी सर्वत्र रस रहित है । 13
सानुरागां स्त्रियं दृष्टवा मृत्युं वा समुपस्थितम । अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशयः । 17-14
प्रीति युक्त स्त्री को । और समीप में स्थित । मृत्यु को देख कर । व्याकुलता से रहित । और शांत महापुरुष । निश्चय ही मुक्त ( ज्ञानी ) है । 14
सुखे दुःखे नरे नार्यां संपत्सु विपत्सु च । विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः । 17-15
सुख में । दुःख में । नर ( पुरुष ) में । नारी ( स्त्री ) में । संपत्तियों में । विपत्तियों में । ज्ञानी बिशेष रूप से । सर्वत्र समदर्शी ( भेद रहित ) है । 15
न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता । नाश्चर्यं नैव च क्षोभः क्षीणसंसरणे नरे । 17-16
जिस मनुष्य के लिए । न हिंसा है । न दयालुता है । न उदंडता है । न दीनता है । न आश्चर्य है । और न क्षोभ है । उसी का संसार क्षीण हुआ है । ( वही जीवन मुक्त है ) 16
न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुपः । असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते । 17-17
जो न बिषयों में । द्वेष करने वाला । और न ( ही ) बिषयों में । लोभ करने वाला है । तथा जो सदा । आसक्ति रहित । मन से प्राप्त । और अप्राप्त । वस्तुओं का । भोग करता है । वही जीवनमुक्त है । 17
समाधानसमाधानहिताहितविकल्पनाः । शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः । 17-18
जो समाधान । और असमाधान । हित और अहित की । कल्पना को । नहीं जानता है । ऐसा शून्य चित्त वाला ( ज्ञानी ) कैवल्य को प्राप्त हुआ ( मोक्ष रूप से ) स्थित है । वही जीवनमुक्त है । 18
निर्ममो निरहंकारो न किंचिदिति निश्चितः । अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि करोति न । 17-19
जो ममता । और अहंकार । रहित है । जिसकी आशाएं । उसके अभ्यंतर में । गल ( विलीन हो ) गयी हैं । जो कुछ भी ( मेरा ) नहीं है । ऐसा निश्चय करके । कर्म करता है । वह ( कर्मों में कभी ) लिप्त । नहीं होता है । 19
मनःप्रकाशसंमोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः । दशां कामपि संप्राप्तो भवेद गलितमानसः । 17-20
जिसका मन । गल ( नष्ट हो ) गया है । वह मन के प्रकाश से । चित्त की शांति से । स्वपन और सुषुप्ति से भी । ऊपर उठकर । अनिर्वचनीय ( आत्मानंद ) की दशा को प्राप्त होता है । ( वही जीवन मुक्त है ) 20

मंगलवार, नवंबर 15, 2011

अष्टावकृ गीतावाणी ध्वनि स्वरूप - 6


अष्टावक्र उवाच - यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान । आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति । 15-1
 अष्टावक्र बोले - सात्विक बुद्धि से । युक्त मनुष्य । साधारण प्रकार के उपदेश से भी कृतकृत्य ( मुक्त ) हो जाता है । परन्तु ऐसा न होने पर । आजीवन जिज्ञासु होने पर भी । परबृह्म का । यथार्थ ज्ञान नहीं होता है । 1 
मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः । एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु । 15-2 
विषयों से उदासीन होना । मोक्ष है । और विषयों में रस लेना । बंधन है । ऐसा जानकर । तुम्हारी जैसी इच्छा हो । वैसा ही करो । 2 
वाग्मिप्राज्ञामहोद्योगं जनं मूकजडालसं । करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षभिः । 15-3
वाणी । बुद्धि । और कर्मों से । महान कार्य करने वाले । मनुष्यों को तत्त्व ज्ञान शांत । स्तब्ध । और कर्म न करने वाला । बना देता है । अतः सुख की इच्छा रखने वाले । इसका त्याग कर देते हैं । 3 
न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान । चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर । 15-4 
न तुम शरीर हो । और न यह शरीर । तुम्हारा है । न ही तुम । भोगने वाले । अथवा करने वाले हो । तुम चैतन्य रूप हो । शाश्वत साक्षी हो । इच्छा रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो । 4  
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अष्टावकृ गीतावाणी ध्वनि स्वरूप - 5


रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन । निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर । 15-5 
राग ( प्रियता ) और द्वेष ( अप्रियता ) मन के धर्म हैं । और तुम किसी भी प्रकार से मन नहीं हो ।  तुम कामना रहित हो । ज्ञान स्वरुप हो । विकार रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो । 5
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव । 15-6 
समस्त प्राणियों को । स्वयं में । और स्वयं को । सभी प्राणियों में । स्थित जानकर । अहंकार और आसक्ति से । रहित होकर । तुम सुखी हो जाओ । 6 
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरंगा इव सागरे । तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव । 15-7 
इस विश्व की उत्पत्ति । तुमसे । उसी प्रकार होती है । जैसे कि समुद्र से । लहरों की । इसमें संदेह नहीं है । तुम चैतन्य स्वरुप हो । अतः चिंता रहित हो जाओ । 7  
श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोऽहं कुरुष्व भोः । ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः । 15-8 
हे प्रिय ! इस अनुभव पर । निष्ठा रखो । इस पर । श्रद्धा रखो । इस अनुभव की सत्यता के । सम्बन्ध में मोहित मत हो । तुम ज्ञान स्वरुप हो । तुम प्रकृति से परे । और आत्म स्वरुप भगवान हो । 8  
गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च । आत्मा न गंता नागंता किमेनमनुशोचसि । 15-9 
गुणों से निर्मित । यह शरीर स्थिति । जन्म और मरण को प्राप्त होता है । आत्मा न आती है । और न ही जाती है । अतः तुम क्यों शोक करते हो । 9
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