बुधवार, फ़रवरी 15, 2012

संसार रूपी वृक्ष पर चढ़े लोग नरक रूपी सागर में गिरते हैं

अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने । समस्त जगदाधारमूर्तये बृह्मणे नमः ।
जो बृह्म अचिन्त्य । अव्यक्त । तीनों गुणों से रहित ( फिर भी देखने वालों के अज्ञान की उपाधि से ) त्रिगुणात्मक । और समस्त जगत का । अधिष्ठान रूप है । ऐसे बृह्म को नमस्कार हो । 1
सूत सूत महाप्राज्ञ निगमागमपारग । गुरुस्वरूपमस्माकं ब्रूहि सर्वमलापहम ।
ऋषि बोले - हे महा ज्ञानी ! हे वेद वेदांगों के निष्णात ! सूत जी ! सर्व पापों का नाश करने वाले । गुरु का स्वरूप । हमें सुनाओ । 2
यस्य श्रवणमात्रेण देही दुःखाद्विमुच्यते । येन मार्गेण मुनयः सर्वज्ञत्वं प्रपेदिरे ।
यत्प्राप्य न पुनर्याति नरः संसारबन्धनम । तथाविधं परं तत्वं वक्तव्यमधुना त्वया ।
जिसको । सुनने मात्र से । मनुष्य दुख से । विमुक्त हो जाता है । जिस उपाय से । मुनियों ने । सर्वज्ञता प्राप्त की । जिसको प्राप्त करके । मनुष्य फ़िर से । संसार बन्धन में नहीं बँधता । ऐसे परम तत्व का । कथन । आप करें । 3 । 4
गुह्यादगुह्यतमं सारं गुरुगीता विशेषतः । त्वत्प्रसादाच्च श्रोतव्या तत्सर्वं ब्रूहि सूत नः ।
जो तत्व । परम रहस्यमय । एवं श्रेष्ठ सार भूत है । और विशेष कर । जो गुरु गीता है । वह आपकी कृपा से हम सुनना चाहते हैं । सूत जी ! वे सब हमें सुनाइये । 5
इति संप्राथितः सूतो मुनिसंघैर्मुहुर्मुहुः । कुतूहलेन महता प्रोवाच मधुरं वचः ।
इस प्रकार बार बार प्रार्थना किये जाने पर सूत जी बहुत प्रसन्न होकर मुनियों के समूह से मधुर वचन बोले । 6
श्रृणुध्वं मुनयः सर्वे श्रद्धया परया मुदा । वदामि भवरोगघ्नीं गीता मातृस्वरूपिणीम ।
सूत जी बोले - हे मुनि ! संसार रूपी रोग का । नाश करने वाली । मातृ स्वरूपिणी ( माता के समान ध्यान रखने वाली ) गुरु गीता कहता हूँ । उसको आप । अत्यंत श्रद्धा और प्रसन्नता से सुनिये । 7
पुरा कैलासशिखरे सिद्धगन्धर्वसेविते । तत्र कल्पलतापुष्पमन्दिरेऽत्यन्तसुन्दरे ।
व्याघ्राजिने समासिनं शुकादिमुनिवन्दितम । बोधयन्तं परं तत्वं मध्येमुनिगणंक्वचित ।
प्रणम्रवदना शश्वन्नमस्कुर्वन्तमादरात । दृष्टवा विस्मयमापन्ना पार्वती परिपृच्छति ।
प्राचीन काल में । सिद्धों । और गन्धर्वों के । आवास रूप । कैलास पर्वत के । शिखर पर । कल्प वृक्ष के । फूलों से बने हुए । अत्यंत सुन्दर मंदिर में । मुनियों के बीच । व्याघ्र चर्म पर । बैठे हुए । शुक आदि मुनियों द्वारा । वन्दन किये जाने वाले । और परम तत्व का । बोध देते हुए । भगवान शंकर को बार बार नमस्कार करते देखकर । अतिशय नमृ मुख वाली । पार्वती ने आश्चर्य चकित होकर पूछा । 8 । 9 । 10 ।
ॐ नमो देव देवेश परात्पर जगदगुरो । त्वां नमस्कुर्वते भक्त्या सुरासुरनराः सदा ।
पार्वती बोली - हे ॐकार के अर्थ स्वरूप । देवों के देव । श्रेष्ठों के श्रेष्ठ । हे जगद गुरु ! आपको प्रणाम हो । देव । दानव । और मानव । सब आपको । सदा । भक्ति पूर्वक । प्रणाम करते हैं । 11
विधिविष्णुमहेन्द्राद्यैर्वन्द्यः खलु सदा भवान । नमस्करोषि कस्मै त्वं नमस्काराश्रयः किलः ।
आप बृह्मा । विष्णु । इन्द्र । आदि के नमस्कार के योग्य हैं । ऐसे नमस्कार के । आश्रय रूप । होने पर भी । आप किसको नमस्कार करते हैं ? 12
भगवन सर्वधर्मज्ञ व्रतानां व्रतनायकम । ब्रूहि मे कृपया शम्भो गुरुमाहात्म्यमुत्तमम ।
हे भगवन ! हे सर्व धर्मों के ज्ञाता ।  हे शम्भो । जो वृत । सब वृतों में । श्रेष्ठ है । ऐसा उत्तम । गुरु माहात्म्य कृपा करके । मुझे कहें । 13
इति संप्रार्थितः शश्वन्महादेवो महेश्वरः । आनंदभरितः स्वान्ते पार्वतीमिदमब्रवीत ।
इस प्रकार ( पार्वती द्वारा ) बार बार । प्रार्थना किये जाने पर । महादेव ने । अंतर से । खूब प्रसन्न होते हुए पार्वती से इस प्रकार कहा । 14
न वक्तव्यमिदं देवि रहस्यातिरहस्यकम । न कस्यापि पुरा प्रोक्तं त्वद्भक्त्यर्थं वदामि तत ।
महादेव बोले -  हे देवी ! यह तत्व । रहस्यों का भी । रहस्य है । इसलिए कहना उचित नहीं । पहले किसी से भी नहीं कहा । फिर भी । तुम्हारी भक्ति देखकर । वह रहस्य कहता हूँ । 15
मम रूपासि देवि त्वमतस्तत्कथयामि ते । लोकोपकारकः प्रश्नो न केनापि कृतः पुरा ।
हे देवी ! तुम । मेरा ही स्वरूप हो । इसलिए ( यह रहस्य ) तुमको कहता हूँ । तुम्हारा यह प्रश्न । लोक का कल्याण कारक है । ऐसा प्रश्न । पहले कभी । किसी ने नहीं किया । 16
यस्य देवे परा भक्ति, यथा देवे तथा गुरौ । त्स्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ।
जिसको । ईश्वर में । उत्तम भक्ति । होती है । जैसी ईश्वर में । वैसी ही भक्ति । जिसको गुरु में । होती है । ऐसे महात्माओं को ही । यहाँ कही हुई । बात समझ में आयेगी । 17
यो गुरु स शिवः प्रोक्तो, यः शिवः स गुरुस्मृतः । विकल्पं यस्तु कुर्वीत स नरो गुरुतल्पगः ।
जो गुरु हैं । वे ही शिव हैं । जो शिव हैं । वे ही गुरु हैं । दोनों में । जो अन्तर मानता है । वह गुरु पत्नी गमन करने वाले के समान पापी है । 18
वेद्शास्त्रपुराणानि चेतिहासादिकानि च । मंत्रयंत्रविद्यादिनिमोहनोच्चाटनादिकम ।
शैवशाक्तागमादिनि ह्यन्ये च बहवो मताः । अपभृंशाः समस्तानां जीवानां भ्रांतचेतसाम ।
जपस्तपोवृतं तीर्थं यज्ञो दानं तथैव च । गुरु तत्वं अविज्ञाय सर्वं व्यर्थं भवेत प्रिये ।
हे प्रिय ! वेद । शास्त्र । पुराण । इतिहास आदि । मंत्र । यंत्र । मोहन । उच्चाटन आदि । विद्या । शैव । शाक्त । आगम । और अन्य सब । मत मतान्तर । ये सब बातें । गुरु तत्व को । जाने बिना । भ्रान्त चित्त वाले । जीवों को । पथ भृष्ट करने वाली हैं । और जप । तप । वृत । तीर्थ । यज्ञ । दान । ये सब व्यर्थ हो जाते हैं । 19 । 20 । 21
गुरुबुध्यात्मनो नान्यत सत्यं सत्यं वरानने । तल्लभार्थं प्रयत्नस्तु कर्त्तवयशच मनीषिभिः ।
आत्मा में । गुरु बुद्धि के सिवा । अन्य कुछ भी । सत्य नहीं है । सत्य नहीं है । इसलिये । इस आत्म ज्ञान को । प्राप्त करने के लिये । बुद्धिमानों को । प्रयत्न करना चाहिये । 22
गूढाविद्या जगन्माया देहशचाज्ञानसम्भवः । विज्ञानं यत्प्रसादेन गुरुशब्देन कथयते ।
जगत । गूढ़ । अविद्यात्मक । माया रूप है । और शरीर । अज्ञान से । उत्पन्न हुआ है । इनका । विश्लेषणात्मक । ज्ञान । जिनकी कृपा से । होता है । उस ज्ञान को । गुरु कहते हैं । 23
देही बृह्म भवेद्यस्मात त्वत्कृपार्थंवदामि तत । सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादसेवनात ।
जिस गुरु के । पाद सेवन से । मनुष्य सब पापों से । विशुद्धात्मा होकर । बृह्म रूप । हो जाता है । वह तुम पर कृपा करने के लिये कहता हूँ । 24
शोषणं पापपंकस्य दीपनं ज्ञानतेजसः । गुरोः पादोदकं सम्यक संसारार्णवतारकम ।
गुरु का । चरणामृत । पाप रूपी । कीचड़ का । सम्यक । शोषक है । ज्ञान तेज का । सम्यक । उद्यीपक है । और संसार सागर का । सम्यक । तारक है । 25
अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारकम । ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं गुरुपादोदकं पिबेत ।
अज्ञान की । जड़ को । उखाड़ने वाले । अनेक जन्मों के । कर्मों को । निवारने वाले । ज्ञान । और वैराग्य को । सिद्ध करने वाले । गुरु के । चरणामृत का । पान करना चाहिये । 26
स्वदेशिकस्यैव च नामकीर्तनम । भवेदनन्तस्यशिवस्य कीर्तनम ।
स्वदेशिकस्यैव च नामचिन्तनम । भवेदनन्तस्यशिवस्य नामचिन्तनम ।
गुरु के । नाम का । कीर्तन । अनंत स्वरूप । भगवान शिव का । ही कीर्तन है । गुरु के । नाम का । चिंतन । अनंत स्वरूप । भगवान शिव का । ही चिंतन है । 27
काशीक्षेत्रं निवासश्च जाह्नवी चरणोदकम । गुरुर्विश्वेश्वरः साक्षात तारकं बृह्मनिश्चयः ।
गुरु का । निवास स्थान । काशी क्षेत्र है । गुरु का पादोदक गंगा है । गुरु । भगवान विश्वनाथ । और निश्चय ही । साक्षात । तारक बृह्म हैं । 28
गुरुसेवा गया प्रोक्ता देहः स्यादक्षयो वटः । तत्पादं विष्णुपादं स्यात तत्रदत्तमनस्ततम ।
गुरु की । सेवा ही । तीर्थ राज गया है । गुरु का । शरीर अक्षय वट वृक्ष है । गुरु के श्री चरण । भगवान विष्णु के श्री चरण हैं । वहाँ लगाया हुआ । मन तदाकार हो जाता है । 29
गुरुवक्त्रे स्थितं बृह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः । गुरोर्ध्यानं सदा कुर्यात पुरूषं स्वैरिणी यथा ।
बृह्म । गुरु के । मुखारविन्द ( वचनामृत ) में स्थित है । वह बृह्म । उनकी कृपा से । प्राप्त हो जाता है । इसलिये । जिस प्रकार । स्वेच्छा चारी स्त्री । अपने प्रेमी पुरुष का । सदा चिंतन करती है । उसी प्रकार । सदा गुरु का । ध्यान करना चाहिये । 30
स्वाश्रमं च स्वजातिं च स्वकीर्ति पुष्टिवर्धनम । एतत्सर्वं परित्यज्य गुरुमेव समाश्रयेत ।
अपने आश्रम ( बृह्मचर्य श्रम आदि ) जाति । कीर्ति ( पद प्रतिष्ठा )  पालन । पोषण । ये सब छोड़ कर । गुरु का ही । सम्यक । आश्रय लेना चाहिये । 31
गुरुवक्त्रे स्थिता विद्या गुरुभक्त्या च लभ्यते । त्रैलोक्ये स्फ़ुटवक्तारो देवर्षिपितृमानवाः ।
विद्या । गुरु के । मुख में । रहती है । और वह । गुरु की । भक्ति से ही । प्राप्त होती है । यह बात । तीनों लोकों में । देव । ऋषि । पितृ । और मानवों द्वारा । स्पष्ट रूप से । कही गई है । 32
गुकारश्चान्धकारो हि रुकारस्तेज उच्यते । अज्ञानग्रासकं बृह्म गुरुरेव न संशयः ।
गु शब्द का अर्थ है - अंधकार ( अज्ञान ) । और रु शब्द का अर्थ है - प्रकाश ( ज्ञान ) । अज्ञान को नष्ट करने वाला । जो बृह्म रूप । प्रकाश है । वह गुरु है । इसमें कोई संशय नहीं है । 33
गुकारश्चान्धकारस्तु रुकारस्तन्निरोधकृत । अन्धकारविनाशित्वात गुरुरित्यभिधीयते ।
गु कार । अंधकार है । और उसको । दूर करने वाला । रु कार है । अज्ञान रूपी । अन्धकार को । नष्ट करने के कारण ही । गुरु कहलाते हैं । 34
गुकारश्च गुणातीतो रूपातीतो रुकारकः । गुणरूपविहीनत्वात गुरुरित्यभिधीयते ।
गु कार से । गुणातीत । कहा जाता है । रु कार से । रूपातीत । कहा जाता है । गुण और रूप से । परे होने के कारण ही । गुरु कहलाते हैं । 35
गुकारः प्रथमो वर्णो मायादि गुणभासकः । रुकारोऽस्ति परं बृह्म मायाभ्रान्तिविमोचकम ।
गुरु । शब्द का । प्रथम अक्षर । गु । माया आदि । गुणों का । प्रकाशक है । और । दूसरा अक्षर । रु कार । माया की । भ्रान्ति से । मुक्ति देने वाला । परबृह्म है । 36
सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदांबुजम । वेदान्तार्थप्रवक्तारं तस्मात्संपूजयेद गुरुम ।
गुरु । सब श्रुति रूप । श्रेष्ठ रत्नों से । सुशोभित । चरण कमल वाले हैं । और वेदान्त के । अर्थ के प्रवक्ता हैं । इसलिये । गुरु की । पूजा करनी चाहिये । 37
यस्यस्मरणमात्रेण ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम । सः एव सर्वसम्पत्तिः तस्मात्संपूजयेद गुरुम ।
जिनके । स्मरण मात्र से । ज्ञान । अपने आप । प्रकट । होने लगता है । और वे ही । सब ( शम दम आदि ) सम्पदा रूप हैं । अतः । गुरु की । पूजा करनी चाहिये । 38
संसारवृक्षमारूढ़ाः पतन्ति नरकार्णवे । यस्तानुद्धरते सर्वान तस्मै श्रीगुरवे नमः ।
संसार रूपी । वृक्ष पर । चढ़े हुए लोग । नरक रूपी । सागर में । गिरते हैं । उन सबका । उद्धार करने वाले । श्री गुरु को नमस्कार हो । 39
एक एव परो बन्धुर्विषमे समुपस्थिते । गुरुः सकलधर्मात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ।
जब । विकट परिस्थिति । उपस्थित होती है । तब । वे ही । एक मात्र । परम बांधव हैं । और । सब धर्मों के । आत्म स्वरूप हैं । ऐसे श्री गुरु को नमस्कार हो । 40
भवारण्यप्रविष्टस्य दिड्मोहभ्रान्तचेतसः । येन सन्दर्शितः पन्थाः तस्मै श्रीगुरवे नमः ।
संसार रूपी । अरण्य में । प्रवेश करने के बाद । दिग मूढ़ की । स्थिति में ( जब कोई मार्ग नहीं दिखाई देता है ) चित्त । भृमित हो जाता है । उस समय । जिसने मार्ग दिखाया । उन श्री गुरु को नमस्कार है । 41
तापत्रयाग्नितप्तानां अशान्तप्राणीनां भुवि । गुरुरेव परा गंगा तस्मै श्रीगुरुवे नमः ।
इस पृथ्वी पर । त्रिविध ताप ( आधि । व्याधि । उपाधि - देहिक । दैविक । भौतिक ) रूपी अग्नि से । जलने के कारण । अशांत हुए । प्राणियों के लिए । गुरु ही । एक मात्र । गंगा हैं । ऐसे श्री गुरु को नमस्कार हो । 42
सप्तसागरपर्यन्तं तीर्थस्नानफलं तु यत । गुरुपादपयोबिन्दोः सहस्रांशेन तत्फलम ।
7 समुद्र । पर्यन्त के । सब तीर्थों में । स्नान करने से । जितना फल । मिलता है । वह फल । गुरु के चरणामृत के । 1 बिन्दु के । फल का । हजारवाँ हिस्सा है । 43
शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन । लब्ध्वा कुलगुरुं सम्यगुरुमेव समाश्रयेत ।
यदि शिव नाराज़ हो जायें । तो गुरु । बचाने वाले हैं । किन्तु यदि । गुरु नाराज़ हो जायें । तो बचाने वाला । कोई नहीं । अतः गुरु को । संप्राप्त करके । सदा उनकी । शरण में रेहना चाहिए । 44
गुकारं च गुणातीतं रुकारं रुपवर्जितम । गुणातीतमरूपं च यो दद्यात स गुरुः स्मृतः ।
गुरु शब्द का । गु अक्षर । गुणातीत । अर्थ का । बोधक है । और । रु अक्षर । रूप रहित स्थिति का । बोधक है । ये दोनों ( गुणातीत और रूपातीत ) स्थितियाँ । जो देते हैं । उनको गुरु कहते हैं । 45
अत्रिनेत्रः शिवः साक्षात द्विबाहुश्च हरिः स्मृतः । योऽचतुर्वदनो बृह्मा श्रीगुरुः कथितः प्रिये ।
हे प्रिय !  गुरु ही । त्रिनेत्र  रहित ( दो नेत्र वाले ) साक्षात । शिव हैं । दो हाथ वाले । भगवान विष्णु हैं । और एक मुख वाले । बृह्मा हैं । 46
देवकिन्नरगन्धर्वाः पितृयक्षास्तु तुम्बुरुः । मुनयोऽपि न जानन्ति गुरुशुश्रूषणे विधिम ।
देव । किन्नर । गंधर्व । पितृ । यक्ष । तुम्बुरु ( गंधर्व का एक प्रकार ) और । मुनि लोग भी । गुरु सेवा की विधि नहीं जानते । 47
तार्किकाश्छान्दसाश्चैव देवज्ञाः कर्मठः प्रिये । लौकिकास्ते न जानन्ति गुरुतत्वं निराकुलम ।
हे प्रिय !  तार्किक । वैदिक । ज्योतिषी । कर्मकांडी । तथा लौकिक जन । निर्मल गुरु तत्व को । नहीं जानते । 48
यज्ञिनोऽपि न मुक्ताः स्युः न मुक्ताः योगिनस्तथा । तापसा अपि नो मुक्त गुरुतत्वात्पराडमुखाः ।
यदि । गुरु तत्व से । प्राडमुख हो जाये । तो । याज्ञिक । मुक्ति नहीं पा सकते । योगी मुक्त । नहीं हो सकते । और तपस्वी भी । मुक्त नहीं हो सकते । 49
न मुक्तास्तु गन्धर्वः पितृयक्षास्तु चारणाः । ॠष्यः सिद्धदेवाद्याः गुरुसेवापराडमुखाः ।
गुरु सेवा से । विमुख । गंधर्व । पितृ । यक्ष । चारण । ॠषि । सिद्ध । और देवता । आदि भी । मुक्त नहीं होंगे ।
इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमामहेश्वरसंवादे श्री गुरुगीतायां प्रथमोऽध्यायः ।

इस प्रकार उपदेश देने वाला बृह्म राक्षस होता है

बृह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं । द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम । भावतीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि ।
जो बृह्मानंद । स्वरूप हैं । परम सुख । देने वाले हैं । जो केवल । ज्ञान स्वरूप हैं । ( सुख । दुख । शीत । उष्ण आदि ) द्वन्द्वों से । रहित हैं । आकाश के समान । सूक्ष्म । और । सर्व व्यापक हैं । तत्वमसि आदि । महा वाक्यों के । लक्ष्यार्थ हैं । एक हैं । नित्य हैं । मल रहित हैं । अचल हैं । सब बुद्धियों के । साक्षी हैं । भावना से । परे हैं । सत । रज । और तम । तीनों गुणों से । रहित हैं । ऐसे । श्री सदगुरु देव को । मैं नमस्कार करता हूँ । 52
गुरुपदिष्टमार्गेण मनः शिद्धिं तु कारयेत । अनित्यं खण्डयेत्सर्वं यत्किंचिदात्मगोचरम ।
गुरु के द्वारा । उपदिष्ट मार्ग से । मन की । शुद्धि करनी चाहिए । जो कुछ भी अनित्य । वस्तु । अपनी इन्द्रियों की विषय । हो जायें । उनका खण्डन ( निराकरण ) करना चाहिए । 53
किमत्रं बहुनोक्तेन शास्त्रकोटिशतैरपि । दुर्लभा चित्तविश्रान्तिः विना गुरुकृपां पराम ।
यहाँ ज्यादा कहने से क्या लाभ ? गुरु की परम कृपा के बिना । करोड़ों शास्त्रों से भी चित्त की विश्रांति दुर्लभ है । 54
करुणाखड्गपातेन छित्त्वा पाशाष्टकं शिशोः । सम्यगानन्दजनकः सदगुरु सोऽभिधीयते ।
एवं श्रुत्वा महादेवि गुरुनिन्दा करोति यः । स याति नरकान घोरान यावच्चन्द्रदिवाकरौ ।
करुणा रूपी तलवार के । प्रहार से । शिष्य के आठों पाशों ( संशय । दया । भय । संकोच । निन्दा । प्रतिष्ठा । कुल अभिमान । संपत्ति ) को काटकर । निर्मल आनंद देने वाले को । गुरु कहते हैं । ऐसा सुनने पर भी । जो मनुष्य । गुरु निन्दा करता है । वह ( मनुष्य ) जब तक । सूर्य चन्द्र का । अस्तित्व रहता है । तब तक । घोर नरक में । रहता है । 55 । 56
यावत्कल्पान्तको देहस्तावद्देवि गुरुं स्मरेत । गुरुलोपो न कर्त्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत ।
हे देवी ! देह कल्प के अन्त तक रहे । तब तक । गुरु का स्मरण । करना चाहिए । और आत्म ज्ञानी होने के बाद भी ( स्वच्छन्द अर्थात स्वरूप का छन्द मिलने पर भी ) शिष्य को । गुरु की शरण । नहीं छोड़नी चाहिए । 57
हुंकारेण न वक्तव्यं प्राज्ञशिष्यै कदाचन । गुरुराग्रे न वक्तव्यमसत्यं तु कदाचन ।
गुरु के समक्ष । प्रज्ञावान शिष्य को । कभी हुँकार शब्द से ( मैने ऐसे किया । वैसा किया ) नहीं बोलना चाहिए । और कभी । असत्य नहीं । बोलना चाहिए । 58
गुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य गुरुसान्निध्यभाषणः । अरण्ये निर्जले देशे संभवेद बृह्मराक्षसः ।
गुरु के समक्ष । जो हुँकार शब्द से । बोलता है । अथवा गुरु को । तू कहकर । जो बोलता है । वह निर्जन मरु भूमि में । बृह्म राक्षस होता है । 59
अद्वैतं भावयेन्नित्यं सर्वावस्थासु सर्वदा । कदाचिदपि नो कुर्यादद्वैतं गुरुसन्निधौ ।
सदा । और सभी अवस्थाओं में । अद्वैत की । भावना करनी चाहिए । परन्तु गुरु के साथ । अद्वैत की । भावना कदापि नहीं करनी चाहिए । 60
दृश्यविस्मृतिपर्यन्तं कुर्याद गुरुपदार्चनम । तादृशस्यैव कैवल्यं न च तद्व्यतिरेकिणः ।
जब तक । दृश्य प्रपंच की । विस्मृति न हो जाय । तब तक । गुरु के । पावन चरणार विन्द की । पूजा अर्चना करनी चाहिए । ऐसा करने वाले को ही । कैवल्य पद की । प्राप्ति होती है । इसके विपरीत । करने वाले को । नहीं होती । 61
अपि संपूर्णतत्त्वज्ञो गुरुत्यागी भवेद्ददा । भवेत्येव हि तस्यान्तकाले विक्षेपमुत्कटम ।
संपूर्ण । तत्वज्ञ भी । यदि गुरु का । त्याग कर दे । तो । मृत्यु के समय । उसे महान विक्षेप । अवश्य हो जाता है । 62
गुरौ सति स्वयं देवी परेषां तु कदाचन । उपदेशं न वै कुर्यात तदा चेद्राक्षसो भवेत ।
हे देवी ! गुरु के रहने पर । अपने आप । कभी किसी को । उपदेश नहीं देना चाहिए । इस प्रकार । उपदेश देने वाला । बृह्म राक्षस होता है । 63
न गुरुराश्रमे कुर्यात् दुष्पानं परिसर्पणम । दीक्षा व्याख्या प्रभुत्वादि गुरोराज्ञां न कारयेत ।
गुरु के आश्रम में । नशा नहीं करना चाहिए । टहलना नहीं चाहिए । दीक्षा देना । व्याख्यान करना । प्रभुत्व दिखाना । और गुरु को । आज्ञा करना । ये सब निषिद्ध हैं । 64
नोपाश्रमं च पर्यंकं न च पादप्रसारणम । नांगभोगादिकं कुर्यान्न लीलामपरामपि ।
गुरु के आश्रम में । अपना छप्पर । और पलंग । नहीं बनाना चाहिए ( गुरु के सम्मुख ) पैर नहीं पसारना । शरीर के भोग । नहीं भोगने चाहिए । और अन्य लीलाएँ । नहीं करनी चाहिए । 65
गुरुणां सदसद्वापि यदुक्तं तन्न लंघयेत । कुर्वन्नाज्ञां दिवारात्रौ दासवन्निवसेद गुरौ ।
गुरुओं की बात । सच्ची हो । या झूठी । परन्तु उसका । कभी उल्लंघन । नहीं करना चाहिए । रात और दिन । गुरु की । आज्ञा का पालन । करते हुए । उनके सान्निध्य में । दास बन कर । रहना चाहिए । 66
अदत्तं न गुरोर्द्रव्यमुपभुंजीत कहिर्चित । दत्तं च रंकवद ग्राह्यं प्राणोप्येतेन लभ्यते ।
जो दृव्य । गुरुदेव ने नहीं दिया हो । उसका उपयोग । कभी नहीं । करना चाहिए । गुरु के दिये हुए । दृव्य को भी । गरीब की तरह । गृहण करना चाहिए । उससे प्राण भी । प्राप्त हो सकते हैं । 67
पादुकासनशय्यादि गुरुणा यदभिष्टितम । नमस्कुर्वीत तत्सर्वं पादाभ्यां न स्पृशेत क्वचित ।
पादुका । आसन । बिस्तर आदि । जो कुछ भी । गुरु के । उपयोग में आते हों । उन सबको । नमस्कार करना चाहिए । और उनको । पैर से । कभी नहीं । छूना चाहिए । 68
गच्छतः पृष्ठतो गच्छेत गुरुच्छायां न लंघयेत । नोल्बणं धारयेद्वेषं नालंकारास्ततोल्बणान ।
चलते हुए । गुरु के । पीछे चलना चाहिए । उनकी परछाईं का भी । उल्लंघन । नहीं करना चाहिए । गुरु के समक्ष । कीमती वेशभूषा । आभूषण आदि । धारण नहीं करने चाहिए । 69
गुरुनिन्दाकरं दृष्टवा धावयेदथ वासयेत । स्थानं वा तत्परित्याज्यं जिह्वाच्छेदाक्षमो यदि ।
गुरु की । निन्दा करने वाले को । देखकर । यदि उसकी । जिह्वा काट डालने में । समर्थ न हो । तो उसे । अपने स्थान से । भगा देना चाहिए । यदि वह ठहरे । तो स्वयं । उस स्थान का । परित्याग । करना चाहिए । 70
मुनिभिः पन्नगैर्वापि सुरैवा शापितो यदि । कालमृत्युभयाद्वापि गुरुः संत्राति पार्वति ।
हे पार्वती ! मुनियों । पन्नगों । और देवताओं के । शाप से । तथा यथा काल । आये हुए । मृत्यु के भय से भी । शिष्य को । गुरु बचा सकते हैं । 71
विजानन्ति महावाक्यं गुरोश्चरणसेवया । ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः ।
गुरु के । चरणों की । सेवा करके । महा वाक्य के । अर्थ को । जो समझते हैं । वे ही । सच्चे संन्यासी हैं । अन्य तो । मात्र वेशधारी हैं । 72
नित्यं बृह्म निराकारं निर्गुणं बोधयेत परम । भासयन बृह्मभावं च दीपो दीपान्तरं यथा ।
गुरु वे हैं । जो नित्य । निर्गुण । निराकार । परम बृह्म । का बोध देते हुए । जैसे एक दीपक । दूसरे दीपक को । प्रज्ज्वलित करता है । वैसे ही । शिष्य में । बृह्म भाव को । प्रकट करते हैं । 73
गुरुप्रादतः स्वात्मन्यात्मारामनिरिक्षणात । समता मुक्तिमर्गेण स्वात्मज्ञानं प्रवर्तते ।
गुरु की । कृपा से । अपने भीतर ही । आत्मानंद । प्राप्त करके । समता । और मुक्ति के । मार्ग द्वारा । शिष्य । आत्म ज्ञान को । उपलब्ध होता है । 74
स्फ़टिके स्फ़ाटिकं रूपं दर्पणे दर्पणो यथा । तथात्मनि चिदाकारमानन्दं सोऽहमित्युत ।
जैसे । स्फ़टिक मणि में । स्फ़टिक मणि । तथा दर्पण में । दर्पण । दिख सकता है । उसी प्रकार । आत्मा में । जो चित । और आनंदमय । दिखाई देता है । वह मैं हूँ । 75
अंगुष्ठमात्रं पुरुषं ध्यायेच्च चिन्मयं हृदि । तत्र स्फ़ुरति यो भावः श्रुणु तत्कथयामि ते ।
हृदय में । अंगुष्ठ मात्र ( अंगूठा के बराबर )  परिणाम वाले । चैतन्य पुरुष का । ध्यान । करना चाहिए । वहाँ । जो भाव । स्फ़ुरित होता है । वह मैं तुम्हें कहता हूँ । सुनो । 76
अजोऽहममरोऽहं च ह्यनादिनिधनोह्यहम । अविकारश्चिदानन्दो ह्यणियान महतो महान ।
मैं अजन्मा हूँ । मैं अमर हूँ । मेरा आदि नहीं है । मेरी मृत्यु नहीं है । मैं निर्विकार हूँ । मैं चिदानन्द हूँ । मैं अणु से भी छोटा हूँ । और महान से भी महान हूँ । 77
अपूर्वमपरं नित्यं स्वयं ज्योतिर्निरामयम । विरजं परमाकाशं ध्रुवमानन्दमव्ययम ।
अगोचरं तथाऽगम्यं नामरूपविवर्जितम । निःशब्दं तु विजानीयात्स्वाभावाद बृह्म पार्वति ।
हे पार्वती ! बृह्म को । स्वभाव से ही । अपूर्व ( जिससे पूर्व कोई नहीं ऐसा ) अद्वितीय । नित्य । ज्योति स्वरूप । निरोग । निर्मल । परम आकाश स्वरूप । अचल । आनन्द स्वरूप । अविनाशी । अगम्य । अगोचर । नाम । रूप । से रहित । तथा निशब्द । जानना चाहिए । 78 । 79
यथा गन्धस्वभावत्वं कर्पूरकुसुमादिषु । शीतोष्णस्वभावत्वं तथा बृह्मणि शाश्वतम ।
जिस प्रकार । कपूर । फ़ूल । इत्यादि में । गन्धत्व ( अग्नि में ) उष्णता । और ( जल में ) शीतलता । स्वभाव से ही । होते हैं । उसी प्रकार । बृह्म में । शाश्वतता भी । स्वभाव सिद्ध है । 80
यथा निजस्वभावेन कुंडलकटकादयः । सुवर्णत्वेन तिष्ठन्ति तथाऽहं बृह्म शाश्वतम ।
जिस प्रकार । कटक । कुण्डल आदि । आभूषण । स्वभाव से ही । सुवर्ण हैं । उसी प्रकार । मैं स्वभाव से ही । शाश्वत बृह्म ही हूँ । 81
स्वयं तथाविधो भूत्वा स्थातव्यं यत्रकुत्रचित । कीटो भृंग इव ध्यानात यथा भवति तादृशः ।
स्वयं । वैसा होकर । किसी न किसी । स्थान में रहना । जैसे कीडा । भृंग का । चिन्तन करते करते । भृंग ही । हो जाता है । वैसे ही । जीव । बृह्म का । ध्यान करते करते । बृह्म स्वरूप ही । हो जाता है । 82
गुरोर्ध्यानेनैव नित्यं देही बृह्ममयो भवेत । स्थितश्च यत्रकुत्रापि मुक्तोऽसौ नात्र संशयः ।
सदा । गुरु का । ध्यान करने से । जीव । बृह्म मय हो जाता है । वह किसी भी । स्थान में । रहता हो । फ़िर भी । मुक्त ही है । इसमें । कोई संशय नहीं है । 83
ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं यशः श्री समुदाहृतम । षड्गुणैश्वर्ययुक्तो हि भगवान श्री गुरुः प्रिये ।
हे प्रिय ! भगवत स्वरूप । गुरु । ज्ञान । वैराग्य । ऐश्वर्य । यश । लक्ष्मी । और मधुर वाणी । ये 6 गुण । रूप ऐश्वर्य से । संपन्न होते हैं । 84
गुरुः शिवो गुरुर्देवो गुरुर्बन्धुः शरीरिणाम । गुरुरात्मा गुरुर्जीवो गुरोरन्यन्न विद्यते ।
मनुष्य के लिए । गुरु ही । शिव हैं । गुरु ही । देव हैं । गुरु ही । बांधव हैं । गुरु ही । आत्मा हैं । और गुरु ही । जीव हैं । ( सचमुच ) गुरु के सिवा । अन्य कुछ भी नहीं है । 85
एकाकी निस्पृहः शान्तः चिंतासूयादिवर्जितः । बाल्यभावेन यो भाति बृह्मज्ञानी स उच्यते ।
अकेला । कामना रहित । शांत । चिन्ता रहित । ईर्ष्या रहित । और बालक की तरह । जो शोभता है । वह बृह्म ज्ञानी कहलाता है । 86
न सुखं वेदशास्त्रेषु न सुखं मंत्रयंत्रके । गुरोः प्रसादादन्यत्र सुखं नास्ति महीतले ।
वेदों । और शास्त्रों में । सुख नहीं है । मंत्र और यंत्र में । सुख नहीं है । इस पृथ्वी पर । गुरु के कृपा प्रसाद के । सिवा अन्यत्र । कहीं भी । सुख नहीं है । 87
चावार्कवैष्णवमते सुखं प्रभाकरे न हि । गुरोः पादान्तिके यद्वत्सुखं वेदान्तसम्मतम ।
गुरु के चरणों में । जो वेदान्त निर्दिष्ट । सुख है । वह सुख । न चावार्क मत में । न वैष्णव मत में । और न प्रभाकर ( सांख्य ) मत में है । 88
न तत्सुखं सुरेन्द्रस्य न सुखं चक्रवर्तिनाम । यत्सुखं वीतरागस्य मुनेरेकान्तवासिनः ।
एकान्त वासी । वीत रागी । मुनि को । जो सुख मिलता है । वह सुख । न इन्द्र को । और न । चक्रवर्ती राजाओं को । मिलता है । 89
नित्यं बृह्मरसं पीत्वा तृप्तो यः परमात्मनि । इन्द्रं च मन्यते रंकं नृपाणां तत्र का कथा ।
हमेशा । बृह्म रस का । पान करके । जो । परमात्मा में । तृप्त हो गया है । वह ( मुनि ) इन्द्र को भी । गरीब मानता है । तो राजाओं की । तो बात ही क्या ? 90
यतः परमकैवल्यं गुरुमार्गेण वै भवेत । गुरुभक्तिरतिः कार्या सर्वदा मोक्षकांक्षिभिः ।
मोक्ष की । आकांक्षा करने वालों को । गुरु भक्ति । खूब करनी चाहिए । क्योंकि । गुरु के द्वारा ही । परम मोक्ष की प्राप्ति होती है । 91
एक एवाद्वितीयोऽहं गुरुवाक्येन निश्चितः । एवमभ्यास्ता नित्यं न सेव्यं वै वनान्तरम ।
अभ्यासान्निमिषणैव समाधिमधिगच्छति । आजन्मजनितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ।
गुरु के । वाक्य की । सहायता से । जिसने ऐसा । निश्चय । कर लिया है कि - मैं एक । और अद्वितीय हूँ । और । उसी अभ्यास में । जो रत है । उसके लिए । अन्य वनवास का । सेवन आवश्यक नहीं है । क्योंकि । अभ्यास से ही । एक क्षण में । समाधि लग जाती है । और उसी क्षण । इस जन्म तक के । सब पाप । नष्ट हो जाते हैं । 92 । 93
गुरुर्विष्णुः सत्त्वमयो राजसश्चतुराननः । तामसो रूद्ररूपेण सृजत्यवति हन्ति च ।
गुरु ही । सत्व गुणी होकर । विष्णु रूप से । जगत का । पालन करते हैं । रजो गुणी होकर । बृह्मा रूप से । जगत का । सृजन करते हैं । और तमो गुणी होकर । शंकर रूप से । जगत का । संहार करते हैं । 94
तस्यावलोकनं प्राप्य सर्वसंगविवर्जितः । एकाकी निःस्पृहः शान्तः स्थातव्यं तत्प्रसादतः ।
उनका ( गुरु का ) दर्शन पाकर । उनके । कृपा प्रसाद से । सब प्रकार की । आसक्ति छोड़कर । एकाकी । निःस्पृह । और शान्त होकर । रहना चाहिए । 95
सर्वज्ञपदमित्याहुर्देही सर्वमयो भुवि । सदाऽनन्दः सदा शान्तो रमते यत्र कुत्रचित ।
जो जीव । इस जगत में । सर्वमय । आनंदमय । और शान्त होकर । सर्वत्र । विचरता है । उस जीव को । सर्वज्ञ कहते हैं । 96
यत्रैव तिष्ठते सोऽपि स देशः पुण्यभाजनः । मुक्तस्य लक्षणं देवी तवाग्रे कथितं मया ।
 ऐसा पुरुष । जहाँ रहता है । वह स्थान । पुण्य तीर्थ है । हे देवी ! तुम्हारे सामने । मैंने । मुक्त पुरूष का । लक्षण कहा । 97
यद्यप्यधीता निगमाः षडंगा आगमाः प्रिये । आध्यामादिनि शास्त्राणि ज्ञानं नास्ति गुरुं विना ।
हे प्रिय ! मनुष्य चाहे । चारों वेद । पढ़ ले । वेद के । छह अंग पढ़ ले । आध्यात्म शास्त्र आदि । अन्य सब । शास्त्र पढ़ ले । फ़िर भी । गुरु के बिना । ज्ञान नहीं मिलता । 98
शिवपूजारतो वापि विष्णुपूजारतोऽथवा । गुरुतत्वविहीनश्चेत्तत्सर्वं व्यर्थमेव हि ।
शिव की । पूजा में । रत हो । या । विष्णु की । पूजा में । रत हो । परन्तु गुरु तत्व के । ज्ञान से । रहित हो । तो वह । सब व्यर्थ है । 99
सर्वं स्यात्सफलं कर्म गुरुदीक्षाप्रभावतः । गुरुलाभात्सर्वलाभो गुरुहीनस्तु बालिशः ।
गुरु की । दीक्षा के । प्रभाव से । सब कर्म । सफल होते हैं । गुरु की । संप्राप्ति रूपी । परम लाभ से । अन्य सब । लाभ मिलते हैं । जिसका गुरु नहीं । वह मूर्ख है । 100
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सर्वसंगविवर्जितः । विहाय शास्त्रजालानि गुरुमेव समाश्रयेत ।
इसलिए । सब प्रकार के । प्रयत्न से । अनासक्त होकर । शास्त्र की । माया जाल छोड़कर । गुरु की ही । शरण लेनी चाहिए । 101
ज्ञानहीनो गुरुत्याज्यो मिथ्यावादी विडंबकः । स्वविश्रान्ति न जानाति परशान्तिं करोति किम ।
ज्ञान रहित । मिथ्या बोलने वाले । और दिखावट करने वाले । गुरु का । त्याग । कर देना चाहिए । क्योंकि जो । अपनी ही । शांति । पाना नहीं जानता । वह दूसरों को । क्या शांति दे सकेगा ? 102
शिलायाः किं परं ज्ञानं शिलासंघप्रतारणे । स्वयं तर्तुं न जानाति परं निसतारेयेत्कथम ।
पत्थरों के । समूह को । तैराने का ज्ञान । पत्थर में । कहाँ से । हो सकता है ? जो खुद । तैरना । नहीं जानता । वह दूसरों को । क्या तैरायेगा । 103
न वन्दनीयास्ते कष्टं दर्शनाद भ्रान्तिकारकः । वर्जयेतान गुरुन दूरे धीरानेव समाश्रयेत ।
जो गुरु । अपने दर्शन से ( दिखावे से ) शिष्य को । भ्रान्ति में । ड़ालता है । ऐसे गुरु को । प्रणाम । नहीं करना चाहिए । इतना ही नहीं । दूर से ही । उसका । त्याग करना चाहिए । ऐसी स्थिति में । धैर्यवान । गुरु का ही । आश्रय लेना चाहिए । 104
पाखण्डिनः पापरता नास्तिका भेदबुद्धयः । स्त्रीलम्पटा दुराचाराः कृतघ्ना बकवृतयः ।
कर्मभृष्टाः क्षमानष्टाः निन्द्यतर्कैश्च वादिनः । कामिनः क्रोधिनश्चैव हिंस्राश्चंड़ाः शठस्तथा ।
ज्ञानलुप्ता न कर्तव्या महापापास्तथा प्रिये । एभ्यो भिन्नो गुरुः सेव्य एकभक्त्या विचार्य च ।
भेद बुद्धि । उत्पन्न करने वाले । स्त्री लम्पट । दुराचारी । नमक हराम । बगुले की तरह ठगने वाले । क्षमा रहित । निन्दनीय । तर्कों से वितंडा वाद करने वाले । कामी । क्रोधी । हिंसक । उग्र । शठ । तथा अज्ञानी । और महा पापी । पुरुष को । गुरु । नहीं करना चाहिए । ऐसा विचार करके । ऊपर दिये । लक्षणों से भिन्न । लक्षणों वाले । गुरु की । एक निष्ठ भक्ति से । सेवा करनी चाहिए । 105 । 106 । 107
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं धर्मसारं मयोदितम । गुरुगीता समं स्तोत्रं नास्ति तत्वं गुरोः परम ।
गुरु गीता के । समान । अन्य कोई । स्तोत्र नहीं है । गुरु के समान । अन्य । कोई तत्व नहीं है । समग्र धर्म का । यह सार । मैंने कहा है । यह सत्य है । सत्य है । और बार बार सत्य है । 108
अनेन यद भवेद् कार्यं तद्वदामि तव प्रिये । लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु विवर्जयेत ।
हे प्रिय ! इस गुरु गीता का । पाठ करने से । जो कार्य । सिद्ध होता है । अब वह । कहता हूँ । हे देवी ! लोगों के लिए । यह उपकारक है । मात्र लौकिक का । त्याग करना चाहिए । 109
लौकिकाद्धर्मतो याति ज्ञानहीनो भवार्णवे । ज्ञानभावे च यत्सर्वं कर्म निष्कर्म शाम्यति ।
जो कोई । इसका उपयोग । लौकिक कार्य के लिए । करेगा । वह ज्ञान हीन होकर । संसार रूपी सागर में । गिरेगा । ज्ञान भाव से । जिस कर्म में । इसका उपयोग । किया जाएगा । वह कर्म । निष्कर्म में । परिणत होकर । शांत हो जाएगा । 110
इमां तु भक्तिभावेन पठेद्वै शृणुयादपि । लिखित्वा यत्प्रसादेन तत्सर्वं फलमश्नुते ।
भक्ति भाव से । इस गुरु गीता का । पाठ करने से । सुनने से । और लिखने से । वह ( भक्त ) सब फल भोगता है । 111
गुरुगीतामिमां देवि हृदि नित्यं विभावय । महाव्याधिगतैदुःखैः सर्वदा प्रजपेन्मुदा ।
हे देवी ! इस गुरु गीता को । नित्य । भाव पूर्वक । हृदय में । धारण करो । महा व्याधि वाले । दुखी लोगों को । सदा आनंद से । इसका । जप करना चाहिए । 112
गुरुगीताक्षरैकैकं मंत्रराजमिदं प्रिये । अन्ये च विविधा मंत्राः कलां नार्हन्ति षोडशीम ।
हे प्रिय ! गुरु गीता का । एक एक अक्षर । मंत्र राज है । अन्य जो । विविध मंत्र हैं । वे इसका सोलहवाँ भाग भी नहीं । 113
अनन्तफलमाप्नोति गुरुगीताजपेन तु । सर्वपापहरा देवि सर्वदारिद्रयनाशिनी ।
हे देवी ! गुरु गीता के जप से । अनंत फल । मिलता है । गुरु गीता । सब पापों को । हरने वाली । और सब । दारिद्रय का । नाश करने वाली है । 114
अकालमृत्युहंत्री च सर्वसंकटनाशिनी । यक्षराक्षसभूतादिचोरव्याघ्रविघातिनी ।
गुरु गीता । अकाल मृत्यु को । रोकती है । सब संकटों का । नाश करती है । यक्ष । राक्षस । भूत । चोर । और बाघ आदि का । घात करती है । 115
सर्वोपदृवकुष्ठदिदुष्टदोषनिवारिणी । यत्फलं गुरुसान्निध्यात्तत्फलं पठनाद भवेत ।
गुरु गीता । सब प्रकार के । उपद्रवों । कुष्ठ । और दुष्ट । रोगों । और दोषों का । निवारण । करने वाली है । गुरु के । सान्निध्य से । जो फल । मिलता है । वह फल । इस गुरु गीता का । पाठ करने से मिलता है । 116
महाव्याधिहरा सर्वविभूतेः सिद्धिदा भवेत । अथवा मोहने वश्ये स्वयमेव जपेत्सदा ।
इस गुरु गीता का । पाठ करने से । महा व्याधि । दूर होती है । सब ऐश्वर्य । और सिद्धियों की । प्राप्ति होती है । मोहन में । अथवा वशीकरण में । इसका पाठ । स्वयं ही । करना चाहिए । 117
मोहनं सर्वभूतानां बन्धमोक्षकरं परम । देवराज्ञां प्रियकरं राजानं वश्मानयेत ।
इस गुरु गीता का । पाठ करने वाले पर । सब प्राणी । मोहित हो जाते हैं । बन्धन में से । परम मुक्ति । मिलती है । देवराज इन्द्र को । वह प्रिय होता है । और राजा । उसके वश होता है । 118
मुखस्तम्भकरं चैव गुणाणां च विवर्धनम । दुष्कर्मनाश्नं चैव तथा सत्कर्मसिद्धिदम ।
इस गुरु गीता का । पाठ । शत्रु का । मुख । बन्द करने वाला है । गुणों की । वृद्धि । करने वाला है । दुष्कृत्यों का । नाश करने वाला । और सतकर्म में । सिद्धि देने वाला है । 119
असिद्धं साधयेत्कार्यं नवग्रहभयापहम । दुःस्वप्ननाशनं चैव सुस्वप्नफलदायकम ।
इसका पाठ । असाध्य कार्यों की । सिद्धि कराता है । नव ग्रहों का । भय हरता है । दुस्वपन का । नाश करता है । और सुस्वपन के । फल की प्राप्ति कराता है । 120
मोहशान्तिकरं चैव बन्धमोक्षकरं परम । स्वरूपज्ञाननिलयं गीतशास्त्रमिदं शिवे ।
हे शिवे ! यह गुरु गीता रूपी । शास्त्र । मोह को । शान्त करने वाला । बन्धन में से । परम मुक्त । करने वाला । और स्वरूप ज्ञान का । भण्डार है । 121
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चयम । नित्यं सौभाग्यदं पुण्यं तापत्रयकुलापहम ।
व्यक्ति । जो जो । अभिलाषा करके । इस गुरु गीता का । पठन चिन्तन । करता है । उसे वह । निश्चय ही । प्राप्त होता है । यह गुरु गीता । नित्य सौभाग्य । और पुण्य । प्रदान करने वाली । तथा तीनों तापों ( आधि । व्याधि । उपाधि ) का । शमन करने वाली है । 122
सर्वशान्तिकरं नित्यं तथा वन्ध्यासुपुत्रदम । अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यस्य विवर्धनम ।
यह गुरु गीता । सब प्रकार की । शांति करने वाली । वंध्या स्त्री को । सुपुत्र देने वाली । सधवा स्त्री के । वैध्व्य का । निवारण । करने वाली । और सौभाग्य की । वृद्धि करने वाली है । 123
आयुरारोग्मैश्वर्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम । निष्कामजापी विधवा पठेन्मोक्षमवाप्नुयात ।
यह गुरु गीता । आयुष्य । आरोग्य । ऐश्वर्य । और पुत्र । पौत्र की । वृद्धि करने वाली है । कोई विधवा । निष्काम भाव से । इसका जप । पाठ करे । तो मोक्ष की प्राप्ति होती है । 124
अवैधव्यं सकामा तु लभते चान्यजन्मनि । सर्वदुःखभयं विघ्नं नाश्येत्तापहारकम ।
यदि वह ( विधवा ) सकाम होकर । जप करे । तो अगले जन्म में । उसको संताप हरने वाला । अवैधव्य ( सौभाग्य ) प्राप्त होता है । उसके सब । दुख । भय । विघ्न । और संताप का । नाश होता है । 125
सर्वपापप्रशमनं धर्मकामार्थमोक्षदम । यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम ।
इस गुरु गीता का । पाठ । सब पापों का । शमन करता है । धर्म । अर्थ । और मोक्ष की । प्राप्ति कराता है । इसके पाठ से । जो जो । आकांक्षा की जाती है । वह अवश्य । सिद्ध होती है । 126
लिखित्वा पूजयेद्यस्तु मोक्षश्रियम्वाप्नुयात । गुरूभक्तिर्विशेषेण जायते हृदि सर्वदा ।
यदि कोई । इस गुरु गीता को लिखकर । उसकी पूजा करे । तो उसे । लक्ष्मी । और मोक्ष की । प्राप्ति होती है । और विशेष कर । उसके हृदय में । सर्वदा । गुरु भक्ति । उत्पन्न होती रहती है । 127
जपन्ति शाक्ताः सौराश्च गाणपत्याश्च वैष्णवाः । शैवाः पाशुपताः सर्वे सत्यं सत्यं न संशयः ।
शक्ति के । सूर्य के । गणपति के । शिव के । और पशुपति के । मतवादी । इसका ( गुरु गीता का ) पाठ करते हैं । यह सत्य है । सत्य है । इसमें कोई । संदेह नहीं है । 128
जपं हीनासनं कुर्वन् हीनकर्माफलप्रदम । गुरुगीतां प्रयाणे वा संग्रामे रिपुसंकटे ।
जपन् जयमवाप्नोति मरणे मुक्तिदायिका । सर्वकमाणि सिद्धयन्ति गुरुपुत्रे न संशयः ।
बिना आसन किया हुआ । जप । नीच कर्म । हो जाता है । और निष्फल । हो जाता है । यात्रा में । युद्ध में । शत्रुओं के उपद्रव में । गुरु गीता का । जप । पाठ करने से । विजय मिलता है । मरण काल में । जप करने से । मोक्ष मिलता है । गुरु पुत्र के ( शिष्य के ) सब कार्य । सिद्ध होते हैं । इसमें संदेह नहीं है । 129 । 130
गुरुमंत्रो मुखे यस्य तस्य सिद्धयन्ति नान्यथा । दीक्षया सर्वकर्माणि सिद्धयन्ति गुरुपुत्रके ।
जिसके मुख में । गुरु मंत्र है । उसके सब कार्य । सिद्ध होते हैं । दूसरे के नहीं । दीक्षा के कारण । शिष्य के सब कार्य । सिद्ध हो जाते हैं । 131
भवमूलविनाशाय चाष्टपाशनिवृतये । गुरुगीताम्भसि स्नानं तत्वज्ञ कुरुते सदा ।
सर्वशुद्धः पवित्रोऽसौ स्वभावाद्यत्र तिष्ठति । तत्र देवगणाः सर्वे क्षेत्रपीठे चरन्ति च ।
तत्वज्ञ पुरूष । संसा रूपी । वृक्ष की जड़ । नष्ट करने के लिए । और आठों प्रकार के बन्धन ( संशय । दया । भय । संकोच । निन्दा । प्रतिष्ठा । कुल अभिमान । और संपत्ति ) की निवृति करने के लिए । गुरु गीता रूपी । गंगा में । सदा स्नान करते रहते हैं । स्वभाव से ही । सर्वथा शुद्ध । और पवित्र । ऐसे वे महापुरूष । जहाँ रहते हैं । उस तीर्थ में । देवता विचरण करते हैं । 132 । 133
आसनस्था शयाना वा गच्छन्तष्तिष्ठन्तोऽपि वा । अश्वरूढ़ा गजारूढ़ा सुषुप्ता जाग्रतोऽपि वा ।
शुचिभूता ज्ञानवन्तो गुरुगीतां जपन्ति ये । तेषां दर्शनसंस्पर्शात पुनर्जन्म न विद्यते ।
आसन पर । बैठे हुए । या लेटे हुए । खड़े रहते । या चलते हुए । हाथी या घोड़े पर सवार । जागृत अवस्था में । या सुषुप्त अवस्था में । जो पवित्र ज्ञानवान पुरूष । इस गुरु गीता का । जप । पाठ करते हैं । उनके दर्शन और स्पर्श से । पुनर्जन्म नहीं होता । 134 । 135
कुशदुर्वासने देवि ह्यासने शुभ्रकम्बले । उपविश्य ततो देवि जपेदेकाग्रमानसः ।
हे देवी ! कुश और दुर्वा के आसन पर । सफ़ेद कम्बल बिछाकर । उसके ऊपर बैठकर । एकाग्र मन से । इसका ( गुरु गीता का ) जप करना चाहिए । 136
शुक्लं सर्वत्र वै प्रोक्तं वश्ये रक्तासनं प्रिये । पदमासने जपेन्नित्यं शान्तिवश्यकरं परम ।
सामान्यतया सफ़ेद आसन । उचित है । परंतु वशीकरण में । लाल आसन आवश्यक है । हे प्रिये ! शांति प्राप्ति के लिए । या वशीकरण में । नित्य पदमासन में । बैठकर जप करना चाहिए । 137
वस्त्रासने च दारिद्रयं पाषाणे रोगसंभवः । मेदिन्यां दुःखमाप्नोति काष्ठे भवति निष्फलम ।
कपड़े के आसन पर बैठकर । जप करने से - दारिद्रय आता है । पत्थर के आसन पर - रोग । भूमि पर बैठकर जप करने से - दुख आता है । और लकड़ी के आसन पर । किये हुए जप । निष्फल होते हैं । 138
कृष्णाजिने ज्ञानसिद्धिः मोक्षश्री व्याघ्रचर्मणि । कुशासने ज्ञानसिद्धिः सर्वसिद्धिस्तु कम्बले ।
काले मृग चर्म । और दर्भासन पर बैठकर । जप करने से । ज्ञान सिद्धि होती है । व्याघ्र चर्म पर जप करने से । मुक्ति प्राप्त होती है । परन्तु कम्बल के आसन पर । सर्व सिद्धि प्राप्त होती है । 139
आग्नेय्यां कर्षणं चैव वयव्यां शत्रुनाशनम । नैरॄत्यां दर्शनं चैव ईशान्यां ज्ञानमेव च ।
अग्नि कोण की तरफ । मुख करके । जप । पाठ । करने से - आकर्षण । वायव्य कोण की तरफ़ - शत्रुओं का नाश । नैऋत्य कोण की तरफ - दर्शन । और । ईशान कोण की तरफ । मुख करके । जप । पाठ । करने से ज्ञान की प्रप्ति है । 140
उदंमुखः शान्तिजाप्ये वश्ये पूर्वमुखतथा । याम्ये तु मारणं प्रोक्तं पश्चिमे च धनागमः ।
उत्तर दिशा की ओर । मुख करके । पाठ करने से - शांति । पूर्व दिशा की ओर - वशीकरण । दक्षिण दिशा की ओर - मारण । सिद्ध होता है । तथा । पश्चिम दिशा की ओर । मुख करके । जप । पाठ । करने से । धन प्राप्ति । होती है । 141
इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमामहेश्वरसंवादे श्री गुरुगीतायां द्वितीयोऽध्यायः

बृह्म निष्ठ महात्मा तीनों लोकों मे समान भाव से गति करते हैं

अथ काम्यजपस्थानं कथयामि वरानने । सागरान्ते सरित्तीरे तीर्थे हरिहरालये ।
शक्तिदेवालये गोष्ठे सर्वदेवालये शुभे । वटस्य धात्र्या मूले व मठे वृन्दावने तथा ।
पवित्रे निर्मले देशे नित्यानुष्ठानोऽपि वा । निर्वेदनेन मौनेन जपमेतत् समारभेत ।
हे सुमुखी ! अब सकामियों के लिए । जप करने के । स्थानों का । वर्णन करता हूँ । सागर । या नदी के तट पर । तीर्थ में । शिवालय में । विष्णु के । या देवी के । मंदिर में । गौशाला में । सभी शुभ देवालयों में । वट वृक्ष के । या आँवले के । वृक्ष के नीचे । मठ में । तुलसी वन में । पवित्र निर्मल स्थान में । नित्य अनुष्ठान के रूप में । अनासक्त रहकर । मौन पूर्वक इसके जप का आरंभ करना चाहिए ।
जाप्येन जयमाप्नोति जप सिद्धिं फलं तथा । हीनकर्म त्यजेत्सर्वं गर्हितस्थानमेव च ।
जप से जय प्राप्त होता है । तथा जप की सिद्धि रूप फल मिलता है । जपानुष्ठान के काल में सब नीच कर्म और निन्दित स्थान का त्याग करना चाहिए । 145
शमशाने बिल्वमूले वा वटमूलान्तिके तथा । सिद्धयन्ति कानके मूले चूतवृक्षस्य सन्निधौ ।
शमशान में । बिल्व । वट वृक्ष । या कनक वृक्ष के नीचे । और आम वृक्ष के पास । जप करने से से सिद्धि जल्दी होती है । 146
आकल्पजन्मकोटीनां यज्ञव्रततपः क्रियाः । ताः सर्वाः सफला देवि गुरुसंतोषमात्रतः ।
हे देवी ! कल्प पर्यन्त के । करोंड़ो जन्मों के यज्ञ । वृत । तप और शास्त्रोक्त क्रियाएँ । ये सब गुरु के संतोष मात्र से सफल हो जाते हैं । 147
मंदभाग्या ह्यशक्ताश्च ये जना नानुमन्वते । गुरुसेवासु विमुखाः पच्यन्ते नरकेऽशुचौ ।
भाग्य हीन । शक्ति हीन । और गुरु सेवा से विमुख । जो लोग इस उपदेश को नहीं मानते । वे घोर नरक में पड़ते हैं । 148
विद्या धनं बलं चैव तेषां भाग्यं निरर्थकम । येषां गुरुकृपा नास्ति अधो गच्छन्ति पार्वति ।
जिसके ऊपर गुरु की कृपा नहीं है । उसकी विद्या । धन । बल । और भाग्य । निरर्थक है । हे पार्वती ! उसका अधः पतन होता है । 149
धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोदभवः । धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद गुरुभक्तता ।
जिसके अंदर गुरु भक्ति हो । उसकी माता धन्य है । उसका पिता धन्य है । उसका वंश धन्य है । उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं । समग्र धरती धन्य है । 150
शरीरमिन्द्रियं प्राणच्चार्थः स्वजनबन्धुतां । मातृकुलं पितृकुलं गुरुरेव न संशयः ।
शरीर । इन्द्रियाँ । प्राण । धन । स्व जन । बन्धु बान्धव । माता का कुल । पिता का कुल । ये सब गुरु ही हैं । इसमें संशय नहीं है । 151
गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरौ निष्ठा परं तपः । गुरोः परतरं नास्ति त्रिवारं कथयामि ते ।
गुरु ही देव हैं । गुरु ही धर्म हैं । गुरु में निष्ठा ही परम तप है । गुरु से अधिक और कुछ नहीं है । यह मैं तीन बार कहता हूँ । 152
समुद्रे वै यथा तोयं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम । भिन्ने कुंभे यथाऽकाशं तथाऽत्मा परमात्मनि ।
जिस प्रकार सागर में पानी । दूध में दूध । घी में घी । अलग अलग घटों में आकाश । एक और अभिन्न है । उसी प्रकार परमात्मा में जीवात्मा एक और अभिन्न है । 153
तथैव ज्ञानवान जीव परमात्मनि सर्वदा । ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र कुत्र दिवानिशम ।
इसी प्रकार ज्ञानी सदा परमात्मा के साथ । अभिन्न होकर । रात दिन । आनंद विभोर होकर । सर्वत्र विचरते हैं । 154
गुरुसन्तोषणादेव मुक्तो भवति पार्वति । अणिमादिषु भोक्तृत्वं कृपया देवि जायते ।
हे पार्वती ! गुरु को संतुष्ट करने से । शिष्य मुक्त हो जाता है । हे देवी ! गुरु की कृपा से वह अणिमादि सिद्धियों का भोग प्राप्त करता है । 155
साम्येन रमते ज्ञानी दिवा वा यदि वा निशि । एवं विधौ महामौनी त्रैलोक्यसमतां वृजेत ।
ज्ञानी दिन में । या रात में । सदा सर्वदा । समत्व में रमण करते हैं । इस प्रकार के । महा मौनी । अर्थात बृह्म निष्ठ महात्मा । तीनों लोकों मे समान भाव से गति करते हैं । 156
गुरुभावः परं तीर्थमन्यतीर्थं निरर्थकम । सर्वतीर्थमयं देवि श्रीगुरोश्चरणाम्बुजम ।
गुरु भक्ति ही । सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है । अन्य तीर्थ । निरर्थक हैं । हे देवी ! गुरु के चरण कमल सर्व तीर्थ मय हैं । 157
कन्याभोगरतामन्दाः स्वकान्तायाः पराड्मुखाः । अतः परं मया देवि कथितन्न मम प्रिये ।
हे देवी ! कन्या के भोग में रत । स्व स्त्री से विमुख ( पर स्त्री गामी ) ऐसे बुद्धि शून्य लोगों को । मेरा यह आत्म प्रिय परम बोध मैंने नहीं कहा । 158
अभक्ते वंचके धूर्ते पाखंडे नास्तिकादिषु । मनसाऽपि न वक्तव्या गुरुगीता कदाचन ।
अभक्त । कपटी । धूर्त । पाखण्डी । नास्तिक इत्यादि को । यह गुरु गीता । कहने का मन में सोचना तक नहीं । 159
गुरवो बहवः सन्ति शिष्यवित्तापहारकाः । तमेकं दुर्लभं मन्ये शिष्यह्यत्तापहारकम ।
शिष्य के धन को । अपहरण करने वाले । गुरु तो बहुत हैं । लेकिन शिष्य के । हृदय का । संताप । हरने वाला । एक गुरु भी दुर्लभ है । ऐसा मैं मानता हूँ । 160
चातुर्यवान्विवेकी च अध्यात्मज्ञानवान् शुचिः । मानसं निर्मलं यस्य गुरुत्वं तस्य शोभते ।
जो चतुर हो । विवेकी हो । अध्यात्म के ज्ञाता हो । पवित्र हो । तथा निर्मल मान सवाले हो ।उनमें गुरुत्व शोभा पाता है । 161
गुरवो निर्मलाः शान्ताः साधवो मितभाषिणः । कामक्रोधविनिर्मुक्ताः सदाचारा जितेन्द्रियाः ।
गुरु निर्मल । शांत । साधु स्वभाव के । मित भाषी । काम क्रोध से अत्यंत रहित । सदाचारी और जितेन्द्रिय होते हैं । 162
सूचकादि प्रभेदेन गुरवो बहुधा स्मृताः । स्वयं समयक परीक्ष्याथ तत्वनिष्ठं भजेत्सुधीः ।
सूचक आदि भेद से । अनेक गुरु कहे गये हैं । बुद्धिमान मनुष्य को । स्वयं योग्य विचार करके । तत्व निष्ठ । गुरु की शरण लेनी चाहिए । 163
वर्णजालमिदं तद्वद्बाह्यशास्त्रं तु लौकिकम । यस्मिन देवि समभ्यस्तं स गुरुः सूचकः स्मृतः ।
हे देवी ! वर्ण । और अक्षरों से । सिद्ध करने वाले । बाह्य । लौकिक शास्त्रों का । जिसको अभ्यास हो । वह गुरु सूचक गुरु कहलाता है । 164
वर्णाश्रमोचितां विद्यां धर्माधर्मविधायिनीम । प्रवक्तारं गुरुं विद्धि वाचकस्त्वति पार्वति ।
हे पार्वती ! धर्म अधर्म का । विधान करने वाली । वर्ण । और आश्रम के । अनुसार । विद्या का । प्रवचन करने वाले । गुरु को । तुम वाचक गुरु जानो । 165
पंचाक्षर्यादिमंत्राणामुपदेष्टा त पार्वति । स गुरुर्बोधको भूयादुभयोरमुत्तमः ।
पंचाक्षरी । आदि मंत्रों का । उपदेश देने वाले । गुरु । बोधक गुरु । कहलाते हैं । हे पार्वती ! प्रथम दो प्रकार के गुरुओं से यह गुरु उत्तम हैं । 166
मोहमारणवश्यादितुच्छमंत्रोपदर्शिनम । निषिद्धगुरुरित्याहुः पण्डितस्तत्वदर्शिनः ।
मोहन । मारण । वशीकरण । आदि तुच्छ मंत्रों को । बताने वाले । गुरु को । तत्व दर्शी पंडित । निषिद्ध गुरु कहते हैं । 167
अनित्यमिति निर्दिश्य संसारे संकटालयम । वैराग्यपथदर्शी यः स गुरुर्विहितः प्रिये ।
हे प्रिये ! संसार । अनित्य । और दुखों का । घर है । ऐसा समझा कर । जो गुरु । वैराग्य का । मार्ग बताते हैं । वे । विहित गुरु । कहलाते हैं । 168
तत्वमस्यादिवाक्यानामुपदेष्टा तु पार्वति । कारणाख्यो गुरुः प्रोक्तो भवरोगनिवारकः ।
हे पार्वती ! तत्वमसि । आदि । महा वाक्यों का । उपदेश देने वाले । तथा संसार रूपी । रोगों का । निवारण करने वाले । गुरु कारणाख्य गुरु । कहलाते हैं । 169
सर्वसन्देहसन्दोहनिर्मूलनविचक्षणः । जन्ममृत्युभयघ्नो यः स गुरुः परमो मतः ।
सभी प्रकार के । सन्देहों का । जड़ से नाश करने में । जो चतुर हैं । जन्म । मृत्यु । तथा भय का । जो विनाश करते हैं । वे परम गुरु कहलाते हैं । 170
बहुजन्मकृतात पुण्याल्लभ्यतेऽसौ महागुरुः । लब्ध्वाऽमुं न पुनर्याति शिष्यः संसारबन्धनम ।
अनेक जन्मों के । किये हुए पुण्यों से । ऐसे । महा गुरु । प्राप्त होते हैं । उनको प्राप्त कर । शिष्य । पुनः संसार बन्धन में । नहीं बँधता । अर्थात । मुक्त हो जाता है । 171
एवं बहुविधालोके गुरवः सन्ति पार्वति । तेषु सर्वप्रत्नेन सेव्यो हि परमो गुरुः ।
हे पार्वती ! इस प्रकार । संसार में । अनेक प्रकार के । गुरु होते हैं । इन सबमें । एक परम गुरु का ही । सेवन । सर्व प्रयत्नों से करना चाहिए । 172
स्वयं मूढा मृत्युभीताः सुकृताद्विरतिं गताः । दैवन्निषिद्धगुरुगा यदि तेषां तु का गतिः ।
पार्वती बोली - प्रकृति से ही मूढ । मृत्यु से भयभीत । सतकर्म से विमुख । लोग यदि । दैवयोग से । निषिद्ध गुरु का । सेवन करें । तो उनकी क्या गति होती है ? 173
निषिद्धगुरुशिष्यस्तु दुष्टसंकल्पदूषितः । बृह्मप्रलयपर्यन्तं न पुनर्याति मृत्यताम ।
महादेव बोले - निषिद्ध गुरु का । शिष्य । दुष्ट संकल्पों से । दूषित होने के कारण । बृह्म प्रलय तक । मनुष्य नहीं होता । पशु योनि में रहता है । 174
श्रृणु तत्वमिदं देवि यदा स्याद्विरतो नरः । तदाऽसावधिकारीति प्रोच्यते श्रुतमस्तकैः ।
हे देवी ! इस तत्व को । ध्यान से सुनो । मनुष्य जब । विरक्त होता है । तभी वह । अधिकारी कहलाता है । ऐसा । उपनिषद कहते हैं । अर्थात । दैव योग से । गुरु प्राप्त होने की । बात अलग है । और विचार से । गुरु चुनने की । बात अलग है । 175
अखण्डैकरसं बृह्म नित्यमुक्तं निरामयम । स्वस्मिन संदर्शितं येन स भवेदस्य देशिकः ।
अखण्ड । एक रस । नित्य मुक्त । और निरामय बृह्म । जो अपने अंदर ही । दिखाते हैं । वे ही गुरु होने चाहिए । 176
जलानां सागरो राजा यथा भवति पार्वति । गुरुणां तत्र सर्वेषां राजायं परमो गुरुः ।
हे पार्वती ! जिस प्रकार । जलाशयों में । सागर राजा है । उसी प्रकार । सब गुरुओं में । ये परम गुरु । राजा हैं । 177
मोहादिरहितः शान्तो नित्यतृप्तो निराश्रयः । तृणीकृतबृह्मविष्णुवैभवः परमो गुरुः ।
मोह आदि । दोषों से रहित । शांत । नित्य । तृप्त । किसी के । आश्रय रहित । अर्थात स्वाश्रयी । बृह्मा । और विष्णु के । वैभव को भी । तृण वत ( तिनका समान तुच्छ ) । समझने वाले । गुरु ही परम गुरु हैं । 178
सर्वकालविदेशेषु स्वतंत्रो निश्चलस्सुखी । अखण्डैकरसास्वादतृप्तो हि परमो गुरुः ।
सर्व काल । और देश में । स्वतंत्र । निश्चल । सुखी । अखण्ड । एक रस के । आनन्द से तृप्त । ही सचमुच परम गुरु हैं । 179
द्वैताद्वैतविनिर्मुक्तः स्वानुभूतिप्रकाशवान । अज्ञानान्धमश्छेत्ता सर्वज्ञ परमो गुरुः ।
द्वैत । और अद्वैत से मुक्त । अपने अनुभुव रूप । प्रकाश वाले । अज्ञान रूपी । अंधकार को । छेदने वाले । और सर्वज्ञ ही । परम गुरु हैं  । 180
यस्य दर्शनमात्रेण मनसः स्यात प्रसन्नता । स्वयं भूयात धृतिश्शान्तिः स भवेत परमो गुरुः ।
जिनके । दर्शन मात्र से । मन प्रसन्न होता है । अपने आप । धैर्य और शांति । आ जाती है । वे परम गुरु हैं । 181
स्वशरीरं शवं पश्यन् तथा स्वात्मानमद्वयम । यः स्त्रीकनकमोहघ्नः स भवेत परमो गुरुः ।
जो । अपने शरीर को । शव समान । समझते हैं । अपने आत्मा को । अद्वय । जानते हैं । जो कामिनी । और कंचन के । मोह का । नाश कर्ता हैं । वे परम गुरु हैं । 182
मौनी वाग्मीति तत्वज्ञो द्विधाभूच्छृणु पार्वति । न कश्चिन्मौनिना लाभो लोकेऽस्मिन्भवति प्रिये ।
वाग्मी तूत्कटसंसारसागरोत्तारणक्षमः । यतोऽसौ संशयच्छेत्ता शास्त्रयुक्त्यनुभूतिभिः
हे पार्वती ! सुनो । तत्वज्ञ । दो प्रकार के । होते हैं । मौनी और वक्ता । इन दोंनों में से । मौनी गुरु द्वारा । लोगों को । कोई लाभ नहीं होता । परन्तु वक्ता गुरु । भयंकर संसार सागर को । पार कराने में । समर्थ होते हैं । क्योंकि शास्त्र । युक्ति ( तर्क ) और अनुभूति से । वे सभी संशयों का । छेदन करते हैं । 183 । 184
गुरुनामजपाद्येवि बहुजन्मार्जितान्यपि । पापानि विलयं यान्ति नास्ति सन्देहमण्वपि ।
हे देवी ! गुरु नाम के जप से । अनेक जन्मों के । इकठ्ठे हुए पाप भी । नष्ट होते हैं । इसमें अणु मात्र । संशय नहीं है । 185
कुलं धनं बलं शास्त्रं बान्धवास्सोदरा इमे । मरणे नोपयुज्यन्ते गुरुरेको हि तारकः ।
अपना कुल । धन । बल । शास्त्र । नाते । रिश्तेदार । भाई । ये सब । मृत्यु के । अवसर पर । काम नहीं आते । एक मात्र गुरु ही । उस समय तारणहार हैं । 186
कुलमेव पवित्रं स्यात सत्यं स्वगुरुसेवया । तृप्ताः स्युस्स्कला देवा बृह्माद्या गुरुतर्पणात ।
अपने गुरु की । सेवा करने से । अपना कुल भी । पवित्र होता है । गुरु के तर्पण से । बृह्मा आदि । सब देव तृप्त होते हैं । 187
स्वरूपज्ञानशून्येन कृतमप्यकृतं भवेत । तपो जपादिकं देवि सकलं बालजल्पवत ।
हे देवी ! स्वरूप के । ज्ञान के बिना । किये हुए । जप । तप आदि । सब कुछ । नहीं किये हुए । के बराबर हैं । बालक के । बकवाद के । समान ( व्यर्थ ) हैं । 188
न जानन्ति परं तत्वं गुरुदीक्षापराड्मुखाः । भ्रान्ताः पशुसमा ह्येते स्वपरिज्ञानवर्जिताः ।
गुरु दीक्षा से । विमुख रहे हुए लोग । भ्रांत हैं । अपने । वास्तविक ज्ञान से । रहित हैं । वे सचमुच । पशु के समान हैं । परम तत्व को । वे नहीं जानते । 189
तस्मात्कैवल्यसिद्धयर्थं गुरुमेव भजेत्प्रिये । गुरुं विना न जानन्ति मूढास्तत्परमं पदम ।
हे प्रिय ! कैवल्य की । सिद्धि के लिए । गुरु का ही । भजन करना चाहिए । गुरु के बिना । मूढ लोग । उस परम पद को । नहीं जान सकते । 190
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते सर्वकर्माणि गुरोः करुणया शिवे ।
हे शिवे ! गुरु की । कृपा से । हृदय की ग्रन्थि । छिन्न हो जाती है । सब संशय । कट जाते हैं । और सब कर्म । नष्ट हो जाते हैं । 191
कृताया गुरुभक्तेस्तु वेदशास्त्रनुसारतः । मुच्यते पातकाद घोराद् गुरुभक्तो विशेषतः ।
वेद । और शास्त्र के । अनुसार । विशेष रूप से । गुरु की । भक्ति करने से । गुरु भक्त । घोर पाप से भी । मुक्त हो जाता है । 192
दुःसंगं च परित्यज्य पापकर्म परित्यजेत । चित्तचिह्नमिदं यस्य तस्य दीक्षा विधीयते ।
दुर्जनों का । संग त्याग कर । पाप कर्म । छोड़ देने चाहिए । जिसके चित्त में । ऐसा चिह्न । देखा जाता है । उसके लिए । गुरु दीक्षा का । विधान है । 193
चित्तत्यागनियुक्तश्च क्रोधगर्वविवर्जितः । द्वैतभावपरित्यागी तस्य दीक्षा विधीयते ।
चित्त का । त्याग करने में । जो प्रयत्नशील है । क्रोध और । गर्व से रहित है । द्वैत भाव का । जिसने त्याग किया है । उसके लिए । गुरु दीक्षा का । विधान है । 194
एतल्लक्षणसंयुक्तं सर्वभूतहिते रतम । निर्मलं जीवितं यस्य तस्य दीक्षा विधीयते ।
जिसका जीवन । इन लक्षणों से । युक्त हो । निर्मल हो । जो सब जीवों के । कल्याण में । रत हो । उसके लिए । गुरु दीक्षा का । विधान है । 195
अत्यन्तचित्तपक्वस्य श्रद्धाभक्तियुतस्य च । प्रवक्तव्यमिदं देवि ममात्मप्रीतये सदा ।
हे देवी ! जिसका चित्त । अत्यन्त परिपक्व हो । श्रद्धा । और भक्ति से । युक्त हो । उसे यह तत्व । सदा मेरी । प्रसन्नता के लिए । कहना चाहिए । 196
सत्कर्मपरिपाकाच्च चित्तशुद्धस्य धीमतः । साधकस्यैव वक्तव्या गुरुगीता प्रयत्नतः ।
सतकर्म के । परिपाक से । शुद्ध हुए । चित्त वाले । बुद्धिमान साधक को ही । गुरु गीता । प्रयत्न पूर्वक कहनी चाहिए । 197
नास्तिकाय कृतघ्नाय दांभिकाय शठाय च । अभक्ताय विभक्ताय न वाच्येयं कदाचन ।
नास्तिक । कृतघ्न । दंभी । शठ । अभक्त । और विरोधी को । यह गुरु गीता । कदापि नहीं कहनी चाहिए । 198
स्त्रीलोलुपाय मूर्खाय कामोपहतचेतसे । निन्दकाय न वक्तव्या गुरुगीतास्वभावतः ।
स्त्री लम्पट । मूर्ख । काम वासना से गृस्त । चित्त वाले । तथा निंदक को । गुरु गीता नहीं कहनी चाहिए । 199
एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुर्नैव मन्यते । श्वनयोनिशतं गत्वा चाण्डालेष्वपि जायते ।
एकाक्षर मंत्र का । उपदेश करने वाले को । जो गुरु नहीं मानता । वह 100 जन्मों में । कुत्ता होकर । फिर चाण्डाल की योनि में जन्म लेता है । 200
गुरुत्यागाद भवेन्मृत्युर्मन्त्रत्यागाद्यरिद्रता । गुरुमंत्रपरित्यागी रौरवं नरकं व्रजेत ।
गुरु का त्याग करने से । मृत्यु होती है । गुरु मंत्र को छोड़ने से । दरिद्रता आती है । और गुरु एवं मंत्र । दोनों का । त्याग करने से । रौरव नरक मिलता है । 201
शिवक्रोधाद गुरुस्त्राता गुरुक्रोधाच्छिवो न हि । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराज्ञां न लंघयेत ।
शिव के क्रोध से । गुरु रक्षा करते हैं । लेकिन गुरु के क्रोध से । शिव रक्षा नहीं करते । अतः सब प्रयत्न से । गुरु की आज्ञा का । उल्लंघन नहीं करना चाहिए । 202
सप्तकोटिमहामंत्राश्चित्तविभृंशकारकाः । एक एव महामंत्रो गुरुरित्यक्षरद्वयम ।
7 करोड़ महा मंत्र विद्यमान हैं । वे सब । चित्त को । भृमित करने वाले हैं । गुरु नाम का । दो अक्षर वाला मंत्र । एक ही महा मंत्र है । 203
न मृषा स्यादियं देवि मदुक्तिः सत्यरूपिणि । गुरुगीतासमं स्तोत्रं नास्ति नास्ति महीतले ।
हे देवी ! मेरा यह कथन । कभी मिथ्या नहीं होगा । वह सत्य स्वरूप है । इस पृथ्वी पर । गुरु गीता के समान । अन्य कोई स्तोत्र नहीं है । 204
गुरुगीतामिमां देवि भवदुःखविनाशिनीम । गुरुदीक्षाविहीनस्य पुरतो न पठेत्क्वचित ।
भव दुख का । नाश करने वाली । इस गुरु गीता का । पाठ । गुरु दीक्षा विहीन । मनुष्य के आगे । कभी नहीं । करना चाहिए । 205
हस्यमरत्यन्तरहस्यमेतन्न पापिना लभ्यमिदं महेश्वरि । अनेकजन्मार्जितपुण्यपाकाद गुरोस्तु तत्वं लभते मनुष्यः ।
हे महेश्वरी ! यह रहस्य । अत्यंत गुप्त । रहस्य है । पापियों को । वह नहीं मिलता । अनेक जन्मों के । किये हुए । पुण्य के । परिपाक से ही । मनुष्य । गुरु तत्व को । प्राप्त कर सकता है । 206
सर्वतीर्थवगाहस्य संप्राप्नोति फलं नरः । गुरोः पादोदकं पीत्वा शेषं शिरसि धारयन ।
गुरु के । चरणामृत का । पान करने से । और उसे । मस्तक पर धारण करने से । मनुष्य सब तीर्थों में । स्नान करने का । फल प्राप्त करता है । 207
गुरुपादोदकं पानं गुरोरुच्छिष्टभोजनम । गुरुर्मूर्ते सदा ध्यानं गुरोर्नाम्नः सदा जपः ।
गुरु के । चरणामृत का । पान करना चाहिए । गुरु के । भोजन में से । बचा हुआ खाना । गुरु की मूर्ति का । ध्यान करना । और गुरु नाम का । जप करना चाहिए । 208
गुरुरेको जगत्सर्वं बृह्मविष्णुशिवात्मकम ।  गुरोः परतरं नास्ति तस्मात्संपूजयेद गुरुम ।
बृह्मा । विष्णु । शिव सहित । समग्र जगत । गुरु में समाविष्ट है । गुरु से अधिक । और कुछ भी । नहीं है । इसलिए गुरु की । पूजा करनी चाहिए । 209
ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभ्यते गुरुभक्तितः । गुरोः समानतो नान्यत् साधनं गुरुमार्गिणाम ।
गुरु के प्रति ( अनन्य ) भक्ति से । ज्ञान के बिना भी । मोक्ष पद । मिलता है । गुरु के मार्ग पर । चलने वालों के लिए । गुरु के समान । अन्य कोई साधन नहीं है । 210
गुरोः कृपाप्रसादेन बृह्मविष्णुशिवादयः । सामर्थ्यमभजन सर्वे सृष्टिस्थित्यंतकर्मणि ।
गुरु के । कृपा प्रसाद से ही । बृह्मा । विष्णु । और शिव । यथा कृम । जगत की सृष्टि । स्थिति । और लय करने का । सामर्थ्य प्राप्त करते हैं । 211
मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम । स्मृतिवेदपुराणानां सारमेव न संशयः ।
हे देवी ! गुरु । यह दो अक्षर वाला । मंत्र । सब मंत्रों में । राजा है । श्रेष्ठ है । स्मृतियाँ । वेद । और पुराणों का । वह सार ही है । इसमें संशय नहीं है । 212
यस्य प्रसादादहमेव सर्वं मय्येव सर्वं परिकल्पितं च । इत्थं विजानामि सदात्मरूपं त्स्यांघ्रिपद्मं प्रणतोऽस्मि नित्यम ।
मैं ही सब हूँ । मुझमें ही सब कल्पित है । ऐसा ज्ञान । जिनकी कृपा से हुआ है । ऐसे आत्म स्वरूप । गुरु के । चरण कमलों में । मैं नित्य प्रणाम करता हूँ । 213
अज्ञानतिमिरान्धस्य विषयाक्रान्तचेतसः । ज्ञानप्रभाप्रदानेन प्रसादं कुरु मे प्रभो ।
हे प्रभो ! अज्ञान रूपी । अंधकार में । अंध बने हुए । और विषयों से । आक्रान्त चित्त वाले । मुझको । ज्ञान का । प्रकाश देकर । कृपा करो । 214
इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमा महेश्वर संवादे श्री गुरु गीतायां तृतीयोऽध्यायः

शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

हे मूर्ख मन ! तू अहं अहं क्यों करता है ?

वशिष्ठ बोले - हे राम ! पूर्व में जैसे उद्दालक भूतों के समूह को । विचार करके परम पद को प्राप्त हुआ है । सो तुम सुनो । हे राम ! जगत रूपी जीर्ण घर के । वायव्य कोण में एक देश है । जो पर्वत और तमालादि वृक्षों से पूर्ण है । और महा मणियों का स्थान है । उस स्थान में उद्दालक नाम एक बुद्धिमान ब्राह्मण मान करने के योग्य विद्यमान था । परन्तु अर्ध प्रबुद्ध था । क्योंकि परम पद को उसने न पाया था । वह ब्राह्मण यौवन अवस्था के पूर्व ही शुभेच्छा से शास्त्रोंक्त यम । नियम । और तप को साधने लगा । तब उसके चित्त में यह विचार उत्पन्न हुआ कि - हे देव ! जिसके पाने से । फिर कुछ पाने योग्य न रहे । जिस पद में विश्राम पाने से । फिर शोक न हो । और जिसके पाने से । फिर बन्धन न रहे । ऐसा पद मुझको कब प्राप्त होगा ? कब मैं मन के मनन भाव को त्याग कर । विश्रान्ति मान होऊँगा । जैसे मेघ भृम ने को त्याग कर । पहाड़ के शिखर में विश्रान्ति करता है । और कब चित्त की दृश्य रूप वासना मिटेगी । जैसे तरंग से रहित समुद्र शान्त मान होता है । वैसे ही कब मैं । मन के संकल्प विकल्प से रहित । शान्ति मान होऊँगा ? तृष्णा रूपी नदी को बोध रूपी बेड़ी और संत संग और सत शास्त्र रूपी मल्लाह से कब तरूँगा ? चित्त रूपी हाथी । जो अभिमान रूपी मद से । उन्मत्त है । उसको विवेक रूपी अंकुश से । कब मारूँगा  और ज्ञान रूपी सूर्य से । अज्ञान रूपी अन्धकार । कब नष्ट करूँगा ? हे देव ! सब आरम्भों को त्याग कर ।  मैं अलेप और अकर्ता । कब होऊँगा ? जैसे जल में कमल अलेप रहता है । वैसे ही मुझको । कर्म कब स्पर्श न करेंगे ? मेरा परमार्थ रूपी भास्कर वपु कब उदय होगा ? जिससे मैं जगत की गति को देखकर हँसूँगा । हृदय में सन्तोष पाऊँगा । और पूर्ण बोध विराट आत्मा की तरह होऊँगा ? वह समय कब होगा कि - मुझ जन्मों के अन्धे को । ज्ञान रूपी नेत्र । प्राप्त होगा ।

जिससे मैं परम बोध पद को देखूँगा ? वह समय कब होगा ? जब मेरा चित्त रूपी मेघ । वासना रूपी वायु से रहित । आत्म रूपी सुमेरु पर्वत में । स्थित होकर शान्त मान होगा ? अज्ञान दशा । कब जावेगी ? और ज्ञान दशा । कब प्राप्त होगी ? अब वह समय कब होगा कि - मन और काया और प्रकृति को देख कर हँसूँगा ? वह समय कब होगा ? जब जगत के कर्मों को बालक की चेष्टावत मिथ्या जानूँगा । और जगत मुझको सुषुप्ति की तरह हो जावेगा । वह समय कब होगा ? जब मुझको पत्थर की शिला वत निर्विकल्प समाधि लगेगी । और शरीर रूपी वृक्ष में पक्षी आलय करेंगे । और निसंग होकर छाती पर आ बैठेंगे ? हे देव ! वह समय कब होगा ? जब इष्ट अनिष्ट विषय की प्राप्ति से मेरे चित्त की वृत्ति चलायमान न होगी । और विराट की तरह सर्वात्मा होऊँगा ? वह समय कब होगा ? जब मेरा सम असम आकार शान्त हो जावेगा । और सब अर्थों से निरिच्छित रूप मैं हो जाऊँगा ? कब मैं उप शम को प्राप्त होऊँगा । जैसे मन्दराचल से रहित क्षीर समुद्र शान्ति मान होता है । और कब मैं अपना चेतन वपु पाकर शरीर को अशरीर वत देखूँगा ? कब मेरी पूर्ण चिन्मात्र वृत्ति होगी । और कब मेरे भीतर बाहर की सब कलना शान्त हो जावेगी । और सम्पूर्ण चिन्मात्र ही का मुझे भान होगा ? मैं गृहण त्याग से रहित कब संतोष पाऊँगा ? और अपने स्व प्रकाश में स्थित होकर संसार रूपी नदी के जरा मरण रूपी तरंगों से कब रहित होऊँगा ? और अपने स्वभाव में कब स्थित होऊँगा ?
हे राम ! ऐसे विचार कर उद्दालक चित्त को ध्यान में लगाने लगा । परन्तु चित्त रूपी वानर दृश्य की ओर निकल जाये । पर स्थित न हो । तब वह फिर ध्यान में लगावे । और फिर वह भोगों की ओर निकल जावे । जैसे वानर नहीं ठहरता । वैसे ही चित्त न ठहरे । जब उसने बाहर विषयों को त्याग कर । चित्त को अन्तर्मुख किया । तब

भीतर जो दृष्टि आई । तो भी विषयों को चिन्तने लगा । निर्विकल्प न हुआ । और जब रोक रखे । तब सुषुप्ति में लीन हो जावे । सुषुप्ति और लय । जो निद्रा है । उस ही में चित्त रहे । तब वह वहाँ से उठकर और स्थान को चला । जैसे सूर्य सुमेरु की प्रदक्षिणा को चलाता है । और गन्धमादन पर्वत की एक कन्दरा में स्थित हुआ । जो फूलों से संयुक्त । सुन्दर । और पशु पक्षी मृगों से रहित । एकान्त स्थान था । और जो देवता को भी देखना कठिन था । वहाँ अत्यन्त प्रकाश भी न था । और अत्यन्त तम भी न था । न अत्यन्त उष्ण था । और न शीत । जैसे मधुर कार्तिक मास होता है । वैसे ही वह निर्भय एकान्त स्थान था । जैसे मोक्ष पदवी निर्भय एकान्त रूप होती है । वैसे ही उस पर्वत में कुटी बना । और उस कुटी में तमाल पर । और कमलों का आसन कर । और ऊपर मृग छाला बिछाकर वह बैठा । और सब कामना का त्याग किया । जैसे बृह्मा जगत को उपजा कर छोड़ बैठे । वैसे ही वह सब कलना को त्याग बैठा । और विचार करने लगा - अरे मूर्ख मन ! तू कहाँ जाता है । यह संसार माया मात्र है । और इतने काल तू जगत में भटकता रहा । पर कहीं तुझको शान्ति न हुई । वृथा धावता रहा । हे मूर्ख मन ! उप शम को त्याग कर । भोगों की ओर धावता है । सो अमृत को त्याग कर विष का बीज बोता है । यह सब तेरी चेष्टा दुखों के निमित्त है । जैसे कुशवारी अपना घर बनाकर । आप ही को बन्धन करती है । वैसे ही तू भी आपको आप संकल्प उठाकर बन्धन करता है । अब तू संकल्प के संसरने को त्याग कर आत्म पद में स्थित हो कि तुझको शान्ति हो । हे मन जिह्वा के साथ मिल कर । जो तू शब्द करता है । वह दादुर के शब्द वत व्यर्थ है । कानों के साथ मिल कर सुनता है । तब शुभ अशुभ वाक्य गृहण करके मृग की तरह नष्ट होता है । त्वचा के साथ मिल कर । जो तू स्पर्श की इच्छा करता है । सो हाथी की तरह नष्ट होता है । रसना के स्वाद की

इच्छा से । मछली की तरह नष्ट होता है । और गन्ध लेने की इच्छा से । भँवरे की तरह नष्ट हो जावेगा । जैसे भँवरा सुगन्ध के निमित्त फूल में फँस मरता है । वैसे ही तू फँस कर मरेगा । और सुन्दर स्त्रियों की वाच्छा से । पतंग की तरह जल मरेगा । हे मूर्ख मन ! जो एक इन्द्रिय का भी स्वाद लेते हैं । वे नष्ट होते हैं । तू तो पंच 5 विषय का सेवने वाला है । क्या तेरा नाश न होगा । इससे तू इनकी इच्छा त्याग कि तुझको शान्ति हो । जो इन भोगों की इच्छा न त्यागेगा । तो मैं ही तुझको त्यागूँगा । तू तो मिथ्या असत्य रूप है । तुझको मेरा क्या प्रयोजन है । विचार कर मैं तेरा त्याग करता हूँ । हे मूर्ख मन ! जो तू देह में । अहं अहं करता है । सो तेरा अहं किस अर्थ का है । अंगुष्ठ से लेकर मस्तक पर्यन्त । अहं वस्तु कुछ नहीं । यह शरीर तो अस्थि । माँस । और रक्त का थैला है । यह तो अहं रूप नहीं । और पोल आकाश रूप है । यह पंच 5 तत्वों का जो शरीर बना है । उसमें अहं रूप वस्तु तो कुछ नहीं है । हे मूर्ख मन ! तू अहं अहं क्यों करता है ? यह जो तू कहता है कि - मैं देखता हूँ । मैं सुनता हूँ । मैं सूँघता हूँ । मैं स्पर्श करता हूँ । मैं स्वाद लेता हूँ । और इनके इष्ट अनिष्ट में राग द्वेष से जलता है । सो वृथा कष्ट पाता है । रूप को नेत्र गृहण करते हैं । नेत्र रूप से उत्पन्न हुए हैं । और तेज का अंश उनमें स्थित है । जो अपने विषय को गृहण करता है । इसके साथ मिलकर तू क्यों तपायमान होता है ? शब्द - आकाश में उत्पन्न हुआ है । और आकाश का अंश श्रवण में स्थित है । जो अपने गुण शब्द को ग्रहण करता है । इसके साथ मिलकर तू क्यों राग द्वेष कर तपायमान होता है ? स्पर्श इन्द्रिय - वायु से उत्पन्न हुई है । और वायु का अंश त्वचा में स्थित है । वही स्पर्श को गृहण करता है । उससे मिलकर तू क्यों राग द्वेष से तपायमान होता है ? रसना इन्द्रिय - जल से उत्पन्न हुई है । और जल का अंश जिह्वा है । जो अग्रभाग में स्थित 


है । वही रस गृहण करती है । इससे मिलकर । तू क्यों वृथा तपाय मान होता है ? और घ्राण इन्द्रिय - गन्ध से उपजी है । और पृथ्वी का अंश घ्राण में स्थित है । वही गन्ध को गृहण करती है । उसमें मिलकर तू क्यों वृथा राग द्वेष वान होता है ? मूर्ख मन ! इन्द्रियाँ तो अपने अपने विषय को गृहण करती हैं । पर तू इनमें अभिमान करता है कि - मैं देखता हूँ । मैं सुनता हूँ । मैं सूँघता हूँ । मैं स्पर्श करता हूँ । और रस लेता हूँ । यह इन्द्रियाँ तो सब आत्म भर हैं । अर्थात अपने विषय को गृहण करती हैं । और के विषय को गृहण नहीं करती कि - नेत्र देखते हैं । श्रवण नहीं करते । और कान सुनते हैं । देखते नहीं इत्यादि । सब इन्द्रियाँ अपना धर्म किसी को देती भी नहीं । और न किसी का लेती हैं । वे अपने धर्म में स्थित हैं । और विषय को गृहण कर इनको राग द्वेष कुछ नहीं होता । इनको गृहण करने की वासना भी कुछ नहीं होती । और तू ऐसा मूर्ख है कि - औरों के धर्म आप में मान कर राग द्वेष से जलता है । जो तू भी राग द्वेष से रहित होकर चेष्टा करे । तो तुझको दुख कुछ न हो । जो वासना सहित कर्म करता है । वह बन्धन का कारण होता है । वासना बिना कुछ दुख नहीं होता । तू मूर्ख है । जो विचार कर नहीं देखता । इससे मैं तुझको त्याग करता हूँ । तेरे साथ मिल कर मैं बड़े खेद पाता हूँ । जैसे भेड़िये के बालक को । सिंह चूर्ण करता है । वैसे ही । तूने मुझको चूर्ण किया है । तेरे साथ मिलकर मैं तुच्छ हुआ हूँ । अब तेरे साथ मेरा प्रयोजन कुछ नहीं । मैं तो निर्विकल्प शुद्ध चिदानन्द हूँ । जैसे महा आकाश घट से मिल कर घटा आकाश होता है । वैसे ही तेरे साथ मिलकर मैं तुच्छ हो गया हूँ । इस कारण मैं तेरा संग त्याग कर परम चिदाकाश को प्राप्त होऊँगा । मैं निर्विकार हूँ । और अहं त्वं की कल्पना से रहित हूँ । तू क्यों अहं त्वं करता है ? शरीर में व्यर्थ अहं करने वाला । और कोई नहीं । तू ही चोर है । अब मैंने तुझको पकड़ कर त्याग दिया है । तू तो अज्ञान से उपजा मिथ्या और असत्य रूप है । जैसे बालक अपनी परछाईं में वेताल जान कर । आप भय पाता है । वैसे ही तूने सबको दुखी किया है । जब तेरा नाश होगा । तब आनन्द होगा । तेरे

उपजने से महा दुख है । जैसे कोई ऊँचे पर्वत से गिर कर कूप में जा पड़े । और कष्ट वान हो । वैसे ही तेरे संग से । मैं आत्म पद से गिरा । देह अभिमान रूपी गढ़े में । राग द्वेष रूपी दुख पाता था । पर अब तुझको त्याग कर । मैं निर अहंकार पद को प्राप्त हुआ हूँ । वह पद । न प्रकाश है । न एक है । न दो है । न बड़ा है । और न छोटा है । अहं त्वं आदि से रहित । अचैत्य चिन्मात्र है । जरा । मृत्यु । राग । द्वेष । और भय । सब तेरे संयोग से होते हैं । अब तेरे वियोग से मैं निर्विकार शुद्ध पद को प्राप्त होता हूँ । हे मन ! तेरा होना दुख का कारण है । जब तू निर्वाण हो जावेगा । तब मैं बृह्म रूप होऊँगा । तेरे संग से मैं तुच्छ हुआ हूँ । जब तू निवृत्त होगा । तब मैं शुद्ध होऊँगा । जैसे मेघ और कुहरे के होने से आकाश मलीन भासता है । पर जब वर्षा हो जाती है । तब शुद्ध और निर्मल हो रहता है । वैसे ही तेरे निवृत्त हुए निर्लेप अपना आप आत्मा भासता है । हे चित्त ! ये जो देह इन्द्रिय आदि पदार्थ हैं । सो भिन्न हैं । इनमें अहं वस्तु कुछ नहीं । इनको एक तूने ही इकट्ठी किया है । जैसे एक तागा । अनेक मणियों को इकट्ठा करता है । वैसे ही सबको इकट्ठा करके तू अहं अहं करता है । तू मिथ्या राग द्वेष करता है । इससे तू शीघ्र ही सब इन्द्रियों को लेकर निर्वाण हो । जिससे तेरी जय हो ।

यह जगत भी चित्त में स्थित है

राम बोले - हे भगवन ! यह माया संसार चक्र है । उसका बड़ा तीक्ष्ण वेग है । और सब अंगों को छेदने वाला है । जिससे यह चक्र । और इस भृम से छूटूँ । वही उपाय कहिये ।
वशिष्ठ बोले - हे राम ! यह जो माया मय संसार चक्र है । उसका नाभि स्थान चित्त है । जब चित्त वश हो । तब संसार चक्र का वेग रोका जावे । और किसी प्रकार नहीं रोका जाता । हे राम ! इस बात को तुम भली प्रकार जानते हो । हे निष्पाप ! जब चक्र की नाभि रोकी जाती है । तब चक्र स्थित हो जाता है । रोके बिना स्थित नहीं होता । संसार रूपी चक्र की चित्त रूपी नाभि को जब रोकते हैं । तब यह चक्र भी स्थित हो जाता है । रोके बिना यह भी स्थित नहीं होता । जब चित्त को स्थित करोगे । तब जगत भृम निवृत्त हो जावेगा । और जब चित्त स्थित होता है । तब पारबृह्म प्राप्त होता है । तब जो कुछ करना था । सो किया होता है । और कृत कृत्य होता है । और जो कुछ प्राप्त होना था । सो प्राप्त होता है । फिर कुछ पाना नहीं रहता । इससे जो कुछ तप । ध्यान । तीर्थ । दान आदि उपाय हैं । उन सबको त्याग कर चित्त के स्थित करने का उपाय करो । सन्तों के संग । और बृह्म विद शास्त्रों के विचार से । चित्त आत्म पद में स्थित होगा । जो कुछ सन्तों और शास्त्रों ने कहा है । उसका बार बार अभ्यास करना । और संसार को मृग तृष्णा के जल और स्वपन वत जान कर । इससे वैराग्य करना । इन दोनों उपायों से चित्त स्थित होगा । और आत्म पद की प्राप्ति होगी । और किसी उपाय से आत्म पद की प्राप्ति न होगी । हे राम ! बोलने चालने का वर्जन नहीं । बोलिये । दान दीजिये । अथवा लीजिये । परन्तु भीतर चित्त को मत लगाओ । इनका साक्षी जानने वाला । जो अनुभव आकाश है । उसकी ओर वृत्ति हो । युद्ध करना हो । तो भी करिये । परन्तु वृत्ति 


साक्षी ही की ओर हो । और उसी को अपना रूप जानिये । और स्थित होईये । शब्द । स्पर्श । रूप । रस । गन्ध । ये जो पाँच 5 विषय इन्द्रियों के हैं । इनको अंगीकार कीजिये । परन्तु इनके जानने वाले साक्षी में स्थित रहिये । तेरा निज स्वरूप । वही चिदाकाश है । जब उसका अभ्यास बार बार करोगे । तब चित्त स्थित होगा । और आत्म पद की प्राप्ति होगी । हे राम ! जब तक चित्त आत्म पद में स्थित नहीं होता । तब तक जगत भृम भी निवृत्त नहीं होता । इस चित्त के संयोग से चेतन का नाम जीव है । जैसे घट के संयोग से । आकाश को घट आकाश कहते हैं । पर जब घट टूट जाता है । तब महा आकाश ही रहता है । वैसे ही जब चित्त का नाश होगा । तब यह जीव चिदाकाश ही होगा । यह जगत भी चित्त में स्थित है । चित्त के अभाव हुए । जगत भृम शान्त हो जायेगा । हे राम ! जब तक चित्त है । तब तक संसार भी है । जैसे जब तक मेघ है । तब तक बूँदे भी हैं । और जब मेघ नष्ट हो जावेगा । तब बूँदें भी न रहेंगी । जैसे जब तक चन्द्रमा की किरणें शीतल हैं । तब तक चन्द्रमा के मण्डल में तुषार है । वैसे ही जब तक चित्त है । तब तक संसार भृम है ।जैसे माँस का स्थान श्मशान होता है । और वहाँ पक्षी भी होते हैं । और ठौर इकट्ठे नहीं होते । वैसे ही जहाँ चित्त है । वहाँ राग द्वेष आदि विचार भी होते हैं । और जहाँ चित्त का अभाव है । वहाँ विकार का भी अभाव है ।
हे राम ! जैसे पिशाच आदि की चेष्टा रात्रि में होती है । दिन में नहीं होती । वैसे ही राग । द्वेष । भय । इच्छा आदि विकार चित्त में होते हैं । जहाँ चित्त नहीं । वहाँ विकार भी नहीं । जैसे अग्नि बिना उष्णता नहीं होती । शीतलता बिना बरफ नहीं होती । सूर्य बिना प्रकाश नहीं होता । और जल बिना तरंग नहीं होते । वैसे ही चित्त बिना जगत भृम नहीं होता । हे राम ! शान्ति भी इसी का नाम है । और शिवता भी वही है । सर्वज्ञता भी वही है । जो चित्त नष्ट हो । आत्मा भी वही है । और तृप्तता भी वही है । पर जो चित्त नष्ट नहीं हुआ । तो इतने पदों में कोई भी नहीं है ।


हे राम ! चित्त से रहित चेतन चैतन्य कहाता है । और अमन शक्ति भी वही है । जब तक सब कलना से रहित बोध नहीं होता । तब तक नाना प्रकार के पदार्थ भासते हैं । और जब वस्तु का बोध हुआ । तब एक अद्वैत आत्म सत्ता भासती है । हे राम ! ज्ञान संवित की ओर वृत्ति रखना । जगत की ओर न रखना । और जागृत की ओर न जाना । जागृत के जानने वाले की ओर जाना । स्वपन और सुषुप्ति की ओर न जाना । भीतर के जानने वाली । जो साक्षी सत्ता है । उसकी ओर वृत्ति रखना ही । चित्त के स्थित करने का परम उपाय है । सन्तों के संग । और शास्त्रों से निर्णय किये अर्थ का । जब अभ्यास हो । तब चित्त नष्ट हो । और जो अभ्यास न हो । तो भी सन्तों का संग । और सत शास्त्रों को सुन कर । बल कीजिये । तो सहज ही चमत्कार हो जायेगा । मन को मन से मथिये । तो ज्ञान रूपी अग्नि निकलेगी । जो आशा रूपी फाँसी को जला डालेगी । जब तक चित्त आत्म पद से विमुख है । तब तक संसार भृम देखता है । पर जब आत्म पद में स्थित होता है । तब सब क्षोभ मिट जाते हैं । जब तुमको आत्म पद का साक्षात्कार होगा । तब कालकूट विष भी अमृत समान हो जावेगा । और विष का जो मारना । धर्म है । सो न रहेगा । जीव जब अपने स्वभाव में स्थित होता है । तब संसार का कारण मोह मिट जाता है । और जब निर्मल निरंश आत्म संवित से गिरता है । तब संसार का कारण मोह आन प्राप्त होता है । जब निरंश निर्मल आत्म संवित में स्थित होता है । तब संसार समुद्र से तर जाता है । जितने तेजस्वी बलवान हैं । उन सबसे तत्व वेत्ता उत्तम हैं । उसके आगे सब लघु हो जाते हैं । और उस पुरुष को संसार के किसी पदार्थ की अपेक्षा नहीं रहती । क्योंकि उसका चित्त सत्य पद को प्राप्त होता है । इससे चित्त को स्थित करो । तब वर्तमान काल भी भविष्य काल की तरह हो जावेगा । और जैसे भविष्य काल का राग द्वेष नहीं स्पर्श करता । वैसे ही वर्तमान काल का राग द्वेष भी स्पर्श न करेगा ।
हे राम ! आत्मा परम आनन्द रूप है । उसके पाने से । विष भी अमृत के समान हो जाता है । जिस पुरुष को आत्म पद में स्थित हुई है । वह सबसे उत्तम है । जैसे सुमेरु पर्वत के निकट । हाथी तुच्छ भासता है । वैसे ही 


उसके निकट त्रिलोकी के पदार्थ सब तुच्छ भासते हैं । वह ऐसे दिव्य तेज को प्राप्त होता है । जिसको सूर्य भी नहीं प्रकाश कर सकता । वह परम प्रकाश रूप । सब कलना से रहित । अद्वैत तत्व है ।
हे राम ! उस आत्म तत्व में स्थित हो रहो । जिस पुरुष ने ऐसे स्वरूप को पाया है । उसने सब कुछ पाया है । और जिसने ऐसे स्वरूप को नहीं पाया । उसने कुछ नहीं पाया । ज्ञान वान को देखकर हमको ज्ञान की वार्ता करते कुछ लज्जा नहीं आती । और जो उस ज्ञान से विमुख है । यद्यपि वह महा बाहु हो । तो भी गर्दभ वत है । जो बड़े ऐश्वर्य से सम्पन्न है । और आत्म पद से विमुख है । उसको तुम विष्ठा के कीट से भी नीच जानो  । जीना उनका श्रेष्ठ है । जो आत्म पद के निमित्त यत्न करते हैं । और जीना उनका वृथा है । जो संसार के निमित्त यत्न करते हैं । वे देखने मात्र तो चेतन हैं । परन्तु शव की तरह हैं । जो तत्व वेत्ता हुए हैं । वे अपने प्रकाश से प्रकाशते हैं । और जिनको शरीर में अभिमान है । वे मृतक समान हैं ।
हे राम ! इस जीव को चित्त ने दीन किया है । ज्यों ज्यों चित्त बड़ा होता है । त्यों त्यों इसको दुख होता है । और जिसका चित्त क्षीण हुआ है । उसका कल्याण हुआ है । जब आत्म भाव अनात्म में दृण होता है । और भोगों की तृष्णा होती है । तब चित्त बड़ा हो जाता है । और आत्म पद से दूर पड़ता है । जैसे बड़े मेघ के आवरण से सूर्य नहीं भासता । तैसे ही अनात्म अभिमान से आत्मा नहीं भासता । जब भोगों की तृष्णा निवृत हो जाती है । तब चित्त क्षीण हो जाता है । जैसे वसन्त ऋतु के गये से पत्र कृश हो जाते हैं । वैसे ही भोग वासना के अभाव से चित्त कृश हो जाता है ।
हे राम ! चित्त रूपी सर्प । दुर्वासना रूपी दुर्गन्ध । भोग रूपी वायु । और शरीर में दृण आस्था रूपी मृत्तिका स्थान से

बड़ा हो जाता है । और उन पदार्थों से जब बड़ा हुआ । तब मोह रूपी विष से जीव को मारता है । हे राम ! ऐसे दुष्ट रूपी सर्प को । जब मारे । तब कल्याण हो । देह में जो आत्म अभिमान हो गया है । भोगों की तृष्णा फुरती है । और मोह रूपी विष चढ़ गया है । इससे यदि विचार रूपी गरुड़ मन्त्र का चिन्तन करता रहे । तो विष उतर जावे । इसके सिवाय और उपाय विष उतरने का कोई नहीं ।
हे राम ! अनात्मा में आत्म अभिमान और पुत्र । दारा आदि में ममत्व से चित्त बड़ा हो जाता है । और अहंकार रूपी विकार । ममता रूपी कीड़ा । और यह मेरा इत्यादि भावना से चित्त कठिन हो जाता है । चित्त रुपी विष का वृक्ष है । जो देह रूपी भूमि पर लगा है । संकल्प विकल्प इसके टास हैं । दुर्वासना रूपी पत्र हैं । और सुख । दुख । आधि । व्याधि । मृत्यु रूपी इसके फल हैं । अहंकार रूपी कर्म जल है । उसके सींचने से बढ़ता है । और काम भोग आदि पुष्प हैं । चिन्ता रूपी बड़ी बेल को । जब विचार और वैराग्य रूपी कुठार से काटे । तब शान्ति हो । अन्यथा शांति न होगी ।
हे राम ! चित्त रूपी एक हाथी है । उसने शरीर रूपी तालाब में स्थित होकर । शुभ वासना रूपी जल को मलीन कर डाला है । और धर्म । सन्तोष । वैराग्य रूपी कमल को । तृष्णा रूपी सूँड़ से तोड़ डाला है । उसको तुम आत्म विचार रूपी नेत्रों से देख । नखों से छेदो । हे राम ! जैसे कौवा अपवित्र पदार्थों को भोजन करके सर्वदा काँ काँ करता है । वैसे ही चित्त । देह रूपी अपवित्र गृह में बैठा । सर्वदा भोगों की ओर धावता है । उसके रस को गृहण करता है । और मौन कभी नहीं रहता । दुर्वासना से वह काक 


की तरह कृष्ण रूप है । जैसे काक के एक ही नेत्र होता है । वैसे ही चित्त । एक विषयों की ओर धावता है । ऐसे अमंगल रूपी कौवे को विचार रूपी धनुष से मारो । तब सुखी होगे । चित्त रूपी चील पखेरु है । जो भोग रूपी माँस के निमित्त सब ओर भृमता है । जहाँ अमंगल रूपी चील आती है । वहाँ से विभूति का अभाव हो जाता है । वह अभिमान रूपी माँस की ओर । ऊँची होकर देखती है । और नमृ नहीं होती । ऐसा अमंगल रूपी चित्त चील है । उसको जब नाश करो । तब शान्ति मान होगे । जैसे पिशाच जिसको लगता है । वह खेद वान होता है । और शब्द करता है । वैसे ही इसको चित्त रूपी पिशाच लगा है । और तृष्णा रूपी पिशाचिनी के साथ । शब्द करता है । उसको निकालो । जो आत्मा से भिन्न । अभिमान करता है । ऐसे चित्त रूपी पिशाच को वैराग्य रूपी मन्त्र से दूर करो । तब स्व भाव सत्ता को प्राप्त होगे । यह चित्त रूपी वानर महा चंचल है । और सदा भटकता रहता है । कभी किसी पदार्थ में धावता है । जैसे वानर जिस वृक्ष पर बैठता है । उसको ठहरने नहीं देता ।
हे राम ! चित्त रूपी रस्सी से सम्पूर्ण जगत कर्ता । कर्म । क्रिया रूपी गाँठ करके बँधा है । जैसे एक जंजीर के साथ अनेक बँधते हैं । और एक तागे के साथ अनेक दाने पिरोये जाते हैं । वैसे ही एक चित्त से सब देह धारी बाँधे हैं । उन रस्सी को असंग शस्त्र से काटे । तब सुखी हो । राम ! चित्त रूपी अजगर सर्प भोगों की तृष्णा रूपी बिष से पूर्ण है । और उसने फुँकार के साथ बड़े बड़े लोक जलाये हैं । और शम । दम । धैर्य रूपी सब कमल जल गये हैं । इस दुष्ट को । और कोई नहीं मार सकता । जब विचार रूपी गरुड़ उपजे । तब इसको नष्ट करे । और जब चित्त रूपी सर्प नष्ट हो । तब आत्म रूपी निधि प्राप्त होगी ।

हे राम ! यह चित्त शस्त्रों से काटा नहीं जाता । न अग्नि से जलता है । और न किसी दूसरे उपाय से नाश होता है । केवल साधु के संग । और सत शास्त्रों के विचार । और अभ्यास से नाश होता है । हे राम ! यह चित्त रूपी गढ़े का मेघ बड़ा दुखदायक है । भोगों की तृष्णा रूपी बिजली इसमें चमकती है । और जहाँ वर्षा इसकी होती है । वहाँ बोध रूपी क्षेत्र । और शम दम रूपी कमलों को नाश करती है । जब विचार रूपी मन्त्र हो । तब शान्त हो ।
हे राम ! चित्त की चपलता को । असंकल्प से त्यागो । जैसे बृह्मास्त्र से बृह्मास्त्र छिदता है । वैसे ही मन से मन को छेदो । अर्थात अन्तर्मुख हो । जब तेरा चित्त रुपी वानर स्थित होगा । तब शरीर रूपी वृक्ष क्षोभ से रहित होगा । शुद्ध बोध से मन को जीतो । और यह जगत । जो तृण से भी तुच्छ है । उससे पार हो जाओ ।

सत शब्द बिना कोई पदार्थ सिद्ध नहीं होता

हे साधो ! जिनका नित्य प्रबुद्ध चित्त है । वे जगत के कार्य भी करते हैं । पर आत्म तत्व में स्थित हैं । तो वह सर्वदा समाधि में स्थित हैं । और जो पदम आसन बाँधकर बैठते हैं । और बृह्म अंजली हाथ में रखते हैं । पर चित्त आत्म पद में स्थित नहीं होता । और विश्रान्ति नहीं पाते । तो उनको समाधि कहाँ ? वह समाधि नहीं कहलाती । हे भगवन ! परमार्थ तत्व बोध आशा रूपी सब तृणों के जलाने वाली अग्नि है । ऐसी निराश रूपी जो समाधि वही समाधि है । तूष्णीम होने का नाम समाधि नहीं है । हे साधो ! जिसका चित्त समाहित । नित्य तृप्त । और सदा शान्त रूप है । और जो यथा भूतार्थ है । अर्थात जिसे ज्यों का त्यों ज्ञान हुआ है । और उसमें निश्चय है । वह समाधि कहाती है । तूष्णीम होने का नाम समाधि नहीं है । जिसके हृदय में संसार रूप सत्यता का क्षोभ नहीं है । जो निर अहंकार है । और अन उदय ही उदय है । वह पुरुष समाधि में कहाता है । ऐसा जो बुद्धिमान है । वह सुमेरु से भी अधिक स्थित है । हे साधो ! जो पुरुष निश्चिन्त है । जिसका गृहण और त्याग बुद्धि निवृत्त हुई है । जिसे पूर्ण आत्म तत्व ही भासता है । वह व्यवहार भी करता दृष्ट आता है । तो भी उसकी समाधि है । जिसका चित्त 1 क्षण भी । आत्म तत्व में स्थित होता है । उसकी अत्यन्त समाधि है । और क्षण क्षण बढ़ती जाती है । निवृत नहीं होती । जैसे अमृत के पान किये से उसकी तृष्णा बढ़ती जाती है । वैसे ही 1 क्षण को भी समाधि बढ़ती ही जाती है । जैसे सूर्य के उदय हुए सब किसी को दिन भासता है । वैसे ही ज्ञान वान को सब आत्म तत्व भासता है । कदाचित भिन्न नहीं भासता । जैसे नदी का प्रवाह किसी से रोका नहीं जाता । वैसे ही ज्ञान वान की आत्म दृष्टि

किसी से रोकी नहीं जाती । और जैसे काल की गति काल को 1 क्षण भी विस्मरण नहीं होती । वैसे ही ज्ञान वान की आत्म दृष्टि विस्मरण नहीं होती । जैसे चलने से ठहरे पवन को । अपना पवन भाव विस्मरण नहीं होता । वैसे ही ज्ञान वान को चिन्मात्र तत्व का विस्मरण नहीं होता । और जैसे सत शब्द बिना । कोई पदार्थ सिद्ध नहीं होता । वैसे ही ज्ञान वान को । आत्मा के सिवाय । कोई पदार्थ नहीं भासता । जिस ओर ज्ञान वान की दृष्टि जाती है । उसे वहाँ अपना आप ही भासता है । जैसे उष्णता बिना अग्नि नहीं । शीतलता बिना बरफ नहीं । और श्यामलता बिना काजल नहीं होती । वैसे आत्मा बिना । जगत नहीं होता । हे साधो ! जिसको आत्मा से भिन्न पदार्थ । कोई नहीं भासता । उसको उत्थान कैसे हो ? मैं सर्वदा बोध रूप । निर्मल । और सर्वदा सर्वात्मा समाहित चित हूँ । इससे उत्थान मुझको कदाचित नहीं होगा । आत्मा से भिन्न मुझको कोई नहीं भासता । सब प्रकार आत्म तत्व ही । मुझको भासता है । हे साधो ! आत्म तत्व सर्वदा जानने योग्य है । सर्वदा और सब प्रकार आत्मा स्थित है । फिर समाधि और उत्थान कैसे हो ? जिसको कार्य कारण में विभाग कलना नहीं फुरती । और जो आत्म तत्व में ही स्थित है । उसको समाहित असमाहित क्या कहिये ? समाधि और उत्थान का वास्तव में कुछ भेद नहीं । आत्म तत्व सदा अपने आप में स्थित है । द्वैत भेद कुछ नहीं । तो समाहित असमाहित क्या कहिये ?

मूर्ख अपनी कल्पना से दुखी होता है

वसिष्ठ बोले - हे राम ! मूढ़ अज्ञानी पुरुष । अपने संकल्प से । आप ही मोह को प्राप्त होता है । और जो पण्डित है । वह मोह को नहीं प्राप्त होता । जैसे मूर्ख बालक । अपनी परछाईं में । पिशाच कल्पना कर । भय पाता है । वैसे ही मूर्ख । अपनी कल्पना से दुखी होता है ।
तब राम बोले - हे भगवन ! बृह्म वेत्ताओं में श्रेष्ठ ! वह संकल्प क्या है ? और छाया क्या है ? जो असत्य ही । सत्य रूप । पिशाच की तरह दीखती है ?
वशिष्ठ बोले - हे राम ! पंच 5 भौतिक शरीर । परछाईं की तरह है । क्योंकि अपनी कल्पना से रचा है । और अहंकार रूपी पिशाच है । जैसे मिथ्या परछाईं में । पिशाच को देखकर । मनुष्य भयभीत होता है । वैसे ही । देह में । अहंकार को देखकर । खेद प्राप्त होता है । हे राम ! एक परम आत्मा । सबमें स्थित है । तब अहंकार कैसे हो ? वास्तव में । अहंकार कोई नहीं । परमात्मा ही अभेद रूप है । और उसमें अहं ( मैं पन ) बुद्धि भृम से भासती है । जैसे मिथ्या दर्शी को । मरु स्थल में । जल भासता है । वैसे ही । मिथ्या ज्ञान से । अहंकार कल्पना होती है । जैसे मणि का प्रकाश । मणि पर पड़ता है । सो मणि से भिन्न नहीं । मणि रूप ही है । वैसे ही । आत्मा में । जगत भासता है । सो आत्मा ही में स्थित है । जैसे जल में । दृवता से । चक्र और तरंग हो । भासते हैं । सो जल रूप ही हैं । वैसे ही । आत्मा में । चित्त से । जो नाना तत्व हो । भासता है । सो । आत्मा से भिन्न नहीं । असम्यक दर्शन से । नाना तत्व । भासता है । इससे । असम्यक दृष्टि को । त्याग कर । आनन्द रूप का आश्रय करो । और मोह के । आरम्भ को । त्याग कर । शुद्ध बुद्धि सहित । विचारो । और विचार से । सत्य ग्रहण

करो । असत्य का त्याग करो । हे राम ! तुम मोह का । महात्म्य देखो कि - स्थूल रूप देह को । जो नाशवन्त है । उसके रखने का उपाय करता है । पर वह रहता नहीं । और जिस मन रूपी शरीर के नाश हुए । कल्याण होता है । उसको पुष्ट करता है । हे राम ! सब मोह के आरम्भ । मिथ्या भृम से दृण हुए हैं । अनन्त आत्म तत्व में । कोई कल्पना नहीं । कौन किसको कहे । जो कुछ नाना तत्व । भासता है । वह है ही नहीं । और जीव बृह्म से अभिन्न है । तब उस बृह्म तत्व में । किसे बन्ध कहिये ? और किसे मोक्ष कहिये ? वास्तव में । न कोई बन्ध है । न मोक्ष है । क्योंकि आत्म सत्ता अनन्त रूप है । हे राम ! वास्तव में । द्वैत कल्पना कोई नहीं । केवल बृह्म सत्ता अपने आप में है । जो आत्म तत्व अनन्त है । वही अज्ञान से । अन्य की तरह भासता है । जब जीव अनात्म में । आत्म अभिमान करता है । तब परिच्छिन्न कल्पना होती है । और शरीर को । अच्छेद रूप जान कर । कष्टवान होता है । पर आत्म पद में । भेद अभेद विकार कोई नहीं । क्योंकि वह तो नित्य । शुद्ध । बोध । और अविनाशी पुरुष है । हे राम ! आत्मा में । न कोई विकार है । न बन्धन है । और न मोक्ष है । क्योंकि - आत्म तत्व । अनन्त रूप । निर्विकार । अच्छेद । निराकार । और अद्वैत रूप है । उसको बन्ध विकार कल्पना कैसे हो ? हे राम ! देह के नष्ट हुए । आत्मा नष्ट नहीं होता । जैसे चमड़ी में आकाश होता है । तो वह चमड़ी के नाश हुए । नष्ट नहीं होता । वैसे ही । देह के नाश हुए । गन्ध आकाश में लीन होती है । जैसे कमल पर । बरफ पड़ता है । तो कमल नष्ट हो जाता है । भृमर नष्ट नहीं होता । और जैसे मेघ के नाश हुए । पवन का नाश नहीं होता । वैसे ही । देह के नाश हुए । आत्मा का नाश नहीं होता । हे राम ! सबका शरीर मन है । और वह आत्मा की शक्ति है । उसमें यह जगत आदि । जगत रचा है । उस मन का । 


ज्ञान बिना । नाश नहीं होता । तो फिर शरीर आदि के । नष्ट हुए । आत्मा का नाश कैसे हो ? हे राम ! शरीर के नष्ट हुए । तुम्हारा नाश नहीं होगा । तुम क्यों मिथ्या । शोक वान होते हो ? तुम तो - नित्य । शुद्ध । और शान्त रूप आत्मा हो । हे राम ! जैसे मेघ के क्षीण हुए । पवन क्षीण नहीं होता । और कमलों के सूखने से । भृमर नष्ट नहीं होता । वैसे ही । देह के नष्ट हुए । आत्मा नष्ट नहीं होता । संसार में क्रीड़ा कर्ता । जो मन है । उसका संसार में । नाश नहीं होता । तो आत्मा का । नाश कैसे हो ? जैसे घट के नाश हुए । घट आकाश नाश नहीं होता । हे राम ! जैसे जल के कुण्ड में । सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है । और उस कुण्ड के नाश हुए । प्रतिबिम्ब का नाश नहीं होता । यदि उस जल को । और ठौर ले जायं । तो प्रतिबिम्ब भी । चलता भासता है । वैसे ही । देह में । जो आत्मा स्थित है । सो देह के चलने से । चलता भासता है । जैसे घट के फूटने से । घट आकाश महा आकाश में । स्थित होता है । वैसे ही । देह के नाश हुए । आत्मा निरामय पद में स्थित होता है । हे राम ! सब जीवों का देह । मन रूपी है । जब वह मृतक होता है । तब कुछ काल पर्यन्त । देश । काल । और पदार्थ का । अभाव हो जाता है । और इसके अनन्तर । फिर पदार्थ भासते हैं । उस मूर्छा का नाम मृतक है । आत्मा का नाश तो नहीं होता । चित्त की मूर्छा से । देश । काल । और पदार्थों के अभाव होने का नाम । मृतक है । हे राम ! संसार भृम का रचने वाला । जो मन है । उसका । ज्ञान रूपी अग्नि से । नाश होता है । आत्म सत्ता का नाश । कैसे हो ? हे राम ! देश । काल । और वस्तु से । मन का निश्चय । विपर्यय भाव को । प्राप्त होता है । चाहे अनेक यत्न करे । परन्तु ज्ञान बिना । नष्ट नहीं होता । हे राम ! कल्पित रूप । जन्म का । नाश नहीं होता । तो जगत के । पदार्थों से । आत्म सत्ता का । नाश कैसे हो ? इसलिये । शोक किसी का न करना । हे महाबाहो ! तुम तो - नित्य शुद्ध अविनाशी पुरुष

हो । यह जो । संकल्प वासना से । तुममें जन्म मरण आदि भासते हैं । सो भृम मात्र हैं । इससे । इस वासना को त्याग कर । तुम शुद्ध चिदाकाश में । स्थित हो जाओ । जैसे गरुड़ पक्षी । अण्डा त्याग कर । आकाश को उड़ता है । वैसे ही । वासना को त्याग कर । तुम चिदाकाश में । स्थित हो जाओ । हे राम ! शुद्ध आत्मा में । मनन फुरता है । वही मन है । वह मनन शक्ति । इष्ट और अनिष्ट से । बन्धन का कारण है । और वह मन । मिथ्या भ्रान्ति से । उदय हुआ है । जैसे स्वपन दृष्टा । भ्रान्ति मात्र होता है । वैसे ही । जागृत सृष्टि । भ्रान्ति मात्र है । हे राम ! यह जगत अविद्या से बन्धन मय । और दुख का कारण है । और उस अविद्या को । तारना कठिन है । अविचार से । अविद्या सिद्ध है । विचार किये से । नष्ट होती है । उसी अविद्या ने । जगत विस्तारा है । यह जगत बरफ की दीवार है । जब ज्ञान रूपी अग्नि का तेज होगा । तब निवृत हो जायेगी । हे राम ! यह जगत आशा रूप है । अविद्या । भ्रान्ति दृष्टि से । आकार हो । भासता है । और असत्य अविद्या से । बड़े विस्तार को प्राप्त होता है । यह दीर्घ स्वपन है । विचार किये से । निवृत हो जाता है । हे राम ! यह जगत । भावना मात्र है । वास्तव में कुछ उपजा नहीं । जैसे आकाश में । भ्रांति से । मारे मोर के । पुच्छ की तरह । तरुवर भासते हैं । वैसे ही । भ्रान्ति से । जगत भासता है । जैसे बरफ की शिला । तप्त करने से । लीन हो जाती है । वैसे ही । आत्म विचार से । जगत लीन हो जाता है । हे राम ! यह जगत । अविद्या से बँधा है । सो अनर्थ का कारण है । जैसे जैसे चित्त फुरता है । वैसे ही वैसे हो भासता है । जैसे इन्द्र जाल स्वर्ण की वर्षा आदि । माया रचता है । वैसे ही । चित्त जैसा फुरता है । तैसा ही हो भासता है । आत्मा के प्रमाद से । जो कुछ चेष्टा । मन करता है । वह अपने ही नाश के कारण होती है । जैसे घुरान । अर्थात कुसवारी की चेष्टा । अपने ही बन्धन का । कारण होती है । वैसे ही । मन की चेष्टा । अपने नाश के निमित्त होती है । और जैसे 


नट । अपनी क्रिया से । नाना प्रकार के रूप । धारता है । वैसे ही । मन । अपने संकल्प को । विकल्प करके । नाना प्रकार के भाव रूपों को धारता है । जब चित्त । अपने संकल्प विकल्प को । त्याग कर । आत्मा की ओर देखता है । तब चित्त नष्ट हो जाता है । और जब तक । आत्मा की ओर नहीं देखता । तब तक जगत को फैलाता है । सो दुख का कारण होता है । हे राम ! संकल्प आवरण को । दूर करो । तब आत्म तत्व प्रकाशेगा । संकल्प विकल्प ही । आत्मा में । आवरण है । जब दृश्य को त्यागोगे । तब आत्म बोध प्रकाशेगा । हे राम ! मन के नाश में । बड़ा आनन्द उदय होता है । और मन के उदय हुए । बड़ा अनर्थ होता है । इससे । मन के नाश करने का । यत्न करो । हे राम ! मन रूपी किसान ने । जगत रूपी वन । रचा है । उसमें सुख दुख रूपी वृक्ष हैं । और मन रूपी सर्प रहता है । जो विवेक से रहित । पुरुष हैं । उनको वह भोजन करता है । हे राम ! यह मन परम दुख का कारण है । इससे तुम मन रूपी शत्रु को । वैराग्य और अभ्यास रूपी खडग से मारो । तब आत्म पद को प्राप्त होगे ।
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