शुक्रवार, अप्रैल 06, 2012

आपके अपने अपने ईश्वर हैं

ध्यान कुछ ऐसा है । जिसका कि उस तरह से अभ्यास नहीं किया जा सकता । जिस तरह आप वायलिन या पियानो बजाने का अभ्यास करते हैं । आप अभ्यास करते हैं । अर्थात आप पूर्णता के किसी खास स्तर पर पहुंचना चाहते हैं । पर ध्यान में कोई स्तर नहीं है । कुछ पाना नहीं है । इसलिए ध्यान कोई चेतन या जान बूझ कर किया जाने वाला कर्म नहीं है । ध्यान वह है । जो पूरी तरह से बिना किसी दिशा निर्देशन के है । अगर मैं चाहूँ । तो अचेतन शब्द का प्रयोग कर सकता हूँ । यह जानबूझ कर की गयी प्रक्रिया नहीं है । अब इसे यहीं छोड़ें । हम इस पर बहुत समय एक घण्टा । एक पूरा दिन । बल्कि पूरा जीवन लगा सकते हैं । आइये अब अवकाश स्पेस के बारे में बात करें । क्योंकि ध्यान - वही अवकाश है ।
हमारी बुद्धि में अवकाश नहीं है । दो प्रयासों के बीच । दो विचारों के बीच । अवकाश है । लेकिन यह अब भी विचार की परिधि में है । इसलिए अवकाश क्या है ? क्या अवकाश में समय भी रहता है ? अथवा क्या समय में सारा अवकाश शामिल है ? हमने समय के बारे में बातचीत की । यदि अवकाश में समय है । तब तो यह अवकाश नहीं है ? यह तो घिरा हुआ और सीमित है । अतः क्या बुद्धि समय से मुक्त हो सकती है ? श्रीमन ! यह महत्वपूर्ण व्यापक प्रश्न है । यदि जीवन । सारा जीवन । अब मैं समाया है । तो आप देख पा रहे हैं कि - इसका आशय क्या है ? सारी मानवता आप हैं । सारी मानवता क्योंकि दुखी हैं । वह दुखी है । उसकी चेतना आप हैं । आपकी चेतना । आपका होना । वह है । यहां आप या मैं जैसा कुछ नहीं है । जो कि अवकाश को सीमित करे । अतः क्या समय का कोई अन्त है ? घड़ी का समय नहीं । जिसकी चाभी आप भरा करते हैं । और जो बन्द हो सकती है । बल्कि समय की समग्र गति ।
समय गति है । घटनाओं का एक समूह है । विचार भी गतियों का समूह हैं । इस तरह समय विचार है । अतः हम कह रहे हैं । क्या विचार का अन्त है ? जिसका आशय है । क्या ज्ञान का अन्त है ? क्या अनुभव का अन्त है ? जो कि पूर्ण मुक्ति है । और यही है ध्यान । न कि कहीं जाकर बैठना । और देखना । ये बचकाना है । ध्यान के लिए बुद्धि की ही नहीं । बल्कि गहरी अंतर दृष्‍टि‍ की भी आवश्यकता होती है । भौतिकविद । कलाकार । चित्रकार । कवि आदि सीमित अंतर दृष्टि रखते हैं । सीमित और छोटी । हम समयातीत अंतर दृष्टि की बात कर रहे हैं । यही है ध्यान । यही है धर्म । और यदि आप चाहें । तो शेष दिनों के लिए यही है । जीने का मार्ग ।
आप ईश्वर के विषय में बहुत चर्चा करते हैं । आपकी किताबें इससे भरी हुई हैं । आप गिरजे मन्दिर बनाते हैं । आप 


त्याग और बलिदान करते हैं । पूजा पाठ करते हैं । अनुष्ठान आयोजित करते हैं । और आप ईश्वर विषयक धारणाओं से भरे पड़े हैं । हैं कि नहीं ? आप यह शब्द ईश्वर तो दोहरा लेते हैं । पर आपके कर्म तो ईश्वरीय नहीं हैं । यद्यपि जिसे आप ईश्वर कहते हैं । उसकी आप उपासना करते हैं । आपके तौर तरीके । आपके विचार । आपका अस्तित्व ईश्वरीय नहीं हैं । क्या हैं ? हालांकि आप ईश्वर शब्द दोहराते रहते हैं । तो भी आप दूसरों का शोषण किया करते हैं । क्या आप ऐसा नहीं करते ? आपके अपने अपने ईश्वर हैं । हिन्दू । मुस्लिम । सिख । ईसाई । और कई अन्य । आप मंदिर बनवाते हैं । आप जितने ज्यादा अमीर होते जाते हैं । उतने ज्यादा मन्दिर बनवाने लगते हैं । हंसिये मत । आप खुद भी यही कर रहे हैं । और कुछ लोग धार्मिक रूप से अमीर होने में लगे हैं । अन्य लोग नोटों से अमीर होने की कोशिशों में लगे हैं । फर्क बस इतना सा ही है ।
तो आप ईश्वर से खूब परिचित हैं । कम से कम इस शब्द से तो हैं ही । पर यह शब्द ईश्वर नहीं है । शब्द वह वस्तु नहीं होता है । हम इस मुद्दे पर पूरी से स्पष्ट हो लें । यह शब्द ईश्वर नहीं है । आप ईश्वर शब्द का अथवा किसी अन्य शब्द का प्रयोग कर सकते हैं । किंतु ईश्वर वह शब्द नहीं है । जिसका प्रयोग आप कर रहे हैं । चूंकि आप ईश्वर शब्द का प्रयोग कर लेते हैं । इसका मतलब यह नहीं है कि - आप ईश्वर को जानते हैं । मैं इस शब्द का प्रयोग नहीं करता । इसकी बड़ी साफ वजह है कि - आप इसे जानते हैं । जो आप जानते हैं । वह यथार्थ नहीं है । इसके अतिरिक्त । यथार्थ का पता लगाने के लिए मन की सारी शाब्दिक बड़बड़ का बंद होना जरूरी है । क्या नहीं ? आपके यहां ईश्वर की प्रतिमाएं हैं । किंतु निश्चित वह प्रतिमा ईश्वर नहीं है । आप ईश्वर को कैसे जान पाएंगे ? जाहिर है । किसी मूर्ति के । किसी मंदिर के जरिये तो नहीं । ईश्वर को । अज्ञात को ग्रहण करने के लिए । मन को भी अज्ञात हो जाना होता है । यदि आप ईश्वर की तलाश में हैं । तो आप ईश्वर को पहले से ही जानते हैं । आप उस लक्ष्य से अवगत हैं । यदि आप ईश्वर को ढूंढ रहे हैं । तो आप जानते ही होंगे कि - ईश्वर क्या है ? नहीं तो आप उसे ढूंढते ही नहीं । या ढँढते हैं ? आप उसे या तो अपनी पुस्तकों के मताबिक ढूंढते हैं । या अपनी भावनाओं के अनुरूप ढूंढते हैं । आपकी भावनाएं आपकी स्मृति की प्रतिक्रियाएं मात्र हैं । इसलिए जिसे आप ढूंढ रहे हैं । वह पहले से ही गढ़ लिया गया है । या तो स्मृति के द्वारा या सुनी सुनाई बातों के द्वारा । और जो पूर्व निर्मित है । वह शाश्वत नहीं है । वह तो मन की ही उपज है ।
अगर किताबें नहीं होतीं । गुरू नहीं होते । दोहराने के लिए सूत्र नहीं होते । तो आपको पता होता । केवल दुख और सुख का । यही होता न ? लगातार दुख और परेशानियां एवं प्रसन्नता के कुछ विरले क्षण । और तब आप जानना चाहते कि - आपको दुख क्यों होता है ? पर आप ईश्वर में पलायन नहीं कर पाते । लेकिन शायद आप दूसरे तरीकों से पलायन करने लगते ( रूस में नास्तिकता वादियों के सुख और दुख की पहेलियों । जीवन की नीरसता से पलायन करने के ईश्वर के अलावा भी कई बहाने हैं । ) और शीघ्र ही पलायन के रूप में आप देवताओं का आविष्कार कर लेते । किंतु यदि आप दुख की समग्र प्रक्रिया को वस्तुतः समझना चाहते हैं । एक नूतन मानव की तरह । एक 


नए खिले इंसान की की तरह । पलायन नहीं । बल्कि जांच परख करते हुए । तब आप स्वयं को दुख से मुक्त कर लेंगे । तब आप खोज लें कि - यथार्थ क्या है ? ईश्वर क्या है ? पर जो मनुष्य दुख से गृस्त है । वह ईश्वर अथवा यथार्थ को नहीं खोज पाता । यथार्थ को तभी खोजा या पाया जा सकता है । जब दुख का अंत हो जाता है । जब प्रसन्नता विद्यमान होती है । तुलना की जा सकने वाली विषमता के रूप में नहीं । विपरीत के रूप में नहीं । अपितु वह तो एक ऐसी अवस्था है । जिसमें विपरीत है ही नहीं ।
अतः अज्ञात वह ? जिसकी सृष्टि मन ने नहीं की है । मन द्वारा प्रतिपादित । सूत्र बद्ध नहीं किया जा सकता । वह जो कि अज्ञात है । उसके बारे में सोचा नहीं जा सकता । जिस क्षण आप अज्ञात के विषय में सोचने लगते हैं । यह ज्ञात ही होता है । निश्चित ही आप अज्ञात के विषय में विचार नहीं कर सकते । कर सकते हैं क्या ? आप विचार केवल ज्ञात के बारे में ही कर सकते हैं । विचार की गति ज्ञात से ज्ञात की ओर ही होती है । और जो ज्ञात है । वह यथार्थ नहीं है । तो जब आप सोचते हैं । और ध्यान करते हैं । जब आप बैठ जाते हैं । और ईश्वर के विषय में विचार करने लगते हैं । तब आप उसी के विषय में विचार कर रहे होते हैं । जो ज्ञात है । वह समय में है । वह समय के जाल में आबद्ध है । अतएव यह यथार्थ नहीं है । यथार्थ केवल तभी अस्तित्व में आ सकता है । जब मन समय के जाल से मुक्त हो जाता है । जब मन सृजन करना बंद कर देता है । तब सर्जन होता है । तात्पर्य यह है कि - मन का पूर्ण रूपेण स्थिर होना । निश्चल होना जरूरी है ? लेकिन वह उकसाई तथा सम्मोहन जन्य स्थिरता नहीं होनी चाहिए । वह तो मात्र एक परिणाम ही होगी । यथार्थ का अनुभव करने के लिए स्थिर बनने की कोशिश करना । पलायन का ही एक और रूप है । शांति स्थिरता तभी होती है । जब सारी समस्याएं समाप्त हो चुकी होती हैं । जैसे हवा के थमने पर सरोवर शांति हो जाता है । वैसे ही मन स्वाभाविक रूप से मौन शांत हो जाता है । जब बेचैन करने वाला विचारक नहीं रहता । विचार के अंत हेतु । वे सभी विचार जिनका वह निर्माण कर रहा है । सोच लिये जाने जरूरी हैं । विचार का प्रतिरोध करने से । उसके खिलाफ प्रतिरोध खड़े करने से । कुछ होने वाला नहीं है । क्योंकि सभी विचारों को अनुभूत कर लेना । महसूस कर लेना । आवश्यक है ।
जब मन स्थिर प्रशांत होता है । तो यथार्थ । वह अनिर्वचनीय प्रकट होता है । आप इसे निमंत्रित नहीं कर सकते । इसे निमंत्रित करने के लिए तो आपका इसे जानना जरूरी होगा । और जो जाना हुआ है । ज्ञात है । वह यथार्थ नहीं है । अतः यह आवश्यक है कि - मन सरल हो । विश्वासों से । कल्पित धारणाओं से लदा हुआ न हो । और जब स्थिरता होती है । जब कोई इच्छा । कोई ललक नहीं रहती । जब ऐसी स्थिरता सहित जिसे प्रवृत्त नहीं किया गया

है । लादा नहीं गया है । मन खामोश होता है । तब यथार्थ का आगमन होता है । एवं वह सत्य । वह यथार्थ ही एकमात्र रूपांतर कारी तत्व है । केवल यही वह कारक है । जो हमारे अस्तित्व में । हमारे दैनिक जीवन में । एक आधार भूत आमूल क्रांति लाता है । उस यथार्थ को पाने के लिए उसे खोजना नहीं पड़ता । बल्कि उन कारकों को समझ लेना होता है । जो मन को उद्वेलित बेचैन करते रहते हैं । तब मन सरल । मौन । स्थिर होता है । उस स्थिरता में वह अज्ञात । वह अविज्ञेय आविर्भूत होता है । जब ऐसा होता है । तो आशीर्वाद होता है । स्वस्ति होती है ।
मुंबई 8 फरवरी 1948 पुस्तक - ईश्वर क्या है ? पृष्ठ क्रमांक 55-57
जब तक भी कुछ हासिल करने की इच्छा है । कुछ उपलब्धि । कुछ होने की इच्छा है । भले ही वो किसी भी स्तर पर हो । तब तक । तब तक वहाँ पर क्षोभ । गुस्सा । शोक । भय होगा । अमीर होने की आकांक्षा । ये और वो होने की महत्वाकांक्षा । तभी गिर सकती है । जब हम इस शब्द में निहित सड़ांध या महत्वाकांक्षा की भृष्ट प्रकृति को समझ लें । उन क्षणों में जबकि हम देख समझ लेते हैं कि ताकत सत्ता हासिल करने की इच्छा । चाहे वो किसी भी रूप में हो । चाहे वो प्रधानमंत्री बन जाने की हो । या जज । या कोई पुजारी । या धर्म गुरू । हमारी किसी भी प्रकार की शक्ति अर्जित करने की इच्छा । आधार भूत रूप से पैशाचकीय या पाप है । लेकिन हम नहीं देख पाते कि - महत्वाकांक्षा भृष्ट करती है । यह कि शक्ति की ताकत की आकांक्षा वीभत्स है । इसके विपरीत हम कहते हैं कि - हम शक्ति और ताकत को भले काम में लगायेंगे । जो कि निहायत ही बेवकूफाना वक्तव्य है । किसी भी गलत चीज से अंत में कोई सही चीज हासिल नहीं की जा सकती । यदि माध्यम या साधन गलत हैं । तो उनका अंजाम या परिणाम भी गलत ही होंगे । यदि हम सभी महत्वाकांक्षाओं के सम्पूर्ण आशय को । उनके परिणामों । उसके परिणामों के साथ ही मिलने वाले ऐच्छिक अनैच्छिक परिणामों सहित नहीं जानते । समझते हैं । और अन्य इच्छाओं के केवल दमन का प्रयास करते हैं । तो इस बात का कुछ भी अर्थ नहीं है । जे. कृष्णमूर्ति

और इसकी भी कि प्रेम क्या है ?

मौन या निशब्दता अपने आप आती है । जब आप जानते हैं कि - अवलोकन कैसे किया जाता है । मन की शांति सहज ही अपने आप आती है । यह स्वाभाविक रूप से आती है । सुगमता पूर्वक । बिना किसी कोशिश या प्रयास के । यदि आप जानते हैं कि - अवलोकन कैसे किया जाता है ? देखा कैसे जाता है ?
जब आप किसी बादल को देखते हैं । तो उसकी तरफ शब्द रहित और इसलिए बिना किसी विचार के देखें । उसकी तरफ बिना किसी अवलोकन कर्ता के अलगाव के देखें । तब वहां इस देखने के कर्म में ही । एक अवलोकन और अवधान होगा । ना कि संकल्प पूर्वक अवधान पूर्ण होना । लेकिन बस अवधान पूर्वक देखना । तब यह घटना चाहे । क्षण भर । सेकेंड भर । या मिनिट भर रहे । पर्याप्त है । तब लोभ ना करें । या ये ना कहें कि - मुझे ऐसे ही स्थिति में सारा दिन रहना है । अवलोकन कर्ता के बिना देखने का मतलब है । अवलोक्य वस्तु और अवलोकन कर्ता के बीच बिना किसी अंतराल । स्थान के देखना । इसका यह मतलब भी नहीं है कि - हम उस वस्तु के साथ ही खुद को सम्बद्ध । लीन । समायोजित कर लें । जिसकी तरफ देख रहे हैं । लेकिन देखना भर हो जाना ।
तो जब कोई किसी पेड़ की तरफ । या किसी बादल की तरफ देखे । या पानी में पड़ते प्रकाश की तरफ । तो बिना अवलोकन कर्ता बने । और यह भी । जो कि बहुत ही ज्यादा कठिन है । जो कि महान अवधान की मांग करता है । यदि आप अपने आपको ही देखें  । बिना अपनी कोई छवि गढ़े । अपने बारे में कोई निर्णय किये बगैर । क्योंकि - छवि । निर्णय । मत या राय । फैसले । अच्छाईयों । बुराईयां । ये सब अवलोकन कर्ता के इर्द गिर्द केन्द्रित हैं । तब आपको पता चलेगा कि - मन । मस्तिष्क । असामान्य । अप्रत्याशित रूप से शांत है । इस शांति या निस्तब्धता का संवर्धन । या इसे विकसित नहीं किया जा सकता । यह बस होती है । यह तब होती है । जब आप अवधान पूर्ण होते हैं । यदि आप हर वक्त हर समय देखते रहने । अवलोकन करने में सक्षम होते हैं । अपने हाव भाव को देखना ।

अपने शब्दों को देखना । अपने अहसासों अनुभवों को देखना । अपने चेहरे पर आने जाने वाले भावों को महसूसना । और वह सब जो आप हैं ।
क्या यह संभव है कि - हम खुद को डर से पूरी तरह मुक्त कर लें ? किसी भी तरह के डर से । क्योंकि भय किसी भी तरह का हो । भृम पैदा करता है । यह दिमाग को कुंद बनाता है । खोखला करता है । जहां भी डर होगा । निश्चित ही वहां आजादी नहीं हो सकती । मुक्तता नहीं हो सकती । और जहां स्वतंत्रता नहीं होगी । वहां प्रेम भी नहीं हो सकता । हममें से बहुत से लोग किसी ना किसी तरह के भय से गृस्त रहते ही हैं । अंधेरे का भय । लोग क्या कहेंगे ? इस बात का भय । सांप का भय । शारीरिक दुख दर्दों का भय । बुढ़ापे की परेशानियों का भय । मौत का भय । और ऐसे ही सैकड़ों की संख्या में कई तरह के भय हैं । तो क्या ऐसा संभव है कि - हम भय से पूर्णतः मुक्त रहें ?
हम देख सकते हैं कि - हम में से हर आदमी के लिए भय क्या क्या करता है । इसी के कारण कोई झूठ बोलता है । यह आदमी को कई तरह से भृष्ट करता है । यह बुद्धि को उथला । और खोखला बना देता है । तो हमारे मन में कई अंधेरे कोने होते हैं । जिनकी तब तक खोज और उनका उदघाटन नहीं हो पाता । जब तक कि हम डरें । शारीरिक सुरक्षा । एक जहरीले सांप से खुद को दूर रखने की एक स्वाभाविक वृत्ति । किसी ऊंची चट्टान के ऊपर खड़े होने से बचना । या ट्रेन के सामने आने से बचना । एक स्वाभाविक सहज स्वस्थ बचाव है । लेकिन हम उस डर की बात कर रहे हैं । जो मनोवैज्ञानिक आत्म रक्षण है । जो कि एक आदमी को बीमारियों से । मौत से । और दुश्मन से डराता है । हम जब भी किसी भी रूप में पूर्णता की तलाश में रहते हैं । वह चाहे चित्र कला हो । संगीत हो । किन्हीं तरह के रिश्ते हों । या आप जो भी होना चाहें । वहां हमेशा भय होता है । तो बहुत ही महत्वपूर्ण क्या है ? यह कि हम भय कि इस सारी प्रक्रिया के प्रति खुद को जागरूक रखें । भय का अवलोकन करके । इसके बारे में सीख कर । और यह ना कहें कि - इसको कैसे दबायें । कुचलें ? जब हम भय को दबाने या कुचलने की बात करते हैं । तो हम फिर इससे पलायन के रास्तों पर चलने लगते हैं । और भय से पलायन करने से तो । भय से मुक्ति नहीं मिलती ।
रिश्तों को समझने के लिए आवश्यक रूप से एक निष्क्रिय अप्रतिरोधात्मक धैर्य होना चाहिए । जो रिश्तों को नष्ट ना करता हो । इसके विपरीत यह धैर्य रिश्तों को और जीवन्त और सार्थक बनाता है । तब उस रिश्ते में वास्तविक

लगाव की संभावना होती है । उसमें उष्णता होती है । निकटता का अहसास होता है । जो कि केवल निरी भावुकता और रोमांच नहीं होता । यदि हम ऐसे रिश्ते तक पहुंच सकते हैं । या सारी चीजों । सारी बातों । सारे अस्तित्व के साथ हम ऐसे ही रिश्ते में हैं । तो हमारी समस्या सहज ही हल हो जायेगी । चाहे वह सम्पत्ति की समस्या हो । चाहे वह किसी आधिपत्य की समस्या हो । क्योंकि हम वही हैं । हम जिन जिस पर आधिपत्य चाहते हैं । वह व्यक्ति जो धन पर आधिपत्य चाहता है । उसका जीवन धन ही है । जो संपत्ति । या जमीन जायदाद । फर्नीचर आदि पर कब्जे करना चाहता है । उसका जीवन किसी संपत्ति की तरह ही है । ऐसा ही संकल्पनाओं विचारों के साथ भी है । या लोगो कें साथ भी । और जब भी जहां पर आधिपत्य शाली होना चाहा जाता है । वहां रिश्ता नहीं होता । लेकिन हम में से बहुत से लोग आधिपत्य चाहते हैं । क्योंकि हमें तभी लगता है कि - हम कुछ हैं । यदि हमारा किसी चीज पर कब्जा ही ना हो । तो लगता ही नहीं कि हम कुछ हैं ।
अगर हमारे आधिपत्य में कुछ ना हो । यदि हम अपने जीवन को फर्नीचर । संगीत । ज्ञान और यह और वह से नहीं भर लेते । तो हम खुद को खोखले घोंघे सा अनुभव करते हैं । यह खोखलापन बहुत ही शोर पैदा करता है । इस शोर को ही हम जीना कहते हैं ? और यही है । जिससे हम संतुष्ट भी रहते हैं । अगर इस सब में किसी तरह का व्यवधान पड़ता है । यह चक्र टूटता है । तब वहां पर हम दुख होता है । क्योंकि तब वहां पर अचानक ही आप अपनी नग्नता को देख पाते हैं । वह देख पाते हैं । जो कि आप असलियत में । हकीकत में हैं । बिना किसी मतलब का । एक खोखला घोंघापन ।
तो रिश्तों के इस सारे बुनाव के प्रति होश वान होना ही । धैर्य पूर्ण या विधेयात्मक कर्म है । इसी कर्म से वास्तविक संबंधों की संभावना बनती है । एक संभावना बनती है । रिश्तों की अतल गहराईयों की । सार्थकता की खोज की । और इसकी भी कि प्रेम क्या है ?

जब आप किसी चीज को नाम देते हैं । तो आपके नाम करण की यह क्रिया । यह शब्द आपको अवलोकन से विकर्षित करता है । भटकाता है । आपके अवलोकन को दोष पूर्ण बनाता है । जब आप शब्द बरगद का प्रयोग करते हैं । तो आप किसी वृक्ष को उस शब्द के माध्यम से देखते हैं । ना कि उस वृक्ष की वास्तविकता को । आप उस वृक्ष को उस छवि के माध्यम से देखते हैं । जो आपने उस वृक्ष के बारे में बनाई हुई है । तो यह छवि दृष्टि को बाधित करती है । इसी तरह यदि आप अपने को ही देखने की कोशिश करें । बिना अपनी कोई छवि बनाये । तो 


यह बड़ा ही अजीब । और गहरे में विक्षुब्ध करने वाला होता है । जब आप गुस्से में । जब ईर्ष्या में हों । तो इन अहसासों को बिना किसी अच्छी या बुरी श्रेणी में रखे । बिना किसी अहसास का नामकरण किये देंखे । क्योंकि जब आप इस अहसास को किसी अच्छी या बुरी श्रेणी में डालते हैं । या इसे नाम देते हैं । तो आप आप वर्तमान के किसी क्षण को अतीत की स्मृतियों के माध्यम से देखते हैं । मुझे नहीं पता । आपको यह सब समझ में आ रहा है । या नहीं । कहने का तात्पर्य यह है कि - किसी अहसास के वर्तमान में सामने आने पर । आप यथार्थतः किसी अहसास को - जैसा वो है । वैसा ना देखकर । जब उसी तरह का कोई अन्य अहसास अतीत में पैदा हुआ था । उस अहसास के बारे में अपनी इकट्ठा की गई स्मृतियों । उस अहसास के बारे में । जो आपने जो कभी पढ़ा । सुना । लिखा । देखा है । उनके माध्यम से देखते हैं । साक्षात अवलोकन तब होता है । जब अवलोकन अतीत के माध्यम से नहीं हो रहा । इसी क्षण को इसी क्षण में देखा जा रहा हो । जे. कृष्ण्मूर्ति

प्रश्न है कि जीवन में आपका ध्येय क्या हो ?

आप इसलिए है । क्योंकि आपके माता पिता ने आपको जन्म दिया है । और आप भारत के ही नहीं । विश्व की सम्पूर्ण मानवता के । शताब्दियों के विकास का परिणाम हैं । आप किसी असाधारण अनूठेपन से नहीं जनमें हैं । बल्कि आपके साथ पंरपरा की पूरी पृष्ठ भूमि है । आप हिन्दू या मुस्लिम हैं । आप पर्यावरण । वातावरण । खान पान । सामाजिक । और सांस्कृतिक परिवेशों । और आर्थिक दबावों से उपजे हैं । आप अनेकों शताब्दियों का । समय का । द्वंद्वों का । दर्दों का । खुशियों का । और लगाव । चाव का परिणाम हैं । आपमें से हर कोई जब यह कहता है कि - वह एक आत्मा है । जब आप कहते हैं कि - आप शुद्ध ब्राह्मण हैं । तो आप केवल परंपरा का । किसी संकल्पना का । किसी संस्कृति । भारत की विरासत । भारत की सदियों से चली आ रही विरासत । का ही अनुकरण कर रहे होते हैं ।
प्रश्न है कि - जीवन में आपका ध्येय क्या हो ? तो पहले तो आपको अपनी पृष्ठ भूमि को समझना होगा । यदि आप परम्परा । संस्कृति को । समूचे परिदृश्य को । नहीं समझते । तो आप अपनी पृष्ठ भूमि से उपजे किसी आयडिये । मिथ्या अर्थ को मान लेंगें । और उसे ही अपने जीवन का ध्येय कहने लगेंगे । माना कि आप हिन्दू हैं । और हिन्दू संस्कृति में पले बढ़े हैं । तो आप हिन्दू वाद से उपजे किसी सिद्धांत या भावना को चुन लेंगे । और उसे अपने जीवन का ध्येय बना लेंगे । लेकिन क्या आप किसी अन्य हिन्दू से अलग । पूरी तरह अलग तरह से सोच सकते हैं ? यह जानने के लिए कि - हमारे अंतर्तम की क्या संभावनाएं । या हमारा अंतर्तम क्या गुहार लगा रहा है । क्या कह रहा है ? यह जानने के लिए किसी व्यक्ति को इन सभी बाहरी दबावों से । बाहरी दशाओं से । मुक्त होना ही होगा । यदि मैं किसी चीज की जड़ तक जाना चाहता हूं । तो मुझे यह सब खरपतवार या व्यर्थ की चीजें हटानी होंगी । जिसका

मतलब है । मुझे हिन्दू । मुसलमान । सिख । ईसाई होने से हटना होगा । और यहां भय भी नहीं होना चाहिए । ना ही कोई महत्वाकांक्षा । ना ही कोई चाह । तब मैं कहीं गहरे तक पैठ सकता हूं । और जान सकता हूं कि - हकीकत में यथार्थ संभावना जनक, या सार्थक क्या है । लेकिन इन सबको हटाये बिना - मैं जीवन में सार्थक क्या है ? इसका अंदाजा नहीं लगा सकता । ऐसा करना मुझे केवल भृम और दार्शनिक अटकल बाजियों में ही ले जायेगा ।
तो यह सब कैसे होगा ? पहले तो हमें सदियों से जमी धूल को हटाना होगा । जो कि बहुत आसान नहीं है । इसके लिए गहरी अंतर दृष्टि की जरूरत है । इसमें आपकी गहरी रूचि होनी चाहिए । संस्कारों का निर्मूलन । परंपराओं । अंधविश्वासों । सांस्कृतिक प्रभावों । की धूल को हटाने के लिए । खुद को । अपने आपको समझने की आवश्यकता होती है । ना कि किताबों से । या किसी शिक्षक से सीखने की । यही ध्यान है ।
जब मन अपने आपको सारे अतीत की धूल से साफ कर लेता है । मुक्त कर लेता है । तब आप अपने अस्तित्व की सार्थकता के बारे में बात कर सकते हैं । आपने यह प्रश्न किया है । तो अब इस पर आगे बढ़ें । तब तक लगे रहें । जबकि यह ना जान लें कि - क्या कोई ऐसी किसी वास्तविक । मौलिक । अभृष्ट चीज है भी ? यह ना कहें कि - हां ! वाकई ऐस कुछ है । या ऐसा कुछ नहीं होता । बस इस पर काम करना जारी रखें । तलाशने । पाने । जानने की कोशिश ना करें । क्योंकि आप जान नहीं पायेंगे । एक ऐसा मन जो भृष्ट है । वो उस चीज को कैसे जान सकता है ? जो कि शुद्ध है । भृष्ट नहीं है । क्या मन खुद को साफ शुद्ध कर सकता है ? हां कर सकता है । और यदि मन अपने 


आपको शुद्ध साफ कर सकता है । तब आप देख सकते हैं । तब आप जान सकते हैं । पता लगा सकते हैं । मन का परिष्करण शुद्धि करण ध्यान है ।
प्रश्‍़न - मेरे जैसा आम आदमी ज्यादातर अपनी तात्कालिक समस्याओं जैसे अभाव । बेरोजगारी । बीमारी । द्वंद्व आदि में ही घिरा रहता है । तो जीवन की गहरे मुद्दों की ओर - मैं कैसे ध्यान दे सकता हूं ? हम सभी लोग आपदाओं से तत्कालिक राहत पाने के उपाय ढूंढते रहते हैं ।
उत्‍तर - हम सभी अपनी समस्याओं के त्वरित समाधान चाहते हैं । हम सभी आम जन हैं । भले ही हम सामाजिक या धार्मिक रूप से कितने ही उच्च पद पर आसीन हों । हमारी रोजाना की आम जिन्दगी में यही छोटी छोटी परेशानियां रहती हैं - जलन । गुस्सा । हमें कोई प्यार नहीं करता । इस बात का दुख । और अगर प्यार किया जा रहा है । तो उसका अपार आनन्द । यदि आप जीवन की इन छोटी छोटी चीजों को समझ सकें । तो आप इनमें अपने दिल दिमाग के काम करने के ढंग को देख सकेंगें । यह मुद्दा नहीं है कि - आप गृहिणी हैं । और आपको आजीवन दिन में तीन बार खाना बनाना है । पति की दासता में रहना । या पति हैं । तो पत्नी की गुलामी करनी है ।
खुशी । गम । विपत्तियों । आशा । निराशा के इन संबंधों को यदि आप बहुत ही सतही स्तर से शुरू करें । तो यदि आप इनका अवलोकन करते हैं । देखते हैं । धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करते हुए । बिना बढ़ाई या निंदा करते हुए । सचेत रहते हुए । बिना कोई फैसला किये । तो आपको मन समस्या में गहरे और गहरे पैठता जाता है । लेकिन यदि आप किसी समस्या विशेष से निजात पाने के पहलू से ही सरोकार रखते हैं । तो आपका मन बहुत ही सतही स्तर पर बना रहता है ।
ईर्ष्या या जलन की समस्या को ही लें । क्योंकि हमारा समाज ईर्ष्या पर ही आधारित है । ईर्ष्या है - अर्जित करना ।

लोभ । आपके पास कुछ है । मेरे पास नहीं है । आप कुछ हैं । मैं कुछ भी नहीं हूं । और मैं कुछ होने के लिए आपसे प्रतिस्पर्धा करता हूं । आपके पास अधिक ज्ञान है । अधिक धन दौलत है । अधिक अनुभव है । मेरे पास नहीं है । तो इस प्रकार यह चिर स्थायी संघर्ष बना रहता है । आप हमेशा आगे ही आगे बढ़ते चले जाते हैं । और मैं हमेशा नीचे की ओर धंसता गिरता चला जाता हूं । आप गुरू हैं । और मैं शिष्य हूं । या अनुयायी हूं । और आपके और मेरे बीच गहरी खाई है । आप हमेशा आगे हैं । और मैं हमेशा पीछे । यदि हम देख सकें । तो इस सभी संघर्षों के । इन सभी कोशिशों के । इन सभी दुख पीड़ाओं के । इन छोटी मोटी बीमारियों के । और रोजाना की अन्य कई छोटी छोटी बातों के । असंख्य निहितार्थ हैं ।
आपको वेद । पुराणों । किताबों को पढ़ने की कतई आवश्यकता नहीं है । आप इन सबको एक तरफ रख दें । इनका कोई महत्व नहीं हैं ? महत्वपूर्ण यह बात है कि - आप अपने जीवन की इन छोटी छोटी बातों को उनकी वास्तविकता में देखें । उनसे सीधे सीधे साक्षात्कार करें । तो यही चीजें आपको अपने अंतर निहित तथ्यों से भिन्न रूप से साक्षात्कार करायेंगी ।
आखिरकार जब आप किसी वृक्ष का सौन्दर्य देखते हैं । उड़ती हुई चिडि़या देखते हैं । सूर्यास्त या लहराता हुआ जल देखते हैं । तो ये सब आपको बहुत कुछ बताते हैं । और जब आप जीवन की कुरूप चीजें देखें । धूल । गंदगी । निराशा । अत्याचार । भय को  तो ये सब भी विचार की मूलभूत प्रक्रिया से परिचित कराते हैं । यदि मन केवल पलायन से ही सरोकार रखता है । किसी राम बाण उपाय की तलाश में रहता है । सभी सम्बंधों के अन्वेषण से बचना चाहता है । तो हम इन सबके प्रति कदापि सचेत नहीं हो सकते । दुर्भाग्य से हमारे पास धैर्य नहीं है । हम त्वरित जवाब चाहते है । समाधान चाहते हैं । हमारा मन समस्या के प्रति बहुत ही बेसब्र है । अधैर्य पूर्ण है ।
लेकिन यदि मन समस्या का अवलोकन करने में सक्षम हो सके । उससे दूर ना भागे । उसके साथ जी सके । तब यही समस्या उसके सामने अपने सारे अदभुत गुण धर्मों को खोलती चली जायेगी ।  मन समस्या की गहराई तक जा सकेगा । तो मन कोई ऐसी चीज नहीं रह जायेगा । जो परिस्थितियों । समस्याओं । विपत्तियों द्वारा परेशान हो जाये । तब मन जल से आपूरित एक शांत स्निग्ध ताल की तरह हो जायेगा । और केवल ऐसा ही मन निश्चलता और शांति में सक्षम हो सकता है ।
भीतर अचेतन में अतीत का जबरदस्त जोर रहता है । जो आपको एक विशेष दिशा में धकेलता है । अब कोई कैसे इस सब को एकबारगी ही पोंछ दे । कैसे अचेतन से अतीत को तुरन्त ही साफ किया जाये ? विश्लेषक सोचता है कि - विश्लेषण द्वारा । जाँच पड़ताल करके । इसके घटकों को तलाश करके । स्वीकार करके । या सपनों की व्याख्या इत्यादि करके । अचेतन को थोड़ा थोड़ा करके । टुकड़ों में । या यहां तक कि - पूरी तरह साफ किया जा सकता है । ताकि हम कम से कम सामान्य आदमी रहें । ताकि हम अपने आपको निवर्तमान माहौल के हिसाब के अनुकूल बना सकें । लेकिन विश्लेषण में सदैव एक विश्लेषण कर्ता होता है । और एक विश्लेषण । या परिणाम । एक अवलोकन कर्ता जो कि अवलोकन की जाने वाली चीजों की व्याख्या करता है । यह ही द्वैत है । जो कि द्वंद्व का स्रोत है ।
तो अचेतन का विश्लेषण मात्र कहीं नहीं पहुंचा पाता । हो सकता है कि - यह हमारा पागलपन कम करे । अपनी पत्नि या पड़ोसी के प्रति कुछ विनमृ बना दे । या इसी तरह की कुछ बातें । लेकिन ये वो चीज नहीं । जिस बारे में हम बात कर रहे हैं । हम देखते हैं कि - विश्लेषण प्रक्रिया जिसमें कि समय । व्याख्या । और विचारों की सक्रियता शामिल है । एक अवलोकन कर्ता के रूप में । जो कि किसी चीज का विश्लेषण कर देख रहा है । यह सब अचेतन को मुक्त नहीं करता । इसलिए मैं विश्लेषण प्रक्रिया को पूरी तरह से अस्वीकार करता हूँ । जिस क्षण मैं यह तथ्य देखता हूं कि - विश्लेषण किन्हीं भी परिस्थितियों में अचेतन का बोझ नहीं हटा सकता । मैं विश्लेषण से बाहर हो जाता हूँ । मैं अब विश्लेषण नहीं करता । तो क्या होता है ? क्योंकि अब कोई भी विश्लेषण कर्ता उस चीज से अलग नहीं है । जिसका कि विश्लेषण किया जा रहा है । वह वही चीज है । वो उससे ( विश्लेषण से ) भिन्न कोई अस्तित्व नहीं है । तब कोई भी देख सकता है कि - अचेतन बहुत ही कम महत्व का है । जे. कृष्णमूर्ति

क्या मौत के बाद कुछ बचता है ?

मुझे नहीं लगता कि - कोई सरल मार्ग है । क्योंकि ईश्वर को पाना । अत्यंत कठिन । अत्यधिक श्रम साध्य बात है । जिसे हम ईश्वर कहते हैं ? क्या मन ही ने उसका निर्माण नहीं किया है ? आप जानते ही हैं कि - मन क्या होता है ? मन समय का परिणाम है । और यह कुछ भी । किसी भी । भ्रांति को निर्मित कर सकता है । धारणाओं को बुनने । तथा रंगीनियों । और कल्पनाओं में अपना प्रक्षेपण करने की शक्ति इसके पास है । यह निरन्तर संचय काट छांट और चयन करता रहता है । संकीर्ण सीमित तथा पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने के कारण । यह अपनी सीमाओं के अनुसार ईश्वर की कल्पना कर सकता है । उसकी छवि बना सकता है । चूंकि कुछ खास शिक्षकों  पुरोहितों तथा तथाकथित उद्धार कर्ताओं ने कह रखा है कि - ईश्वर है ? और उसका वर्णन भी कर दिया है । इसलिए उसी शब्दावली में मन ईश्वर की कल्पना तो कर सकता है । लेकिन वह कल्पना । वह छवि ईश्वर नहीं है । ईश्वर का अन्वेषण मन द्वारा नहीं किया जा सकता ।
ईश्वर को समझने के लिए पहले आपको अपने मन को समझना होगा । जो बहुत कठिन है । मन बहुत पेचीदा है । और इसे समझना सरल नहीं है । बैठे बैठे किसी प्रकार के सपने में खो जाना । विविध दिव्य दृश्यों । तथा भ्रांतियों में लीन हो जाना । और यह सोचने लगना कि - आप ईश्वर के बहुत करीब आ गये हैं । यह सब तो काफी सरल है । मन अपने साथ अतिशय छल कर सकता है । अतः जिसे ईश्वर कहा जा सकता है ? उसका अनुभव करने के लिए आपको पूर्णतः शांत होना होगा । और क्या आपको यह मालूम नहीं है कि - यह कितना अधिक कठिन है ? क्या आपने ध्यान दिया है कि - वयस्क लोग कभी भी शांत नहीं बैठ पाते हैं । वे किस तरह बेचैन रहते हैं । पैर हिलाते

रहते हैं । हाथों को डुलाते रहते हैं ? शारीरिक रूप से ही निश्चल बैठ पाना कितना दुसाध्य है । मन का निश्चल होना । तो और भी कितना ज्यादा मुश्किल है ? आप किसी गुरू का अनुगमन कर सकते हैं । और अपने मन को शांत होने के लिए बाध्य कर सकते हैं ? पर आपका मन वस्तुतः शांत नहीं होता । यह अब भी बेचैन होता है । जैसे किसी बच्चे को कोने में खड़ा कर दिया गया हो । बिना किसी जोर जबरदस्ती के पूर्णतः मौन होना । एक महान कला हैं । केवल तभी उसकी अनुभूति हो पाने की संभावना होती है । जिसे ईश्वर कहा जा सकता है ?
क्या मृत्यु के बाद भी कुछ बचता है ? जब एक आदमी दुख से भरा हुआ । मोह गृस्त और खेदजनक स्थितियों में मरता है । तो क्या बचता है ?
क्या असली प्रश्न यह नहीं है कि - क्या मौत के बाद । कुछ बचता है ? जब आपका कोई करीबी मर जाता है । तो आप कितना सयापा करते हैं ? क्या आपने इस पर कभी गौर किया ? सब आपके साथ रोते हैं । जब अपने भारत देश में कोई मर जाता है । तो जितना शोक संताप किया जाता है । ऐसा सारी दुनियां में कहीं नहीं होता । आइये इसे गहराई में जाने ।
सबसे पहले तो क्या आप देख सकते हैं । क्या आप हकीकतन महसूस कर सकते हैं कि - आपकी चेतना ही सारी मानवता की चेतना है ? क्या आप ऐसा महसूस कर सकते हैं ? क्या यह आपके लिए एक तथ्य की तरह है ? क्या यह आपके लिए यह उसी तरह तथ्य है । जैसे कि कोई आप आपके हाथ में सुई चुभोए । और आप उसका दर्द महसूस करें ? क्या यह इसी तरह वास्तविक है ?
मानव मस्तिष्क का विकास समय में हुआ है । और यह करोड़ों वर्षों के विकास का परिणाम है । यह मस्तिष्क एक विशेष ढांचे में बद्ध हो सकता है । यदि कोई व्यक्ति दुनियां के किसी विशेष भाग में । एक संस्कृति और परिवेश में रह रहा हो । तो भी यह एक सामान्य आम मानव चेतना युक्त मस्तिष्क ही होता है । इस बारे में आप पूर्णतः आश्वस्त रहें । यह आपका व्यक्तिगत मस्तिष्क नहीं होता । यह सामान्य चेतना होती है । मस्तिष्क को पैतृक रूप से या विरासत में बहुत सारी प्रतिक्रियाएं मिली होती हैं । और यह दिमाग अपने जींस ( गुण सूत्रों )

सहित । जिनमें कुछ पैतृक होते हैं । कुछ समय में विकसित । इसमें मानवीय चेतना सामान्य घटक होती है । इस तरह यह मात्र आपका ही मस्तिष्क नहीं होता । यह सम्पूर्ण मानवीय चेतना भी होता है । विचार यह कह सकता है कि - यह मेरा दिमाग है । विचार यह कह सकता है कि - मैं एक व्यक्ति हूं । यही हमारा ढांचा बद्ध । सांचा बद्ध । या बद्ध होना है । यही बंधन है । क्या आप सारी मानवीय चेतना से हटकर एक व्यक्ति हैं ? इसे जरा गहराई में जाकर देखें । आपका एक अलग नाम हो सकता है । एक रूप हो सकता है । एक अलग चेहरा हो सकता है । आप नाटे लम्बे या गोरे काले इत्यादि हो सकते हैं । क्या इससे ही आप एक सारी मानवीय चेतना से अलग व्यक्ति हो जाते हैं ? क्या यदि आप किसी विशेष प्रकार के समूह या समुदाय या देश के हैं । तो इससे आप अलग हो जाते हैं । या एक अलग व्यक्ति बन जाते हैं ?
तो वैयक्तिक्ता क्या है ? एक व्यक्ति वह होता है । जो खंडित नहीं है । बंटा हुआ नहीं है । मानव चेतना से विलग नहीं है ।
जब तक आप सब खंडित हैं । तक एक व्यक्ति नहीं हो सकते । यह एक तथ्य है । जब तक यह तथ्य आपके खून में नहीं बहने लगता । आप एक व्यक्ति नहीं हो सकते । भले ही आप अपने बारे में यह खयाल रखते हों कि - आप एक व्यक्ति हैं । तो भी यह महज आपका विचार ही होगा । विचार ही सारी मानव जाति में आम चीज है । जो अनुभव । ज्ञान । स्मृति पर आधारित होती है । और दिमाग में स्टोर हुई रहती है । मस्तिष्क या दिमाग सारी संवेदनों का केन्द्र होता है । जो सारी मानव जाति में आम है । यह सब तर्क संगत है । तो जब आप कहते हैं कि - मेरे साथ क्या होगा । जब मैं मर जाऊंगा ? तो इसमें ही आपकी रूचि है । इस ” मैं “ में । जो कि मरने वाला है । मैं क्या है ? आपका नाम । आप कैसे दिखते हैं ? आपकी शिक्षा दीक्षा कैसी है ? ज्ञान । कैरियर । पारिवारिक पंरपरा । और धार्मिक संस्कृति । विश्वास । अंधविश्वास । लोभ । महत्वकांक्षा । वह सारी धोखाधडि़यां जो आप कर रहे हैं । आपके आदर्श । यह सब ही तो आपका ” मैं “ है । यह सब ही आपकी व्यक्ति परक चेतना है । यही चेतना सारी मनुष्यता में समान है । क्योंकि वह भी तो लोभी । ईर्ष्यालु । भयभीत । जो सुरक्षा चाहती है । जो अंधविश्वासी है । जो एक तरह के ईश्वर में भरोसा करती है । आप अन्य तरह के । इनमें से कुछ कम्युनिस्ट है । कुछ समाजवादी । कुछ पूंजीवादी । यह सब उसी का एक हिस्सा हैं । इन सबमें यह एक सामान्य घटक है कि - आप ही सारी शेष मानवता हैं । आप सहमत होते हैं । आप कहते हैं कि - ठीक है । यह तो पूरी तरह सही है । लेकिन तो भी आप एक व्यक्ति । एक व्यक्तित्व की तरह बर्ताव करते हैं । यही वह बात है । जो बहुत ही भद्दी है । बहुत ही पाखंड पूर्ण है ।


तो अब । वह क्या है । जो मर जाता है ? यदि मेरी चेतना ही सारी मानव जाति की चेतना है । यह बदल जाती है । जो कि मैं सोचता हूं कि - मैं हूं ? तो मेरे मरने पर क्या होगा ? मेरी देह का मृत्यु संस्कार कर दिया जायेगा । या हो सकता है । यह अचानक ही किसी दुर्घटना वश नष्ट हो जाये । तो क्या होगा ? यह आम चेतना चली जायेगी । मुझे नहीं मालूम कि - आप इसे महसूस कर पा रहे हैं । या नहीं ? जब सच को इस तरह देख लिया जाता है । तो मृत्यु का बहुत ही तुच्छ अर्थ रह जाता है । तब मृत्यु का भय नहीं रहता । मृत्यु का भय तब तक ही रहता है । जब तक कि हम खुद को मानवता से अलग व्यक्ति या व्यक्तित्व मानते हैं । जो कि परंपरा है । जिस परपंरा में हमारे दिमाग को एक कम्प्यूटर की तरह प्रोग्राम्ड किया जाता है । यह फीड किया जाता है कि - मैं एक अलग व्यक्ति हूं । मैं एक अलग व्यक्ति हूं । मैं विशेष तरह के ईश्वर को मानता हूं । मैं यह मानता हूं । मैं वह मानता हूं आदि आदि ।
इस सबमें आप एक तथ्य और भूल रहे हैं । वह है - प्रेम । प्रेम मृत्यु को नहीं जानता । करूणा मृत्यु को नहीं जानती । तो वही व्यक्ति जिसे प्रेम का कुछ पता नहीं । जो प्रेम नहीं करता । जिसमें करूणा नहीं है । वही मृत्यु से भयभीत होता है । तो आप कहेंगे कि - मैं प्रेम कैसे करूं ? मुझमें करूणा कैसे आये ? जैसे कि ये सब बाजार से खरीदा जा सकता हो । लेकिन यदि आप देखें । अगर आप महसूस कर सकें कि - प्रेम ही ऐसी चीज है । जिसकी मृत्यु नहीं है । यही असली बुद्धत्व है । जागृति है । यह किसी भी ज्ञान । शब्दों की जुगाली या बौद्धिक अलंकरण से परे की चीज है ।
चेतना की परिधि में की गई कोई भी प्रगति मात्र आत्म विकास है । और आत्म विकास का अर्थ है । दुख के मार्ग पर ही बढ़ते जाना । उसका अंत करना नहीं । यदि आप इसे ध्यान पूर्वक देखें । तो यह बात स्पष्ट हो जायेगी । यदि मन का वास्ता सम्पूर्ण दुख से मुक्त होने से है । तो फिर मन को करना क्या होगा ? पता नहीं आपने कभी इस समस्या पर विचार किया है । या नहीं ? परन्तु कृपया इस पर अब विचार कर लें ।
हम दुख उठाते हैं । हैं न ? हम केवल शारीरिक बीमारियों और अस्वस्थता से ही दुखी नहीं रहते । बल्कि अपने अकेलेपन और आंतरिक गरीबी के कारण भी दुखी रहते हैं । हम दुखी रहते हैं । क्योंकि हमें कोई प्रेम नहीं करता । जब हम किसी को प्रेम करते हैं । और जवाब में प्रेम नहीं मिलता । तो हम दुखी हो जाते हैं । हर तरह से । सोचने का अर्थ ही है । दुख से भर जाना । अतः हमें लगता है कि - सोचने का क्या लाभ ? इसलिए हम किसी विश्वास को थाम लेते हैं । और फिर उसी से बंधकर रह जाते हैं । उसी को हम धर्म कह देते हैं । यदि मन देख पाए कि कृमशः प्रगति व आत्म सुधार द्वारा दुख का अंत संभव नहीं है । तो फिर मन करे क्या ? क्या मन इस चेतना के पार जा सकता है ? तरह तरह की इन व्यग्रताओं और विरोधाभासी इच्छाओं के पार ? और क्या उस पार जाने में समय समय लगेगा ? कृपया इसे समझिये । केवल शाब्दिक रूप से नहीं । बल्कि वस्तुतः । वास्तविक रूप में । यदि यह समय का मामला है । तो आप पुनः उस घेरे में आ जाते हैं । जिसे प्रगति कहते हैं । क्या आप यह देख पा रहे हैं ? चेतना की परिधि में । किसी भी दिशा में उठाया गया कदम । आत्म विकास ही होता है ? और इसलिए वहां दुख की निरंतरता बनी रहती है । दुख को नियंत्रित व अनुशासित किया जा सकता है । उसका दमन किया जा सकता है । उसे युक्ति संगत तथा अत्यंत परिष्कृत बनाया जा सकता है । परन्तु दुख की अन्तर निहित प्रबलता तब भी बनी रहती है । और दुख से मुक्त होने के लिए । उसकी इस प्रबलता से । इसके बीज मैं से । अहं से । कुछ बनने । होने के । इस सम्पूर्ण प्रकृम से मुक्त होना ही होगा । पार जाने के लिए इस प्रक्रिया पर विराम लगना आवश्यक है ।
अभिमान । स्वाभिमान । मैं । अहं । इगो । घमण्ड । होमी । आत्म । स्व आदि शब्द पर्यायवाची हैं । बचपन । जवानी हो । या बुढ़ापा । जब कभी भी । जिस भी उमृ में । हम अपने बारे में सोचने समझने लगते हैं । तो उमृ के साथ ही हम चाहे अनचाहे अपना व्यक्तित्व बनाने लगते हैं । विभिन्न तत्वों को जोड घटाकर । उनका सामंजस्य कर । हम अपने व्यक्ति को गढ़ने लगते हैं । व्यक्ति अपनी रूचि अरूचि अनुसार । विभिन्न तरह के लक्षण अपना लेता है । व्यक्तित्व के लिए अंग्रेजी में शब्द है - पर्सोनेलिटी । इसमें पर्सोना शब्द का हिन्दी अर्थ होता है - मुखौटा । हम अपना एक ऐसा मुखौटा गढ़ते हैं । जैसा कि हम समाज को दिखना चाहते हैं । इसी तरह हम खुद स्वयं के लिए । और विभिन्न संबंधों के लिए भी । अलग अलग या विभिन्न चीजों को जोड़कर मुखौटे बनाते हैं । समाज हमें और हम समाज के प्रत्येक व्यक्ति को इन्हीं मुखौटों की सच्ची झूठी हकीकतों से पहचानते हैं । समाज में इसे किसी व्यक्ति के लक्षणों के रूप में जाना जाता है । और तद अनुसार भला । बुरा । नगण्य । घमंडी । गंदा । बुद्धिजीवी । स्वार्थी आदि की सामान्य प्रतिक्रियाएं देता है । विशिष्ट लक्षणों को विशिष्ट मान्यताएं देता है । लेकिन किसी भी मुखौटे को गढ़ना । यानि अहं को गढ़ना है । अपने मूल अस्तित्व से भिन्न । एक कृत्रिम चीज गढ़ना है ।
आत्म विकास का अर्थ - अहं का विकास ही है । हम अपने बारे में जो भी भला बुरा सोचकर । योजना बनाकर । जानबूझ कर । जो आदर्शों के लक्ष्य स्थापित कर । प्रगति की सीढि़यां बनाते हैं । इनसे हम दुख के मार्ग पर ही चलते हैं । क्योंकि तय करके चलेंगे । तो राह में कई रोढ़े आयेंगे । तकलीफें मिलेंगी । दुख होगा । इतना सोच समझकर चलने पर भी दुख खत्म नहीं होता । तो हम अपनी विवेक विचार क्षमता को ही निकम्मा जानकर । सोचने समझने को । एक तरफ रख देते हैं । और किसी विश्वास को पकड़ लेते हैं । किसी किताब । गुरू । या किसी पुरानी से पुरानी सिद्ध चीज । के पीछे लग जाते हैं । और उसमें लिखे की नकल करने लग जाते हैं । उनकी बातों का अंधानुकरण करने लग जाते हैं । लेकिन यह सब भी हम अपने व्यक्तित्व को । अहं को पुष्ट करने के एक तरीके की ही तरह करते हैं । इसमें भी कोई लक्ष्य या आदर्श और फिर उस पर आगे बढ़ने की रास्ते और सीढि़यां होती हैं । इन पर भी दुख रहता ही है ।
कोई दुख है । इसका मतलब है कि - हमारे मौलिक वास्तविक अस्तित्व के अतिरिक्त भी । एक इच्छा या चाह है । और हम उसे पूरा करना चाह रहे हैं । वह पूरी नहीं होती । और दुख होता है । हम अपनी वास्तविकता से इतर विचारों से एक कृत्रिम व्यक्तित्व या आदर्श या लक्ष्य गढ़ते हैं । जो कि असलीयत में अहं होता है । इस लक्ष्य की राह पर चलने से ही दुख होता है । अपने मूल स्वरूप । वास्तविक अस्तित्व के अतिरिक्त खुद को किसी भी अन्य कृत्रिम रूप में जानने । पहचानने । उसके बारे में विचार करने में ही दुख का बीज छिपा है । जब हमारे विचार । अपने बारे में कोई कृत्रिम छवि गढ़ते हैं । तो हम दुख का बीज बोते हैं । जब हम अपनी छवि को पालते पोसते हैं । तो दुख को पालते पोसते हैं । बढ़ा करते हैं ।
इसी कुछ होने बनने की चाह । और तद अनुसार कोशिश करने । और इसमें होने वाले दुख के कुचक्र से निकलने के लिए । हम क्या कर सकते हैं ? अपनी चेतना के इस आयाम से पार होने के लिए । हम क्या कर सकते हैं ?
आत्म विकास । अहं का विकास करने । आदर्श । लक्ष्य बनाकर चलने । दुनियां के हिसाब से चलने की कोशिश में हम दुख से निजात नहीं पा सकते । इससे तो किसी ना किसी तरह का दुख मिलेगा ही । हम जैसे कुदरती हैं । मौलिक रूप से हैं । वैसे ही रहें । किसी चीज को कल्पना । विचार । सिद्धांत । या शाब्दिक रूप से समझने की बजाय । उसका साक्षात अवलोकन करें । तो ही उसका यथार्थ समझ आ सकता है । यदि कोई दुख से मुक्त होना चाहता है । तो उसे अहं को बनाने वाली सम्पूर्ण प्रक्रिया से वाकिफ होना होगा । इस अहं निर्माण की प्रक्रिया पर रोक लगानी होगी । अपने अस्तित्व की वास्तविकता में रहना होगा ।  जे. कृष्णमूर्ति
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