शुक्रवार, अप्रैल 06, 2012

क्या मौत के बाद कुछ बचता है ?

मुझे नहीं लगता कि - कोई सरल मार्ग है । क्योंकि ईश्वर को पाना । अत्यंत कठिन । अत्यधिक श्रम साध्य बात है । जिसे हम ईश्वर कहते हैं ? क्या मन ही ने उसका निर्माण नहीं किया है ? आप जानते ही हैं कि - मन क्या होता है ? मन समय का परिणाम है । और यह कुछ भी । किसी भी । भ्रांति को निर्मित कर सकता है । धारणाओं को बुनने । तथा रंगीनियों । और कल्पनाओं में अपना प्रक्षेपण करने की शक्ति इसके पास है । यह निरन्तर संचय काट छांट और चयन करता रहता है । संकीर्ण सीमित तथा पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने के कारण । यह अपनी सीमाओं के अनुसार ईश्वर की कल्पना कर सकता है । उसकी छवि बना सकता है । चूंकि कुछ खास शिक्षकों  पुरोहितों तथा तथाकथित उद्धार कर्ताओं ने कह रखा है कि - ईश्वर है ? और उसका वर्णन भी कर दिया है । इसलिए उसी शब्दावली में मन ईश्वर की कल्पना तो कर सकता है । लेकिन वह कल्पना । वह छवि ईश्वर नहीं है । ईश्वर का अन्वेषण मन द्वारा नहीं किया जा सकता ।
ईश्वर को समझने के लिए पहले आपको अपने मन को समझना होगा । जो बहुत कठिन है । मन बहुत पेचीदा है । और इसे समझना सरल नहीं है । बैठे बैठे किसी प्रकार के सपने में खो जाना । विविध दिव्य दृश्यों । तथा भ्रांतियों में लीन हो जाना । और यह सोचने लगना कि - आप ईश्वर के बहुत करीब आ गये हैं । यह सब तो काफी सरल है । मन अपने साथ अतिशय छल कर सकता है । अतः जिसे ईश्वर कहा जा सकता है ? उसका अनुभव करने के लिए आपको पूर्णतः शांत होना होगा । और क्या आपको यह मालूम नहीं है कि - यह कितना अधिक कठिन है ? क्या आपने ध्यान दिया है कि - वयस्क लोग कभी भी शांत नहीं बैठ पाते हैं । वे किस तरह बेचैन रहते हैं । पैर हिलाते

रहते हैं । हाथों को डुलाते रहते हैं ? शारीरिक रूप से ही निश्चल बैठ पाना कितना दुसाध्य है । मन का निश्चल होना । तो और भी कितना ज्यादा मुश्किल है ? आप किसी गुरू का अनुगमन कर सकते हैं । और अपने मन को शांत होने के लिए बाध्य कर सकते हैं ? पर आपका मन वस्तुतः शांत नहीं होता । यह अब भी बेचैन होता है । जैसे किसी बच्चे को कोने में खड़ा कर दिया गया हो । बिना किसी जोर जबरदस्ती के पूर्णतः मौन होना । एक महान कला हैं । केवल तभी उसकी अनुभूति हो पाने की संभावना होती है । जिसे ईश्वर कहा जा सकता है ?
क्या मृत्यु के बाद भी कुछ बचता है ? जब एक आदमी दुख से भरा हुआ । मोह गृस्त और खेदजनक स्थितियों में मरता है । तो क्या बचता है ?
क्या असली प्रश्न यह नहीं है कि - क्या मौत के बाद । कुछ बचता है ? जब आपका कोई करीबी मर जाता है । तो आप कितना सयापा करते हैं ? क्या आपने इस पर कभी गौर किया ? सब आपके साथ रोते हैं । जब अपने भारत देश में कोई मर जाता है । तो जितना शोक संताप किया जाता है । ऐसा सारी दुनियां में कहीं नहीं होता । आइये इसे गहराई में जाने ।
सबसे पहले तो क्या आप देख सकते हैं । क्या आप हकीकतन महसूस कर सकते हैं कि - आपकी चेतना ही सारी मानवता की चेतना है ? क्या आप ऐसा महसूस कर सकते हैं ? क्या यह आपके लिए एक तथ्य की तरह है ? क्या यह आपके लिए यह उसी तरह तथ्य है । जैसे कि कोई आप आपके हाथ में सुई चुभोए । और आप उसका दर्द महसूस करें ? क्या यह इसी तरह वास्तविक है ?
मानव मस्तिष्क का विकास समय में हुआ है । और यह करोड़ों वर्षों के विकास का परिणाम है । यह मस्तिष्क एक विशेष ढांचे में बद्ध हो सकता है । यदि कोई व्यक्ति दुनियां के किसी विशेष भाग में । एक संस्कृति और परिवेश में रह रहा हो । तो भी यह एक सामान्य आम मानव चेतना युक्त मस्तिष्क ही होता है । इस बारे में आप पूर्णतः आश्वस्त रहें । यह आपका व्यक्तिगत मस्तिष्क नहीं होता । यह सामान्य चेतना होती है । मस्तिष्क को पैतृक रूप से या विरासत में बहुत सारी प्रतिक्रियाएं मिली होती हैं । और यह दिमाग अपने जींस ( गुण सूत्रों )

सहित । जिनमें कुछ पैतृक होते हैं । कुछ समय में विकसित । इसमें मानवीय चेतना सामान्य घटक होती है । इस तरह यह मात्र आपका ही मस्तिष्क नहीं होता । यह सम्पूर्ण मानवीय चेतना भी होता है । विचार यह कह सकता है कि - यह मेरा दिमाग है । विचार यह कह सकता है कि - मैं एक व्यक्ति हूं । यही हमारा ढांचा बद्ध । सांचा बद्ध । या बद्ध होना है । यही बंधन है । क्या आप सारी मानवीय चेतना से हटकर एक व्यक्ति हैं ? इसे जरा गहराई में जाकर देखें । आपका एक अलग नाम हो सकता है । एक रूप हो सकता है । एक अलग चेहरा हो सकता है । आप नाटे लम्बे या गोरे काले इत्यादि हो सकते हैं । क्या इससे ही आप एक सारी मानवीय चेतना से अलग व्यक्ति हो जाते हैं ? क्या यदि आप किसी विशेष प्रकार के समूह या समुदाय या देश के हैं । तो इससे आप अलग हो जाते हैं । या एक अलग व्यक्ति बन जाते हैं ?
तो वैयक्तिक्ता क्या है ? एक व्यक्ति वह होता है । जो खंडित नहीं है । बंटा हुआ नहीं है । मानव चेतना से विलग नहीं है ।
जब तक आप सब खंडित हैं । तक एक व्यक्ति नहीं हो सकते । यह एक तथ्य है । जब तक यह तथ्य आपके खून में नहीं बहने लगता । आप एक व्यक्ति नहीं हो सकते । भले ही आप अपने बारे में यह खयाल रखते हों कि - आप एक व्यक्ति हैं । तो भी यह महज आपका विचार ही होगा । विचार ही सारी मानव जाति में आम चीज है । जो अनुभव । ज्ञान । स्मृति पर आधारित होती है । और दिमाग में स्टोर हुई रहती है । मस्तिष्क या दिमाग सारी संवेदनों का केन्द्र होता है । जो सारी मानव जाति में आम है । यह सब तर्क संगत है । तो जब आप कहते हैं कि - मेरे साथ क्या होगा । जब मैं मर जाऊंगा ? तो इसमें ही आपकी रूचि है । इस ” मैं “ में । जो कि मरने वाला है । मैं क्या है ? आपका नाम । आप कैसे दिखते हैं ? आपकी शिक्षा दीक्षा कैसी है ? ज्ञान । कैरियर । पारिवारिक पंरपरा । और धार्मिक संस्कृति । विश्वास । अंधविश्वास । लोभ । महत्वकांक्षा । वह सारी धोखाधडि़यां जो आप कर रहे हैं । आपके आदर्श । यह सब ही तो आपका ” मैं “ है । यह सब ही आपकी व्यक्ति परक चेतना है । यही चेतना सारी मनुष्यता में समान है । क्योंकि वह भी तो लोभी । ईर्ष्यालु । भयभीत । जो सुरक्षा चाहती है । जो अंधविश्वासी है । जो एक तरह के ईश्वर में भरोसा करती है । आप अन्य तरह के । इनमें से कुछ कम्युनिस्ट है । कुछ समाजवादी । कुछ पूंजीवादी । यह सब उसी का एक हिस्सा हैं । इन सबमें यह एक सामान्य घटक है कि - आप ही सारी शेष मानवता हैं । आप सहमत होते हैं । आप कहते हैं कि - ठीक है । यह तो पूरी तरह सही है । लेकिन तो भी आप एक व्यक्ति । एक व्यक्तित्व की तरह बर्ताव करते हैं । यही वह बात है । जो बहुत ही भद्दी है । बहुत ही पाखंड पूर्ण है ।


तो अब । वह क्या है । जो मर जाता है ? यदि मेरी चेतना ही सारी मानव जाति की चेतना है । यह बदल जाती है । जो कि मैं सोचता हूं कि - मैं हूं ? तो मेरे मरने पर क्या होगा ? मेरी देह का मृत्यु संस्कार कर दिया जायेगा । या हो सकता है । यह अचानक ही किसी दुर्घटना वश नष्ट हो जाये । तो क्या होगा ? यह आम चेतना चली जायेगी । मुझे नहीं मालूम कि - आप इसे महसूस कर पा रहे हैं । या नहीं ? जब सच को इस तरह देख लिया जाता है । तो मृत्यु का बहुत ही तुच्छ अर्थ रह जाता है । तब मृत्यु का भय नहीं रहता । मृत्यु का भय तब तक ही रहता है । जब तक कि हम खुद को मानवता से अलग व्यक्ति या व्यक्तित्व मानते हैं । जो कि परंपरा है । जिस परपंरा में हमारे दिमाग को एक कम्प्यूटर की तरह प्रोग्राम्ड किया जाता है । यह फीड किया जाता है कि - मैं एक अलग व्यक्ति हूं । मैं एक अलग व्यक्ति हूं । मैं विशेष तरह के ईश्वर को मानता हूं । मैं यह मानता हूं । मैं वह मानता हूं आदि आदि ।
इस सबमें आप एक तथ्य और भूल रहे हैं । वह है - प्रेम । प्रेम मृत्यु को नहीं जानता । करूणा मृत्यु को नहीं जानती । तो वही व्यक्ति जिसे प्रेम का कुछ पता नहीं । जो प्रेम नहीं करता । जिसमें करूणा नहीं है । वही मृत्यु से भयभीत होता है । तो आप कहेंगे कि - मैं प्रेम कैसे करूं ? मुझमें करूणा कैसे आये ? जैसे कि ये सब बाजार से खरीदा जा सकता हो । लेकिन यदि आप देखें । अगर आप महसूस कर सकें कि - प्रेम ही ऐसी चीज है । जिसकी मृत्यु नहीं है । यही असली बुद्धत्व है । जागृति है । यह किसी भी ज्ञान । शब्दों की जुगाली या बौद्धिक अलंकरण से परे की चीज है ।
चेतना की परिधि में की गई कोई भी प्रगति मात्र आत्म विकास है । और आत्म विकास का अर्थ है । दुख के मार्ग पर ही बढ़ते जाना । उसका अंत करना नहीं । यदि आप इसे ध्यान पूर्वक देखें । तो यह बात स्पष्ट हो जायेगी । यदि मन का वास्ता सम्पूर्ण दुख से मुक्त होने से है । तो फिर मन को करना क्या होगा ? पता नहीं आपने कभी इस समस्या पर विचार किया है । या नहीं ? परन्तु कृपया इस पर अब विचार कर लें ।
हम दुख उठाते हैं । हैं न ? हम केवल शारीरिक बीमारियों और अस्वस्थता से ही दुखी नहीं रहते । बल्कि अपने अकेलेपन और आंतरिक गरीबी के कारण भी दुखी रहते हैं । हम दुखी रहते हैं । क्योंकि हमें कोई प्रेम नहीं करता । जब हम किसी को प्रेम करते हैं । और जवाब में प्रेम नहीं मिलता । तो हम दुखी हो जाते हैं । हर तरह से । सोचने का अर्थ ही है । दुख से भर जाना । अतः हमें लगता है कि - सोचने का क्या लाभ ? इसलिए हम किसी विश्वास को थाम लेते हैं । और फिर उसी से बंधकर रह जाते हैं । उसी को हम धर्म कह देते हैं । यदि मन देख पाए कि कृमशः प्रगति व आत्म सुधार द्वारा दुख का अंत संभव नहीं है । तो फिर मन करे क्या ? क्या मन इस चेतना के पार जा सकता है ? तरह तरह की इन व्यग्रताओं और विरोधाभासी इच्छाओं के पार ? और क्या उस पार जाने में समय समय लगेगा ? कृपया इसे समझिये । केवल शाब्दिक रूप से नहीं । बल्कि वस्तुतः । वास्तविक रूप में । यदि यह समय का मामला है । तो आप पुनः उस घेरे में आ जाते हैं । जिसे प्रगति कहते हैं । क्या आप यह देख पा रहे हैं ? चेतना की परिधि में । किसी भी दिशा में उठाया गया कदम । आत्म विकास ही होता है ? और इसलिए वहां दुख की निरंतरता बनी रहती है । दुख को नियंत्रित व अनुशासित किया जा सकता है । उसका दमन किया जा सकता है । उसे युक्ति संगत तथा अत्यंत परिष्कृत बनाया जा सकता है । परन्तु दुख की अन्तर निहित प्रबलता तब भी बनी रहती है । और दुख से मुक्त होने के लिए । उसकी इस प्रबलता से । इसके बीज मैं से । अहं से । कुछ बनने । होने के । इस सम्पूर्ण प्रकृम से मुक्त होना ही होगा । पार जाने के लिए इस प्रक्रिया पर विराम लगना आवश्यक है ।
अभिमान । स्वाभिमान । मैं । अहं । इगो । घमण्ड । होमी । आत्म । स्व आदि शब्द पर्यायवाची हैं । बचपन । जवानी हो । या बुढ़ापा । जब कभी भी । जिस भी उमृ में । हम अपने बारे में सोचने समझने लगते हैं । तो उमृ के साथ ही हम चाहे अनचाहे अपना व्यक्तित्व बनाने लगते हैं । विभिन्न तत्वों को जोड घटाकर । उनका सामंजस्य कर । हम अपने व्यक्ति को गढ़ने लगते हैं । व्यक्ति अपनी रूचि अरूचि अनुसार । विभिन्न तरह के लक्षण अपना लेता है । व्यक्तित्व के लिए अंग्रेजी में शब्द है - पर्सोनेलिटी । इसमें पर्सोना शब्द का हिन्दी अर्थ होता है - मुखौटा । हम अपना एक ऐसा मुखौटा गढ़ते हैं । जैसा कि हम समाज को दिखना चाहते हैं । इसी तरह हम खुद स्वयं के लिए । और विभिन्न संबंधों के लिए भी । अलग अलग या विभिन्न चीजों को जोड़कर मुखौटे बनाते हैं । समाज हमें और हम समाज के प्रत्येक व्यक्ति को इन्हीं मुखौटों की सच्ची झूठी हकीकतों से पहचानते हैं । समाज में इसे किसी व्यक्ति के लक्षणों के रूप में जाना जाता है । और तद अनुसार भला । बुरा । नगण्य । घमंडी । गंदा । बुद्धिजीवी । स्वार्थी आदि की सामान्य प्रतिक्रियाएं देता है । विशिष्ट लक्षणों को विशिष्ट मान्यताएं देता है । लेकिन किसी भी मुखौटे को गढ़ना । यानि अहं को गढ़ना है । अपने मूल अस्तित्व से भिन्न । एक कृत्रिम चीज गढ़ना है ।
आत्म विकास का अर्थ - अहं का विकास ही है । हम अपने बारे में जो भी भला बुरा सोचकर । योजना बनाकर । जानबूझ कर । जो आदर्शों के लक्ष्य स्थापित कर । प्रगति की सीढि़यां बनाते हैं । इनसे हम दुख के मार्ग पर ही चलते हैं । क्योंकि तय करके चलेंगे । तो राह में कई रोढ़े आयेंगे । तकलीफें मिलेंगी । दुख होगा । इतना सोच समझकर चलने पर भी दुख खत्म नहीं होता । तो हम अपनी विवेक विचार क्षमता को ही निकम्मा जानकर । सोचने समझने को । एक तरफ रख देते हैं । और किसी विश्वास को पकड़ लेते हैं । किसी किताब । गुरू । या किसी पुरानी से पुरानी सिद्ध चीज । के पीछे लग जाते हैं । और उसमें लिखे की नकल करने लग जाते हैं । उनकी बातों का अंधानुकरण करने लग जाते हैं । लेकिन यह सब भी हम अपने व्यक्तित्व को । अहं को पुष्ट करने के एक तरीके की ही तरह करते हैं । इसमें भी कोई लक्ष्य या आदर्श और फिर उस पर आगे बढ़ने की रास्ते और सीढि़यां होती हैं । इन पर भी दुख रहता ही है ।
कोई दुख है । इसका मतलब है कि - हमारे मौलिक वास्तविक अस्तित्व के अतिरिक्त भी । एक इच्छा या चाह है । और हम उसे पूरा करना चाह रहे हैं । वह पूरी नहीं होती । और दुख होता है । हम अपनी वास्तविकता से इतर विचारों से एक कृत्रिम व्यक्तित्व या आदर्श या लक्ष्य गढ़ते हैं । जो कि असलीयत में अहं होता है । इस लक्ष्य की राह पर चलने से ही दुख होता है । अपने मूल स्वरूप । वास्तविक अस्तित्व के अतिरिक्त खुद को किसी भी अन्य कृत्रिम रूप में जानने । पहचानने । उसके बारे में विचार करने में ही दुख का बीज छिपा है । जब हमारे विचार । अपने बारे में कोई कृत्रिम छवि गढ़ते हैं । तो हम दुख का बीज बोते हैं । जब हम अपनी छवि को पालते पोसते हैं । तो दुख को पालते पोसते हैं । बढ़ा करते हैं ।
इसी कुछ होने बनने की चाह । और तद अनुसार कोशिश करने । और इसमें होने वाले दुख के कुचक्र से निकलने के लिए । हम क्या कर सकते हैं ? अपनी चेतना के इस आयाम से पार होने के लिए । हम क्या कर सकते हैं ?
आत्म विकास । अहं का विकास करने । आदर्श । लक्ष्य बनाकर चलने । दुनियां के हिसाब से चलने की कोशिश में हम दुख से निजात नहीं पा सकते । इससे तो किसी ना किसी तरह का दुख मिलेगा ही । हम जैसे कुदरती हैं । मौलिक रूप से हैं । वैसे ही रहें । किसी चीज को कल्पना । विचार । सिद्धांत । या शाब्दिक रूप से समझने की बजाय । उसका साक्षात अवलोकन करें । तो ही उसका यथार्थ समझ आ सकता है । यदि कोई दुख से मुक्त होना चाहता है । तो उसे अहं को बनाने वाली सम्पूर्ण प्रक्रिया से वाकिफ होना होगा । इस अहं निर्माण की प्रक्रिया पर रोक लगानी होगी । अपने अस्तित्व की वास्तविकता में रहना होगा ।  जे. कृष्णमूर्ति

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