बुधवार, फ़रवरी 15, 2012

संसार रूपी वृक्ष पर चढ़े लोग नरक रूपी सागर में गिरते हैं

अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने । समस्त जगदाधारमूर्तये बृह्मणे नमः ।
जो बृह्म अचिन्त्य । अव्यक्त । तीनों गुणों से रहित ( फिर भी देखने वालों के अज्ञान की उपाधि से ) त्रिगुणात्मक । और समस्त जगत का । अधिष्ठान रूप है । ऐसे बृह्म को नमस्कार हो । 1
सूत सूत महाप्राज्ञ निगमागमपारग । गुरुस्वरूपमस्माकं ब्रूहि सर्वमलापहम ।
ऋषि बोले - हे महा ज्ञानी ! हे वेद वेदांगों के निष्णात ! सूत जी ! सर्व पापों का नाश करने वाले । गुरु का स्वरूप । हमें सुनाओ । 2
यस्य श्रवणमात्रेण देही दुःखाद्विमुच्यते । येन मार्गेण मुनयः सर्वज्ञत्वं प्रपेदिरे ।
यत्प्राप्य न पुनर्याति नरः संसारबन्धनम । तथाविधं परं तत्वं वक्तव्यमधुना त्वया ।
जिसको । सुनने मात्र से । मनुष्य दुख से । विमुक्त हो जाता है । जिस उपाय से । मुनियों ने । सर्वज्ञता प्राप्त की । जिसको प्राप्त करके । मनुष्य फ़िर से । संसार बन्धन में नहीं बँधता । ऐसे परम तत्व का । कथन । आप करें । 3 । 4
गुह्यादगुह्यतमं सारं गुरुगीता विशेषतः । त्वत्प्रसादाच्च श्रोतव्या तत्सर्वं ब्रूहि सूत नः ।
जो तत्व । परम रहस्यमय । एवं श्रेष्ठ सार भूत है । और विशेष कर । जो गुरु गीता है । वह आपकी कृपा से हम सुनना चाहते हैं । सूत जी ! वे सब हमें सुनाइये । 5
इति संप्राथितः सूतो मुनिसंघैर्मुहुर्मुहुः । कुतूहलेन महता प्रोवाच मधुरं वचः ।
इस प्रकार बार बार प्रार्थना किये जाने पर सूत जी बहुत प्रसन्न होकर मुनियों के समूह से मधुर वचन बोले । 6
श्रृणुध्वं मुनयः सर्वे श्रद्धया परया मुदा । वदामि भवरोगघ्नीं गीता मातृस्वरूपिणीम ।
सूत जी बोले - हे मुनि ! संसार रूपी रोग का । नाश करने वाली । मातृ स्वरूपिणी ( माता के समान ध्यान रखने वाली ) गुरु गीता कहता हूँ । उसको आप । अत्यंत श्रद्धा और प्रसन्नता से सुनिये । 7
पुरा कैलासशिखरे सिद्धगन्धर्वसेविते । तत्र कल्पलतापुष्पमन्दिरेऽत्यन्तसुन्दरे ।
व्याघ्राजिने समासिनं शुकादिमुनिवन्दितम । बोधयन्तं परं तत्वं मध्येमुनिगणंक्वचित ।
प्रणम्रवदना शश्वन्नमस्कुर्वन्तमादरात । दृष्टवा विस्मयमापन्ना पार्वती परिपृच्छति ।
प्राचीन काल में । सिद्धों । और गन्धर्वों के । आवास रूप । कैलास पर्वत के । शिखर पर । कल्प वृक्ष के । फूलों से बने हुए । अत्यंत सुन्दर मंदिर में । मुनियों के बीच । व्याघ्र चर्म पर । बैठे हुए । शुक आदि मुनियों द्वारा । वन्दन किये जाने वाले । और परम तत्व का । बोध देते हुए । भगवान शंकर को बार बार नमस्कार करते देखकर । अतिशय नमृ मुख वाली । पार्वती ने आश्चर्य चकित होकर पूछा । 8 । 9 । 10 ।
ॐ नमो देव देवेश परात्पर जगदगुरो । त्वां नमस्कुर्वते भक्त्या सुरासुरनराः सदा ।
पार्वती बोली - हे ॐकार के अर्थ स्वरूप । देवों के देव । श्रेष्ठों के श्रेष्ठ । हे जगद गुरु ! आपको प्रणाम हो । देव । दानव । और मानव । सब आपको । सदा । भक्ति पूर्वक । प्रणाम करते हैं । 11
विधिविष्णुमहेन्द्राद्यैर्वन्द्यः खलु सदा भवान । नमस्करोषि कस्मै त्वं नमस्काराश्रयः किलः ।
आप बृह्मा । विष्णु । इन्द्र । आदि के नमस्कार के योग्य हैं । ऐसे नमस्कार के । आश्रय रूप । होने पर भी । आप किसको नमस्कार करते हैं ? 12
भगवन सर्वधर्मज्ञ व्रतानां व्रतनायकम । ब्रूहि मे कृपया शम्भो गुरुमाहात्म्यमुत्तमम ।
हे भगवन ! हे सर्व धर्मों के ज्ञाता ।  हे शम्भो । जो वृत । सब वृतों में । श्रेष्ठ है । ऐसा उत्तम । गुरु माहात्म्य कृपा करके । मुझे कहें । 13
इति संप्रार्थितः शश्वन्महादेवो महेश्वरः । आनंदभरितः स्वान्ते पार्वतीमिदमब्रवीत ।
इस प्रकार ( पार्वती द्वारा ) बार बार । प्रार्थना किये जाने पर । महादेव ने । अंतर से । खूब प्रसन्न होते हुए पार्वती से इस प्रकार कहा । 14
न वक्तव्यमिदं देवि रहस्यातिरहस्यकम । न कस्यापि पुरा प्रोक्तं त्वद्भक्त्यर्थं वदामि तत ।
महादेव बोले -  हे देवी ! यह तत्व । रहस्यों का भी । रहस्य है । इसलिए कहना उचित नहीं । पहले किसी से भी नहीं कहा । फिर भी । तुम्हारी भक्ति देखकर । वह रहस्य कहता हूँ । 15
मम रूपासि देवि त्वमतस्तत्कथयामि ते । लोकोपकारकः प्रश्नो न केनापि कृतः पुरा ।
हे देवी ! तुम । मेरा ही स्वरूप हो । इसलिए ( यह रहस्य ) तुमको कहता हूँ । तुम्हारा यह प्रश्न । लोक का कल्याण कारक है । ऐसा प्रश्न । पहले कभी । किसी ने नहीं किया । 16
यस्य देवे परा भक्ति, यथा देवे तथा गुरौ । त्स्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ।
जिसको । ईश्वर में । उत्तम भक्ति । होती है । जैसी ईश्वर में । वैसी ही भक्ति । जिसको गुरु में । होती है । ऐसे महात्माओं को ही । यहाँ कही हुई । बात समझ में आयेगी । 17
यो गुरु स शिवः प्रोक्तो, यः शिवः स गुरुस्मृतः । विकल्पं यस्तु कुर्वीत स नरो गुरुतल्पगः ।
जो गुरु हैं । वे ही शिव हैं । जो शिव हैं । वे ही गुरु हैं । दोनों में । जो अन्तर मानता है । वह गुरु पत्नी गमन करने वाले के समान पापी है । 18
वेद्शास्त्रपुराणानि चेतिहासादिकानि च । मंत्रयंत्रविद्यादिनिमोहनोच्चाटनादिकम ।
शैवशाक्तागमादिनि ह्यन्ये च बहवो मताः । अपभृंशाः समस्तानां जीवानां भ्रांतचेतसाम ।
जपस्तपोवृतं तीर्थं यज्ञो दानं तथैव च । गुरु तत्वं अविज्ञाय सर्वं व्यर्थं भवेत प्रिये ।
हे प्रिय ! वेद । शास्त्र । पुराण । इतिहास आदि । मंत्र । यंत्र । मोहन । उच्चाटन आदि । विद्या । शैव । शाक्त । आगम । और अन्य सब । मत मतान्तर । ये सब बातें । गुरु तत्व को । जाने बिना । भ्रान्त चित्त वाले । जीवों को । पथ भृष्ट करने वाली हैं । और जप । तप । वृत । तीर्थ । यज्ञ । दान । ये सब व्यर्थ हो जाते हैं । 19 । 20 । 21
गुरुबुध्यात्मनो नान्यत सत्यं सत्यं वरानने । तल्लभार्थं प्रयत्नस्तु कर्त्तवयशच मनीषिभिः ।
आत्मा में । गुरु बुद्धि के सिवा । अन्य कुछ भी । सत्य नहीं है । सत्य नहीं है । इसलिये । इस आत्म ज्ञान को । प्राप्त करने के लिये । बुद्धिमानों को । प्रयत्न करना चाहिये । 22
गूढाविद्या जगन्माया देहशचाज्ञानसम्भवः । विज्ञानं यत्प्रसादेन गुरुशब्देन कथयते ।
जगत । गूढ़ । अविद्यात्मक । माया रूप है । और शरीर । अज्ञान से । उत्पन्न हुआ है । इनका । विश्लेषणात्मक । ज्ञान । जिनकी कृपा से । होता है । उस ज्ञान को । गुरु कहते हैं । 23
देही बृह्म भवेद्यस्मात त्वत्कृपार्थंवदामि तत । सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादसेवनात ।
जिस गुरु के । पाद सेवन से । मनुष्य सब पापों से । विशुद्धात्मा होकर । बृह्म रूप । हो जाता है । वह तुम पर कृपा करने के लिये कहता हूँ । 24
शोषणं पापपंकस्य दीपनं ज्ञानतेजसः । गुरोः पादोदकं सम्यक संसारार्णवतारकम ।
गुरु का । चरणामृत । पाप रूपी । कीचड़ का । सम्यक । शोषक है । ज्ञान तेज का । सम्यक । उद्यीपक है । और संसार सागर का । सम्यक । तारक है । 25
अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारकम । ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं गुरुपादोदकं पिबेत ।
अज्ञान की । जड़ को । उखाड़ने वाले । अनेक जन्मों के । कर्मों को । निवारने वाले । ज्ञान । और वैराग्य को । सिद्ध करने वाले । गुरु के । चरणामृत का । पान करना चाहिये । 26
स्वदेशिकस्यैव च नामकीर्तनम । भवेदनन्तस्यशिवस्य कीर्तनम ।
स्वदेशिकस्यैव च नामचिन्तनम । भवेदनन्तस्यशिवस्य नामचिन्तनम ।
गुरु के । नाम का । कीर्तन । अनंत स्वरूप । भगवान शिव का । ही कीर्तन है । गुरु के । नाम का । चिंतन । अनंत स्वरूप । भगवान शिव का । ही चिंतन है । 27
काशीक्षेत्रं निवासश्च जाह्नवी चरणोदकम । गुरुर्विश्वेश्वरः साक्षात तारकं बृह्मनिश्चयः ।
गुरु का । निवास स्थान । काशी क्षेत्र है । गुरु का पादोदक गंगा है । गुरु । भगवान विश्वनाथ । और निश्चय ही । साक्षात । तारक बृह्म हैं । 28
गुरुसेवा गया प्रोक्ता देहः स्यादक्षयो वटः । तत्पादं विष्णुपादं स्यात तत्रदत्तमनस्ततम ।
गुरु की । सेवा ही । तीर्थ राज गया है । गुरु का । शरीर अक्षय वट वृक्ष है । गुरु के श्री चरण । भगवान विष्णु के श्री चरण हैं । वहाँ लगाया हुआ । मन तदाकार हो जाता है । 29
गुरुवक्त्रे स्थितं बृह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः । गुरोर्ध्यानं सदा कुर्यात पुरूषं स्वैरिणी यथा ।
बृह्म । गुरु के । मुखारविन्द ( वचनामृत ) में स्थित है । वह बृह्म । उनकी कृपा से । प्राप्त हो जाता है । इसलिये । जिस प्रकार । स्वेच्छा चारी स्त्री । अपने प्रेमी पुरुष का । सदा चिंतन करती है । उसी प्रकार । सदा गुरु का । ध्यान करना चाहिये । 30
स्वाश्रमं च स्वजातिं च स्वकीर्ति पुष्टिवर्धनम । एतत्सर्वं परित्यज्य गुरुमेव समाश्रयेत ।
अपने आश्रम ( बृह्मचर्य श्रम आदि ) जाति । कीर्ति ( पद प्रतिष्ठा )  पालन । पोषण । ये सब छोड़ कर । गुरु का ही । सम्यक । आश्रय लेना चाहिये । 31
गुरुवक्त्रे स्थिता विद्या गुरुभक्त्या च लभ्यते । त्रैलोक्ये स्फ़ुटवक्तारो देवर्षिपितृमानवाः ।
विद्या । गुरु के । मुख में । रहती है । और वह । गुरु की । भक्ति से ही । प्राप्त होती है । यह बात । तीनों लोकों में । देव । ऋषि । पितृ । और मानवों द्वारा । स्पष्ट रूप से । कही गई है । 32
गुकारश्चान्धकारो हि रुकारस्तेज उच्यते । अज्ञानग्रासकं बृह्म गुरुरेव न संशयः ।
गु शब्द का अर्थ है - अंधकार ( अज्ञान ) । और रु शब्द का अर्थ है - प्रकाश ( ज्ञान ) । अज्ञान को नष्ट करने वाला । जो बृह्म रूप । प्रकाश है । वह गुरु है । इसमें कोई संशय नहीं है । 33
गुकारश्चान्धकारस्तु रुकारस्तन्निरोधकृत । अन्धकारविनाशित्वात गुरुरित्यभिधीयते ।
गु कार । अंधकार है । और उसको । दूर करने वाला । रु कार है । अज्ञान रूपी । अन्धकार को । नष्ट करने के कारण ही । गुरु कहलाते हैं । 34
गुकारश्च गुणातीतो रूपातीतो रुकारकः । गुणरूपविहीनत्वात गुरुरित्यभिधीयते ।
गु कार से । गुणातीत । कहा जाता है । रु कार से । रूपातीत । कहा जाता है । गुण और रूप से । परे होने के कारण ही । गुरु कहलाते हैं । 35
गुकारः प्रथमो वर्णो मायादि गुणभासकः । रुकारोऽस्ति परं बृह्म मायाभ्रान्तिविमोचकम ।
गुरु । शब्द का । प्रथम अक्षर । गु । माया आदि । गुणों का । प्रकाशक है । और । दूसरा अक्षर । रु कार । माया की । भ्रान्ति से । मुक्ति देने वाला । परबृह्म है । 36
सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदांबुजम । वेदान्तार्थप्रवक्तारं तस्मात्संपूजयेद गुरुम ।
गुरु । सब श्रुति रूप । श्रेष्ठ रत्नों से । सुशोभित । चरण कमल वाले हैं । और वेदान्त के । अर्थ के प्रवक्ता हैं । इसलिये । गुरु की । पूजा करनी चाहिये । 37
यस्यस्मरणमात्रेण ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम । सः एव सर्वसम्पत्तिः तस्मात्संपूजयेद गुरुम ।
जिनके । स्मरण मात्र से । ज्ञान । अपने आप । प्रकट । होने लगता है । और वे ही । सब ( शम दम आदि ) सम्पदा रूप हैं । अतः । गुरु की । पूजा करनी चाहिये । 38
संसारवृक्षमारूढ़ाः पतन्ति नरकार्णवे । यस्तानुद्धरते सर्वान तस्मै श्रीगुरवे नमः ।
संसार रूपी । वृक्ष पर । चढ़े हुए लोग । नरक रूपी । सागर में । गिरते हैं । उन सबका । उद्धार करने वाले । श्री गुरु को नमस्कार हो । 39
एक एव परो बन्धुर्विषमे समुपस्थिते । गुरुः सकलधर्मात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ।
जब । विकट परिस्थिति । उपस्थित होती है । तब । वे ही । एक मात्र । परम बांधव हैं । और । सब धर्मों के । आत्म स्वरूप हैं । ऐसे श्री गुरु को नमस्कार हो । 40
भवारण्यप्रविष्टस्य दिड्मोहभ्रान्तचेतसः । येन सन्दर्शितः पन्थाः तस्मै श्रीगुरवे नमः ।
संसार रूपी । अरण्य में । प्रवेश करने के बाद । दिग मूढ़ की । स्थिति में ( जब कोई मार्ग नहीं दिखाई देता है ) चित्त । भृमित हो जाता है । उस समय । जिसने मार्ग दिखाया । उन श्री गुरु को नमस्कार है । 41
तापत्रयाग्नितप्तानां अशान्तप्राणीनां भुवि । गुरुरेव परा गंगा तस्मै श्रीगुरुवे नमः ।
इस पृथ्वी पर । त्रिविध ताप ( आधि । व्याधि । उपाधि - देहिक । दैविक । भौतिक ) रूपी अग्नि से । जलने के कारण । अशांत हुए । प्राणियों के लिए । गुरु ही । एक मात्र । गंगा हैं । ऐसे श्री गुरु को नमस्कार हो । 42
सप्तसागरपर्यन्तं तीर्थस्नानफलं तु यत । गुरुपादपयोबिन्दोः सहस्रांशेन तत्फलम ।
7 समुद्र । पर्यन्त के । सब तीर्थों में । स्नान करने से । जितना फल । मिलता है । वह फल । गुरु के चरणामृत के । 1 बिन्दु के । फल का । हजारवाँ हिस्सा है । 43
शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन । लब्ध्वा कुलगुरुं सम्यगुरुमेव समाश्रयेत ।
यदि शिव नाराज़ हो जायें । तो गुरु । बचाने वाले हैं । किन्तु यदि । गुरु नाराज़ हो जायें । तो बचाने वाला । कोई नहीं । अतः गुरु को । संप्राप्त करके । सदा उनकी । शरण में रेहना चाहिए । 44
गुकारं च गुणातीतं रुकारं रुपवर्जितम । गुणातीतमरूपं च यो दद्यात स गुरुः स्मृतः ।
गुरु शब्द का । गु अक्षर । गुणातीत । अर्थ का । बोधक है । और । रु अक्षर । रूप रहित स्थिति का । बोधक है । ये दोनों ( गुणातीत और रूपातीत ) स्थितियाँ । जो देते हैं । उनको गुरु कहते हैं । 45
अत्रिनेत्रः शिवः साक्षात द्विबाहुश्च हरिः स्मृतः । योऽचतुर्वदनो बृह्मा श्रीगुरुः कथितः प्रिये ।
हे प्रिय !  गुरु ही । त्रिनेत्र  रहित ( दो नेत्र वाले ) साक्षात । शिव हैं । दो हाथ वाले । भगवान विष्णु हैं । और एक मुख वाले । बृह्मा हैं । 46
देवकिन्नरगन्धर्वाः पितृयक्षास्तु तुम्बुरुः । मुनयोऽपि न जानन्ति गुरुशुश्रूषणे विधिम ।
देव । किन्नर । गंधर्व । पितृ । यक्ष । तुम्बुरु ( गंधर्व का एक प्रकार ) और । मुनि लोग भी । गुरु सेवा की विधि नहीं जानते । 47
तार्किकाश्छान्दसाश्चैव देवज्ञाः कर्मठः प्रिये । लौकिकास्ते न जानन्ति गुरुतत्वं निराकुलम ।
हे प्रिय !  तार्किक । वैदिक । ज्योतिषी । कर्मकांडी । तथा लौकिक जन । निर्मल गुरु तत्व को । नहीं जानते । 48
यज्ञिनोऽपि न मुक्ताः स्युः न मुक्ताः योगिनस्तथा । तापसा अपि नो मुक्त गुरुतत्वात्पराडमुखाः ।
यदि । गुरु तत्व से । प्राडमुख हो जाये । तो । याज्ञिक । मुक्ति नहीं पा सकते । योगी मुक्त । नहीं हो सकते । और तपस्वी भी । मुक्त नहीं हो सकते । 49
न मुक्तास्तु गन्धर्वः पितृयक्षास्तु चारणाः । ॠष्यः सिद्धदेवाद्याः गुरुसेवापराडमुखाः ।
गुरु सेवा से । विमुख । गंधर्व । पितृ । यक्ष । चारण । ॠषि । सिद्ध । और देवता । आदि भी । मुक्त नहीं होंगे ।
इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमामहेश्वरसंवादे श्री गुरुगीतायां प्रथमोऽध्यायः ।

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