सोमवार, दिसंबर 19, 2011

समरथ है गुरू हमारा



1. प्रश्न - स्वामी जी, दीक्षा लेने की क्या आवश्यकता है। स्वयं अपने बल पर साधना करने से भी तो साधना पूरी हो सकती है?

ऊत्तर - हे प्रिय शिष्य, दीक्षा लिये बिना मन की एकाग्रता नहीं होती। आज शायद तुम्हारे मन में कोई देवी देवता अच्छा लगे। कल कोई सन्त महात्मा अच्छा लगे, और अगले दिन कोई सदगुरू अच्छा लगे। परिणाम स्वरूप किसी में भी एकाग्रता नहीं हो सकती है। यदि मन स्थिर न हो तो भगवान (सदगुरू) का लाभ तो दूर की बात है, मामूली सांसारिक कर्मों में भी गङबङी होने लगती है। भगवान लाभ करने के लिये श्री सदगुरूदेव भगवान की नितान्त आवश्यकता है।

गुरू के बतलाये हुए नाम मात्र का जप व ध्यान करने से और श्री सदगुरूदेव की दया से सब ठीक हो जाता है, या सर्वसमर्थ श्री सदगुरू ठीक कर देते हैं। श्री सदगुरूदेव के वचनों पर विश्वास करके यदि निष्ठापूर्वक तथा श्रद्धा सहित भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान न करोगे तो किसी भी हालत में कुछ की भी प्राप्ति नहीं हो सकती है। धर्म का मार्ग अति कठिन है। श्री सदगुरू का आश्रय मिले बिना चाहे जितना भी बुद्धिमान क्यों न हो। कोटिश: प्रयत्न क्यों न करे, ठोकर खाकर गिर ही पङेगा।

साधारण सी बात है कि चाहे जो भी कला सीखना चाहो। उस कला को प्राप्त करने के लिये उस कला के गुरू को मानना ही पङेगा, और उसी के निर्देशानुसार सीखना पङेगा तब वह विद्या या कला सीख पाओगे। तब फ़िर इतनी श्रेष्ठ ब्रह्मविद्या का लाभ प्राप्त करने के लिये गुरू की आवश्यकता क्यों नहीं पङेगी? गुरू की आवश्यकता अवश्य पङेगी और सदा पङेगी।

यदि भगवान लाभ चाहते हो तो धैर्य धारण कर भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान करते जाओ, समय आने पर सब होगा। वे खुद जानते हैं कि वे कब दर्शन देंगे। बिना श्रद्धा के दौङ धूप करने से कोई फ़ायदा नहीं होगा।

श्री स्वामी जी महाराज सतसंग के दौरान कहा करते थे कि समय से पहले पक्षी अपना अण्डा तक नहीं फ़ोङता है। ऐसे अवसर पर मन की अवस्था बहुत ही कष्टदायक होती है। एक बार आशा फ़िर निराशा, कभी हंसना, कभी रोना, वस्तु लाभ न होने पर दिन इसी तरह कट जाते हैं। परन्तु उत्तम गुरू पा जाने से वे मन को इस अवस्था से भी झट से ऊपर उठा सकते हैं।

किन्तु यदि बिना ठीक समय के आये इस प्रकार मन को ऊपर उठा दिया जाय तो उसका वेग सम्हाला नहीं जा सकता। उल्टे शरीर और मन का अनिष्ट होता है। ऐसी अवस्था में बङी सावधानी से रहना पङता है। श्री सदगुरू के आश्रम में रहकर उनके उपदेश अनुसार सात्त्विक आहार, पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन इत्यादि नियमों का सुचारू रूप से पालन करना पङता है। यदि ऐसा न किया जाय तो सिर का गरम होना, सिर चकराना इत्यादि रोगों का सामना करना पङता है।

प्रश्न - सदगुरू देव जी महाराज, मुझे भजन, सुमिरन, ध्यान एक साथ करने का आदेश मिला है। परन्तु ध्यान तो बिलकुल नहीं होता है। इसलिये मन बीच-बीच में बहुत खराब हो जाता है।

उत्तर - प्रिय भक्त, निराशा उत्पन्न होना स्वाभाविक है। एक दिन एक भक्त को आश्रम में ऐसा हुआ था। उस समय उसकी उम्र बहुत कम थी। भजन, सुमिरन, ध्यान करने की जो विधि बतलाई गयी थी, उसको रोज करता था। क्योंकि श्री स्वामी जी महाराज का सबको भजन, सेवा, ध्यान करने का कङा निर्देश था। उम्र कम और करने का शौक तो था ही लेकिन मन चंचल बहुत था।

जब भजन, सुमिरन, ध्यान करता तो कभी ध्यान होता, कभी नहीं होता था तो मन में बङी घबराहट व बङी ग्लानि भी होती थी। श्री सदगुरूदेव से कहने में बङा डर लगता था। एक दिन मन में आया कि इतने दिन से यहाँ आया हूँ, कुछ भी तो अभी नहीं बना। अर्थात न भजन होता न ध्यान ही आता है फ़िर क्या यहाँ रहूँ। जाय सब चूल्हे में।

श्री स्वामी जी से भी कुछ नहीं बतलाया। मन ही मन सोच रहा था कि यदि इसी तरह दो-चार दिन और चला तो घर वापस चला जाऊँगा। ऐसा सोचता हुआ बाहर आ रहा था कि श्री स्वामी जी महाराज ने उसे देख लिया। वे अन्दर कमरे में चले गये। तब सबका नियम था कि मन्दिर में आरती पूजा के बाद सब लोग श्री स्वामी जी के दर्शन करने के लिये जाते थे। श्री स्वामी जी महाराज का दर्शन करने के बाद सब कोई नीचे प्रसाद लेने जाते थे।

जब दण्डवत प्रणाम कर उठा तो श्री स्वामी जी महाराज बोले - देख, तू जब मन्दिर से आ रहा था तब देखा कि तेरा मन मानो मैल से ढंक गया है।

यह सब सुनकर भक्त ने सोचा - हाय रे, श्री स्वामी जी महाराज तो सब कुछ मेरे अन्दर की बात जान गये।

वह बोला - मेरा मन सचमुच खराब हो गया है आप सब कुछ जान गये हैं।

तब उन्होंने उसका मुँह खुलवा कर जीभ पर कुछ लिख दिया। तुरन्त ही पहले का सारा कष्ट भूल गया और आनन्द में विभोर हो गया। जब भी उनके पास जाता या रहता था। हमेशा आनन्द से भरपूर रहता था। इसीलिये तो सिद्ध एवं शक्तिशाली गुरू की आवश्यकता होती है।

प्रश्न - आजकल बहुत से लोग दीक्षा लेकर भजन, सुमिरन, ध्यान तो करते ही नहीं बल्कि बङी बङी डींगे मारते रहते हैं।

उत्तर - बहुत धैर्य चाहिए। धैर्य धारण कर भजन, सुमिरन, ध्यान की साधना करते जाओ। जब तक तत्त्व लाभ न हो, तब तक खूब मेहनत करो, यानी खूब मेहनत, लगन, और श्रद्धा से भजन, सुमिरन, ध्यान की साधना नियमित नियमानुसार सदा करते रहो। पहले पहल साधना बेगारी करने के समान नीरस मालूम पङती है, जैसे अ आ का सीखना।

परन्तु धैर्यपूर्वक लगे रहने पर यानी भजन, सुमिरन, ध्यान करते रहने पर धीरे धीरे भजन, ध्यान होने लग जाता है, और मन को शान्ति भी मिलने लग जाती है। दीक्षा लेने के बाद जो सिर्फ़ शिकायत करते हैं और कहते हैं कि महाराज जी, कुछ तो नहीं हो रहा है। उनकी बात दो-तीन साल तक बिलकुल नहीं सुना। बल्कि उन्हें समझा बुझाकर तसल्ली देकर छोङ देता था।

इसके बाद वे लोग खुद ही आकर कहते थे कि - हाँ महाराज जी, अब कुछ कुछ हो रहा है। यह जल्दबाजी की चीज नहीं है। दो-तीन साल का खूब भजन, सुमिरन, ध्यान की साधना करो। फ़िर आनन्द मिलने लगेगा। तुम्हारी बात सुनकर बडा आनन्द आया। आजकल अनेक लोग कामचोरी करते हुए छल से अपना काम बना लेना चाहते हैं। पर यह आध्यात्मिकता की बात है और सच्चे दरबार में झूठ और चापलूसी ज्यादा दिन नहीं चलती। अन्त में भाण्डा फ़ूट जाता है।

प्रश्न - स्वामी जी, ईश्वर है, या नहीं। इसका क्या प्रमाण है?

उत्तर - सन्त महापुरूषों का कहना है कि ईश्वर है, और हम लोगों ने उन्हें पाया है। तुम लोग खूब भजन, सुमिरन, ध्यान, नियमित नियमानुसार करोगे तो तुम लोग भी पाओगे। सन्तों का कहता है कि भांग भांग कहने से नशा नहीं चढ़ता। भांग लाओ, पी लो, तब कुछ नशा चढ़ेगा। केवल भगवान या ईश्वर ईश्वर कहने से नहीं होगा। भजन, सुमिरन, ध्यान की साधना करो। फ़िर उनकी कृपा की अपेक्षा करो। समय पर उनकी कृपा तथा उनक दर्शन अवश्य पाओगे।

प्रश्न - स्वामी जी महाराज, जप करते करते कभी कभी मन शून्य हो जाता है, यह क्यों?

उत्तर - पतंजलि ने कहा है यह शून्यपन विघ्न है। श्री सदगुरू महाराज के बतलाये हुए नाम का भजन, सुमिरन, ध्यान निरन्तर करते रहने से ध्यान में प्रगाढ़ता आती है। प्रगाढ़ता आने से प्रत्यक्ष अनुभूति हो जाती है, और अनुभूति हो जाने से समाधि हो जाती है। समाधि के बाद आनन्द का प्रभाव बहुत समय तक बना रहता है। श्री स्वामी जी महाराज कहा करते थे कि यह भक्ति भजन का आनन्द जीवन भर बना रहता है कभी भी समाप्त नहीं होता।

श्री स्वामी जी महाराज एक शिष्य को समझा रहे थे। परन्तु बालक जानकर थोडा सा एवायड कर रहे थे। फ़िर भी मालिक तो भक्ति की खान होते हैं। जब भक्ति की खान से फ़व्वारा निकला तो अपने शिष्य को भक्ति का खान बना दिया, और फ़िर शिष्य के कानों में श्री सदगुरू का नाम पडते ही उस शिष्य के भीतर से मानो प्रेम का फ़ुहारा उठने लगा। साधु ही साधु को पहचान सकता है। साधना करके उच्च अवस्थ प्राप्त किये बिना उस अवस्था के व्यक्ति को पहचाना नहीं जा सकता। हीरे का मूल्य क्या सब्जी बेचने वाला लगा सकता है।

प्रश्न - स्वामी जी, कुछ महात्माओं और भक्तों का कहना है कि निर्जन स्थान में गुप्तरूप से रोते रोते मालिक को पुकारना चाहिये। चाहे एक वर्ष तक हो, या तीन माह हो, या तीन दिन हो। साधु संग हो, निर्जन स्थान हो, जैसे नदी का किनारा, धार्मिक स्थान, बाग बगीचा, उसमें बैठकर भजन ध्यान करना चाहिये। इन दोनों में किस पर अधिक जोर देना हमें उचित है।

उत्तर - भजन, ध्यान दोनों एक साथ करना होगा। एकान्त में बैठ कर भजन, ध्यान करने से मन सहज ही अन्तर्मुखी हो जाता है। व्यर्थ की चिन्तायें कम हो जाती है। थोङी उन्नति हुए बिना पूर्ण निर्जन स्थान का प्रयोग नहीं किया जा सकता। बहुत लोग एकदम नि:संग होने की कोशिश करने से पागल हो जाते हैं। कोई अनिष्ट हो जाता है। भजन, सुमिरन, ध्यान करते करते कुछ अभ्यास होने पर ही एकान्तवास करें। भजन, ध्यान करते करते समाधिस्थ हुए बिना श्री सदगुरू को अन्दर बसाये बिना या सदगुरू के चिन्तन में लीन हुए बिना मन ठीक तरह से नि:संग नहीं होगा। साधु सन्तों की संगति की भी सदैव आवश्यकता पङती है।

एक दिन एक व्यक्ति श्री स्वामी जी महाराज के पास आया। उन्हें देखा, वे चुपचाप अपने में अन्दर लीन हैं। उन्हें देखकर वह सोचने लगा - ये बात नहीं करते, इनके पास आने से क्या लाभ?

यह सोचकर वह उस दिन वापस चला गया और एक दिन आकर उनके पास कुछ देर बैठा रहा। उस दिन उसने देखा कि स्वामी जी अन्दर यानी अपने मन ही मन किसी से बातें कर रहे हैं। कभी रो
रहे हैं, तो कभी हंस रहे हैं।

उनका यह भाव देखकर उस व्यक्ति ने उस दिन कहा - जो आज सीखा है, वह हजारों पुस्तकें पढ़कर भी नहीं सीखा जा सकता है। श्री सदगुरू भगवान में जब ऐसी व्याकुलता आयेगी तभी उनके दर्शन होंगे और तभी भजन, सुमिरन, पूजा, दर्शन, ध्यान की साधना का आनन्द आएगा।

प्रश्न - स्वामीजी, ध्यान में बैठने से कभी कभी मन खूब स्थिर होता है, और कभी कभी हजार चेष्टा करने पर भी स्थिर नहीं हो पाता है। सिर्फ़ इधर उधर दौङता रहता है।

उत्तर - हाँ, ऐसा होता है। किन्तु यह पहले पहल ही होता है। समुद्र में ज्वार भाटा होता है। ठीक उसी प्रकार सभी चीजों का ज्वार भाटा होता है। साधना भजन में भी ज्वार भाटा है। इसके लिये कुछ सोचना मत, कमर कस कर नियम से लगे रहना चाहिये। श्री सदगुरू महाराज के प्रति एकनिष्ठ भक्ति भाव से साधना, भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान कुछ समय तक नियमित रूप से किया जाए तो ज्वार भाटा फ़िर नहीं उठेगा। मन स्थिर होने लगेगा। तब ध्यान की धारा अविरल प्रवाहित होने लगेगी।

आसन पर बैठते ही एकदम जप ध्यान आरम्भ करना ठीक नहीं है। पहले विचार पूर्वक श्रद्धा भाव से मन को बाहर की दुनियां से समेटना चाहिये। फ़िर अपने श्री सदगुरूदेव महाराज को आप जहाँ बैठे हैं वहीं से मन ही मन साष्टांग दण्डवत प्रणाम करना चाहिये। श्री स्वामी जी महाराज से हाथ जोङकर प्रार्थना करना चाहिये कि हे मेरे दयासागर, परमदयालु, श्री स्वामी जी, मेरे मालिक मेरा मन ध्यान की तरफ़ अग्रसर कीजिये। मन की भटकन को छुङाइये प्रभु। फ़िर उसके बाद मालिक के स्वरूप का ध्यान, भजन प्रारम्भ करना चाहिये। कुछ दिन ऐसा करने पर मन धीरे धीरे स्थिर हो जायेगा।

जब देखो कि मन थोङा स्थिर हो रहा है तो उस समय काम कोई भी करो। सेवा करते रहो लेकिन मन मालिक की तरफ़ लगाये रखो। जहाँ जरा भी सेवा से अवकाश मिले तुरन्त भजन, सुमिरन, ध्यान करना चाहिये। जब अच्छा न लगे मन स्थिर न हो उस समय मालिक की श्रीमुख वाणी का स्मरण करते रहना चाहिये। मालिक को याद करते रहना चाहिये और उनका भजन गाना चाहिये। भजनादि गुनगुनाने से भी मन लगता है। नियमित नियमानुसार चिन्तन, मनन और मालिक का दर्शन, आरती, पूजा, भजन, त्यौहार आदि की अदभुत छवि के ख्याल की सहायता से मन को स्थिर करने की चेष्टा करे। मन तुरन्त स्थिर होने लगेगा। प्रतिक्षण संघर्ष करना होगा। मन कहो, बुद्धि कहो, चाहे इन्द्रिय कहो। संघर्ष करने से सभी वश में आ जाते हैं।

श्री स्वामी जी महाराज ने कहा है - संघर्ष ही है जीवन।
श्री गुरूदेव ने कहा है - कांटों का गम नहीं है, समरथ है गुरू हमारा।

सुमिरन का ढोल नहीं पीटना चाहिये




प्रश्न - श्री स्वामी जी, क्या भजन, सुमिरन का ढोल नहीं पीटना चाहिये?

उत्तर - नहीं, कदापि नहीं, इससे अनिष्ट होता है। विभिन्न लोग विभिन्न प्रकार की बातें हंसी उडाते हैं। फ़िर यह ठीक भी नहीं है। नाना प्रकार की बातें करके लोग मन को संदिग्ध और चंचल बना देते हैं तथा साधन में विघ्न पैदा करते हैं। यथार्थ साधक कैसा होता है जानते हो?

यथार्थ साधक मच्छरदानी के अन्दर सोया रहता है। सब लोग सोचते हैं कि सो रहा है। पर वह रात सुमिरन, ध्यान करके बिता देता है। सबेरे जब उठता है तो लोग समझते हैं कि वह सोकर उठा है।

पहली उम्र में ही खूब साधना, जप, ध्यान, भजन, सुमिरन, पूजा, दर्शन, सेवा, दान कर श्री सदगुरू देव महाराज के दर्शन, ध्यान का आनन्द पा लेना चाहिये। एक बार जिसने स्वाद पा लिया वह फ़िर कहाँ जाएगा। उसका सिर काट लेने पर भी वह पुन: अपने भगवान, अपने प्रभु, अपने मालिक को कभी छोङ नहीं सकता। अपने मालिक से मिलने को बेचैन रहता है।

साधना भजन का सुन्दर समय है, सन्धि क्षण, और गम्भीर रात्रि।

साधारणतया मनुष्य वह समय व्यर्थ गवां देता है। जो लोग खूब नींद लेना चाहते हैं यदि वे पहले पहल दिन में सो लें, और रात्रि में जागें तो वह भी अच्छा है।

रात को तीन लोग जागते हैं - पहला योगी, दूसरा भोगी, और तीसरा चोर।
रात की नींद योगी साधु के लिये नहीं है। यह बात श्री स्वामी जी महाराज अपने श्रीमुख से बराबर कहा करते हैं।

ऐसे प्रेमीभक्त श्री सदगुरूदेव के सानिध्य में रहते हैं और सदगुरू सभी को उपदेश ध्यान, धारणा, भजन, सेवा सिखलाते हैं। विभिन्न प्रकार की सेवायें करवा कर अपने शिष्य को हर प्रकार से संवारते और सम्हालते हैं।

प्रश्न - क्या श्री सदगुरूदेव भगवान का नाम लेने से मन शुद्ध होता है?

उत्तर - अवश्य शुद्ध होता है। श्री सदगुरूदेव के नाम का भजन, सुमिरन, दर्शन, सेवा, पूजा, ध्यान करने से तन और मन दोनों शुद्ध हो जाते हैं। श्री सदगुरू स्वामी जी के नाम के भजन में ऐसा विश्वास होना चाहिये कि मुझे अब डर क्या, मेरा अब बन्धन कहाँ। श्री सदगुरू से नामदीक्षा लेकर मैं अब अमर हो गया हूँ। इस तरह का अटल विश्वास रखकर मैं अब अमर हो गया हूँ। इस तरह का अटल विश्वास रखकर साधना करनी चाहिये। निश्चित ही भजन, सुमिरन से तन, मन शुद्ध और शान्त हो जायेगा।

गुरू अतिरिक्त और नहीं ध्यावे



प्रश्न - महाराज जी, गुरू भाइयों से बातचीत के दौरान मालूम होता है और मेरे साथ भी ऐसा होता है कि कभी कभी भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान में खूब मन लगता है, और उसमें आनन्द आता है, और कभी भजन, सुमिरन व ध्यान के अभ्यास में कमी आ जाती है। मन ठीक से नहीं लगता है। मन में तरह तरह की हिलोरें उठती रहती हैं और तरह तरह की विघ्न बाधायें आती रहती हैं। यह हालत एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी यानी एक के बाद एक लगातार आती ही रहती हैं। भजन ध्यान का साधन बनता बिगङता रहता है।

उत्तर - जब तक श्री सदगुरूदेव महाराज की कृपा नहीं होगी। तब तक भजन, सुमिरन, ध्यान में रस या आनन्द नहीं आयेगा। साधक के मन में भजन, ध्यान के लिये बेकली व तङप आवश्यक है। जिससे रस और आनन्द के लिए भूख पैदा हो। भजन और ध्यान के लिए भूख पैदा होना ही आगे का रास्ता चलना है। यदि उतने से आनन्द में तृप्ति हो जाती है तो फ़िर उसके लिये आगे का रास्ता रुक जाता है। अत: ऐसी दशा में जब विघ्न उत्पन्न हो तो उसके लिये विरह तथा तङप उत्पन्न होती है। ऐसी दशा में अभ्यासी को घबराना नहीं चाहिये और न ही निराश होना चाहिये। इस दशा में श्री सदगुरूदेव महाराज के दया की आशा रखकर खूब लगन से भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान नियमित नियमानुसार करते रहना चाहिये। इससे मालिक की दया व कृपा अवश्य ही होती है।

महापुरूषों ने बताया है कि साधक जितना रास्ता चलता है, और परमार्थ पथ पर अग्रसर होता जाता है, उतनी ही अधिक विघ्न बाधायें सामने आती हैं। नित्य नयी तरंगें लेकर काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया तथा अहंकार के रूप में विघ्न आते हैं। अत: इनसे बचने के लिये केवल एकमात्र सहारा श्री सदगुरू भगवान का ही रह जाता है। अर्थात श्री सदगुरूदेव जी महाराज की दया का सहारा लेकर इन विघ्नबाधाओं को काटते रहना चाहिये। श्री सदगुरूदेव जी महाराज की दया से साहस और पुरूषार्थ के साथ चलकर श्री सदगुरूदेव महाराज की कृपा से धीरे धीरे माया मोह के प्रभाव पर विजय पाना चाहिये। साधक एक न एक दिन सफ़लता प्राप्त कर ही लेगा।

ऐसी धुन गुरू में लगे, जैसे तन में प्रान।
एक पलक बिसरूं नहीं, हे परिपूरण काम।

बिना श्री सदगुरूदेव की कृपा व दया के काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया, अहंकार से लङना सम्भव नहीं है। श्री सदगुरूदेव जी महाराज की दया या सम्बल लिये बिना साधक आगे नहीं बढ़ सकता है। ऐसा होने से साधक के मन में मालिक के प्रति प्रेम, दीनता और आश्रय बढ़ते जाते हैं और जब श्री सदगुरू की दया से विघ्न कटने लग जाते हैं तो प्रभु प्रेम विशेष रूप से उभरने लगता है। जिसके फ़लस्वरूप साधक तीव्रता से परमार्थ पथ पर बढ़ने लगता है। उसका मन मानस स्वच्छ होने लगता है और उसकी बढ़त इस ढंग से होने लगती है। जिससे वह इस मायादेश से ऊपर उठकर ऊँचे देश यानी दयाल देश का वासी बन जाता है। यह सब कुछ हमारे श्री सदगुरूदेव की कृपा व दया की बख्शीश या देन है।

नियम निभाये दास ये, प्रभु दीजो यही आशीष।
मेरे दामन में भरो, प्रभु दया की बख्शीश।

जो साधक श्री सदगुरू के स्वरूप को अगुआ करके चलेगा यानी श्री सदगुरूदेव जी महाराज का आश्रय लेकर कोई भी कार्य करेगा। उसे प्रभु की कृपा से विघ्नबाधायें बहुत ही कम असर करेंगी। यदि माया अपने दल-बल का थोङा बहुत वेग दिखायेगी तो भी श्री सदगुरूदेव अपनी दया से अपने शिष्य के ऊपर आई विघ्नबाधाओं का शीघ्र निवारण कर देंगे। इस प्रकार साधक अपने श्री सदगुरूदेव महाराज पर आश्रित रहकर भजन, सुमिरन, ध्यान तथा भक्ति की साधन करता है तथा सदा अपने मन को उनके श्रीचरण कमलों में लवलीन रखता है उससे माया भी डरती है। क्योंकि वह जानती है कि यहाँ मेरा वश नहीं चलेगा। इसलिये सभी साधकों को सीख दी जाती है कि कोई भी कार्य, चाहे सामाजिक कार्य हो या आध्यात्मिक कार्य सदा सर्वदा श्री सदगुरूदेव महाराज को आगे रखकर ही करोगे तो सदा सफ़लता प्राप्त करते रहोगे।

गुरू अतिरिक्त और नहीं ध्यावे।
गुरू सेवा रत शिष्य कहावे।

इस तरह से अपने इष्टदेव पर न्यौछावर हों तब वे कृपालु, दयालु अपने वह प्रेमाभक्ति देते हैं, जो सारे सुखों का मूल है। जब हम उन पर अपने आपको कुर्बान कर देते हैं। हम पर उन्हें पूर्ण विश्वास हो जाता है कि यह हमारी हर आज्ञा का पालन करेगा तब वे अपने सेवा का अवसर प्रदान करते हैं। अत: हमें पूर्णरूपेण श्री सदगुरूदेव भगवान की श्री चरण शरण में अर्पित होना चाहिये।

तभी तो लोग कहते हैं कि
न हमने हंस के पाया है, न हमने रो के पाया है।
जो कुछ भी हमने पाया है, श्री सदगुरू का हो के पाया है।

बिना श्री सदगुरूदेव की कृपा के साधक के अन्दर भजन, सुमिरन, ध्यान व भक्ति की प्रक्रिया यानी आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो पाती। जिन साधक जिज्ञासु पर श्री सदगुरूदेव की महती कृपा होती है। उनको गुरू के प्रेम की अमूल्य निधि प्राप्त हो जाती है। उन्हें उसको बनाये रखने के लिये भजन, सुमिरन, ध्यान का नियमित अभ्यास नियमानुसार करते रहना चाहिये। साधक को इसे बनाये रखने के लिये नियमित अभ्यास करना अति आवश्यक है। जब कभी भजन, सुमिरन, ध्यान करते समय ध्यान में रूकावट पङे तो घबराना नहीं चाहिये। मालिक की दया का सहारा लेकर बार बार कोशिश पर कोशिश जारी रखे रहना चाहिए। ऐसा करने से मालिक की दया से भजन, सुमिरन व ध्यान होने लग जायेगा, और रस व आनन्द भी मिलने लगेगा। यही तो श्री सदगुरू की दया का प्रताप है।

श्री सदगुरू ने अति दया कर, दिया नाम का दान।
जपे जो श्रद्धा भाव से, पूरण होवें सब काम।

भजन में जब सांसारिक विचार आवे तो भरसक उन्हें हटाकर अपने मन को भजन, सुमिरन, ध्यान में लगाना चाहिये। यदि सांसारिक विचार न हटें तो मालिक के भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान में मन को घुमा फ़िरा कर लगाते रहना चाहिये। यदि इतना करने पर भी मन न लगे तो मालिक से दीनभाव से प्रार्थना करें कि हे मालिक, मेरा तन, मन, धन सब आपका है। हे मालिक, मेरे मन को अपने चरणों की प्रीति की डोर मे बांध कर अपने साथ हमेशा जोङे रहिये, और मेरा मन भजन, सुमिरन, ध्यान के रस में हमेशा हमेशा सराबोर किये रहिये। इससे मेरे मन में शान्ति व आनन्द प्राप्त हो जायेगा।

माया और भक्ति दोनों इकट्ठी नहीं रह सकतीं। यह मेरा दिल मालिक का मन्दिर है। इष्टदेव का उपासना स्थल है। इसी उपासना स्थल में मालिक के नाम का भजन, मालिक के स्वरूप का ध्यान करें, और इसी भजन और ध्यान के रस में सदा डूबे रहें। यह श्री सदगुरू महाराज की महती दया है और सभी साधकों को इसे बनाये रखने के लिये भजन भक्ति का अभ्यास करना अति आवश्यक है। ऐसा करने से शान्ति का अनुभव होता है। ऐसी दशा में जितनी देर तबियत चाहे उतनी देर भजन ध्यान करता रहे और मन में शान्ति की भावना लेकर उठे।

सन्त सदगुरू जीवों के परम हितैषी होते हैं। वे संसार में आकर सदा परमार्थ एवं परोपकार में संलग्न रहते हैं और अपने भक्तों को भक्ति की सच्ची दात प्रदान कर उनके दुख, कष्ट को हरते हैं। उनकी आत्मा का कल्याण करते हैं। उन्हें चौरासी के चक्कर से मुक्ति दिलाते हैं। अपने सुकोमल तन पर अनेकों कष्ट सहन करके भी वे सदा भक्तों की भलाई करने में सदा लगे रहते हैं।

जीवों के कल्याण हित, निरत रहे दिन रैन।
पावन तन पर कष्ट सहें, देवें सुख और चैन।

सन्तों महापुरूषों का कहना है -

परमारथ के कारने, सन्त लिया औतार।
सन्त लिया औतार, जगत को राह चलावैं।
भक्ति करैं उपदेश, ज्ञान दे नाम सुनावैं।
प्रीत बढ़ावैं जगत में, धरनी पर डोलौं।
कितनौ कहे कठोर वचन, वे अमृत बोलौं।
उनको क्या है चाह, सहत हैं दुख घनेरे।
जीव तारन के हेतु, मुलुक फ़िरते बहुतेरे।
पलटू सदगुरू पायके, दास भया निरवार।

परमारथ के कारने, सन्त लिया औतार।

पावै सुख अपार




प्रश्न - अभ्यास करते करते यानी भजन, ध्यान करते करते किसी किसी को नींद आने लगती है और अभ्यासी सो जाता है। किसी किसी को तो गहरी नींद में नाक बजने लग जाती है। जागने पर सोचता है कि बङी गहरी समाधि लग गयी है। क्या यह सचमुच समाधि की हालत होती है?

उत्तर - यह धोखा है। भजन, सुमिरन, ध्यान में जब नींद आने लग जाती है तो वह एक प्रकार का विघ्न है। इसे तन्द्रा कहते हैं और यह जाग्रत तथा सोने के बीच की हालत है। प्रारम्भिक अभ्यास में यह दशा किसी किसी को होती है। जब नींद आती मालूम पङे तो भजन करना छोङकर उठ जायें और कुछ देर टहल घूम लें। यदि आवश्यकता समझे तो मुँह हाथ धोकर कुल्ला कर लें। सिर धो लें। फ़िर अभ्यास में बैठ जायें। ज्यादा खाना खाकर भजन, सुमिरन, ध्यान की साधना में बैठने से ऐसा अक्सर होता है। खाली पेट भजन, सुमिरन, ध्यान में आन्तरिक स्मरण करता रहे तो ऐसा अभ्यास
करते रहने से कुछ ही समय में सारी विघ्न बाधायें दूर हो जायेंगी।

इसके अतिरिक्त तीन प्रकार के विघ्न और भी हैं जो अभ्यासी के मार्ग में बाधा डालते हैं।
1. विक्षेप 2. कषाय, और 3. रसा स्वाद।

1. विक्षेप - जब भजन और ध्यान में मन लगता है तब कभी कभी ऐसा होता है कि झटके के साथ एकदम चित्त उधर से हट जाता है। जैसे किसी ने अचानक आकर पुकारा या आवाज दी या हाथ से हिलाकर उठाना चाहा या मन में अचानक कोई सांसारिक तरंगें ऐसी उठीं जिसके कारण चित्त चलायमान हो गया या कोई कीङा, मच्छर, चींटी इत्यादि ने काट लिया।

यह केवल कुछ उदाहरण हैं जिससे विक्षेप का अर्थ स्पष्ट हो जाय। इस प्रकार की अनेक विघ्न बाधायें विक्षेप के अन्तर्गत आती हैं और इसके कारण अभ्यासी भजन और ध्यान को एकदम छोङ देता है। इसका उपाय यह है कि इन कारणों की पहले से रोकथाम करे। भजन, ध्यान में बैठने के लिये साफ़ सुथरी जगह पर बैठकर भजन ध्यान करे। घर परिवार के लोगों को समझा दे कि भजन ध्यान के समय कोई जोर से न बोले। इशारे इशारों से काम ले लें। बहुत जरूरी पङने पर धीरे धीरे बोलकर काम चलावें। जिससे कि अभ्यासी के भजन, ध्यान में बाधा न पङे। जब तक भजन ध्यान की एकाग्रता में परिपक्वता नहीं आ जाती तब तक यह दशा रहती है।

अभ्यास करते करते जब एकाग्रता में दृढ़ता आ जाती है तब इस प्रकार के विघ्न बाधायें नहीं डालते। फ़िर चाहे कोई सिर पर ढोल बजाता रहे। अभ्यासी के चित्त को डिगा नहीं सकता। महर्षि वाल्मीकि के ऊपर दीमकों ने घर बना लिया था। रामकृष्ण परमहंस जब पंचवटी में ध्यान करने बैठते थे तो मच्छर उनके शरीर पर इस प्रकार लिपट जाते थे कि जैसे वे कोई कपङा ओढ़े हों।

पल पल जो सुमिरन करे, मन में श्रद्धा धार।
आधि व्याधि नासे सकल, पावै सुख अपार।

2. कषाय - कभी भजन व ध्यान के समय अभ्यासी के मन में ऐसे विचार उठते हैं या ऐसे दृश्य सामने आते हैं जिन्हें उसने वर्तमान जन्म में न देखा है न सुना है और न जिनका कोई आधार है। ऐसे विचार पूर्ण जन्मों के कर्मों के परिणामस्वरूप होते हैं और मन की गुनावन से पैदा होते हैं। बिना थोङी देर अपना प्रभाव दिखाये यह नहीं जाते हैं। जो अभ्यासी गुरू को आगे रखता है और प्रेम तथा विरह को दृढ़ता से पकङ कर चलता है उसे इस प्रकार के विघ्न कम सताते हैं। जब कभी ऐसे विचार आकर घेरें उस समय अभ्यासी को चाहिये कि भजन के साथ साथ श्री सदगुरू भगवान के स्वरूप का ध्यान करे। कुछ ही समय में यह विचार हट जायेंगे और भजन, ध्यान के आनन्द का रस मिलने लग जायेगा। साथ ही साधक का मन उत्साहित होकर और ज्यादा से ज्यादा समय भजन, भक्ति व सेवा, पूजा, दर्शन में लगने लगता है और आनन्दित भी होता है तथा अपने श्री सदगुरूदेव को प्रसन्नचित्त व आनन्दविभोर करके सन्तुष्ट कर लेता है और जब श्री सदगुरू सन्तुष्ट हो जाते हैं तो वे अपने शिष्य व साधक को अपने दया से मोक्ष प्रदान कर देते हैं।

गुरू नाम का सुमिरन किये, जन्म यह निश्चय जीता संवर।
मोक्ष मिल जाता दास को, दया का हाथ होता सर।

3. स्वाद से आशय यह है कि जो थोङा बहुत रस भजन व ध्यान में अभ्यासी को प्रारम्भिक दशा में मिलता है उसे पाकर कभी कभी साधक बहुत मग्न हो जाता है और भजन, ध्यान के आनन्द में विभोर होकर तृप्त हो जाता है। सन्तुष्ट हो जाता है। इसी सन्तुष्टि के फ़लस्वरूप साधक का मन भजन, सुमिरन, ध्यान में ज्यादा से ज्यादा लगने लगता है। जिससे उसे समय का ज्ञान नहीं रह पाता। उसी भजन, भक्ति में विभोर मन सदगुरू की कृपा व दया का पात्र बन जाता है।

जब ऐसी दशा होती है तो साधक को चाहिये कि अपने साधना को बढ़ाता जाये तथा आध्यात्मिक चढ़ाई धीरे धीरे चढ़ता जाय। ऐसा करने से धीरे धीरे सारी विघ्न बाधायें समाप्त हो जाती हैं और भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान में मग्न होकर मन श्री सदगुरू की दया का अमृतपान कर मस्त व मगन हो उठता हैये सब श्री सदगुरू की कृपा की ही देन है। ऐसी स्थिति में श्री सदगुरू की चरण शरण ग्रहण किये रहे।

सन्त सदगुरू के जो उपकार हैं उनका बदला जीव क्या दे सकता है? संत सदगुरू के उपकारों के बदले यदि जीव तीन लोक की सम्पदा भी भेंट कर दे तो भी वह मन में यह सोचकर सकुचाता है कि मैंने कुछ भी तो भेंट नहीं किया।

कथन है कि -

सदगुरू के उपकार का, बदला दिया न जाय।
तीन लोक की सम्पदा, भेंटत मन सकुचाय।

मरने का अर्थ क्या है?




काम करने के दिन यहाँ पर इतने लोगों को देखना कुछ अदभुत सा लगता है, नहीं? पहली बार जब आप यहाँ मिले थे, शनिवार था। हमने चर्चा की थी कि प्रेम क्या है? यदि आप यहाँ थे, तो शायद आपको याद होगा, हम सब लोग मिलकर, मेरा अभिप्राय है, साथ साथ इस पूरे मसले के संबंध में खोजबीन कर रहे हैं। यह अत्यंत जटिल है।

यदि आप बुरा न मानें तो आपको विचार करना है, केवल सहमत नहीं हो जाना है। इसे विचारने में आपको अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल पूरी ताकत से करना होगा। तो हम लोग एक साथ इस प्रश्न की छानबीन करने जा रहे हैं कि प्रेम क्या है? साथ साथ आप और हम एक ही मार्ग पर साथ चल रहे हैं। आप वक्ता का केवल अनुमोदन नहीं कर रहे हैं, और यह नहीं कह रहे हैं - हाँ, सुनने में अच्छा लग रहा है। उपनिषद का गीता का भी यही कहना है इत्यादि, यह सब बकवास है।

सर्वप्रथम अपने अनुभवों, निष्कर्षों, विचारों के सम्बंध में किसी बात को स्वीकार न करें। मेरी भी नहीं, मैं तो एक पथिक हूँ, मेरा महत्व नहीं है। हम आप और मैं मिलकर पता लगाने जा रहे हैं कि क्या स्पष्ट है, क्या स्पष्ट नहीं है। हम लोग मिलकर जाँच कर रहे हैं, सन्देह कर रहे हैं। वक्ता का क्या कहना है, उसे हम कतई भी स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

यह मार्गदर्शन, निर्देश या सहायता के लिए कोई भाषण नहीं है। यह तो अत्यधिक नादानी की बात होगी। उस तरह की सहायता तो हमें पीढ़ी दर पीढ़ी मिलती रही है, और इसके बावजूद हम जहाँ थे, वहीं हैं। हम जैसे अभी हैं, वहीं से आरंभ करना है। अतीत में हम कहाँ थे, अथवा भविष्य में हम क्या होंगे? उससे नहीं। अभी हम जैसे हैं, भविष्य में भी वैसे ही होंगे। हमारा लोभ, हमारा द्वेष, हमारी ईर्ष्या, हमारा प्रबल अंधविश्वास, किसी को पूजने की हमारी कामना, अभी तो हम यही हैं।

इस प्रकार हम मिलकर एक बहुत लंबे पथ पर चल रहे हैं। इसके लिए उर्जा चाहिये, और हम इस मसले पर गौर करने जा रहे हैं कि प्रेम क्या है? बहुत गहरी और सूक्ष्म छानबीन हम इस बारे में भी करें कि उर्जा क्या है? आपकी प्रत्येक चेष्टा उर्जा पर आधारित है। अभी जब आप वक्ता को सुन रहे हैं, आप अपनी उर्जा लगा रहे हैं । घर के निर्माण में, वृक्ष लगाने में, कोई भी मुद्रा बनाने में, बात करने में इन सबको लिए उर्जा की आवश्यकता है।

कौवे की काँव काँव, सूर्योदय, और सूर्यास्त यह सब कुछ उर्जा है। जन्म लेते ही बच्चे का रोना, उर्जा का ही अंग है। वायलिन बजाना, बोलना, विवाह करना, यौनक्रिया, धरती की हर बात में उर्जा आवश्यक है।

अतः हम पूछते हैं, उर्जा क्या है? यह है वैज्ञानिक प्रश्नों में से एक। वैज्ञानिक कहते हैं, उर्जा पदार्थ है। हो सकता है कि वह पदार्थ हो, पर उसके पहले मूलभूत उर्जा क्या है, उसका उदगम स्रोत क्या है, किसने इस उर्जा का सृजन किया? सावधान, यह नहीं कह दें कि ईश्वर ने, और ऐसा कहकर चल दीजिए। ईश्वर को मैं नहीं मानता। वक्ता का कोई ईश्वर नहीं है, इतना स्पष्ट है न?

तो उर्जा क्या है? हम पता लगा रहे हैं वैज्ञानिकों के कथन को। हम स्वीकार नहीं कर रहे हैं। और यदि आप कर सकें, तो जो कुछ भी प्राचीन लोगों ने कहा है। हम उस सबको त्याग दें, छोड़ दें उन्हें। राह के किनारे छोड़कर हम साथ साथ आगे बढ़ें।

आपका मस्तिष्क जो एक पदार्थ है। दस लाख वर्षों के एकत्रित अनुभवों का भण्डार है, और उस तमाम विकास का अर्थ है - उर्जा। और मैं स्वयं से पूछ रहा हूं, आप स्वयं से पूछ रहे हैं, क्या कोई उर्जा है, जो ज्ञान के क्षेत्र में अर्थात विचार के क्षेत्र में चालित और आबद्ध नहीं है? क्या कोई ऐसी उर्जा है, जो विचार की गतिविधि से परे है?

विचार आपको प्रबल उर्जा देता है। प्रत्येक सुबह नौ बजे आफिस जाने के लिए, पैसा अर्जित करने के लिए ताकि आप बेहतर घर बना लें। अतीत के संबंध में विचार, भविष्य का विचार, वर्तमान की योजना बनाना, इस तरह विचार प्रचण्ड उर्जा  देता है। धनी बन जाने के लिए, आप प्रबल अग्निशिखा के वेग की भांति कार्य करते हैं। विचार उर्जा उत्पन्न करता है, अतः अब हमें विचार के स्वरूप का ही गहराई से पता लगाना है।

विचार ने इस समाज को योजनाबद्ध किया है। इसने इस संसार को विभाजित कर दिया है। साम्यवादी, समाजवादी, जनतंत्रवादी, गणतंत्रवादी, थलसेना, जलसेना, वायुसेना, ना केवल देश से निकाल बाहर करना वरन वध करना भी शासकों सैनिकों का कार्य है। इस प्रकार हमारे जीवन में विचार बड़ा ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि विचार के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते। हर चीज विचार की प्रक्रिया में निहित है तो विचारणा क्या है?

आप पता लगाईए, मेरी बात ही नहीं सुनिए। वक्ता ने तो इस पर बहुत चर्चा की है, इसलिए उसकी किताबें नहीं देखिए। यह नहीं कहिए, यह सब मैं पहले सुन चुका हूँ। यहाँ आप समस्त किताबों को, अब तक आपने जितनी सारी चीजें पढ़ी हैं, सबको भुला दीजिए। यह इसलिए कि इस पर प्रत्येक बार बिलकुल नये ढंग से हम गौर करें।

विचारणा या विचारना ज्ञान पर आधारित है, और हमने असीम ज्ञान एकत्र कर लिया है। कैसे हम एक दूसरे को बेच डालें। एक दूसरे का शोषण किस प्रकार करें। ईश्वरों का और मन्दिरों का निर्माण कैसे करें आदि हम जानते हैं।

बिना अनुभव के ज्ञान नहीं हो सकता है। अनुभव स्मृति के रूप में मस्तिष्क में संग्रहित ज्ञान। यही विचार का प्रारंभ है। अनुभव सदैव सीमित है क्योंकि आप इसमें और और जोड़ रहे हैं। इस प्रकार अनुभव सीमित है, ज्ञान सीमित है, स्मृति सीमित है अतः विचार सीमित है। ईश्वर जिन्हें विचारों ने निर्मित किया है। आपके ईश्वर, आपकी विचारणा सदैव सीमित रहेंगें। सीमितता से हम उदगम की, उर्जा की खोज का प्रयास करते हैं, आप समझ रहे हैं न? हम, उदगम सृष्टि का प्रारंभ खोजने की कोशिश करते हैं।

विचार ने भय का निर्माण किया, ठीक?
आगे चलकर क्या होगा क्या आप इससे भयभीत नहीं हैं?

नौकरी कहीं खो न दें, परीक्षा में असफल ना हो जाएं, सफलता की सीढ़ी पर शायद ऊपर न चढ़ पाएं। और आप भयभीत हैं कि आप अपनी कामनाओं की पूर्ति नहीं कर पाए। अकेले खड़े रह पाने में असमर्थ हैं। आप स्वयं में एक ताकत नहीं बन पाए। आप हमेशा किसी न किसी पर निर्भर रहते हैं और यह बात प्रचण्ड भय उत्पन्न करती है।

हमारे नित्य जीवन का यही तथ्य है कि हम भयभीत लोग हैं। और इसी से सुरक्षा चाहते हैं, इसी से भय उत्पन्न होता है। भय प्रेम को विनष्ट कर देता है। जहाँ भय है, वहाँ प्रेम का अस्तित्व हो ही नहीं सकता। भय स्वयं में ही एक प्रबल उर्जा है। प्रेम का भय से कोई संबंध ही नहीं है। वे एक दूसरे से पूर्णतया अलग हैं। तो भय का उदगम क्या है? इस सब पर प्रश्न करना ही जीवन्तता है।

विचारणा ने भय उत्पन्न किया है। भविष्य, अतीत के संबंध में विचार, वातावरण से शीघ्रतापूर्वक समायोजित नहीं हो पाना, शायद कहीं कुछ हो न जाये, मेरी पत्नी कहीं मेरा परित्याग न कर दे, अथवा कहीं उसकी मृत्यु ना हो जाए, तब मैं बिलकुल अकेला रह जाऊँगा, मैं तब क्या करूँगा? मेरे अनेक बच्चे हैं, इसलिए किसी से पुनर्विवाह कर लेना बेहतर होगा, कम से कम वह मेरे बच्चों की देखभाल तो करेगी, ऐसे ही और विचार।

यह है अतीत पर आधारित भविष्य के संबंध में विचारणा। इस प्रकार विचार और समय इसमें निहित है। भविष्य के सबंध में विचार, भविष्य अर्थात आने वाला कल। वह विचारणा ही भय का कारण है। इस प्रकार समय और विचार भय के केन्द्रीय तत्व हैं।

तो जीवन के प्रधान तत्व हैं - समय, और विचार। समय आन्तरिक, और बाहरी दोनों है। भीतरी, मैं यह हूँ, मैं वह बनूंगा। और बाहरी, और समय है - विचार। ये दोनों ही गतियां हैं।

मृत्यु, पीड़ा, चिन्ता, दुख, एकाकीपन, हताशा, इन तमाम भयावह स्थितियों से मैं गुजरता हूँ। क्या स्थान है इनका मेरे जीवन में? तमाम तीव्र पीड़ाओं से अपने जीवन में आदमी गुजरता है। बस यही है हमारी जिन्दगी? मैं पूछ रहा हूँ, क्या आपकी जिन्दगी बस इतनी ही है?

यही है आपका जीवन। आपकी चेतना जिन अन्तर्वस्तुओं से निर्मित है। वे हैं आपकी सोच, आपकी परम्परा, आपकी शिक्षा, आपकी जानकारी, आपका भय, आपका अकेलापन। आप सावधानी से गौर करके देख लीजिए, यही हैं आप। आपकी व्यथा, आपका दर्द, आपकी चिन्ता, आपका अकेलापन, आपका ज्ञान, यह सब प्रत्येक मनुष्य की साझा अवस्था है। यह एक तथ्य है, पृथ्वी का हर आदमी पीड़ा, कष्ट, चिन्ता, झगड़े, प्रलोभन, इसकी कामना, इसकी उपेक्षा आदि से गुजरता है।

अतः आप एक व्यक्ति नहीं हैं, आप एक पृथक प्राण, एक प्रथक आत्मा नहीं हैं। आपकी चेतना वही है। शारीरिक रूप में ही नहीं, वरन मनोवैज्ञानिक रूप में, जो संपूर्ण मानव जाति की चेतना है।

हम पता लगाने की छानबीन करने की कोशिश कर रहे हैं कि जीवन क्या है? हम कह रहे हैं कि जब तक किसी भी प्रकार का भय है, कोई भी दूसरी चीज अस्तित्व में नहीं आयेगी। अगर किसी भी प्रकार की आसक्ति है, दूसरा अस्तित्व में आयेगा ही नहीं।

और वह दूसरा है - प्रेम, यानि किसी भी प्रकार की आसक्ति हो, तो प्रेम असंभव है।

अतः हम गौर करने जा रहे हैं कि संसार क्या है, और मृत्यु क्या है? हम इनका पता लगा रहे हैं। हम सभी मृत्यु से इस कदर भयभीत क्यों हैं? आप जानते हैं, मरने का क्या अर्थ है? क्या आपने दर्जनों लोगों को मरते घायल होते नहीं देखा है? क्या कभी आपने गहराई से पता लगाया है कि मृत्यु क्या है? यह प्रश्न बड़ा ही महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण, जितना कि यह प्रश्न कि जीवन क्या है?

हम लोगों ने कहा कि जीवन है। यही सब व्यर्थ की बातें, जानकारी, प्रतिदिन नौ बजे आफिस जाना आदि, विवाद, संघर्ष, इसको नहीं चाहना, उसकी कामना रखना, जीवन क्या है, शायद हम जानते हैं।

लेकिन हमने गंभीरतापूर्वक कभी भी यह पता नहीं लगाया कि मरण क्या है?

क्या है मरण? निश्चित ही मृत्यु एक असाधारण चीज होनी चाहिए। प्रत्येक चीज आपसे ले ली जाती है। आपकी आसक्ति, आपका पैसा, आपकी पत्नी, आपके बच्चे, आपका देश, आपके अन्धविश्वास, आपके तमाम गुरू, आपके समस्त भगवान। आपकी यह कामना हो सकती है कि आप इन सभी को दूसरी दुनियां में लेते जायें। पर आप ऐसा कर ही नहीं सकते।

अतः मृत्यु कहती है, पूर्णतया अनासक्त हो जाएं। मृत्यु जब आती है, तो ठीक यही होता। किसी भी व्यक्ति पर आप निर्भर नहीं रहते, कुछ भी नहीं रह जाता, फिर भी आप शरीर धारण करेंगे, ऐसा आप विश्वास करते हैं। यह कल्पना बहुत ही आराम पहुँचाने वाली है, पर यह यथार्थ नहीं है।

हम लोग पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं, जीवित रहते हुए मरने का क्या अर्थ है? आत्महत्या कर लेना नहीं, उस तरह की मूर्खता के संबंध में, मैं बात नहीं कर रहा। मृत्यु का क्या अर्थ है, मैं खुद ही पता लगाने की कोशिश कर रहा हूँ? जिसका आशय है, क्या खुद अपने समेत आदमी ने जो कुछ भी निर्मित किया है, उस सबसे आदमी पूरी तरह मुक्त हो सकता है?

मरने का अर्थ क्या है?

प्रत्येक चीज का परित्याग, मृत्यु अत्यधिक तेज छुरे से काटकर, आपको तमाम आसक्तियों से, आपके ईश्वर से, देवताओं से, अन्धविश्वासों से, आराम की कामना से, अगले जीवन आदि से बिलकुल अलग कर देती है। मैं पता लगाने जा रहा हूँ कि मरण का अर्थ क्या है?

क्योंकि यह उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि जीवन, तो हम किस प्रकार पता लगाएंगे? सचमुच में सैद्धांतिक रूप में नहीं, क्या अर्थ है मरण का? मैं सचमुच पता लगाना चाहता हूँ, वैसे ही जैसे आप पता लगाना चाहते हैं कि मैं आपके लिए बोल रहा हूँ, अतः सो मत जाइए। मरण का क्या अर्थ है, यह प्रश्न कीजिए अपने आपसे। हम युवा हैं, या अधिक वृद्ध, यह प्रश्न सदैव कायम है।

इसका अर्थ है पूरी तरह से मुक्त हो जाना। आदमी ने जो भी गढ़ा है, उन सबों से पूरी तरह अनासक्त हो जाना। कोई आसक्ति नहीं, कोई भविष्य नहीं, कोई अतीत नहीं। जीवित रहते हुए मृत हो जाना। इसके सौन्दर्य को, इसकी श्रेष्ठता को, इसकी असाधारण शक्ति को, आप नहीं देख रहे हैं।

इसका अर्थ क्या है, आप समझ रहे हैं? आप जीवित हैं, लेकिन प्रत्येक क्षण आपका मरण हो रहा है। और इस प्रकार पूरे जीवन में आप किसी भी चीज से आसक्त नहीं, यही है अर्थ मरण का।

इस प्रकार का मरण है - जीवन।

आप समझ रहे हैं जीवित होने का अर्थ है? प्रत्येक दिन अपनी आसक्ति की प्रत्येक चीज का परित्याग करते जा रहे हैं, क्या आप यह कर सकते हैं? बड़ा ही स्पष्ट सरल यथार्थ है, पर विस्मयकारी हैं, इसके गूढ़ार्थ।

इस प्रकार प्रत्येक दिन नया दिन है। प्रत्येक दिन आपकी मृत्यु हो रही है, और आप पुर्नजीवित हो रहे हैं। इसमें विस्मयकारी ओजस्विता है, उर्जा है, क्योंकि आप अब किसी भी चीज से भयभीत नहीं हैं। ऐसी कोई भी चीज नहीं जो आपको आहत कर सके, आहत होने का अस्तित्व ही नहीं।

आदमी ने जो कुछ भी गढ़ा है उन सबों का पूर्णतया परित्याग करना होगा।
यही है - मरण का अर्थ।

क्या आप ऐसा कर सकते हैं, क्या आप ऐसा प्रयास करेंगे, क्या आप इसके प्रयोग करेंगे?

महज एक दिन नहीं वरन प्रत्येक दिन। नहीं श्रीमान, आप ऐसा नहीं कर पाएंगे। इसके लिए आपका मस्तिष्क प्रशिक्षित नहीं है। क्योंकि आपकी शिक्षा, आपकी परम्पराओं, आपकी पुस्तकों और आपके प्रोफेसरों द्वारा आपका मस्तिष्क गहराई से प्रशिक्षित है, गंभीर रूप से संस्कारित है।

इसके लिए यह पता लगाना आवश्यक है कि प्रेम क्या है?

प्रेम और मरण बिलकुल साथ साथ कार्यशील हैं।

मृत्यु कहती है - मुक्त हो जाओ, मुक्त हो जाओ आसक्ति से। आप अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सकते।

और प्रेम कहता है - प्रेम कहता है, इसके लिए कोई शब्द नहीं है। प्रेम का अस्तित्व मुक्त अवस्था में ही है। आपको पत्नी से, नयी लड़की से, अथवा नये पति से, मुक्ति नहीं वरन विपुल शक्ति, ओजस्विता, पूर्ण मुक्ति की उर्जा की अनुभूति।

=जे कृष्णमूर्ति= 
पुस्तक - अन्तिम वार्ताएं
अध्याय: मद्रास वार्ता
पृष्ठ 129 से 135
1 जनवरी, 1986

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Agra, uttar pradesh, India
भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।

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