गुरुवार, नवंबर 17, 2011

तुम केवल चैतन्य रूप हो - अष्टावक्र गीता अध्याय - 15

अष्टावक्र उवाच - यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान । आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति । 15-1
 अष्टावक्र बोले - सात्विक बुद्धि से । युक्त मनुष्य । साधारण प्रकार के उपदेश से भी कृतकृत्य ( मुक्त ) हो जाता है । परन्तु ऐसा न होने पर । आजीवन जिज्ञासु होने पर भी । परबृह्म का । यथार्थ ज्ञान नहीं होता है । 1
मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः । एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु । 15-2
विषयों से उदासीन होना । मोक्ष है । और विषयों में रस लेना । बंधन है । ऐसा जानकर । तुम्हारी जैसी इच्छा हो । वैसा ही करो । 2
वाग्मिप्राज्ञामहोद्योगं जनं मूकजडालसं । करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षभिः । 15-3
वाणी । बुद्धि । और कर्मों से । महान कार्य करने वाले । मनुष्यों को तत्त्व ज्ञान शांत । स्तब्ध । और कर्म न करने वाला । बना देता है । अतः सुख की इच्छा रखने वाले । इसका त्याग कर देते हैं । 3
न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान । चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर । 15-4
न तुम शरीर हो । और न यह शरीर । तुम्हारा है । न ही तुम । भोगने वाले । अथवा करने वाले हो । तुम चैतन्य रूप हो । शाश्वत साक्षी हो । इच्छा रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो । 4
रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन । निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर । 15-5
राग ( प्रियता ) और द्वेष ( अप्रियता ) मन के धर्म हैं । और तुम किसी भी प्रकार से मन नहीं हो ।  तुम कामना रहित हो । ज्ञान स्वरुप हो । विकार रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो । 5
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव । 15-6
समस्त प्राणियों को । स्वयं में । और स्वयं को । सभी प्राणियों में । स्थित जानकर । अहंकार और आसक्ति से । रहित होकर । तुम सुखी हो जाओ । 6
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरंगा इव सागरे । तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव । 15-7
इस विश्व की उत्पत्ति । तुमसे । उसी प्रकार होती है । जैसे कि समुद्र से । लहरों की । इसमें संदेह नहीं है । तुम चैतन्य स्वरुप हो । अतः चिंता रहित हो जाओ । 7
श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोऽहं कुरुष्व भोः । ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः । 15-8
हे प्रिय ! इस अनुभव पर । निष्ठा रखो । इस पर । श्रद्धा रखो । इस अनुभव की सत्यता के । सम्बन्ध में मोहित मत हो । तुम ज्ञान स्वरुप हो । तुम प्रकृति से परे । और आत्म स्वरुप भगवान हो । 8
गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च । आत्मा न गंता नागंता किमेनमनुशोचसि । 15-9
गुणों से निर्मित । यह शरीर स्थिति । जन्म और मरण को प्राप्त होता है । आत्मा न आती है । और न ही जाती है । अतः तुम क्यों शोक करते हो । 9
देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः । क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः । 15-10
यह शरीर । सृष्टि के अंत तक रहे । अथवा । आज ही । नाश को प्राप्त हो जाये । तुम तो चैतन्य स्वरुप हो ।  इससे तुम्हारी क्या हानि या लाभ है । 10
त्वय्यनंतमहांभोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः । 15-11
अनंत महासमुद्र रूप तुम में । लहर रूप । यह विश्व । स्वभाव से ही । उदय और अस्त । को प्राप्त होता है । इसमें तुम्हारी । क्या वृद्धि या क्षति है । 11
तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत । अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना । 15-12
हे प्रिय ! तुम केवल चैतन्य रूप हो । और यह विश्व । तुमसे अलग नहीं है । अतः किसी की किसी से । श्रेष्ठता या निम्नता । की कल्पना । किस प्रकार की जा सकती है । 12
 एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि । कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहंकार एव च । 15-13
इस अव्यय । शांत । चैतन्य । निर्मल आकाश में । तुम अकेले ही हो । अतः तुममें जन्म । कर्म और अहंकार की कल्पना किस प्रकार की जा सकती है । 13
यत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे । किं पृथक भासते स्वर्णात कटकांगदनूपुरम । 15-14
तुम एक होते हुए भी । अनेक रूप में । प्रतिबिंबित होकर । दिखाई देते हो । क्या स्वर्ण कंगन । बाज़ूबन्द और पायल से अलग दिखाई देता है । 14
अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति संत्यज । सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव । 15-15
यह मैं हूँ । और यह मैं नहीं हूँ । इस प्रकार के भेद को त्याग दो । सब कुछ आत्मस्वरूप तुम ही हो । ऐसा निश्चय करके । और कोई संकल्प न करते हुए । सुखी हो जाओ । 15
तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः । त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन । 15-16
अज्ञानवश तुम ही । यह विश्व हो । पर ज्ञान दृष्टि से । देखने पर । केवल एक तुम ही हो । तुमसे अलग कोई । दूसरा संसारी । या असंसारी । किसी भी प्रकार से नहीं है । 16
भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चयी । निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किंचिदिव शाम्यति । 15-17
यह विश्व केवल भृम ( स्वप्न की तरह असत्य ) है । और कुछ भी नहीं । ऐसा निश्चय करो । इच्छा और चेष्टा रहित हुए । बिना कोई भी । शांति को प्राप्त नहीं होता है । 17
एक एव भवांभोधावासीदस्ति भविष्यति । न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृत्यकृत्यः सुखं चर । 15-18
एक ही भवसागर ( सत्य ) था । है । और रहेगा । तुममें न मोक्ष है । और न बंधन । आप्त काम होकर सुख से विचरण करो । 18
मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय । उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे । 15-19
हे चैतन्यरूप ! भाँति भाँति के संकल्पों । और विकल्पों से । अपने चित्त को । अशांत मत करो । शांत होकर । अपने आनंद रूप में । सुख से स्थित हो जाओ । 19
त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किंचिद् हृदि धारय । आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि । 15-20
सभी स्थानों से अपने ध्यान को हटा लो । और अपने हृदय में कोई विचार न करो । तुम आत्मरूप हो । और मुक्त ही हो । इसमें विचार करने की क्या आवश्यकता है । 20

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