रविवार, जनवरी 29, 2012

कबीर और कालपुरुष बातचीत - काल का जाल

सुनो धर्मराया । हम संखों हंसा पद परसाया ।
जिन लीन्हा हमरा प्रवाना । सो हंसा हम किए अमाना ।
द्वादस पंथ करूं मैं साजा । नाम तुम्हारा ले करूं अवाजा ।
द्वादस यम संसार पठहो । नाम तुम्हारे पंथ चलैहो ।
प्रथम दूत मम प्रगटे जाई । पीछे अंश तुम्हारा आई ।
यही विधि जीव न को भरमाऊं । पुरुष नाम जीवन समझाऊं ।
द्वादस पंथ नाम जो लैहे । सो हमरे मुख आन समै है ।
कहा तुम्हारा जीव नहीं माने । हमरी ओर होय बाद बखानै ।
मैं दृढ़ फंदा रची बनाई । जामें जीव रहे उरझाई ।
देवल देव पाषान पूजाई । तीर्थ वृत जप तप मन लाई ।
यज्ञ होम अरू नेम अचारा । और अनेक फंद मैं डारा ।
जो ज्ञानी जाओ संसारा । जीव न मानै कहा तुम्हारा ।
ज्ञानी कहे सुनो अन्यायी । काटो फंद जीव ले जाई ।
जेतिक फंद तुम रचे विचारी । सत्य शबद तै सबै बिंडारी ।
जौन जीव हम शब्द दृढावै । फंद तुम्हारा सकल मुकावै ।
चौका कर प्रवाना पाई । पुरुष नाम तिहि देऊं चिन्हाई ।
ताके निकट काल नहीं आवै । संधि देखी ताकहं सिर नावै ।
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कबीर मानुष जन्म दुर्लभ है । मिले न बारम्बार । तरूवर से पत्ता टूट गिरे । बहुर न लगता डारि ।
साहब के दरबार में । गाहक कोटि अनन्त ।  चार चीज चाहते । रिद्ध  सिद्ध मान महन्त ।
बृह्मरन्ध्र के घाट को । खोलत है कोई एक । द्वारे से फ़िर जात है । ऐसे बहुत अनेक ।
बीजक की बातें कहें । बीजक नाहीं हाथ । प्रथ्वी डूवन उतरे कह कह मीठी बात ।
बीजक की बातें कहें । बीजक नाहीं पास । औरन को प्रमोधहि । आपन चले निराश ।
सन्त मिलन को चालिये । तज माया अभिमान । ज्यों ज्यों पग आगे धरे । कोटिन यज्ञ  समान ।
साधु भूखा भाव का । धन का भूखा नाहिं । जो कोई धन का भूखा । वो तो साधु नाहिं ।

युधिष्ठर का अश्वमेघ यज्ञ

व्यंजन छत्तीसों परोसिया । जहाँ द्रौपदी रानी । बिन आदर सत्कार के । कहे शंख ना वानी ।
पाँच गिरासी वाल्मीक । पाँचे बार बोले । आगे शंख पंचायन । कपाट ना खोले ।
बोले कृष्ण महावली । त्रिभुवन के राजा । वालमीक प्रसाद से । कान कान क्यों ना बाजा ।
द्रौपदी सेती कृष्ण देव । जब ऐसे भाखा । वाल्मीक के चरनों की । तेरे ना अभिलाषा ।
प्रेम पंचायन भूख है । अन्न जग का खाजा । ऊँच नीच द्रौपदी कहा । शंख कान कान यों नहीं बाजा । 
वाल्मीक के चरनों की । लई द्रौपदी धारा । शंख पंचायन बाजिया । कान कान झंकारा ।
सुनत पंचायन शंख रे । पाण्डव बन्ध छुटी । पाण्डु राजा पारिंग हुये । धर ध्यान अनूठी ।
स्वपच शंख सब करत हैं । नीच जाति विश चूक । पौहुमी बिगसी स्वर्ग सब । खिले जो पर्वत रूंख  ।
करी द्रौपदी दिल मांजना । स्वपच चरन धोये । बाजा शंख सर्व कला । रहे आवाज गोये ।
द्रौपदी चरणामृत लिये । स्वपच शंख नहीं कीन । बाजया शंख असंख्य धुनि । गण गन्धर्व लव लीन ।
फ़िर पाण्डव की यज्ञ में । शंख पंचायन  टेर । द्वादश कोटि पण्डित जहाँ । पङी सभन की मेर ।
करी कृष्ण भगवान कू । चरणामृत सों प्रीत । शंख पपंचायन जब बाजया । लिया  द्रौपदी सीत ।
द्वादश कोटि पण्डित जहाँ । और बृह्मा विष्णु महेश । चरण लिये जगदीश कू । जिस कू राता शेष ।
वालमीक के बाल सामी । नहीं तीनों लोक । सुर नर मुनि जन कृष्ण सुधी । पाण्डव पाई पोस ।
वाल्मीक बैकुण्ठ परी । स्वर्ग लगाई लात । शंख पंचायन घुरत है । गण गन्धर्व ऋषि मात ।
स्वर्ग लोक के देवता । किन्हें ना पूरया । स्वपच सिंहासन बैठे । बाजया अगम अगाध ।
पण्डित द्वादश कोटि थे । शाहिदे से सुर बीन । सहस अठासी देव में । कोई  ना पद में लीन ।
बाजया शंख स्वर्ग सुनया । चौदह  भवन  उच्चार । तैतीसों तत्त ना लहया । किन्हीं न पाया पार ।
सुपच रूप धरि आईया । सतगुरु पुरुष कबीर । तीन लोक की मेदनी । सुर नर मुनिजन भीर । 
सुपच रूप धरि आईया । सब देवन का देव । कृष्णचन्द्र पग धोईया । करी तास की सेव ।
पांचैं पंडौं संग हैं । छठे कृष्ण मुरारि । चलिये हमरी यज्ञ में । समर्थ सिरजनहार । 
सहंस अठासी ऋषि जहां । देवा तैतीस कोटि । शंख न बाज्या तास तैं । रहे चरण में लोटि ।
पंडित द्वादश कोटि हैं । और चौरासी सिद्ध । शंख न बाज्या तास तैं । पिये मान का मध ।
पंडौं यज्ञ अश्वमेघ में । सतगुरु किया पियान । पांचैं पंडौं संग चलैं । और छठा भगवान ।
सुपच रूप को देखि करि । द्रौपदी मानी शंक । जानि गये जगदीश गुरु । बाजत नाहीं शंख । 
छप्पन भोग संजोग करि । कीनें पांच गिरास । द्रौपदी के दिल दुई हैं । नाहीं दृढ़ विश्वास ।
पांचैं पंडौं यज्ञ करी । कल्पवृक्ष की छांहिं । द्रौपदी दिल बंक हैं । शंख अखण्ड बाज्या नांहि । 
छप्पन भोग न भोगिया । कीन्हें पंच गिरास । खड़ी द्रौपदी उनमुनी । हरदम घालत श्वास ।
बोलै कृष्ण महाबली । क्यूं बाज्या नहीं शंख । जानराय जगदीश गुरु । काढत है मन बंक । 
द्रौपदी दिल कूं साफ करि । चरण कमल ल्यौ लाय । बालमीक के बाल सम । त्रिलोकी नहीं पाय ।
चरण कमल कूं धोय करि । ले द्रौपदी प्रसाद । अंतर सीना साफ होय । जरैं सकल अपराध । 
बाज्या शंख सुभान गति । कण कण भई अवाज । स्वर्ग लोक बानी सुनी । त्रिलोकी में गाज ।
पंडौं यज्ञ अश्वमेघ में । आये नजर निहाल । जम राजा की बंधि में । खल हल पर्या कमाल । 
अचला का अंग । सत ग्रन्थ साहिब । पृष्ठ नं. 359 

कबीर द्वारा गोरखनाथ की क्लास लेना

योगी गोरखनाथ प्रतापी । तासो तेज पृथ्वी कांपी । काशी नगर में सो पग परहीं । रामानन्द से चर्चा करहीं ।
चर्चा में गोरख जय पावै । कंठी तोरै तिलक छुड़ावै । सत्य कबीर शिष्य जो भयऊ । यह वृतांत सो सुनि लयऊ ।
गोरख के डर के मारे । वैरागी नहीं भेष सवारे । तब कबीर आज्ञा अनुसारा । वैष्णव सकल स्वरूप संवारा ।
सो सुधि गोरख जो पायौ । काशी नगर शीघ्र चल आयौ । रामानन्द को खबर पठाई । चर्चा करो मेरे संग आई ।
रामानन्द की पहली पौरी । सत्य कबीर बैठे तीस ठौरी । कह कबीर सुन गोरखनाथा । चर्चा करो हमारे साथा ।
प्रथम चर्चा कर संग मेरे । पीछे मेर गुरु को टेरे । बालक रूप कबीर निहारी । तब गोरख ताहि वचन उचारी ।
कबके भए वैरागी कबीर जी । कबसे भए वैरागी । नाथ जी जब से भए वैरागी । मेरी आदि अंत सुधि लागी ।
धूंधूकार आदि को मेला । नहीं गुरु नहीं था चेला । जब का तो हम योग उपासा । तब का फिरूं अकेला ।
धरती नहीं जद की टोपी दीना । बृह्मा नहीं जद का टीका । शिव शंकर से योगी । न थे जदका झोली शिका ।
द्वापर को हम करी फावड़ी । त्रेता को हम दंडा । सतयुग मेरी फिरी दुहाई । कलियुग फिरौ नौ खण्डा ।
गुरु के वचन साधु की संगत । अजर अमर घर पाया । कहैं कबीर सुनो हो गोरख । मैं सब को तत्व लखाया ।
जो बूझे सोई बावरा । क्या है उमृ हमारी । असंख युग प्रलय गई । तब का बृह्मचारी ।
कोटि निरंजन हो गए । परलोक सिधारी । हम तो सदा महबूब हैं । स्वयं बृह्मचारी ।
अरबों तो बृह्मा गए । उनन्चास कोटि कन्हैया । सात कोटि शम्भू गए । मोर एक नहीं पलैया ।
कोटिन नारद हो गए । मुहम्मद से चारी । देवतन की गिनती नहीं है । क्या सृष्टि विचारी ।
नहीं बुढ़ा नहीं बालक । नाहीं कोई भाट भिखारी । कहैं कबीर सुन हो गोरख । यह है उमृ हमारी ।
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अवधु अविगत से चल आया । कोई मेरा भेद मर्म नहीं पाया ।
ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा । बालक हवे दिखलाया । काशी नगर जल कमल पर डेरा । तहाँ जुलाहे पाया ।
माता पिता मेरे कछु नहीं । ना मेरे घर दासी । जुलहा को सुत आन कहाया । जगत करे मेरी हांसी ।
पांच तत्व का धड़ नहीं मेरा । जानूं ज्ञान अपारा । सत्य स्वरूपी नाम साहिब का । सो है नाम हमारा ।
अधर दीप गगन गुफा में । तहां निज वस्तु सारा । ज्योति स्वरूपी अलख निरंजन । धरता ध्यान हमारा ।
हाड चाम लोहू नहीं मोरे । जाने सत्य नाम उपासी । तारन तरन अभय पद दाता । मैं हूं कबीर अविनासी ।

गुरुवार, जनवरी 26, 2012

माया और भक्ति दोनों का एक साथ रहना सम्भव नहीं है

74 प्रश्न - महाराज जी ! कभी कभी भजन ध्यान का अभ्यास करते समय सिर और आंखों में दर्द होने लगता है । इसका क्या उपाय करें ?
उत्तर - ऐसे समय में यह अच्छा है कि धीरे धीरे अभ्यास को बढाना चाहिये । ऐसा करने से यदि दर्द सिर में या आंखों में होने लगे । तो कुछ देर के लिये अभ्यास बन्द करके आराम कर ले । घूम टहल ले । कुछ देर के विश्राम के बाद अभ्यास करे । विश्राम कर लेने के बाद पुन: अभ्यास आरम्भ कर देना चाहिये । विश्राम कर लेने पर दर्द शान्त हो जायेगा । यानी दर्द ठीक हो जायेगा । जब अभ्यासी अपनी सुरत को ऊपर की ओर चढाता है । या खींचता है । तो उसमें आंख की पुतली ऊपर की ओर खिंचती है । और उसमें जोर लगता है । इसी से आंख में तथा सिर में दर्द होता है । जो अनावश्यक है । जब तक आदत न पड जाय । तब तक जबरदस्ती नहीं करना चाहिये । जितना जितना सहन होता जावे । उतना ही जोर लगाना चाहिये । उससे अधिक जोर लगाने से रक्त का दबाव ऊपर की तरफ़ आवश्यकता से अधिक होने लगता है । और नाडियों में खून अधिक भर जाने के कारण दर्द होने लगता है । यह एक अनावश्यक कार्य है । भजन । सुमिरन । ध्यान । सुख आसन पर बैठकर आराम पूर्वक सहजता सरलता के साथ आराम और आसानी के साथ करना चाहिये । सहज योग में सहजता के साथ साधना करना चाहिये । जबरदस्ती करनें में हठ योग कहलाने लगता है ।
साधक का भजन । सुमिरन । ध्यान के करने में जितना मन लगेगा । उतना ही आनन्द आएगा । आनन्द मिलने

पर ही उत्साह बढता जाता है । और उसके साथ साथ अभ्यास का समय तथा ध्यान में आनन्द बढता जाता है । कभी कभी तो ऐसा हो जाता है कि भजन, ध्यान में बैठकर समय का पता नहीं लगता कि कितना समय बीत गया । ऐसी दशा में यह आवश्यक है कि भजन, अभ्यास में बैठते समय यह इरादा करके बैठे कि एक घंटा, दो घण्टा या जितनी देर बैठने की मन में इच्छा हो । इरादा करके बैठे कि इतनी देर भजन, सुमिरन व ध्यान के साधना करूंगा । ऐसा करने से सुरत निश्चित समय पर नीचे उतर आवेगी । और आप जितना सोच कर बैठे हैं कि इतना अभ्यास करूंगा । वह भी पूरा हो जायेगा ।
जिसे सन्त सदगुरू के श्री चरणों का भरोसा है । और अपने श्री सदगुरू देव महाराज के श्री चरण कमलों में जिसका चित्त जुडा हुआ है । श्री सदगुरू सदा उनके साथ हैं । और सदा उसके रक्षक तथा उसके सहाई हैं । श्री सदगुरू देव जी महाराज का भजन, ध्यान ही जीव का सच्चा संगी साथी है । यही इस लोक में भी तथा परलोक में भी रक्षक है । यही भजन, ध्यान ही सर्व सुखों की खान है । यदि श्री सदगुरू का भजन, ध्यान नियमित नियमानुसार चलता रहा हो । उस जीव का सदा कल्याण है ।


सतगुरू सम हितू कोई नहीं । देखा सब संसार । प्रणत पाल गुरूदेव जी । पल पल करैं संभार ।
सन्त महापुरूषों का कहना है कि संसारी भोग विलास ह्रदय के अन्दर ठौर न पाने पावें । अगर उन्होंने दिल में घर कर लिया । तो अन्दर ह्रदय में श्री सदगुरू भगवान का दर्शन होने में बाधा होगी ।
दिल है तेरा एक । इसमें ऐ हाजी । उलफ़तें दो दो । समा सकतीं नहीं ।
माया और भक्ति दोनों का एक साथ रहना सम्भव नहीं है । यह दिल मालिक का मन्दिर है । श्री सदगुरू देव जी महाराज की उपासना का स्थान है । मायावी विषय विकारों के लिये इसे मुसाफ़िर खाना नहीं बनाना चाहिये । इसे विषय वासना का घर बनाकर नहीं रखना चाहिये । यह एक देवालय है । यह पूजा का सर्वश्रेष्ठ यानी पवित्र मन्दिर है । इसे साफ़ सुथरा एवं शुद्ध तथा पवित्र बनाये रखना चाहिये । अत: सांसारिक सुख ऐश्वर्यों में मन को नहीं फ़ंसाना चाहिये । सन्तों महापुरूषों का कहना है कि श्री सदगुरू देव जी महाराज के उपदेशानुसार भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान करते हुए सदा धार्मिक रीति से चलते हुए जीवन व्यतीत करना ही साधकों, गुरूमुखों का परम धर्म है । भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । ध्यान । दर्शन । नियमित नियमानुसार सदा सदा करते रहना चाहिये । यही साधक के जीवन की पूंजी है । जिस पर आचरण कर लोक तथा परलोक में सुख की प्राप्ति होती है ।

प्रत्येक साधक व अभ्यासी की मनोदशा अलग अलग होती है । पर यह तीन बातों पर निर्भर है - 1 उसके पिछले तथा वर्तमान जन्मों के कर्मों का प्रभाव । 2 परमार्थ की प्राप्ति की कितनी तडप है । तथा कितनी विरह वेदना उसके मन में पैदा हो चुकी है । 3 सन्त सदगुरू के श्री चरण कमलों में साधक को भजन । सुमिरन । ध्यान में रस मिलता है । तथा उसका मन भजन । सुमिरन । ध्यान में लगता है । अर्थात प्रत्येक अभ्यासी को चाहिये कि बराबर अपनी हालत पर दृष्टि रखता रहे । यानी इस बात की परख करता रहे कि उसकी क्या स्थिति है । जब किसी बात में कमी दिखे । तो सच्चे मन से सुधार करने का प्रयत्न करे । श्री सदगुरू देव जी महाराज की दया के बिना विवेक की उत्तपत्ति नहीं होती । और सदगुरू की कृपा के बिना सहज में ही सत संगति की प्राप्ति नहीं होती । सदगुरू की दया व उनकी संगति आनन्द व कल्याण का मूल है । श्री सदगुरू की संगति की प्राप्ति ही सभी सुखों का फ़ल है । और सभी साधक फ़ूल है । श्री सदगुरू की संगति पाकर दुष्ट भी उसी तरह सुधर जाते हैं । जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुहावन बन जाता है । अर्थात सोने में परिवर्तित हो जाता है । फ़िर भी प्रभु से क्षमा प्रर्थना करता रहे । दया और कृपा की याचना करता रहे । तथा भविष्य के लिये पूर्णरूप से सतर्क रहे कि जो त्रुटि अब तक हो गई है । दुबारा न हो जाय । इसको पूरी तरह से याद रखो । फ़िर भी सच्चे मन से प्रयत्न करने से प्रभु की कृपा का सहारा मिल जाता है । और भजन । सुमिरन । ध्यान की साधना में मन का ठहराव अधिक होने लगता है । तथा निर्मल रस व आनन्द मिलने लगता है । इसी प्रकार धीरे धीरे अन्दर की सफ़ाई होती रहती है । और साधक को स्वयं अपने आध्यात्मिक उन्नति का आभास होने लगता है ।


बहुधा ऐसा होता है कि किसी किसी अभ्यासी को भजन, ध्यान करते समय अन्दर में गुरू के स्वरूप के दर्शन कभी होते हैं । कभी नहीं होते हैं । तो न होने की दशा में निराश नहीं होना चाहिये । और यह सोच कर हताश नहीं होना चाहिये कि मेरे अभ्यास में बहुत बडी कमी है । साधक को चाहिये कि जिस आन्तरिक केन्द्र पर श्री सदगुरू ने उसे अभ्यास करने को बताया है । उसी स्थान पर सुरत या मन को जमाकर सहसदल कमल पर ठहरने लगेंगे । और भजन, सुमिरन, ध्यान में मन लगने लगेगा । यदि मन नहीं ठहरता । तो इसका एकमात्र कारण यही है कि भजन, सुमिरन, ध्यान नियमित नियमानुसार नहीं हो रहा है । और अन्दर में या बाहर में सदगुरू के प्रति प्रेम में कमी पड रही है । यदि श्री सदगुरू के प्रति प्यार होगा । तो अवश्य ही उस प्यार की डोर के द्वारा या सहारे मन व सुरत की धार ऊपर की ओर चढेगी । और जब ऊपर चढेगी । तो भजन, सुमिरन, ध्यान का आनन्द अवश्य प्राप्त होगा । इसमें कोई संशय नहीं है । इसलिये साधक के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि प्रेम तथा श्रद्धा के साथ अभ्यास करता रहे । यदि प्रेम में कोई कसर है । और चाव भी कम है । तो ख्याली तौर पर साधक को चाहिये कि श्री सदगुरू देव जी महाराज के श्री चरणों में माथा रखकर दीन भाव से, आर्तभाव से प्रेम की भीख मांगे । इसी प्रकार बारबार दीन भाव से प्रार्थना करने से अवश्य ही प्रेम व दया की बख्शीश होती है । प्रेम की प्राप्ति होने पर उस प्रेम रूपी पौधे को 


श्रद्धा के जल से निरन्तर सींचता रहे । बार बार या जब जब याद आ जाय । तब तब ख्याली तौर पर श्री सदगुरू भगवान के श्री चरणों में सिर झुकाकर बारम्बार दण्डवत प्रणाम करते रहना चाहिये । इस प्रकार करते करते भजन, सुमिरन, ध्यान के करने में रस मिलने लग जायेगा । और सदगुरू का दर्शन अन्दर में होता रहेगा । इस प्रकार के दर्शन को सन्त सदगुरू की असली दया और कृपा का सूचक समझना चाहिये । जब कभी इस प्रकार के दर्शन मिल जाते हैं । तो साधक की प्रीति और प्रतीति बढ जाती है ।
साधक को चाहिये कि सत्यराज्य के प्रत्येक चक्र पर या मण्डल पर अपने श्री सदगुरू द्वारा बताया हुआ भजन, सुमिरन, ध्यान का अभ्यास बढाता जाय । किसी किसी सन्त ने तो ऐसा कहा है कि एक चक्र पर या मण्डल पर कम से कम दो वर्ष अभ्यास करें । किन्तु यह कोई आवश्यक नहीं है । यह तो साधना पर व प्रेम व निष्ठा पर निर्भर करता है । उसके पुरूषार्थ पर निर्भर करता है । प्रत्येक साधक की अलग अलग स्थिति होती है । उसी के अनुसार उसकी सुरत की चाल होती है । और फ़िर इस सिलसिले में सदगुरू कृपा पर बहुत कुछ निर्भर करता है । प्रत्येक साधक की अलग अलग स्थिति होती है । उसी के अनुसार उसकी सुरत की चाल होती है । और फ़िर इस सिलसिले में सदगुरू कृपा पर बहुत कुछ निर्भर करता है । जितना जिसका सदगुरू के प्रति समर्पण होगा । 


जितना कोई अपने आपको श्री सदगुरू में लय कर चुका होगा । जितना जिसका गुरू के प्रति और गुरू समाज के प्रति आचरण उज्जवल हो चुका होगा । उसी के अनुसार उसकी प्रगति होगी । दशम 10 द्वार या सतलोक तक । या अलख । अगम लोक तथा अनामी पद तक अपनी सुरत को पहुंचाकर वहां ठहर जायं । इसमें एक जन्म भी लग सकता है । और कई जन्म भी । पर बिना श्री सदगुरू देव जी महाराज की असीम कृपा व दया के यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है ।
श्री सदगुरू देव जी महाराज की दया रूपी शरण संगति में साधक को धर्म । अर्थ । काम । मोक्ष चारों फ़ल प्राप्त होते हैं । तथा उनकी संगति से साधक के मन के सारे विकार दूर हो जाते हैं । जिस प्रकार पारस के स्पर्श से लोहा सुन्दर कंचन बन जाता है । उसी प्रकार श्री सदगुरू देव जी महाराज की पावन संगति से साधक का मन भी उज्जवल एवं निर्मल बन जाता है । यह पूर्ण सत्य है । श्री सदगुरू की ही शरण संगति में तो साधक के मलिन मन की पूरी तरह साफ़ सफ़ाई होती है ।
गुरू नाम सुमिरण किये । तन मन निर्मल होय । तिस सौभागी जीव का । पला न पकडे कोय ।
रूहानी शब्द - आपको हर पल याद करूं । हिरदय में ए सदगुरू । सदा आप ही का ध्यान धरूं ।
भूलीं न इक पल भी । सुमिरन भजन सदा करूं । हो आपका ही दर्शन ।
यही कामना है मेरी । मेरे रोम रोम सदगुरू । छवि प्यारी बसी हो आपकी ।
जग की न चाह रहे । बस आप ही आप सदगुरू । हिरदय में बसें मेरे ।

युग युग तू ही तू । बनूं दास आपका । आपकी सेवा पूजा ही । सदगुरू हो धर्म मेरा ।
सन्त महापुरूषों का कहना है कि साधक के लिये सदगुरू की भक्ति करना ही मुख्य आधार है । श्री सदगुरू देव जी महाराज के कमलवत श्री चरणों को पकड लें । और अपने आपको उनको पूरी तरह से समर्पण कर दें । यदि साधक अपने को पूरी तरह से श्री सदगुरू देव में विलीन कर दे । अपना आपा भाव खत्म हो जाय । तो श्री सदगुरू देव जी महाराज की भक्ति आसानी से प्राप्त हो जाती है ।
सदगुरू शिष की आतमा । शिष सतगुरू की देह । लखा जो चाहे अलख को । इनहीं में लख लेय ।
यह बहुत कठिन कार्य है । कोई विरला साधक, जिज्ञासु ही यहां तक पहुंच सकता है । पर जिसके पूर्व जन्म के संस्कार अच्छे हों । केवल थोडी कसर रह गई हो । उस साधक को उत्साह के साथ सोचना तथा करना भी चाहिये कि मेरे पूर्व जन्म के संस्कार अच्छे रहे हैं । और अच्छे हैं भी । तथा आगे भी मालिक की दया से अच्छे रहेंगे । शेष सभी अपनी अपनी योग्यता तथा संस्कार के अनुसार पाते हैं ।
रास्ता चलता जाय । निराश नहीं होना चाहिये । यदि रास्ते पर बराबर चलता रहे । तो एक न एक दिन मंजिल पर पहुंच ही जायेगा । किन्तु मनुष्य जन्म अनमोल है । यह जन्म बार बार नहीं मिलता । इसे अमूल्य मानकर इसी जन्म में अपने लक्ष्य तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिये ।
इसलिये हर समय श्री सदगुरू देव जी महाराज के भजन, सुमिरन, ध्यान और सेवा पूजा को तरजीह देने चाहिये । ताकि भक्ति की ताकत पैदा हो । क्योंकि इसी एक बात के अन्दर बन्धन और मोक्ष का भेद छिपा हुआ है । जिस 


सेवक के दिल में मालिक के प्रति श्रद्धा और प्रेम दोनों बने रहते हैं । उसका एक न एक दिन अवश्य उद्धार होगा । क्योंकि मालिक का प्रेम तथ नाम का भजन और भक्ति संसार के मोह पाश को तोडेगा । मालिक की भक्ति की शक्ति जिसमें उत्पन्न हो गयी । उसी भक्त पर मालिक की खास दया समझनी चाहिये । क्योंकि श्री सदगुरू देव जी महाराज के श्री चरणों की भक्ति ऐसी है । जो मालिक और भक्त के बीच जितने पर्दे हैं । उन सबको साफ़ करके जीव को मोक्ष की प्राप्ति करा देती है ।
दासनदास ने भी गहा । सदगुरू चरण तुम्हार । अवगुण हार चरणन पडा । कर दो अब उद्धार ।
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- ये शिष्य जिज्ञासा से सम्बन्धित प्रश्नोत्तरी श्री राजू मल्होत्रा द्वारा भेजी गयी है । आपका बहुत बहुत आभार ।

गुरुवार, जनवरी 19, 2012

2-4 श्लोक कण्ठस्थ करने मात्र से क्या कोई साधु हो जाता है ?

61 प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! आहार आदि कैसे बनाना चाहिये ?
उत्तर - भोजन शुद्ध विचारधारा से बनाना चाहिये । भोजन बनाने वाले पर काफ़ी कुछ निर्भर करता है । भोजन बनाने वाले को नित्य कर्म करके स्नान, ध्यान करके साफ़ सुथरे वस्त्र धारण कर साफ़ सफ़ाई से भोजन बनाना चाहिये । कहावत है - जैसा खाए अन्न । वैसा होवे मन । भोजन बडी शान्ति से मौन रहकर खुश दिल होकर बनाना चाहिये । भोजन बनाते समय बोलना नहीं चाहिये । क्योंकि वही भोजन आप अपने श्री सदगुरु देव जी महाराज को भोग लगाते हैं । भोजन सदा सात्विक करना कराना चाहिये । मनुष्य का शारीरिक गठन इतना भिन्न है कि सब लोगों के लिये 1 ही नियम नहीं बनाया जा सकता है । मान लीजिये । कोई वस्तु मुझे सहन होती है । परन्तु आपके शरीर को सहन नहीं होती है । मेरा शरीर किसी वस्तु को गृहण कर सकता है । आपका शरीर शायद उसे गृहण न कर सके । इसलिये हम लोगों को अपने शरीर के अनुकूल भोजन का चयन करना चाहिये । हाँ सात्विक भोजन ही खायें खिलायें । साधारण तौर पर यह कहा जा सकता है कि भोजन भारी न हो । ये सावधानी बनाये रखकर । जिसके पेट में जो सहता है । वैसा भोजन किया जा सकता है । भजन में सहायक भोजन करना चाहिये ।
62  प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! मंत्र जागृत किस स्थान पर जल्दी होता है ?

उत्तर - आश्रम में । मन्दिर में । पंचवटी में । नदी के किनारे । सागर के किनारे । शुद्ध पवित्र स्थान पर मंत्र जल्दी जाग्रत होता है । जो लोग ठीक ठीक भजन करते हैं । वे सहज ही कुछ दिन के बाद इसे जान सकते हैं । यह समझना कठिन नहीं है । श्री सदगुरू देव जी महाराज के प्रति एकनिष्ठ भाव तथा आचरण की शुद्धता से मन्त्र शीघ्र जाग्रत होता है ।
वाराणसी नगरी संसार से अलग है । महा चैतन्यमय स्थान है । यहीं पर गंगा तट के किनारे बैठकर भजन ध्यान करने वाले को 10 गुना अधिक फ़ल मिलता है । यहां छोटे बडे । धनी गरीब जो भी हैं । सभी को साधन भजन का पूर्ण अधिकार है । श्री सदगुरू देव जी महाराज सबको भक्ति । भजन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान । चिन्तन करने का पूर्ण अवसर देते हैं । श्री सदगुरू देव जी महाराज की वाणी है कि यहां पर रहने वाले सभी भक्त 1 दिन मुक्त हो जायेंगे । श्री सदगुरू स्वामी जी महाराज का दर्शन । पूजा । आरती । भजन । सुमिरन । सेवा । ध्यान । चिन्तन । मनन करने वाले भक्त का मन्त्र जाग्रत तो हो ही जाता है । परन्तु तपो भूमि की अपनी 1 विशेषता है । यहां पर रहकर भजन । सुमिरन । ध्यान । अर्चन । वन्दन । पूजन करने वाले को 10 गुना अधिक लाभ मिलता है । महापुरूषों की वाणी है - गुरूद्वारे में जहां सर कटने वाला हो । वहां खरोंच लगकर रह जाती है ।
तपस्थली का विशेष महत्त्व होता है । शिकार हमेशा जंगल में होता है । देखो । शिकारी हमेशा जंगल में शिकार 


खेलने जाता है । शहर या घर में नहीं । ठीक उसी प्रकार भजन, तपस्या के लिये उचित स्थान आश्रम । तपस्थली । गुरूद्वारा है । कोई बिरला ही लाखों करोडों में गृहस्थी में रहकर मुक्ति पा सकता है । मन्त्र जाग्रत कर सकता है ।
63 प्रश्न - श्री सदगुरू स्वामी जी महाराज ! क्या मठ बनाना आवश्यक है ?
उत्तर - मठ का निर्माण आवश्यक है । मठ बनाने का प्रथम उद्देश्य जीव कल्याण है । इसलिये जरूरी है । इस संसार में बहुत सारे असहाय । दीन, दुखी । अबला । विधवा । अपंग है । जिनका संसार बहिष्कार करता है । उनका जीवन यापन सबसे सुन्दर तरीकों से मठों में ही होता है । उन्हें आश्रम ही सम्मानित जीवन देता है । मठ में ऐसे दीन दुखियों को दिशा मिलती है । आत्म प्रेरणा मिलती है । जिन्होंने आश्रम का आश्रय लिया । उन्हें संसार सागर से पार जाने का रास्ता श्री सदगुरू देव जी महाराज ही दिखाते हैं । उनकी समस्त बाधाओं को वे दूर कर देते हैं । गुरू वाक्य में विश्वास रखो । जिसने भी गुरू वाणी पर विश्वास कर उनके वचनों का अक्षरश: पालन किया है । जैसा प्रभु कहें । वैसा करते गया है । उनके मन का सारा मैल धुल जाता है । और धीरे धीरे ज्ञान का प्रकाश आने लगता है । श्री सदगुरू देव जी महाराज के प्रति सच्ची निष्टा । भक्ति भाव । लगन । और पूर्ण विश्वास से ही सब काम बन जाता है । श्री सदगुरू देव जी महाराज को मनुष्य रूप में मत देखो । मत देखना । शिष्य के लिये श्री सदगुरू देव जी महाराज साक्षात परबृह्म भगवान ही है ।


गुरूर्बृह्मा गुरू:विर्ष्णु: गुरूर्देवो महेश्वर: । गुरू: साक्षात परबृह्म तस्मै श्रीगुरवे नम: ।
भगवत बुद्धि से श्री सदगुरू देव जी महाराज का ध्यान । दर्शन । पूजा । सेवा । भजन । आरती करते करते शरीर और मन जब शुद्ध हो जाते हैं । तब गुरू शिष्य को अपने दिव्य स्वरूप का दिव्य दर्शन देकर कृतार्थ कर देते हैं । शुद्ध आधार । शुद्ध मन । और श्री सदगुरू देव जी महाराज के प्रति शुद्ध भाव होने पर ही प्रभु के दर्शन होते हैं । संसार में अनेकों मठ है । जन कल्याण के लिये ही खुले हैं । इनसे जन कल्याण भारी संख्या में हो भी रहा है ।
सतयुग में ध्यान करने से । त्रेता में यज्ञ करने से । द्वापर में पूजा करने से । जो फ़ल प्राप्त होता है । वह फ़ल कलियुग में केवल श्री सदगुरू देव जी महाराज के नाम का जप करने से साधक प्राप्त कर लेता है । परन्तु ऐसा कोई बिरला ही कर पाता है । रात दिन भजन । सुमिरन हो तो क्या बात है । परन्तु होता नहीं । इसलिये मठ बनाने की आवश्यकता है ।
श्री स्वामी जी ने एक दिन कहा था - देखो कलि में सिर्फ़ नाम भजन से ही सब कुछ मिल सकता है । सैकडों करोडों अश्वमेघ यज्ञों से जो पुण्य फ़ल प्राप्त होता है । वह सम्पूर्ण फ़ल सिर्फ़ नाम भजन से ही मिल जाता है । लेकिन नाम भजन रात दिन नहीं हो पाता है । न कोई कर सकता है । रात दिन भजन सुमिरन हो सके । तो क्या पूछना । पर होता नहीं है । इसीलिये सेवा कार्य शुरू किया गया है । सेवा कार्य से खूब शक्ति आती है । और भक्ति मिलती है । निष्काम कर्म करने से

भगवान मिलते हैं । गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा है -
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय: । असक्तो ह्याचरन कर्म परमाप्रोति पूरूष: ।
हिमालय में जाकर तपस्या किया । गेरूआ वस्त्र धारण कर लिया । घूम फ़िर कर । भिक्षा मांग कर भोजन कर लिया । और 2-4 श्लोक कण्ठस्थ करने मात्र से क्या कोई साधु हो जाता है ? साधु होने के लिये आध्यात्मिक प्रगति होनी चाहिये । आध्यात्मिक प्रगति एकमात्र श्री सदगुरू देव जी महाराज के द्वारा ही हो सकती है । श्री सदगुरू देव जी महाराज जीवों से दर्शन । पूजा । सेवा । भजन । सुमिरन । ध्यान । आरती करवा कर उन्हें रूहानी मंजिल तक पहुंचा देते हैं ।
यदि स्कूल नहीं रहेगा । तो कहाँ पर विधार्थी अध्ययन करेंगे ? अब कोई कहे कि क्या विधा अध्ययन जरूरी है । हाँ जरूरी है । जरूरी ही नहीं अनिवार्य है । कारण कि विधालय नहीं रहेगा । शिक्षा कहाँ से ग्रहण करेगा । विधा अध्ययन कैसे करेगा ? इसलिये मठ अनिवार्य हैं । मठ नहीं रहेगा । तो भजन करने वाले साधकों के लिये भजन की शिक्षा । दीक्षा । भजन की विधि कौन बतायेगा ? सेवा भाव कहां से आयेगा । बृह्मविधा कौन बतायेगा ? इसलिये मठ बनाना जरूरी है । जरूरी ही नहीं । अनिवार्य है ।
64 प्रश्न - 1 भक्त ने 1 सन्त की शरण में जाकर प्रार्थना करते हुए पूछा - प्रभु ! सदगुरू नाम में प्रेम हो । और उनमें चित्त कैसे लगे ? इसकी कोई युक्ति बताइये ।

उत्तर - सन्त ने फ़रमाया कि श्री सदगुरू भगवान के नाम का मूल्य एवं महत्त्व जब समझ में आ जाता है । तभी उसमें प्रेम होता है । और तभी भजन, सुमिरन में मन व चित्त लगता है ।
फ़िर भक्त ने कहा - महाराज ! मूल्य और महत्व तो कुछ कुछ समझ में आता है । परन्तु उसमें चित्त नहीं लगता ।
उत्तर - तुमको कुछ समझ में नहीं आया । यदि समझ में आ गया होता । तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि नाम के भजन सुमिरन में मन न लगे । फ़िर भक्त कहता है कि - नहीं महाराज ! ऐसा तो कदापि नहीं है ।
अब सन्त ने प्रश्न किया - अच्छा बताओ । तुम्हारी मासिक आय क्या है ? भक्त ने उत्तर दिया - लगभग 15000 रूपये ।
सन्त ने फ़रमाया कि अब विचार करो । और हिसाब लगाओ । इसका अर्थ है । 500 रूपया प्रतिदिन । अर्थात रात दिन मिलाकर 24 घण्टे में 500 रूपये । तो 1 घण्टे में लगभग 21 रूपये । और 1 मिनट में लगभग 35 पैसे । 1 मिनट में तुम 35 बार तो सदगुरू भगवान के नाम का स्मरण आसानी से कर सकते हो । अर्थात जितनी देर में तुम 1 पैसा कमाते हो । उतनी देर में 1 बार प्रभु के नाम का सुमिरन तो हो सकता है । इतने पर भी तुम पैसे के लिये तो हर पल चेष्टा करते हो । परन्तु नाम के भजन, सुमिरन के लिये नहीं । अब तुम बताओ कि क्या तुमने नाम भजन, सुमिरन का मूल्य एवं महत्त्व पैसे से भी कम नहीं समझा ?
बात भक्त की समझ में आ गई । उस दिन वह सांसारिक काम काज करने के साथ नियम पूर्वक नाम का भजन,

सुमिरन करने लगा ।
65 प्रश्न - भक्त कहता है कि मेरा मन भजन, ध्यान में नहीं लगता है । इसका उपाय बताइये ।
उत्तर - अपने श्री सदगुरू देव महाराज के प्रति पूर्ण श्रद्धा व प्रेम रखने से । उनके उपदेश को सुनने से । दरबार में बैठकर साधना करने से । मन शान्त होता है । और कृमश: भजन । सुमिरन । ध्यान में मन लगने लगता है । अर्थात जो अभ्यास साधक को करने को बताया गया है । यदि उसको दरबार में बैठकर करे । तब तो मन लगने लगता है । उसी अभ्यास को चहल पहल वाली जगह में बैठकर करने से । न मन भजन में लगता है । और न ध्यान ही । मन के अन्दर जमता है । पहले पहल अभ्यास के प्रारम्भ में अभ्यासियों को अभ्यास में रस तथा आनन्द कम होता है ।
66  प्रश्न - एक अभ्यासी ने पूछा - मन में यह इच्छा बार बार उठती है कि आन्तरिक चक्रों का जो हाल सन्तों के द्वारा सुना है । उनमें से पहला चक्र भजन ध्यान करते करते कुछ दिन के ही अभ्यास से खुल जाय । तो गुरू में और उनकी बतलाई हुई साधना में प्रेम और प्रतीत बढे । क्या ऐसा हो सकता है ?
उत्तर - प्रथम तो यह अभ्यास बहुत कठिन है । परन्तु यदि श्री सदगुरू देव महाराज की कृपा हो गई । तो यह चक्र खुल सकता है । खुलने के बाद साधक अन्दर में अपनी जगह बनाकर । कुछ दिन भजन सुमिरन का अभ्यास करेगा । और फ़िर वह चाहेगा कि हमारी साधना यानी भजन ध्यान की क्रिया सुचारू रूप से चले । और भजन, ध्यान में दिन प्रतिदिन प्रगाढता 


बढती चली जाय । तथा मालिक के श्री  चरणों में प्रीति बढती जाय । इस तरह वह भजन ध्यान में मन निरन्तर लगाये रहता है । इसी प्रकार से यदि श्री सदगुरू की कृपा से अन्दर में श्री सदगुरू देव जी महाराज का दर्शन बराबर मिलता रहा । तो दर्शन को बराबर करते रहना चाहिये । यह साधक के साधना की पहली कडी है । साधकों, शिष्यों को यह मालूम होना चाहिये कि आन्तरिक चक्रों की झलक दिखाई देना । व अन्दर में पहुंचकर भजन सुमिरन ध्यान की प्रक्रिया जारी करना । कोई साधारण बात नहीं है । फ़िर भी अभ्यास के साथ साथ जब तक सदाचार में पूर्णता न आ जाय । तब तक स्थिरता आना बहुत कठिन है । इसलिये श्री सदगुरू देव महाराज के आगे गिर कर त्राहिमाम त्राहिमाम करते हुए उनसे विनती करें कि मुझ पर दया करें । मुझ जैसे दीनहीन पर कृपा कर । भजन । सुमिरन । ध्यान मन में जमाकर इन चक्रों से आगे बढाने की कृपा करें । ऐसी विनती करते रहने से दया जरूर होती है ।
गुरू की मूरत बसी हिये में । आठ पहर संग रहाये । अस गुरू भक्ति करी जिन पूरी । तिन तिन नाम समाये । स्वाती बूंद जस रटत पपीहा । अस धुन नाम समाये । नाम प्रताप सुरत जब जागी । तब सुरत ऊपर चढ धाये ।
जब साधक नाम का सुमिरन, भजन और ध्यान करेगा । तब गुरू की दया वाली प्रीत जागेगी । तभी सुरत ऊपर की ओर प्रगतिशील होगी । भक्तजन को चाहिये कि नाम को श्वासों के द्वारा पकड कर निरन्तर नाम का भजन, सुमिरन करते रहें । जब नाम का भजन, सुमिरन पक्का हो जायेगा । तब ध्यान भी अच्छी तरह से आने लग जायेगा । इसीलिये श्री सदगुरू स्वरूप का 


ध्यान करने और साथ ही साथ नाम जपने से दोनों का साथ सध जाता है । कहा गया है - सदगुरू शब्द स्वरूप हैं ।
भजन, सुमिरन और ध्यान करने में जो तरीका अपनाया जाता है । उसी को पूरा नहीं समझना चाहिये । बल्कि और भी ज्यादा से ज्यादा तजुर्बा हासिल करने की कोशिश करनी चाहिये । जैसे सत शास्त्रों को सुनना पढना । यानी पुस्तकीय जानकारी के साथ श्री सदगुरू देव जी महाराज से तरह तरह के तरीके की जानकारी करते रहना चाहिये । जिस प्रकार अभ्यास बढता जायेगा । नया नया तजुर्बा होता जायेगा ।
यदि नियमित रूप से भजन, सुमिरन, ध्यान किया जाय । जो धीरे धीरे ऐसा लगने लगेगा कि सदगुरू का स्वरूप धीरे धीरे नजदीक यानी हमारे अन्दर आता जा रहा है । सबसे आवश्यक बात यह है कि श्री सदगुरू देव जी महाराज के श्री चरणों में प्रीति और प्रतीत के साथ अभ्यास करता रहे । श्री स्वामी जी महाराज समझाते थे कि अभ्यास से अभिप्राय यह है कि - आत्म और मन जिनकी ग्रन्थि इस स्थूल यानी पिण्ड शरीर में बंधी हुई है । वह खुलने लगे । आत्मा मन के फ़न्दे से न्यारी हो । और उसकी चाल बृह्माण्ड की ओर हो । तथा चढाई करके सन्तों के देश दयालदेश तक पहुंचे ।
अभ्यास करते समय यानी भजन, सुमिरन व ध्यान करते समय मन को नाम के सुमिरन में एकाग्र करते करते मालिक यानी श्री सदगुरू देव जी महाराज के ही ध्यान में मन को स्थिर करना चाहिये । यदि कुछ देर बाद ख्याल या सुरति कहीं अन्यत्र चली जाय । तो भी उसको खींचकर श्री सदगुरू 


देव के भजन ध्यान में बार बार लगाते रहना चाहिये । ऐसा करने से कृमश: धीरे धीरे मन भजन व ध्यान में लगने लग जायेगा । इसके बाद भी मन न लगे । तो श्री सदगुरू देव महाराज की आरती । वन्दना । गुरू चालीसा थोङा जोर जोर से भाव विभोर होकर गाना चाहिये । ऐसा करने से मन मालिक में लग जायेगा । ऐसा ख्याल रखना चाहिये  कि मन हर वक्त श्री सदगुरू भगवान के प्रेम के रंग में रंगा रहे । प्रभु के ख्याल में डूबा रहे । ऐसा अभ्यास करते हुए मालिक के भजन, ध्यान में मन को सदा लगाते रहना चाहिये । सदा मन के बराबर प्रवाह को संसारी मोह माया की ओर से मोडकर मालिक में बराबर लगाते रहना चाहिये । यानी ख्याल को अन्तर्मुखी बनाये रखना चाहिये । ऐसा करते करते साधक अन्दर में ऊपर की ओर चढाई करने लगते हैं । इस प्रकार का प्रयोग करने से अभ्यास में आनन्द भी आता है । और मन भी लगने लग जाता हैं ।
अभ्यास करते समय भजन, ध्यान में अभ्यासी अपने मन और सुरत को सहसदल कमल पर जमावे । और कुछ देर के लिये अपनी सुरत को भजन, ध्यान या मानसिक पूजा में लगाये रखे । ऐसा करने से मन माया की तरफ़ से मुड जायेगा । और ऊपर की ओर जो चढाई है । उसका रस उसको अवश्य मिलने लग जायेगा । इसी तरह अभ्यास करते करते जब मन भजन, ध्यान में लग जायेगा । तो साधक धीरे धीरे भजन, सुमिरन, ध्यान के आनन्द में विभोर होता हुआ । आकर्षण में खिंचा हुआ । उस स्थान तक पहुंच जायेगा । जहां मालिक का स्थान है ।
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- ये शिष्य जिज्ञासा से सम्बन्धित प्रश्नोत्तरी श्री राजू मल्होत्रा द्वारा भेजी गयी है । आपका बहुत बहुत आभार ।
2-4 श्लोक कण्ठस्थ करने मात्र से क्या कोई साधु हो जाता है ?

गुरुवार, जनवरी 12, 2012

कबीर गुरू की भक्ति बिन बांधा जमपुर जाय


ऊजल पहने कापड़ा । पान  सुपारी खाय । कबीर गुरू की भक्ति बिन । बांधा जमपुर जाय ।
कुल करनी के कारने । ढिग ही रहिगो राम । कुल काकी लाजि है । जब जमकी धूमधाम ।
कुल करनी के कारने । हंसा गया बिगोय । तब कुल काको लाजि है । चाकिर पांव का होय ।
मैं मेरी तू जानि करे । मेरी मूल बिनास । मेरी पग का पैखड़ा   ।  मेरी गल की फांस । 
ज्यों कोरी रेजा बुने  । नीरा आवे  छोर । ऐसा लेखा मीच का । दौरि सके तो दौर । 
इत पर धर उत है धरा । बनिजन आये हाथ । करम करीना बेचि के । उठि करि चालो काट । 
जिसको रहना उतघरा ।    सो क्यों जोड़े मित्र । जैसे पर घर पाहुना  । रहे उठाये चित्त । 
मेरा संगी कोई नहीं । सबे स्वारथी लोय । मन परतीत न ऊपजे । जिय विस्वाय न होय ।
मैं भोंरो तोहि बरजिया । बन बन बास न लेय । अटकेगा कहुं बेल  में  । तड़फ  तड़फ  जिय देय ।
दीन गंवायो दूनि संग । दुनी न चली साथ । पांच कुल्हाड़ी मारिया । मूरख अपने हाथ । 
तू मति जाने बावरे  । मेरा है यह कोय । प्रान पिण्ड सो बंधि रहा  । सो नहिं अपना होय ।
या मन गहि जो थिर रहे  । गहरी धूनी गाड़ि । चलती बिरिया उठि चला ।  हस्ती घोड़ा छाड़ि ।
तन सराय मन पाहरू । मनसा उतरी आय । कोई काहू का है नहीं  । देखा ठोंकि बजाय । 
डर करनी डर परम गुरु  ।  डर पारस डर सार । डरत रहे  सो ऊबरे  । गाफिल खाई मार । 
भय से भक्ति करे  सब । भय से पूजा होय । भय पारस है जीव को । निरभय होय न कोय । 
भय बिन भाव न ऊपजे । भय बिन होय न प्रीति । जब हिरदे से भय गया,। मिटी सकल रस रीति । 
काल चकृ चाकी चले । बहुत दिवस ओ रात । सुगन अगुन दोउ पाटला।  तामें जीव पिसात । 
बारी बारी आपने । चले पियारे मीत । तेरी बारी जीयरा । नियरे आवे  नीत । 
एक दिन ऐसा होयगा । कोय काहु का नांहि । घर की नारी को कहे । तन की नारी जांहि । 
बैल गढ़न्ता नर । चूका सींग रू पूँछ । एकहिं गुरु के ज्ञान बिनु  । धिक दाढ़ी धिक मूंछ ।

एक गुरु के नाम बिन जम मारेंगे रोज ।

ऊँचा महल चुनाइया ।  सुबरन कली ढुलाय । वे मन्दिर खाले पड़े ।  रहे मसाना जाय । 
ऊँचा मन्दिर मेड़िया ।  चला कली ढुलाय । एकहि गुरु के नाम बिन ।  जदि तदि परलय जाय । 
ऊँचा दीसे धौहरा ।  भागे चीती पोल । एक गुरु के नाम बिन ।  जम मारेंगे रोज । 
पाव पलक तो दूर है ।  मो पे कहा न जाय । ना जानो क्या होयगा ।  पाव के चौथे भाय । 
मौत बिसारी बाहिरा ।  अचरज कीया कौन । मन माटी में मिल गया ।  ज्यों आटा में लौन । 
घर रखवाला बाहिरा ।  चिड़िया खाई खेत । आधा परवा ऊबरे ।  चेति सके तो चेत । 
हाड़ जले लकड़ी जले ।  जले जलवान हार । अजहुँ झोला बहुत है ।  घर आवे तब जान । 
पकी हुई खेती देख के ।  गरब किया किसान । अजहुं झोला बहुत है ।  घर आवे तब जान । 
पाँच तत्व का पूतरा ।  मानुष धरिया नाम । दिना चार के कारने ।  फिर फिर रोके ठाम । 
कहा चुनावे मेड़िया ।  लम्बी भीत उसारि । घर तो साढ़े तीन हाथ ।  घना तो पौने चारि । 
यह तन काचा कुंभ है ।  लिया फिरे थे साथ । टपका लागा फुटि गया ।  कछु न आया हाथ । 
कहा किया हम आयके ।  कहा करेंगे जाय । इत के भये न ऊत के ।  चाले मूल गंवाय । 
कुल खोये कुल ऊबरे । कुल राखे कुल जाय । राम निकुल कुल भेटिया  । सब कुल गया बिलाय ।
दुनिया के धोखे मुआ ।  चला कुटुम की कानि । तब कुल की क्या लाज है   ।जब ले धरा मसानि ।
दुनिया सेती दोसती । मुआ  होत भजन में भंग । एका एकी राम सों ।  कै साधुन के संग ।
यह तन काचा कुंभ है  । यही लिया रहिवास । कबिरा नैन निहारिया । नहिं जीवन की आस । 
यह तन काचा कुंभ हे । चोट चहू दिस खाय । एकहि गुरु के नाम बिन । जदि तदि परलय जाय । 
जंगल ढेरी राख की  ।   उपरि उपरि हरियाय । ते भी होते मानवी  ।  करते रंग रलियाय । 
मलमल खासा पहिनते ।  खाते नागर पान । टेढ़ा होकर चलते   ।    करते बहुत गुमान । 
महलन माही पौढ़ते  । परिमल अंग लगाय । ते सपने दीसे नहीं  ।   देखत गये बिलाय । 

सोमवार, जनवरी 02, 2012

गुरूभक्ति योग


गुरूभक्ति योग की भावना - जिस प्रकार शीघ्र ईश्वर दर्शन के लिये कलियुग में साधना के रूप में कीर्तन साधना है । ठीक उसी प्रकार इस संशय, नास्तिकता, अभिमान, और अहंकार के युग में योग की एक सनातन पद्धति यहाँ प्रस्तुत है, जिसको कहते हैं - गुरूभक्ति योग।

यह योग अद्भुत है, इसकी शक्ति असीम है। इसका प्रभाव अमोघ है इसकी महत्ता अवर्णनीय है। इस युग के लिये उपयोगी इस विशेष योग पद्धति के द्वारा आप इस हाङ चाम के पार्थिव देह में रहते हुए सदगुरू भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं। इसी जीवन में आप उन्हें अपने साथ विचरण करते हुए देख सकते हैं।

गुरू की यह सर्वोच्च विभावना है, और हर साधक को यह प्राप्त करना है। व्यक्तिगत गुरू को स्वीकार करना है। यह साधक की परब्रह्म में विलीन होने की तैयारी है, और उस दिशा में एक सोपान है। गुरू की विभावना के विकास के लिये व्यक्ति की गुरू के प्रति शरणागति एक महत्त्वपूर्ण सोपान है। फ़िर साधना के किसी भी सोपान पर गुरू की आवश्यकता का इन्कार कभी नहीं हो सकता। क्योंकि आत्म-साक्षात्कार के लिये तङपते हुए साधक को होने वाली परब्रह्म की अनुभूति का नाम गुरू है। उसी को गुरूतत्त्व भी कहते हैं।

सन्त महापुरूष उपदेश देते हैं कि एकाग्रता ही प्रत्येक काम की सफ़लता की कुंजी है। जिस काम को एकाग्रचित्त होकर किया जाये, वह कठिन से कठिन कार्य भी सफ़ल हो जाता है। ऐसे ही प्रभु प्राप्ति में भी यदि मन को सांसारिक कामनाओं और चिन्तन से हटाकर और मन को एकाग्रचित्त कर श्री सदगुरू के भजन, सुमिरन, ध्यान में लगाया जाये तो अपने लक्ष्य की प्राप्ति हो जाती है।

अभ्यास का अर्थ ही यह है कि किसी भी कार्य को नियमपूर्वक करना अर्थात मन की चित्तवृत्तियों को एकाग्र करने के लिये हर समय अपने मन पर ध्यान रखना। यह ख्याल में रखना चाहिए कि सुरति को भजन ध्यान में लीन करते हुए समाधि अवस्था तक पहुँचना ही जीवन का परम लक्ष्य है।

इस प्रकार प्रभु प्राप्ति के अभिलाषी जिज्ञासुजन इन साधनों को ध्यान में रखते हुए अपनी चित्तवृत्तियों को माया की ओर से समेट कर श्री सदगुरू की भक्ति की ओर लगाते हैं तथा अपने ध्यान को श्री सदगुरू के स्वरूप पर ठहराते हैं। श्री सदगुरू के नाम का भजन उनकी पूजा बन जाती है। इस प्रकार वे अपने जीवन को श्री सदगुरू के उपदेश अनुसार बनाकर लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग सुगम बनाते हैं तथा लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।

गुरू वास्तव में उस परम ईश्वरीय शक्ति का नाम है, जो अपनी अपार दया से जीवों को ऊपर उठाने  नाम भजन के द्वारा उनके ज्ञाननेत्र खोलने मन को शुद्ध व पवित्र बनाने तथा श्री सदगुरूदेव  महाराज की असीम दया से अपनी तरफ़ आकर्षित करने का काम करती है।

श्री सदगुरूदेव के वचन तो महामोह रूपी घने अन्धकार को नाश करने के लिये सूर्य की किरणों के सदृश होते हैं। उनका हर वचन जीवन में नवक्रान्ति लाने वाला होता है। प्रेमीजन उनके एक एक वचन को ह्रदय में धारण करके उन्हें व्यवहार में लाकर परम लाभ का अनुभव करते हैं। श्री सदगुरू देव अपने भक्तों को सीधे सादे शब्दों में यानी अपनी सहज व सरल बोलचाल की भाषा में धर्म, ज्ञान, नीति, भक्तियोग, सेवा का भाव, भजन, सुमिरन, पूजा, दर्शन, ध्यान के तरीके समझा दिया करते थे।

श्री सदगुरूदेव के मुखारविन्द के वाक्य आज भी भौतिकवाद से संतप्त प्राणियों को परम शान्ति और दिव्यता प्रदान करने में समर्थ हैं। आज भी हजारों लाखों साधक जिज्ञासु उन अमर वाक्यों का मनन करके अपने जीवन के परम लक्ष्य सत्यस्वरूप निजपद की प्राप्ति कर सकते हैं।

भक्तजनों को भक्तिरस पिलाने और सत्यमार्ग दर्शाने के लिये श्री सदगुरूदेव युग युग में नाना रूप धारण कर आते हैं। आगे भी स्वामी जी भक्तों को दर्शन देने के लिये आते ही रहेंगे।

श्री सदगुरूदेव का श्रद्धा, विश्वास तथा भाव पूर्वक जो उनके अमृतरूप सतसंग के तीर्थ में गोता लगाते रहते हैं उनके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं, और अन्त में वे सभी पापों से छूटकर सायुज्य मुक्ति को पाते हैं। दया, क्षमा, और शान्ति स्वरूप श्री सदगुरूदेव की शरण में जाने पर ही साधक परमपद एवं भक्ति का अधिकारी बनता है।

गुरू मोक्ष का द्वार हैं




सुरति की अन्तर्यात्रा की मंजिलें - जिज्ञासुओं की सुरति को साधना और अभ्यास में जिन आन्तरिक मंजिलों में से होकर गुजरना पङता है। उनका विशद वर्णन स्वामी जी महाराज सुचारू रूप से किया करते थे। भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान की प्रक्रिया अर्थात अजपा जप और सहज समाधि यानी ध्यान के विषय में साधक के साधना मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का समाधान भी आप ऐसे सरल भाव व सरल तरीके से करते थे कि शिष्य बङी आसानी से समझ जाता था।

पिण्डदेश में चक्रवेधन कैसे किया जाय, और ब्रह्माण्ड में साधक की सुरति किस प्रकार ऊपर के मण्डलों में जाती है। इसके विषय में आप कहते थे कि स्थूल शरीर में अहंकार, मन, बुद्धि और चित्त ये अन्त:करण है। पांच-तत्वों से बनी यह देह है। प्रथम सुरति की धार पिण्डदेश से चलती है। फ़िर कई कठिनाईयों को पार करती हुई ब्रह्माण्ड देश में पहुंचती है।

ख्याल रखने की बात है कि मूलाधार से इन्द्रिय चक्र, इन्द्रिय चक्र से नाभि चक्र, नाभिचक्र से ह्रदय चक्र, ह्रदय चक्र से कण्ठ चक्र, कण्ठ चक्र से ललाट में भ्रूमध्य तक तो अविद्या माया का पसारा है। इससे आगे भृकुटी के थोङा ऊपर जो लोक है उसे सहसदल कमल कहते हैं। यहीं से ब्रह्माण्ड की मंजिल शुरू होती है। जिसे महापुरूषों की शरण ग्रहण कर उनकी कृपा से पार किया जा सकता है।

मूलाधार चक्र - मूलाधार चक्र के देवता गणेश हैं। मूलाधार चक्र में चार दलों वाला लाल रंग का कमल है। यह चक्र पृथ्वी तत्त्व का केन्द्र है। इस चक्र का बीज मन्त्र क्लीं है। सन्त महापुरूष गुरू की बताई हुई जिस नामभक्ति की उपासना करते हैं। वह मूलाधार चक्र में सोई हुई सुरति को भजन,  सुमिरन, दर्शन, ध्यान के माध्यम से जगाकर निजधाम में पहुंचाने का सुगम उपाय है। साधक अपने ऊर्ध्वमुखी यात्रा भ्रूमध्य में स्थित आज्ञाचक्र में अपनी सुरति को केन्द्रित करके सहसदल कमल से प्रारम्भ करते हैं। इससे नीचे के चक्रों से ऊपर की ओर उठती हुई सुरति माथे में स्थित निजधाम की ओर गमन करती है।

स्वाधिष्ठान चक्र - इस चक्र को स्वाद चक्र भी कहते हैं इसी चक्र से स्वाद की उत्पत्ति होती है। इस चक्र में पीले रंग का छह पंखुङियों वाला एक कमल है। इस चक्र का तत्त्व जल है। यहाँ के देवता ब्रह्मा और सावित्री हैं। स्वाधिष्ठान चक्र का बीज मन्त्र ॐ है। श्री सदगुरू महाराज के बतलाये हुए मूलमंत्र का जप कर करके साधक सुरतिरूपी नागिन के सिर पर बार बार भजन सुमिरन से संयुक्त श्वास का अघात करते हैं। तब सुरतिरूपी नागिन फ़ुफ़कार कर सुषम्ना नाङी के द्वारा ऊपर की ओर मुँह करके चल पङती है। इसी को कुण्डलिनी का जागरण कहते हैं। स्वाधिष्ठान चक्र से ही पैदाइश का काम होता है। इसलिये इस चक्र को इन्द्रिय चक्र भी कहते हैं।

मणिपूर चक्र - इसे मणिपूर इसलिये कहते हैं क्योंकि यह चक्र अग्नि का तेज तत्त्व का अधिष्ठान होने से मणि के समान कान्ति वाला होता है। इस केन्द्र में जो कमल है उसका रंग सफ़ेद होता है। यह आठ पंखुङियों वाला कमल है। इस चक्र का बीज मंत्र ह्रीं है। सफ़ेद रंग के सिंहासन पर विष्णु विराजमान हैं। जो इस चक्र तथा अग्नि तत्त्व के देवता या मालिक हैं। यह प्रसिद्ध है कि विष्णु सृष्टि के पालनकर्ता हैं, और मनुष्य शरीर में इसी स्थान से शरीर का पालन पोषण होता है।

अनाहत चक्र - इस चक्र में जो कमल है उसमें बारह पंखुङियां हैं। सुरति का यह मण्डल प्राणों का भण्डार है। इस चक्र के मालिक शिवजी हैं। यहाँ का तत्त्व वायु है। चेतना के इस मण्डल से त्वक अर्थात त्वचा नामक स्पर्श की ज्ञानेन्द्रिय और उपस्थ नामक कर्मेन्द्रिय की सम्हाल होती है। कुशल साधक इस केन्द्र में प्राणों के अनाहत ध्वनि रूपी स्पन्दन को अपनी आन्तरिकता में सुनते हैं।

विशुद्ध चक्र - विशुद्ध चक्र की स्थिति कण्ठ में होने के कारण इसे कण्ठ चक्र भी कहते हैं। इस चक्र के कमल की सोलह पंखुङियां है जिनका रंग धूमिल बैंगनी होता है। विशुद्ध चक्र में आकाश तत्त्व की स्थिति है। सन्तों की दृष्टि में विशुद्ध चक्र का शक्ति या भवानी नामक अधिष्ठातृ देवता अविद्या माया के अन्तर्गत है।

आज्ञाचक्र - आज्ञाचक्र मन और प्रकृति के सूक्ष्म तत्त्वों का केन्द्र है। इस चक्र को आज्ञाचक्र कहने का कारण यह है कि किस चक्र से ऊपर के निर्मल चैतन्य देश में रमण करने वाले परमात्मा स्वरूप श्री सदगुरूदेव की आज्ञा अन्तर्जगत में इसी चक्र में प्राप्त होती है। यहाँ पर दोनों भौंहों के मध्य में श्वेत रंग का दो दलों वाला एक कमल है। मूलाधार चक्र से लेकर आज्ञाचक्र तक के प्रत्येक कमल के दलों का योग पचास दलों का होता है। आज्ञाचक्र से नीचे का देश सन्तों के अनुसार पिण्डदेश (स्थूलता प्रधान देश) कहलाता है जो अविद्या माया का देश है।

पिण्डदेश अथवा स्थूलता प्रधान देश का विस्तार मूलाधार चक्र से आज्ञाचक्र तक रहता है। मूलाधार चक्र अविद्या के देश का प्रारम्भ है, और आज्ञाचक्र उस देश का अन्तिम छोर है। सन्तजन अपनी साधना आज्ञाचक्र में परानाम के सुमिरन और श्री सदगुरू मूर्ति के ध्यान के सहारे अपनी सुरति को केन्द्रित करके उसके ऊपर सहसदल कमल से प्रारम्भ करते हैं।

ब्रह्माण्ड के देशों का संक्षिप्त परिचय - सहसदल कमल, बंकनाल, त्रिकुटी, सुन्न यानी दशम द्वार, महासुन्न, भंवरगुफ़ा, सत्यलोक, अनामी पद (गुप्त) अलख लोक, अगम लोक, अकह लोक क्रम से ये मण्डल आज्ञाचक्र अर्थात छठें चक्र के ऊपर के सत्यराज्य के लोक हैं।

इस सत्यराज के दो विभाग हैं - एक ब्रह्माण्ड, और दूसरा निर्मल चैतन्य देश।

ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत - सहसदल कमल, बंकनाल, त्रिकुटी, और सुन्न या दशम द्वार मण्डल आते हैं। इन लोकों में योगमाया या विद्यामाया का प्रभुत्व रहता है।

सुन्न या दशम द्वार के बाद भंवरगुफ़ा से अकहलोक तक के लोक निर्मल चैतन्य के देश अथवा दयाल देश कहलाते हैं। इस स्थान को ही सुरति का निजधाम कहते हैं। सदगुरूदेव की उपासना, उनकी अनन्य भक्ति को छोङकर यहाँ पहुँचने का दूसरा कोई उपाय या साधन नहीं है।

सहसदल कमल - सहसदल कमल को सन्तजन त्रिलोकीनाथ या निरंजन का देश कहते हैं। यहाँ तक पहुँचे हुए साधक साधना की दृष्टि से ऊँचाई पर पहुँचे हुए साधक होते हैं। इनका सदगुरू में अगाध प्रेम होता है, और जिनको श्री सदगुरू के चरणों की प्यास बराबर बनी रहती है। उनको श्री सदगुरूदेव महाराज ऊपर के मण्डलों में पहुँचा देते हैं। श्री सदगुरू महाराज के जो शिष्य़ हैं वे श्री सदगुरू के नाम भजन और ध्यान के सहारे यहाँ पहुंचते हैं। श्री सदगुरू भगवान को अपने संग साथ रखने वाले शिष्य को वे कृपालु माया के प्रलोभनों में नहीं फ़ंसने देते हैं।

त्रिकुटी - श्री सदगुरू महाराज ने अपने शिष्यों को जो परानाम का उपदेश दिया है । वह बहुत बङी अमूल्य निधि है। उस अमूल्य निधि का सदा सदा भजन, सुमिरन, ध्यान हर स्थिति में करते रहना चाहिये। ऐसे शिष्य को सदगुरूदेव बंकनाल नामक सूक्ष्म मार्ग में प्रवेश दिलाकर इसके ऊपर के त्रिकुटी नामक देश में पहुंचा देते हैं।

इस त्रिकुटी नामक देश का वर्णन करते हुए सन्त दरिया साहब कहते हैं।

त्रिकुटी माहीं सुख घना, नाहीं दुख का लेस।
जन दरिया सुख दुख नहीं, वह कोई अनुभवै देश।

सन्त महापुरूषों ने अपने वचनों में कहा है कि त्रिकुटी नामक यह मण्डल ब्रह्म का देश है। जैसे सहसदल कमल में अमृत बरसता रहता है। ठीक उसी प्रकार त्रिकुटी में भी अमृत बरसता रहता है। यहाँ पहुँचे हुये साधक की त्रिकुटी का अमृतपान करने व उसमें स्नान करने से आशा व तृष्णा की प्यास शान्त हो जाती है। यह त्रिकुटी नामक महल सम्पूर्ण विद्याओं का भण्डार है।

मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की गति त्रिकुटी पहुँचने तक ही रहती है। इसके आगे त्रिकुटी महल है । जहाँ श्री सदगुरू पूर्णब्रह्म का निवास होता है। जब साधक श्री सदगुरू की दया से ब्रह्मसरोवर में जाकर स्नान पान करने लग जाता है तो वह शरीर रहते हुए भी मन, वाणी और शरीर से परे हो जाता है। ये तीनों उसे प्रभावित नहीं कर पाते हैं। जब त्रिकुटी की सन्धि में स्थिरता पूर्वक श्री सदगुरू के नाम का भजन, सुमिरन, ध्यान होने लगता है तो प्राण इङा पिंगला नाङियों को छोङकर अवश्य ही सुषुम्ना नाङी में प्रवाहित होने लगता है, और तब अपने श्री सदगुरूदेव के प्रति श्रद्धा और निष्ठा की अटूटधारा बहने लगती है।

श्री सदगुरूदेव महाराज ने इस प्रकार त्रिकुटी नामक मण्डल का पूर्ण रहस्य बतलाया। जिसे केवल समय के सन्त महापुरूषों की चरण शरण में जाने से ही जाना जा सकता है। केवल वाणी विलास या पुस्तकीय ज्ञान से भक्ति की आध्यात्मिक मंजिलों (आन्तरिक मंजिलों) को पार करना असम्भव है।

इसी आन्तरिक मार्ग को पार करने के लिये परम सन्त कबीर साहब उपदेश देते हैं।

त्रिकुटी में गुरूदेव का, करै जो गुरूमुख ध्यान।
यम किंकर का भय मिटे, पावे पद निर्वान।

सुन्न या दशम द्वार - जब शिष्य की सुरति श्री सदगुरूदेव महाराज के भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान के दृढ़ अभ्यास से इस त्रिकुटी नामक मण्डल में पहुंचती है। तब उसको सतशिष्य का दर्जा प्राप्त हो जाता है। फ़िर वह दशम द्वार में प्रवेश करना चाहता है। इस दशम द्वार में जिस गुरूभक्त की सुरति सदगुरू की कृपा से पहुंच जाती है। वही गुरूभक्त सच्चे अर्थों में सतशिष्य कहलाता है, साधु कहलाता है।

श्री सदगुरूदेव महाराज के नाम के भजन, सुमिरन और उनकी सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान की प्रगाढ़ता के भावदशा में साधक की सुरति त्रिकुटी मण्डल से चलकर जब दशम द्वार में प्रवेश कर श्री सदगुरूदेव महाराज का श्रद्धा, प्रेम, प्यार के साथ इतना स्पष्ट दर्शन करती है। जितना स्पष्ट स्वच्छ दर्पण में अपना चेहरा दिखलाई देता है। तब साधक की सुरति शून्यमण्डल या दशम द्वार में प्रवेश कर श्री सदगुरूदेव महाराज की कृपा प्राप्त कर अपने को धन्य धन्य मानने लग जाती है।

इस प्रकार साधक की सुरति को दशम द्वार में पहुँचने से उसमें शुद्ध परमार्थ का उदय हो जाता है। अपने श्री सदगुरूदेव महाराज के स्वरूप में स्फ़टिक के समान अत्यन्त उज्ज्वल सफ़ेद प्रकाश विद्यमान रहता है। सन्त महापुरूषों का कहना है कि शून्यमण्डल या दशम द्वार में अक्षय पुरूष के आसन के नीचे अमृत का एक कुण्ड है। जिसको मानसरोवर कहते है। उसमें साधक के स्नान, पान, ध्यान करने से उसकी सुरति विशेष निर्मल हो जाती है। इसीलिये यहाँ पहुँची हुई सुरत की हंसगति हो जाती है।

महासुन्न - इसके बाद श्री सदगुरूदेव महाराज अपने ही प्रकाश के द्वारा सुरति को महासुन्न के घोर अन्धकार के मैदान से पार करके ऊपर के मण्डलों में ले जाते हैं। साधक जब श्री सदगुरूदेव महाराज का साथ हर वक्त पकङे रहता है। तभी घोर अन्धकार युक्त इस विषम घाटी को पार कर पाता है। अर्थात श्री सदगुरूदेव महाराज की चरण धूलि में स्नान करते हुए साधक घोर अन्धकारयुक्त महासुन्न की विषम घाटी को पार करने में समर्थ हो जाता है।

जिन आत्माओं को श्री सदगुरूदेव महाराज भजन, सुमिरन, ध्यान का अभ्यास करवा करवा कर अपने साथ आगे ले जाते हैं। उन आत्माओं से महाशून्य में फ़ंसी हुई आत्मायें प्रार्थना करती है कि अपने श्री सदगुरूदेव महाराज के सम्मुख सिफ़ारिश करो कि हमें भी ऊपर ले चलें। यदि उन सन्तों की मौज हो जाती है तो वे महाशून्य की इन आत्माओं को अपने साथ आगे ले जाते हैं।

भंवरगुफ़ा - पूरे गुरू की कृपा से जब साधक महाशून्य से आगे की यात्रा करता है तो सत्यराज्य के भंवरगुफ़ा नामक स्थान में पहुँचता है। जैसे सहसदल कमल नामक मण्डल ब्रह्माण्ड देश का पहला लोक है। उसी तरह शून्य या दशम द्वार निर्मल चैतन्य देश अथवा दयाल देश का द्वार है, और भंवरगुफ़ा नामक लोक श्री सदगुरूदेव महाराज के दयाल देश नामक निजधाम का पहला लोक है।

महाशून्य से ऊपर की ओर सूरति या चितशक्ति की एक गुफ़ा है जिसे भंवरगुफ़ा कहते हैं। यहाँ पहुँची हुई निर्मल चैतन्य सुरतें निरन्तर भिन्न-भिन्न प्रकार के उत्सव मनाती रहती हैं। यहाँ की सुरते हंस कहलाती हैं। अपने श्री सदगुरूरूपी क्षीरसागर में सदा मुरली की मधुर धुन बजती रहती है। इसी मुरली की गूंज के मध्य ‘सोऽहं’ की झंकार होती रहती है। यह ऐसा ही है जैसे बूंद समुद्र को देखकर कहे कि मैं तुम्हारा ही अंश हूँ। मालिक महासागर है, और जीव बूंद है। इसी तरह आत्मा सतपुरूष को देखकर कहती है कि मैं श्री सदगुरूदेव जी महाराज का एक अंश हूँ।

सतलोक - भंवरगुफ़ा के बाद माथे में ऊपर की ओर निर्मल चैतन्य देश का सतलोक नामक मण्डल है। अपने श्री सदगुरूदेव महाराज के श्री चरणों में निरन्तर रमे हुए दास को सदगुरूदेव महाराज भंवरगुफ़ा नामक मण्डल से सतलोक नामक लोक में ले जाते हैं। इस देश के मालिक का नाम सतपुरूष है। सतलोक वह स्थान है, जहाँ से सम्पूर्ण रचना का प्रकाश होता है। साधक सतलोक में पहुंचकर श्री सदगुरूदेव महाराज में लीन रहता है। इस तरह के बूंद यहाँ पहुँच कर समुद्र में मिलकर समुद्र हो जाती है।

सन्त कहते हैं कि सतलोक सर्वश्रेष्ठ सुन्दरता का लोक है। यहाँ सभी तरफ़ उच्चकोटि की सुगन्ध फ़ैली हुई है। जो साधक अपने श्री सदगुरूदेव के श्री चरणों की कृपा से सतलोक में पहुँचा है। वह सोलह सूर्यों के प्रकाश जैसा तेजपुंज और उज्जवल हो जाता है।

सतलोक में पहुँच कर साधक काल की सीमा से बाहर हो जाता है। श्री सदगुरूदेव महाराज का भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, ध्यान करने वाले अभ्यासी सतलोक पहुँचते हैं। सतलोक पहुंचने पर ही जीव को मुक्ति लाभ होता है।

जब सतलोक राह चढ़ि जाई।
तब यह जीव मुक्ति को पाई।

परन्तु धन्य है श्री सदगुरूदेव महाराज का यह कृपालु स्वभाव जिससे प्रेरित होकर वे उस जीव को अपने पास न रखकर उसे निर्मल चैतन्य देश के सतलोक के ऊपर के मण्डलों पर भेज देते हैं। सतलोक तक पहुंचने में श्री सदगुरूदेव महाराज की कृपा के साथ साथ शिष्य के स्वयं के अभ्यास की भी अपेक्षा रहती है। परन्तु सतलोक तक पहुँच जाने के बाद शिष्य के प्रयास की दौङ धूप समाप्त हो जाती है। यहाँ से ऊपर के मण्डलों में एकमात्र श्री सदगुरूदेव महाराज की कृपा ही अपने शिष्य को अपने प्रताप से आगे भेजती है।

अनामीलोक - सतलोक के बाद और अलख लोक के बीच में अनामी पद नामक निर्मल चैतन्य देश है। इस स्थान की निर्मल सुरति को अनामी सम्भवत: इसलिये कहा जाता है कि सत्यलोक में अलख पुरूष सत्यनाम के रूप में प्रकाशित हो जाता है। अनामी पद सत्यलोक के स्वामी सत्यनाम का पूर्ण रूप है। जिसे सन्तों ने गुप्तभेद भी कहा है।

अलखलोक - श्री सदगुरूदेव महाराज का विज्ञानमय स्वरूप शिष्य की आत्मा को ऊपर के अलख, अगम, और अकह लोकों में पहुंचा देता है। यहाँ के मालिक का नाम अलख पुरूष है। अलख पुरूष के एक एक रोम में अनेकों सूर्य का प्रकाश विराजमान रहता है। अलख लोक के ऊपर अगम लोक नामक महाचैतन्य का लोक है। इसकी महिमा अधिक से अधिक है। इस लोक के मालिक का नाम अगम पुरूष है। अगम पुरूष के एक एक रोम में अनेकों सूर्य का प्रकाश है। महापुरूषों ने बताया है कि यह देश परम सन्तों का देश है।

अकहलोक - इस अगम लोक के ऊपर जो अकहलोक है। उसका वर्णन करने में सन्त भी मौन हो गये। क्योंकि यहाँ का प्रकाश और यहाँ की निर्मलता बेअन्त है। इसका वर्णन किसी भी प्रकार नहीं किया जा सकता है। जैसे गूंगे आदमी को मिठाई खिला दी जाय और वह उस मिठाई के स्वाद का वर्णन न कर सके। उसी प्रकार इस लोक का वर्णन नहीं किय जा सकता है क्योंकि यह लोक अवर्णनीय है। इसीलिये इसे अकहलोक कहते है। गुरू की कृपा से जो यहाँ पहुँचे हैं वही इसका अनुभव कर पाते हैं।

तभी तो सन्त भीखा साहब कहते हैं कि इसकी गति अगम्य है।

भीखा बात अगम्य की, कहन सुनन में नाहिं।
जो जाने सो कहे ना, कहे सो जाने नाहिं।

कहने का तात्पर्य है कि जो साधक अपने श्री सदगुरूदेव महाराज के बताये हुए नाम का भजन, सुमिरन तथा उनकी सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान पूर्ण श्रद्धा के साथ करता जाता है। वह सदा अपनी एक के बाद दूसरी आध्यात्मिक मंजिल पर चढ़ता चला जाता है।

पल पल सुमिरन जो करे, हिरदय श्रद्धा धार।
आधि व्याधि नाशे सकल, चढ़ जावै धुर धाम।

साधक यदि नियमपूर्वक प्रतिदिन भजन, सुमिरन, ध्यान यानी सुरति शब्द योग का अभ्यास करते हैं तो उनको आन्तरिक आनन्द का अनुभव होने लगता है और उनका चित्त प्रसन्न रहने लग जाता है। यह श्री सदगुरूदेव महाराज की प्रत्यक्ष दया और उनकी कृपा है। जो शिष्य को गुरू की भक्ति की दिशा में ले जाती है। गुरू की भक्ति की दिशा में ले जाने का तात्पर्य है कि साधक की चेतना के ज्ञानात्मक और क्रियात्मक और भावात्मक पक्ष सदगुरूदेव महाराज पर श्रद्धा और विश्वास के रंग में ऐसे रंग जाते हैं कि सदगुरूदेव की कृपा से शिष्य का ज्ञान और उसके सम्पूर्ण कर्म गुरूभक्ति के रस से सराबोर हो जाते हैं।

इस भक्ति की साधना में परानाम का सुमिरन और ध्यान अर्थात गुरूस्वरूप का अपने अन्तर्चक्षुओं से दर्शन करना और उनकी मानसिक सेवा, पूजा करने का प्रधान स्थान है। इसमें अपने श्रद्धा भाव द्वारा ही सदगुरूदेव के भाव स्वरूप का भजन ध्यान किया जाता है। इस प्रकार की उपासना से गुरूभक्ति के साधक अपने सदगुरू की कृपा से माथे में भावराज्य के द्वार को खोलकर अन्दर प्रवेश कर जाते हैं और सदगुरूदेव महाराज के असीम दया से निकली हुई चेतना की निर्मल किरणों की सहायता से उनकी महिमा का रसास्वादन करते हुए उनके परमधाम की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करते हैं।

प्रभु को प्राप्त करने के जो अभिलाषी भक्ति की साधना के द्वारा मन को इष्ट के साथ जोङ लेते हैं वही मालिक को प्राप्त कर सकते हैं। सदा सदा ही मालिक के भजन, भक्ति, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान में रत रहने वाले प्रभु को प्राप्त करने के अभिलाषी शिष्य में स्वभावत: गुरू के स्वरूप उभर आते हैं।

सदगुरू की प्राप्ति को ईश्वर का साक्षात अनुग्रह समझना चाहिये। गुरू का दर्शन उनमें पूर्ण भक्तिभाव उनकी प्रसन्नता प्राप्ति और परिणाम स्वरूप अन्त:दर्शन की व्याकुलता, ये सभी ईश्वर के सार्थक अनुग्रह बताये गये हैं। ईश्वर के अनुग्रहकारी स्वरूप को गुरूतत्त्व कहते हैं।

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Agra, uttar pradesh, India
भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।

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