शुक्रवार, अप्रैल 06, 2012

आपके अपने अपने ईश्वर हैं

ध्यान कुछ ऐसा है । जिसका कि उस तरह से अभ्यास नहीं किया जा सकता । जिस तरह आप वायलिन या पियानो बजाने का अभ्यास करते हैं । आप अभ्यास करते हैं । अर्थात आप पूर्णता के किसी खास स्तर पर पहुंचना चाहते हैं । पर ध्यान में कोई स्तर नहीं है । कुछ पाना नहीं है । इसलिए ध्यान कोई चेतन या जान बूझ कर किया जाने वाला कर्म नहीं है । ध्यान वह है । जो पूरी तरह से बिना किसी दिशा निर्देशन के है । अगर मैं चाहूँ । तो अचेतन शब्द का प्रयोग कर सकता हूँ । यह जानबूझ कर की गयी प्रक्रिया नहीं है । अब इसे यहीं छोड़ें । हम इस पर बहुत समय एक घण्टा । एक पूरा दिन । बल्कि पूरा जीवन लगा सकते हैं । आइये अब अवकाश स्पेस के बारे में बात करें । क्योंकि ध्यान - वही अवकाश है ।
हमारी बुद्धि में अवकाश नहीं है । दो प्रयासों के बीच । दो विचारों के बीच । अवकाश है । लेकिन यह अब भी विचार की परिधि में है । इसलिए अवकाश क्या है ? क्या अवकाश में समय भी रहता है ? अथवा क्या समय में सारा अवकाश शामिल है ? हमने समय के बारे में बातचीत की । यदि अवकाश में समय है । तब तो यह अवकाश नहीं है ? यह तो घिरा हुआ और सीमित है । अतः क्या बुद्धि समय से मुक्त हो सकती है ? श्रीमन ! यह महत्वपूर्ण व्यापक प्रश्न है । यदि जीवन । सारा जीवन । अब मैं समाया है । तो आप देख पा रहे हैं कि - इसका आशय क्या है ? सारी मानवता आप हैं । सारी मानवता क्योंकि दुखी हैं । वह दुखी है । उसकी चेतना आप हैं । आपकी चेतना । आपका होना । वह है । यहां आप या मैं जैसा कुछ नहीं है । जो कि अवकाश को सीमित करे । अतः क्या समय का कोई अन्त है ? घड़ी का समय नहीं । जिसकी चाभी आप भरा करते हैं । और जो बन्द हो सकती है । बल्कि समय की समग्र गति ।
समय गति है । घटनाओं का एक समूह है । विचार भी गतियों का समूह हैं । इस तरह समय विचार है । अतः हम कह रहे हैं । क्या विचार का अन्त है ? जिसका आशय है । क्या ज्ञान का अन्त है ? क्या अनुभव का अन्त है ? जो कि पूर्ण मुक्ति है । और यही है ध्यान । न कि कहीं जाकर बैठना । और देखना । ये बचकाना है । ध्यान के लिए बुद्धि की ही नहीं । बल्कि गहरी अंतर दृष्‍टि‍ की भी आवश्यकता होती है । भौतिकविद । कलाकार । चित्रकार । कवि आदि सीमित अंतर दृष्टि रखते हैं । सीमित और छोटी । हम समयातीत अंतर दृष्टि की बात कर रहे हैं । यही है ध्यान । यही है धर्म । और यदि आप चाहें । तो शेष दिनों के लिए यही है । जीने का मार्ग ।
आप ईश्वर के विषय में बहुत चर्चा करते हैं । आपकी किताबें इससे भरी हुई हैं । आप गिरजे मन्दिर बनाते हैं । आप 


त्याग और बलिदान करते हैं । पूजा पाठ करते हैं । अनुष्ठान आयोजित करते हैं । और आप ईश्वर विषयक धारणाओं से भरे पड़े हैं । हैं कि नहीं ? आप यह शब्द ईश्वर तो दोहरा लेते हैं । पर आपके कर्म तो ईश्वरीय नहीं हैं । यद्यपि जिसे आप ईश्वर कहते हैं । उसकी आप उपासना करते हैं । आपके तौर तरीके । आपके विचार । आपका अस्तित्व ईश्वरीय नहीं हैं । क्या हैं ? हालांकि आप ईश्वर शब्द दोहराते रहते हैं । तो भी आप दूसरों का शोषण किया करते हैं । क्या आप ऐसा नहीं करते ? आपके अपने अपने ईश्वर हैं । हिन्दू । मुस्लिम । सिख । ईसाई । और कई अन्य । आप मंदिर बनवाते हैं । आप जितने ज्यादा अमीर होते जाते हैं । उतने ज्यादा मन्दिर बनवाने लगते हैं । हंसिये मत । आप खुद भी यही कर रहे हैं । और कुछ लोग धार्मिक रूप से अमीर होने में लगे हैं । अन्य लोग नोटों से अमीर होने की कोशिशों में लगे हैं । फर्क बस इतना सा ही है ।
तो आप ईश्वर से खूब परिचित हैं । कम से कम इस शब्द से तो हैं ही । पर यह शब्द ईश्वर नहीं है । शब्द वह वस्तु नहीं होता है । हम इस मुद्दे पर पूरी से स्पष्ट हो लें । यह शब्द ईश्वर नहीं है । आप ईश्वर शब्द का अथवा किसी अन्य शब्द का प्रयोग कर सकते हैं । किंतु ईश्वर वह शब्द नहीं है । जिसका प्रयोग आप कर रहे हैं । चूंकि आप ईश्वर शब्द का प्रयोग कर लेते हैं । इसका मतलब यह नहीं है कि - आप ईश्वर को जानते हैं । मैं इस शब्द का प्रयोग नहीं करता । इसकी बड़ी साफ वजह है कि - आप इसे जानते हैं । जो आप जानते हैं । वह यथार्थ नहीं है । इसके अतिरिक्त । यथार्थ का पता लगाने के लिए मन की सारी शाब्दिक बड़बड़ का बंद होना जरूरी है । क्या नहीं ? आपके यहां ईश्वर की प्रतिमाएं हैं । किंतु निश्चित वह प्रतिमा ईश्वर नहीं है । आप ईश्वर को कैसे जान पाएंगे ? जाहिर है । किसी मूर्ति के । किसी मंदिर के जरिये तो नहीं । ईश्वर को । अज्ञात को ग्रहण करने के लिए । मन को भी अज्ञात हो जाना होता है । यदि आप ईश्वर की तलाश में हैं । तो आप ईश्वर को पहले से ही जानते हैं । आप उस लक्ष्य से अवगत हैं । यदि आप ईश्वर को ढूंढ रहे हैं । तो आप जानते ही होंगे कि - ईश्वर क्या है ? नहीं तो आप उसे ढूंढते ही नहीं । या ढँढते हैं ? आप उसे या तो अपनी पुस्तकों के मताबिक ढूंढते हैं । या अपनी भावनाओं के अनुरूप ढूंढते हैं । आपकी भावनाएं आपकी स्मृति की प्रतिक्रियाएं मात्र हैं । इसलिए जिसे आप ढूंढ रहे हैं । वह पहले से ही गढ़ लिया गया है । या तो स्मृति के द्वारा या सुनी सुनाई बातों के द्वारा । और जो पूर्व निर्मित है । वह शाश्वत नहीं है । वह तो मन की ही उपज है ।
अगर किताबें नहीं होतीं । गुरू नहीं होते । दोहराने के लिए सूत्र नहीं होते । तो आपको पता होता । केवल दुख और सुख का । यही होता न ? लगातार दुख और परेशानियां एवं प्रसन्नता के कुछ विरले क्षण । और तब आप जानना चाहते कि - आपको दुख क्यों होता है ? पर आप ईश्वर में पलायन नहीं कर पाते । लेकिन शायद आप दूसरे तरीकों से पलायन करने लगते ( रूस में नास्तिकता वादियों के सुख और दुख की पहेलियों । जीवन की नीरसता से पलायन करने के ईश्वर के अलावा भी कई बहाने हैं । ) और शीघ्र ही पलायन के रूप में आप देवताओं का आविष्कार कर लेते । किंतु यदि आप दुख की समग्र प्रक्रिया को वस्तुतः समझना चाहते हैं । एक नूतन मानव की तरह । एक 


नए खिले इंसान की की तरह । पलायन नहीं । बल्कि जांच परख करते हुए । तब आप स्वयं को दुख से मुक्त कर लेंगे । तब आप खोज लें कि - यथार्थ क्या है ? ईश्वर क्या है ? पर जो मनुष्य दुख से गृस्त है । वह ईश्वर अथवा यथार्थ को नहीं खोज पाता । यथार्थ को तभी खोजा या पाया जा सकता है । जब दुख का अंत हो जाता है । जब प्रसन्नता विद्यमान होती है । तुलना की जा सकने वाली विषमता के रूप में नहीं । विपरीत के रूप में नहीं । अपितु वह तो एक ऐसी अवस्था है । जिसमें विपरीत है ही नहीं ।
अतः अज्ञात वह ? जिसकी सृष्टि मन ने नहीं की है । मन द्वारा प्रतिपादित । सूत्र बद्ध नहीं किया जा सकता । वह जो कि अज्ञात है । उसके बारे में सोचा नहीं जा सकता । जिस क्षण आप अज्ञात के विषय में सोचने लगते हैं । यह ज्ञात ही होता है । निश्चित ही आप अज्ञात के विषय में विचार नहीं कर सकते । कर सकते हैं क्या ? आप विचार केवल ज्ञात के बारे में ही कर सकते हैं । विचार की गति ज्ञात से ज्ञात की ओर ही होती है । और जो ज्ञात है । वह यथार्थ नहीं है । तो जब आप सोचते हैं । और ध्यान करते हैं । जब आप बैठ जाते हैं । और ईश्वर के विषय में विचार करने लगते हैं । तब आप उसी के विषय में विचार कर रहे होते हैं । जो ज्ञात है । वह समय में है । वह समय के जाल में आबद्ध है । अतएव यह यथार्थ नहीं है । यथार्थ केवल तभी अस्तित्व में आ सकता है । जब मन समय के जाल से मुक्त हो जाता है । जब मन सृजन करना बंद कर देता है । तब सर्जन होता है । तात्पर्य यह है कि - मन का पूर्ण रूपेण स्थिर होना । निश्चल होना जरूरी है ? लेकिन वह उकसाई तथा सम्मोहन जन्य स्थिरता नहीं होनी चाहिए । वह तो मात्र एक परिणाम ही होगी । यथार्थ का अनुभव करने के लिए स्थिर बनने की कोशिश करना । पलायन का ही एक और रूप है । शांति स्थिरता तभी होती है । जब सारी समस्याएं समाप्त हो चुकी होती हैं । जैसे हवा के थमने पर सरोवर शांति हो जाता है । वैसे ही मन स्वाभाविक रूप से मौन शांत हो जाता है । जब बेचैन करने वाला विचारक नहीं रहता । विचार के अंत हेतु । वे सभी विचार जिनका वह निर्माण कर रहा है । सोच लिये जाने जरूरी हैं । विचार का प्रतिरोध करने से । उसके खिलाफ प्रतिरोध खड़े करने से । कुछ होने वाला नहीं है । क्योंकि सभी विचारों को अनुभूत कर लेना । महसूस कर लेना । आवश्यक है ।
जब मन स्थिर प्रशांत होता है । तो यथार्थ । वह अनिर्वचनीय प्रकट होता है । आप इसे निमंत्रित नहीं कर सकते । इसे निमंत्रित करने के लिए तो आपका इसे जानना जरूरी होगा । और जो जाना हुआ है । ज्ञात है । वह यथार्थ नहीं है । अतः यह आवश्यक है कि - मन सरल हो । विश्वासों से । कल्पित धारणाओं से लदा हुआ न हो । और जब स्थिरता होती है । जब कोई इच्छा । कोई ललक नहीं रहती । जब ऐसी स्थिरता सहित जिसे प्रवृत्त नहीं किया गया

है । लादा नहीं गया है । मन खामोश होता है । तब यथार्थ का आगमन होता है । एवं वह सत्य । वह यथार्थ ही एकमात्र रूपांतर कारी तत्व है । केवल यही वह कारक है । जो हमारे अस्तित्व में । हमारे दैनिक जीवन में । एक आधार भूत आमूल क्रांति लाता है । उस यथार्थ को पाने के लिए उसे खोजना नहीं पड़ता । बल्कि उन कारकों को समझ लेना होता है । जो मन को उद्वेलित बेचैन करते रहते हैं । तब मन सरल । मौन । स्थिर होता है । उस स्थिरता में वह अज्ञात । वह अविज्ञेय आविर्भूत होता है । जब ऐसा होता है । तो आशीर्वाद होता है । स्वस्ति होती है ।
मुंबई 8 फरवरी 1948 पुस्तक - ईश्वर क्या है ? पृष्ठ क्रमांक 55-57
जब तक भी कुछ हासिल करने की इच्छा है । कुछ उपलब्धि । कुछ होने की इच्छा है । भले ही वो किसी भी स्तर पर हो । तब तक । तब तक वहाँ पर क्षोभ । गुस्सा । शोक । भय होगा । अमीर होने की आकांक्षा । ये और वो होने की महत्वाकांक्षा । तभी गिर सकती है । जब हम इस शब्द में निहित सड़ांध या महत्वाकांक्षा की भृष्ट प्रकृति को समझ लें । उन क्षणों में जबकि हम देख समझ लेते हैं कि ताकत सत्ता हासिल करने की इच्छा । चाहे वो किसी भी रूप में हो । चाहे वो प्रधानमंत्री बन जाने की हो । या जज । या कोई पुजारी । या धर्म गुरू । हमारी किसी भी प्रकार की शक्ति अर्जित करने की इच्छा । आधार भूत रूप से पैशाचकीय या पाप है । लेकिन हम नहीं देख पाते कि - महत्वाकांक्षा भृष्ट करती है । यह कि शक्ति की ताकत की आकांक्षा वीभत्स है । इसके विपरीत हम कहते हैं कि - हम शक्ति और ताकत को भले काम में लगायेंगे । जो कि निहायत ही बेवकूफाना वक्तव्य है । किसी भी गलत चीज से अंत में कोई सही चीज हासिल नहीं की जा सकती । यदि माध्यम या साधन गलत हैं । तो उनका अंजाम या परिणाम भी गलत ही होंगे । यदि हम सभी महत्वाकांक्षाओं के सम्पूर्ण आशय को । उनके परिणामों । उसके परिणामों के साथ ही मिलने वाले ऐच्छिक अनैच्छिक परिणामों सहित नहीं जानते । समझते हैं । और अन्य इच्छाओं के केवल दमन का प्रयास करते हैं । तो इस बात का कुछ भी अर्थ नहीं है । जे. कृष्णमूर्ति

और इसकी भी कि प्रेम क्या है ?

मौन या निशब्दता अपने आप आती है । जब आप जानते हैं कि - अवलोकन कैसे किया जाता है । मन की शांति सहज ही अपने आप आती है । यह स्वाभाविक रूप से आती है । सुगमता पूर्वक । बिना किसी कोशिश या प्रयास के । यदि आप जानते हैं कि - अवलोकन कैसे किया जाता है ? देखा कैसे जाता है ?
जब आप किसी बादल को देखते हैं । तो उसकी तरफ शब्द रहित और इसलिए बिना किसी विचार के देखें । उसकी तरफ बिना किसी अवलोकन कर्ता के अलगाव के देखें । तब वहां इस देखने के कर्म में ही । एक अवलोकन और अवधान होगा । ना कि संकल्प पूर्वक अवधान पूर्ण होना । लेकिन बस अवधान पूर्वक देखना । तब यह घटना चाहे । क्षण भर । सेकेंड भर । या मिनिट भर रहे । पर्याप्त है । तब लोभ ना करें । या ये ना कहें कि - मुझे ऐसे ही स्थिति में सारा दिन रहना है । अवलोकन कर्ता के बिना देखने का मतलब है । अवलोक्य वस्तु और अवलोकन कर्ता के बीच बिना किसी अंतराल । स्थान के देखना । इसका यह मतलब भी नहीं है कि - हम उस वस्तु के साथ ही खुद को सम्बद्ध । लीन । समायोजित कर लें । जिसकी तरफ देख रहे हैं । लेकिन देखना भर हो जाना ।
तो जब कोई किसी पेड़ की तरफ । या किसी बादल की तरफ देखे । या पानी में पड़ते प्रकाश की तरफ । तो बिना अवलोकन कर्ता बने । और यह भी । जो कि बहुत ही ज्यादा कठिन है । जो कि महान अवधान की मांग करता है । यदि आप अपने आपको ही देखें  । बिना अपनी कोई छवि गढ़े । अपने बारे में कोई निर्णय किये बगैर । क्योंकि - छवि । निर्णय । मत या राय । फैसले । अच्छाईयों । बुराईयां । ये सब अवलोकन कर्ता के इर्द गिर्द केन्द्रित हैं । तब आपको पता चलेगा कि - मन । मस्तिष्क । असामान्य । अप्रत्याशित रूप से शांत है । इस शांति या निस्तब्धता का संवर्धन । या इसे विकसित नहीं किया जा सकता । यह बस होती है । यह तब होती है । जब आप अवधान पूर्ण होते हैं । यदि आप हर वक्त हर समय देखते रहने । अवलोकन करने में सक्षम होते हैं । अपने हाव भाव को देखना ।

अपने शब्दों को देखना । अपने अहसासों अनुभवों को देखना । अपने चेहरे पर आने जाने वाले भावों को महसूसना । और वह सब जो आप हैं ।
क्या यह संभव है कि - हम खुद को डर से पूरी तरह मुक्त कर लें ? किसी भी तरह के डर से । क्योंकि भय किसी भी तरह का हो । भृम पैदा करता है । यह दिमाग को कुंद बनाता है । खोखला करता है । जहां भी डर होगा । निश्चित ही वहां आजादी नहीं हो सकती । मुक्तता नहीं हो सकती । और जहां स्वतंत्रता नहीं होगी । वहां प्रेम भी नहीं हो सकता । हममें से बहुत से लोग किसी ना किसी तरह के भय से गृस्त रहते ही हैं । अंधेरे का भय । लोग क्या कहेंगे ? इस बात का भय । सांप का भय । शारीरिक दुख दर्दों का भय । बुढ़ापे की परेशानियों का भय । मौत का भय । और ऐसे ही सैकड़ों की संख्या में कई तरह के भय हैं । तो क्या ऐसा संभव है कि - हम भय से पूर्णतः मुक्त रहें ?
हम देख सकते हैं कि - हम में से हर आदमी के लिए भय क्या क्या करता है । इसी के कारण कोई झूठ बोलता है । यह आदमी को कई तरह से भृष्ट करता है । यह बुद्धि को उथला । और खोखला बना देता है । तो हमारे मन में कई अंधेरे कोने होते हैं । जिनकी तब तक खोज और उनका उदघाटन नहीं हो पाता । जब तक कि हम डरें । शारीरिक सुरक्षा । एक जहरीले सांप से खुद को दूर रखने की एक स्वाभाविक वृत्ति । किसी ऊंची चट्टान के ऊपर खड़े होने से बचना । या ट्रेन के सामने आने से बचना । एक स्वाभाविक सहज स्वस्थ बचाव है । लेकिन हम उस डर की बात कर रहे हैं । जो मनोवैज्ञानिक आत्म रक्षण है । जो कि एक आदमी को बीमारियों से । मौत से । और दुश्मन से डराता है । हम जब भी किसी भी रूप में पूर्णता की तलाश में रहते हैं । वह चाहे चित्र कला हो । संगीत हो । किन्हीं तरह के रिश्ते हों । या आप जो भी होना चाहें । वहां हमेशा भय होता है । तो बहुत ही महत्वपूर्ण क्या है ? यह कि हम भय कि इस सारी प्रक्रिया के प्रति खुद को जागरूक रखें । भय का अवलोकन करके । इसके बारे में सीख कर । और यह ना कहें कि - इसको कैसे दबायें । कुचलें ? जब हम भय को दबाने या कुचलने की बात करते हैं । तो हम फिर इससे पलायन के रास्तों पर चलने लगते हैं । और भय से पलायन करने से तो । भय से मुक्ति नहीं मिलती ।
रिश्तों को समझने के लिए आवश्यक रूप से एक निष्क्रिय अप्रतिरोधात्मक धैर्य होना चाहिए । जो रिश्तों को नष्ट ना करता हो । इसके विपरीत यह धैर्य रिश्तों को और जीवन्त और सार्थक बनाता है । तब उस रिश्ते में वास्तविक

लगाव की संभावना होती है । उसमें उष्णता होती है । निकटता का अहसास होता है । जो कि केवल निरी भावुकता और रोमांच नहीं होता । यदि हम ऐसे रिश्ते तक पहुंच सकते हैं । या सारी चीजों । सारी बातों । सारे अस्तित्व के साथ हम ऐसे ही रिश्ते में हैं । तो हमारी समस्या सहज ही हल हो जायेगी । चाहे वह सम्पत्ति की समस्या हो । चाहे वह किसी आधिपत्य की समस्या हो । क्योंकि हम वही हैं । हम जिन जिस पर आधिपत्य चाहते हैं । वह व्यक्ति जो धन पर आधिपत्य चाहता है । उसका जीवन धन ही है । जो संपत्ति । या जमीन जायदाद । फर्नीचर आदि पर कब्जे करना चाहता है । उसका जीवन किसी संपत्ति की तरह ही है । ऐसा ही संकल्पनाओं विचारों के साथ भी है । या लोगो कें साथ भी । और जब भी जहां पर आधिपत्य शाली होना चाहा जाता है । वहां रिश्ता नहीं होता । लेकिन हम में से बहुत से लोग आधिपत्य चाहते हैं । क्योंकि हमें तभी लगता है कि - हम कुछ हैं । यदि हमारा किसी चीज पर कब्जा ही ना हो । तो लगता ही नहीं कि हम कुछ हैं ।
अगर हमारे आधिपत्य में कुछ ना हो । यदि हम अपने जीवन को फर्नीचर । संगीत । ज्ञान और यह और वह से नहीं भर लेते । तो हम खुद को खोखले घोंघे सा अनुभव करते हैं । यह खोखलापन बहुत ही शोर पैदा करता है । इस शोर को ही हम जीना कहते हैं ? और यही है । जिससे हम संतुष्ट भी रहते हैं । अगर इस सब में किसी तरह का व्यवधान पड़ता है । यह चक्र टूटता है । तब वहां पर हम दुख होता है । क्योंकि तब वहां पर अचानक ही आप अपनी नग्नता को देख पाते हैं । वह देख पाते हैं । जो कि आप असलियत में । हकीकत में हैं । बिना किसी मतलब का । एक खोखला घोंघापन ।
तो रिश्तों के इस सारे बुनाव के प्रति होश वान होना ही । धैर्य पूर्ण या विधेयात्मक कर्म है । इसी कर्म से वास्तविक संबंधों की संभावना बनती है । एक संभावना बनती है । रिश्तों की अतल गहराईयों की । सार्थकता की खोज की । और इसकी भी कि प्रेम क्या है ?

जब आप किसी चीज को नाम देते हैं । तो आपके नाम करण की यह क्रिया । यह शब्द आपको अवलोकन से विकर्षित करता है । भटकाता है । आपके अवलोकन को दोष पूर्ण बनाता है । जब आप शब्द बरगद का प्रयोग करते हैं । तो आप किसी वृक्ष को उस शब्द के माध्यम से देखते हैं । ना कि उस वृक्ष की वास्तविकता को । आप उस वृक्ष को उस छवि के माध्यम से देखते हैं । जो आपने उस वृक्ष के बारे में बनाई हुई है । तो यह छवि दृष्टि को बाधित करती है । इसी तरह यदि आप अपने को ही देखने की कोशिश करें । बिना अपनी कोई छवि बनाये । तो 


यह बड़ा ही अजीब । और गहरे में विक्षुब्ध करने वाला होता है । जब आप गुस्से में । जब ईर्ष्या में हों । तो इन अहसासों को बिना किसी अच्छी या बुरी श्रेणी में रखे । बिना किसी अहसास का नामकरण किये देंखे । क्योंकि जब आप इस अहसास को किसी अच्छी या बुरी श्रेणी में डालते हैं । या इसे नाम देते हैं । तो आप आप वर्तमान के किसी क्षण को अतीत की स्मृतियों के माध्यम से देखते हैं । मुझे नहीं पता । आपको यह सब समझ में आ रहा है । या नहीं । कहने का तात्पर्य यह है कि - किसी अहसास के वर्तमान में सामने आने पर । आप यथार्थतः किसी अहसास को - जैसा वो है । वैसा ना देखकर । जब उसी तरह का कोई अन्य अहसास अतीत में पैदा हुआ था । उस अहसास के बारे में अपनी इकट्ठा की गई स्मृतियों । उस अहसास के बारे में । जो आपने जो कभी पढ़ा । सुना । लिखा । देखा है । उनके माध्यम से देखते हैं । साक्षात अवलोकन तब होता है । जब अवलोकन अतीत के माध्यम से नहीं हो रहा । इसी क्षण को इसी क्षण में देखा जा रहा हो । जे. कृष्ण्मूर्ति

प्रश्न है कि जीवन में आपका ध्येय क्या हो ?

आप इसलिए है । क्योंकि आपके माता पिता ने आपको जन्म दिया है । और आप भारत के ही नहीं । विश्व की सम्पूर्ण मानवता के । शताब्दियों के विकास का परिणाम हैं । आप किसी असाधारण अनूठेपन से नहीं जनमें हैं । बल्कि आपके साथ पंरपरा की पूरी पृष्ठ भूमि है । आप हिन्दू या मुस्लिम हैं । आप पर्यावरण । वातावरण । खान पान । सामाजिक । और सांस्कृतिक परिवेशों । और आर्थिक दबावों से उपजे हैं । आप अनेकों शताब्दियों का । समय का । द्वंद्वों का । दर्दों का । खुशियों का । और लगाव । चाव का परिणाम हैं । आपमें से हर कोई जब यह कहता है कि - वह एक आत्मा है । जब आप कहते हैं कि - आप शुद्ध ब्राह्मण हैं । तो आप केवल परंपरा का । किसी संकल्पना का । किसी संस्कृति । भारत की विरासत । भारत की सदियों से चली आ रही विरासत । का ही अनुकरण कर रहे होते हैं ।
प्रश्न है कि - जीवन में आपका ध्येय क्या हो ? तो पहले तो आपको अपनी पृष्ठ भूमि को समझना होगा । यदि आप परम्परा । संस्कृति को । समूचे परिदृश्य को । नहीं समझते । तो आप अपनी पृष्ठ भूमि से उपजे किसी आयडिये । मिथ्या अर्थ को मान लेंगें । और उसे ही अपने जीवन का ध्येय कहने लगेंगे । माना कि आप हिन्दू हैं । और हिन्दू संस्कृति में पले बढ़े हैं । तो आप हिन्दू वाद से उपजे किसी सिद्धांत या भावना को चुन लेंगे । और उसे अपने जीवन का ध्येय बना लेंगे । लेकिन क्या आप किसी अन्य हिन्दू से अलग । पूरी तरह अलग तरह से सोच सकते हैं ? यह जानने के लिए कि - हमारे अंतर्तम की क्या संभावनाएं । या हमारा अंतर्तम क्या गुहार लगा रहा है । क्या कह रहा है ? यह जानने के लिए किसी व्यक्ति को इन सभी बाहरी दबावों से । बाहरी दशाओं से । मुक्त होना ही होगा । यदि मैं किसी चीज की जड़ तक जाना चाहता हूं । तो मुझे यह सब खरपतवार या व्यर्थ की चीजें हटानी होंगी । जिसका

मतलब है । मुझे हिन्दू । मुसलमान । सिख । ईसाई होने से हटना होगा । और यहां भय भी नहीं होना चाहिए । ना ही कोई महत्वाकांक्षा । ना ही कोई चाह । तब मैं कहीं गहरे तक पैठ सकता हूं । और जान सकता हूं कि - हकीकत में यथार्थ संभावना जनक, या सार्थक क्या है । लेकिन इन सबको हटाये बिना - मैं जीवन में सार्थक क्या है ? इसका अंदाजा नहीं लगा सकता । ऐसा करना मुझे केवल भृम और दार्शनिक अटकल बाजियों में ही ले जायेगा ।
तो यह सब कैसे होगा ? पहले तो हमें सदियों से जमी धूल को हटाना होगा । जो कि बहुत आसान नहीं है । इसके लिए गहरी अंतर दृष्टि की जरूरत है । इसमें आपकी गहरी रूचि होनी चाहिए । संस्कारों का निर्मूलन । परंपराओं । अंधविश्वासों । सांस्कृतिक प्रभावों । की धूल को हटाने के लिए । खुद को । अपने आपको समझने की आवश्यकता होती है । ना कि किताबों से । या किसी शिक्षक से सीखने की । यही ध्यान है ।
जब मन अपने आपको सारे अतीत की धूल से साफ कर लेता है । मुक्त कर लेता है । तब आप अपने अस्तित्व की सार्थकता के बारे में बात कर सकते हैं । आपने यह प्रश्न किया है । तो अब इस पर आगे बढ़ें । तब तक लगे रहें । जबकि यह ना जान लें कि - क्या कोई ऐसी किसी वास्तविक । मौलिक । अभृष्ट चीज है भी ? यह ना कहें कि - हां ! वाकई ऐस कुछ है । या ऐसा कुछ नहीं होता । बस इस पर काम करना जारी रखें । तलाशने । पाने । जानने की कोशिश ना करें । क्योंकि आप जान नहीं पायेंगे । एक ऐसा मन जो भृष्ट है । वो उस चीज को कैसे जान सकता है ? जो कि शुद्ध है । भृष्ट नहीं है । क्या मन खुद को साफ शुद्ध कर सकता है ? हां कर सकता है । और यदि मन अपने 


आपको शुद्ध साफ कर सकता है । तब आप देख सकते हैं । तब आप जान सकते हैं । पता लगा सकते हैं । मन का परिष्करण शुद्धि करण ध्यान है ।
प्रश्‍़न - मेरे जैसा आम आदमी ज्यादातर अपनी तात्कालिक समस्याओं जैसे अभाव । बेरोजगारी । बीमारी । द्वंद्व आदि में ही घिरा रहता है । तो जीवन की गहरे मुद्दों की ओर - मैं कैसे ध्यान दे सकता हूं ? हम सभी लोग आपदाओं से तत्कालिक राहत पाने के उपाय ढूंढते रहते हैं ।
उत्‍तर - हम सभी अपनी समस्याओं के त्वरित समाधान चाहते हैं । हम सभी आम जन हैं । भले ही हम सामाजिक या धार्मिक रूप से कितने ही उच्च पद पर आसीन हों । हमारी रोजाना की आम जिन्दगी में यही छोटी छोटी परेशानियां रहती हैं - जलन । गुस्सा । हमें कोई प्यार नहीं करता । इस बात का दुख । और अगर प्यार किया जा रहा है । तो उसका अपार आनन्द । यदि आप जीवन की इन छोटी छोटी चीजों को समझ सकें । तो आप इनमें अपने दिल दिमाग के काम करने के ढंग को देख सकेंगें । यह मुद्दा नहीं है कि - आप गृहिणी हैं । और आपको आजीवन दिन में तीन बार खाना बनाना है । पति की दासता में रहना । या पति हैं । तो पत्नी की गुलामी करनी है ।
खुशी । गम । विपत्तियों । आशा । निराशा के इन संबंधों को यदि आप बहुत ही सतही स्तर से शुरू करें । तो यदि आप इनका अवलोकन करते हैं । देखते हैं । धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करते हुए । बिना बढ़ाई या निंदा करते हुए । सचेत रहते हुए । बिना कोई फैसला किये । तो आपको मन समस्या में गहरे और गहरे पैठता जाता है । लेकिन यदि आप किसी समस्या विशेष से निजात पाने के पहलू से ही सरोकार रखते हैं । तो आपका मन बहुत ही सतही स्तर पर बना रहता है ।
ईर्ष्या या जलन की समस्या को ही लें । क्योंकि हमारा समाज ईर्ष्या पर ही आधारित है । ईर्ष्या है - अर्जित करना ।

लोभ । आपके पास कुछ है । मेरे पास नहीं है । आप कुछ हैं । मैं कुछ भी नहीं हूं । और मैं कुछ होने के लिए आपसे प्रतिस्पर्धा करता हूं । आपके पास अधिक ज्ञान है । अधिक धन दौलत है । अधिक अनुभव है । मेरे पास नहीं है । तो इस प्रकार यह चिर स्थायी संघर्ष बना रहता है । आप हमेशा आगे ही आगे बढ़ते चले जाते हैं । और मैं हमेशा नीचे की ओर धंसता गिरता चला जाता हूं । आप गुरू हैं । और मैं शिष्य हूं । या अनुयायी हूं । और आपके और मेरे बीच गहरी खाई है । आप हमेशा आगे हैं । और मैं हमेशा पीछे । यदि हम देख सकें । तो इस सभी संघर्षों के । इन सभी कोशिशों के । इन सभी दुख पीड़ाओं के । इन छोटी मोटी बीमारियों के । और रोजाना की अन्य कई छोटी छोटी बातों के । असंख्य निहितार्थ हैं ।
आपको वेद । पुराणों । किताबों को पढ़ने की कतई आवश्यकता नहीं है । आप इन सबको एक तरफ रख दें । इनका कोई महत्व नहीं हैं ? महत्वपूर्ण यह बात है कि - आप अपने जीवन की इन छोटी छोटी बातों को उनकी वास्तविकता में देखें । उनसे सीधे सीधे साक्षात्कार करें । तो यही चीजें आपको अपने अंतर निहित तथ्यों से भिन्न रूप से साक्षात्कार करायेंगी ।
आखिरकार जब आप किसी वृक्ष का सौन्दर्य देखते हैं । उड़ती हुई चिडि़या देखते हैं । सूर्यास्त या लहराता हुआ जल देखते हैं । तो ये सब आपको बहुत कुछ बताते हैं । और जब आप जीवन की कुरूप चीजें देखें । धूल । गंदगी । निराशा । अत्याचार । भय को  तो ये सब भी विचार की मूलभूत प्रक्रिया से परिचित कराते हैं । यदि मन केवल पलायन से ही सरोकार रखता है । किसी राम बाण उपाय की तलाश में रहता है । सभी सम्बंधों के अन्वेषण से बचना चाहता है । तो हम इन सबके प्रति कदापि सचेत नहीं हो सकते । दुर्भाग्य से हमारे पास धैर्य नहीं है । हम त्वरित जवाब चाहते है । समाधान चाहते हैं । हमारा मन समस्या के प्रति बहुत ही बेसब्र है । अधैर्य पूर्ण है ।
लेकिन यदि मन समस्या का अवलोकन करने में सक्षम हो सके । उससे दूर ना भागे । उसके साथ जी सके । तब यही समस्या उसके सामने अपने सारे अदभुत गुण धर्मों को खोलती चली जायेगी ।  मन समस्या की गहराई तक जा सकेगा । तो मन कोई ऐसी चीज नहीं रह जायेगा । जो परिस्थितियों । समस्याओं । विपत्तियों द्वारा परेशान हो जाये । तब मन जल से आपूरित एक शांत स्निग्ध ताल की तरह हो जायेगा । और केवल ऐसा ही मन निश्चलता और शांति में सक्षम हो सकता है ।
भीतर अचेतन में अतीत का जबरदस्त जोर रहता है । जो आपको एक विशेष दिशा में धकेलता है । अब कोई कैसे इस सब को एकबारगी ही पोंछ दे । कैसे अचेतन से अतीत को तुरन्त ही साफ किया जाये ? विश्लेषक सोचता है कि - विश्लेषण द्वारा । जाँच पड़ताल करके । इसके घटकों को तलाश करके । स्वीकार करके । या सपनों की व्याख्या इत्यादि करके । अचेतन को थोड़ा थोड़ा करके । टुकड़ों में । या यहां तक कि - पूरी तरह साफ किया जा सकता है । ताकि हम कम से कम सामान्य आदमी रहें । ताकि हम अपने आपको निवर्तमान माहौल के हिसाब के अनुकूल बना सकें । लेकिन विश्लेषण में सदैव एक विश्लेषण कर्ता होता है । और एक विश्लेषण । या परिणाम । एक अवलोकन कर्ता जो कि अवलोकन की जाने वाली चीजों की व्याख्या करता है । यह ही द्वैत है । जो कि द्वंद्व का स्रोत है ।
तो अचेतन का विश्लेषण मात्र कहीं नहीं पहुंचा पाता । हो सकता है कि - यह हमारा पागलपन कम करे । अपनी पत्नि या पड़ोसी के प्रति कुछ विनमृ बना दे । या इसी तरह की कुछ बातें । लेकिन ये वो चीज नहीं । जिस बारे में हम बात कर रहे हैं । हम देखते हैं कि - विश्लेषण प्रक्रिया जिसमें कि समय । व्याख्या । और विचारों की सक्रियता शामिल है । एक अवलोकन कर्ता के रूप में । जो कि किसी चीज का विश्लेषण कर देख रहा है । यह सब अचेतन को मुक्त नहीं करता । इसलिए मैं विश्लेषण प्रक्रिया को पूरी तरह से अस्वीकार करता हूँ । जिस क्षण मैं यह तथ्य देखता हूं कि - विश्लेषण किन्हीं भी परिस्थितियों में अचेतन का बोझ नहीं हटा सकता । मैं विश्लेषण से बाहर हो जाता हूँ । मैं अब विश्लेषण नहीं करता । तो क्या होता है ? क्योंकि अब कोई भी विश्लेषण कर्ता उस चीज से अलग नहीं है । जिसका कि विश्लेषण किया जा रहा है । वह वही चीज है । वो उससे ( विश्लेषण से ) भिन्न कोई अस्तित्व नहीं है । तब कोई भी देख सकता है कि - अचेतन बहुत ही कम महत्व का है । जे. कृष्णमूर्ति

क्या मौत के बाद कुछ बचता है ?

मुझे नहीं लगता कि - कोई सरल मार्ग है । क्योंकि ईश्वर को पाना । अत्यंत कठिन । अत्यधिक श्रम साध्य बात है । जिसे हम ईश्वर कहते हैं ? क्या मन ही ने उसका निर्माण नहीं किया है ? आप जानते ही हैं कि - मन क्या होता है ? मन समय का परिणाम है । और यह कुछ भी । किसी भी । भ्रांति को निर्मित कर सकता है । धारणाओं को बुनने । तथा रंगीनियों । और कल्पनाओं में अपना प्रक्षेपण करने की शक्ति इसके पास है । यह निरन्तर संचय काट छांट और चयन करता रहता है । संकीर्ण सीमित तथा पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने के कारण । यह अपनी सीमाओं के अनुसार ईश्वर की कल्पना कर सकता है । उसकी छवि बना सकता है । चूंकि कुछ खास शिक्षकों  पुरोहितों तथा तथाकथित उद्धार कर्ताओं ने कह रखा है कि - ईश्वर है ? और उसका वर्णन भी कर दिया है । इसलिए उसी शब्दावली में मन ईश्वर की कल्पना तो कर सकता है । लेकिन वह कल्पना । वह छवि ईश्वर नहीं है । ईश्वर का अन्वेषण मन द्वारा नहीं किया जा सकता ।
ईश्वर को समझने के लिए पहले आपको अपने मन को समझना होगा । जो बहुत कठिन है । मन बहुत पेचीदा है । और इसे समझना सरल नहीं है । बैठे बैठे किसी प्रकार के सपने में खो जाना । विविध दिव्य दृश्यों । तथा भ्रांतियों में लीन हो जाना । और यह सोचने लगना कि - आप ईश्वर के बहुत करीब आ गये हैं । यह सब तो काफी सरल है । मन अपने साथ अतिशय छल कर सकता है । अतः जिसे ईश्वर कहा जा सकता है ? उसका अनुभव करने के लिए आपको पूर्णतः शांत होना होगा । और क्या आपको यह मालूम नहीं है कि - यह कितना अधिक कठिन है ? क्या आपने ध्यान दिया है कि - वयस्क लोग कभी भी शांत नहीं बैठ पाते हैं । वे किस तरह बेचैन रहते हैं । पैर हिलाते

रहते हैं । हाथों को डुलाते रहते हैं ? शारीरिक रूप से ही निश्चल बैठ पाना कितना दुसाध्य है । मन का निश्चल होना । तो और भी कितना ज्यादा मुश्किल है ? आप किसी गुरू का अनुगमन कर सकते हैं । और अपने मन को शांत होने के लिए बाध्य कर सकते हैं ? पर आपका मन वस्तुतः शांत नहीं होता । यह अब भी बेचैन होता है । जैसे किसी बच्चे को कोने में खड़ा कर दिया गया हो । बिना किसी जोर जबरदस्ती के पूर्णतः मौन होना । एक महान कला हैं । केवल तभी उसकी अनुभूति हो पाने की संभावना होती है । जिसे ईश्वर कहा जा सकता है ?
क्या मृत्यु के बाद भी कुछ बचता है ? जब एक आदमी दुख से भरा हुआ । मोह गृस्त और खेदजनक स्थितियों में मरता है । तो क्या बचता है ?
क्या असली प्रश्न यह नहीं है कि - क्या मौत के बाद । कुछ बचता है ? जब आपका कोई करीबी मर जाता है । तो आप कितना सयापा करते हैं ? क्या आपने इस पर कभी गौर किया ? सब आपके साथ रोते हैं । जब अपने भारत देश में कोई मर जाता है । तो जितना शोक संताप किया जाता है । ऐसा सारी दुनियां में कहीं नहीं होता । आइये इसे गहराई में जाने ।
सबसे पहले तो क्या आप देख सकते हैं । क्या आप हकीकतन महसूस कर सकते हैं कि - आपकी चेतना ही सारी मानवता की चेतना है ? क्या आप ऐसा महसूस कर सकते हैं ? क्या यह आपके लिए एक तथ्य की तरह है ? क्या यह आपके लिए यह उसी तरह तथ्य है । जैसे कि कोई आप आपके हाथ में सुई चुभोए । और आप उसका दर्द महसूस करें ? क्या यह इसी तरह वास्तविक है ?
मानव मस्तिष्क का विकास समय में हुआ है । और यह करोड़ों वर्षों के विकास का परिणाम है । यह मस्तिष्क एक विशेष ढांचे में बद्ध हो सकता है । यदि कोई व्यक्ति दुनियां के किसी विशेष भाग में । एक संस्कृति और परिवेश में रह रहा हो । तो भी यह एक सामान्य आम मानव चेतना युक्त मस्तिष्क ही होता है । इस बारे में आप पूर्णतः आश्वस्त रहें । यह आपका व्यक्तिगत मस्तिष्क नहीं होता । यह सामान्य चेतना होती है । मस्तिष्क को पैतृक रूप से या विरासत में बहुत सारी प्रतिक्रियाएं मिली होती हैं । और यह दिमाग अपने जींस ( गुण सूत्रों )

सहित । जिनमें कुछ पैतृक होते हैं । कुछ समय में विकसित । इसमें मानवीय चेतना सामान्य घटक होती है । इस तरह यह मात्र आपका ही मस्तिष्क नहीं होता । यह सम्पूर्ण मानवीय चेतना भी होता है । विचार यह कह सकता है कि - यह मेरा दिमाग है । विचार यह कह सकता है कि - मैं एक व्यक्ति हूं । यही हमारा ढांचा बद्ध । सांचा बद्ध । या बद्ध होना है । यही बंधन है । क्या आप सारी मानवीय चेतना से हटकर एक व्यक्ति हैं ? इसे जरा गहराई में जाकर देखें । आपका एक अलग नाम हो सकता है । एक रूप हो सकता है । एक अलग चेहरा हो सकता है । आप नाटे लम्बे या गोरे काले इत्यादि हो सकते हैं । क्या इससे ही आप एक सारी मानवीय चेतना से अलग व्यक्ति हो जाते हैं ? क्या यदि आप किसी विशेष प्रकार के समूह या समुदाय या देश के हैं । तो इससे आप अलग हो जाते हैं । या एक अलग व्यक्ति बन जाते हैं ?
तो वैयक्तिक्ता क्या है ? एक व्यक्ति वह होता है । जो खंडित नहीं है । बंटा हुआ नहीं है । मानव चेतना से विलग नहीं है ।
जब तक आप सब खंडित हैं । तक एक व्यक्ति नहीं हो सकते । यह एक तथ्य है । जब तक यह तथ्य आपके खून में नहीं बहने लगता । आप एक व्यक्ति नहीं हो सकते । भले ही आप अपने बारे में यह खयाल रखते हों कि - आप एक व्यक्ति हैं । तो भी यह महज आपका विचार ही होगा । विचार ही सारी मानव जाति में आम चीज है । जो अनुभव । ज्ञान । स्मृति पर आधारित होती है । और दिमाग में स्टोर हुई रहती है । मस्तिष्क या दिमाग सारी संवेदनों का केन्द्र होता है । जो सारी मानव जाति में आम है । यह सब तर्क संगत है । तो जब आप कहते हैं कि - मेरे साथ क्या होगा । जब मैं मर जाऊंगा ? तो इसमें ही आपकी रूचि है । इस ” मैं “ में । जो कि मरने वाला है । मैं क्या है ? आपका नाम । आप कैसे दिखते हैं ? आपकी शिक्षा दीक्षा कैसी है ? ज्ञान । कैरियर । पारिवारिक पंरपरा । और धार्मिक संस्कृति । विश्वास । अंधविश्वास । लोभ । महत्वकांक्षा । वह सारी धोखाधडि़यां जो आप कर रहे हैं । आपके आदर्श । यह सब ही तो आपका ” मैं “ है । यह सब ही आपकी व्यक्ति परक चेतना है । यही चेतना सारी मनुष्यता में समान है । क्योंकि वह भी तो लोभी । ईर्ष्यालु । भयभीत । जो सुरक्षा चाहती है । जो अंधविश्वासी है । जो एक तरह के ईश्वर में भरोसा करती है । आप अन्य तरह के । इनमें से कुछ कम्युनिस्ट है । कुछ समाजवादी । कुछ पूंजीवादी । यह सब उसी का एक हिस्सा हैं । इन सबमें यह एक सामान्य घटक है कि - आप ही सारी शेष मानवता हैं । आप सहमत होते हैं । आप कहते हैं कि - ठीक है । यह तो पूरी तरह सही है । लेकिन तो भी आप एक व्यक्ति । एक व्यक्तित्व की तरह बर्ताव करते हैं । यही वह बात है । जो बहुत ही भद्दी है । बहुत ही पाखंड पूर्ण है ।


तो अब । वह क्या है । जो मर जाता है ? यदि मेरी चेतना ही सारी मानव जाति की चेतना है । यह बदल जाती है । जो कि मैं सोचता हूं कि - मैं हूं ? तो मेरे मरने पर क्या होगा ? मेरी देह का मृत्यु संस्कार कर दिया जायेगा । या हो सकता है । यह अचानक ही किसी दुर्घटना वश नष्ट हो जाये । तो क्या होगा ? यह आम चेतना चली जायेगी । मुझे नहीं मालूम कि - आप इसे महसूस कर पा रहे हैं । या नहीं ? जब सच को इस तरह देख लिया जाता है । तो मृत्यु का बहुत ही तुच्छ अर्थ रह जाता है । तब मृत्यु का भय नहीं रहता । मृत्यु का भय तब तक ही रहता है । जब तक कि हम खुद को मानवता से अलग व्यक्ति या व्यक्तित्व मानते हैं । जो कि परंपरा है । जिस परपंरा में हमारे दिमाग को एक कम्प्यूटर की तरह प्रोग्राम्ड किया जाता है । यह फीड किया जाता है कि - मैं एक अलग व्यक्ति हूं । मैं एक अलग व्यक्ति हूं । मैं विशेष तरह के ईश्वर को मानता हूं । मैं यह मानता हूं । मैं वह मानता हूं आदि आदि ।
इस सबमें आप एक तथ्य और भूल रहे हैं । वह है - प्रेम । प्रेम मृत्यु को नहीं जानता । करूणा मृत्यु को नहीं जानती । तो वही व्यक्ति जिसे प्रेम का कुछ पता नहीं । जो प्रेम नहीं करता । जिसमें करूणा नहीं है । वही मृत्यु से भयभीत होता है । तो आप कहेंगे कि - मैं प्रेम कैसे करूं ? मुझमें करूणा कैसे आये ? जैसे कि ये सब बाजार से खरीदा जा सकता हो । लेकिन यदि आप देखें । अगर आप महसूस कर सकें कि - प्रेम ही ऐसी चीज है । जिसकी मृत्यु नहीं है । यही असली बुद्धत्व है । जागृति है । यह किसी भी ज्ञान । शब्दों की जुगाली या बौद्धिक अलंकरण से परे की चीज है ।
चेतना की परिधि में की गई कोई भी प्रगति मात्र आत्म विकास है । और आत्म विकास का अर्थ है । दुख के मार्ग पर ही बढ़ते जाना । उसका अंत करना नहीं । यदि आप इसे ध्यान पूर्वक देखें । तो यह बात स्पष्ट हो जायेगी । यदि मन का वास्ता सम्पूर्ण दुख से मुक्त होने से है । तो फिर मन को करना क्या होगा ? पता नहीं आपने कभी इस समस्या पर विचार किया है । या नहीं ? परन्तु कृपया इस पर अब विचार कर लें ।
हम दुख उठाते हैं । हैं न ? हम केवल शारीरिक बीमारियों और अस्वस्थता से ही दुखी नहीं रहते । बल्कि अपने अकेलेपन और आंतरिक गरीबी के कारण भी दुखी रहते हैं । हम दुखी रहते हैं । क्योंकि हमें कोई प्रेम नहीं करता । जब हम किसी को प्रेम करते हैं । और जवाब में प्रेम नहीं मिलता । तो हम दुखी हो जाते हैं । हर तरह से । सोचने का अर्थ ही है । दुख से भर जाना । अतः हमें लगता है कि - सोचने का क्या लाभ ? इसलिए हम किसी विश्वास को थाम लेते हैं । और फिर उसी से बंधकर रह जाते हैं । उसी को हम धर्म कह देते हैं । यदि मन देख पाए कि कृमशः प्रगति व आत्म सुधार द्वारा दुख का अंत संभव नहीं है । तो फिर मन करे क्या ? क्या मन इस चेतना के पार जा सकता है ? तरह तरह की इन व्यग्रताओं और विरोधाभासी इच्छाओं के पार ? और क्या उस पार जाने में समय समय लगेगा ? कृपया इसे समझिये । केवल शाब्दिक रूप से नहीं । बल्कि वस्तुतः । वास्तविक रूप में । यदि यह समय का मामला है । तो आप पुनः उस घेरे में आ जाते हैं । जिसे प्रगति कहते हैं । क्या आप यह देख पा रहे हैं ? चेतना की परिधि में । किसी भी दिशा में उठाया गया कदम । आत्म विकास ही होता है ? और इसलिए वहां दुख की निरंतरता बनी रहती है । दुख को नियंत्रित व अनुशासित किया जा सकता है । उसका दमन किया जा सकता है । उसे युक्ति संगत तथा अत्यंत परिष्कृत बनाया जा सकता है । परन्तु दुख की अन्तर निहित प्रबलता तब भी बनी रहती है । और दुख से मुक्त होने के लिए । उसकी इस प्रबलता से । इसके बीज मैं से । अहं से । कुछ बनने । होने के । इस सम्पूर्ण प्रकृम से मुक्त होना ही होगा । पार जाने के लिए इस प्रक्रिया पर विराम लगना आवश्यक है ।
अभिमान । स्वाभिमान । मैं । अहं । इगो । घमण्ड । होमी । आत्म । स्व आदि शब्द पर्यायवाची हैं । बचपन । जवानी हो । या बुढ़ापा । जब कभी भी । जिस भी उमृ में । हम अपने बारे में सोचने समझने लगते हैं । तो उमृ के साथ ही हम चाहे अनचाहे अपना व्यक्तित्व बनाने लगते हैं । विभिन्न तत्वों को जोड घटाकर । उनका सामंजस्य कर । हम अपने व्यक्ति को गढ़ने लगते हैं । व्यक्ति अपनी रूचि अरूचि अनुसार । विभिन्न तरह के लक्षण अपना लेता है । व्यक्तित्व के लिए अंग्रेजी में शब्द है - पर्सोनेलिटी । इसमें पर्सोना शब्द का हिन्दी अर्थ होता है - मुखौटा । हम अपना एक ऐसा मुखौटा गढ़ते हैं । जैसा कि हम समाज को दिखना चाहते हैं । इसी तरह हम खुद स्वयं के लिए । और विभिन्न संबंधों के लिए भी । अलग अलग या विभिन्न चीजों को जोड़कर मुखौटे बनाते हैं । समाज हमें और हम समाज के प्रत्येक व्यक्ति को इन्हीं मुखौटों की सच्ची झूठी हकीकतों से पहचानते हैं । समाज में इसे किसी व्यक्ति के लक्षणों के रूप में जाना जाता है । और तद अनुसार भला । बुरा । नगण्य । घमंडी । गंदा । बुद्धिजीवी । स्वार्थी आदि की सामान्य प्रतिक्रियाएं देता है । विशिष्ट लक्षणों को विशिष्ट मान्यताएं देता है । लेकिन किसी भी मुखौटे को गढ़ना । यानि अहं को गढ़ना है । अपने मूल अस्तित्व से भिन्न । एक कृत्रिम चीज गढ़ना है ।
आत्म विकास का अर्थ - अहं का विकास ही है । हम अपने बारे में जो भी भला बुरा सोचकर । योजना बनाकर । जानबूझ कर । जो आदर्शों के लक्ष्य स्थापित कर । प्रगति की सीढि़यां बनाते हैं । इनसे हम दुख के मार्ग पर ही चलते हैं । क्योंकि तय करके चलेंगे । तो राह में कई रोढ़े आयेंगे । तकलीफें मिलेंगी । दुख होगा । इतना सोच समझकर चलने पर भी दुख खत्म नहीं होता । तो हम अपनी विवेक विचार क्षमता को ही निकम्मा जानकर । सोचने समझने को । एक तरफ रख देते हैं । और किसी विश्वास को पकड़ लेते हैं । किसी किताब । गुरू । या किसी पुरानी से पुरानी सिद्ध चीज । के पीछे लग जाते हैं । और उसमें लिखे की नकल करने लग जाते हैं । उनकी बातों का अंधानुकरण करने लग जाते हैं । लेकिन यह सब भी हम अपने व्यक्तित्व को । अहं को पुष्ट करने के एक तरीके की ही तरह करते हैं । इसमें भी कोई लक्ष्य या आदर्श और फिर उस पर आगे बढ़ने की रास्ते और सीढि़यां होती हैं । इन पर भी दुख रहता ही है ।
कोई दुख है । इसका मतलब है कि - हमारे मौलिक वास्तविक अस्तित्व के अतिरिक्त भी । एक इच्छा या चाह है । और हम उसे पूरा करना चाह रहे हैं । वह पूरी नहीं होती । और दुख होता है । हम अपनी वास्तविकता से इतर विचारों से एक कृत्रिम व्यक्तित्व या आदर्श या लक्ष्य गढ़ते हैं । जो कि असलीयत में अहं होता है । इस लक्ष्य की राह पर चलने से ही दुख होता है । अपने मूल स्वरूप । वास्तविक अस्तित्व के अतिरिक्त खुद को किसी भी अन्य कृत्रिम रूप में जानने । पहचानने । उसके बारे में विचार करने में ही दुख का बीज छिपा है । जब हमारे विचार । अपने बारे में कोई कृत्रिम छवि गढ़ते हैं । तो हम दुख का बीज बोते हैं । जब हम अपनी छवि को पालते पोसते हैं । तो दुख को पालते पोसते हैं । बढ़ा करते हैं ।
इसी कुछ होने बनने की चाह । और तद अनुसार कोशिश करने । और इसमें होने वाले दुख के कुचक्र से निकलने के लिए । हम क्या कर सकते हैं ? अपनी चेतना के इस आयाम से पार होने के लिए । हम क्या कर सकते हैं ?
आत्म विकास । अहं का विकास करने । आदर्श । लक्ष्य बनाकर चलने । दुनियां के हिसाब से चलने की कोशिश में हम दुख से निजात नहीं पा सकते । इससे तो किसी ना किसी तरह का दुख मिलेगा ही । हम जैसे कुदरती हैं । मौलिक रूप से हैं । वैसे ही रहें । किसी चीज को कल्पना । विचार । सिद्धांत । या शाब्दिक रूप से समझने की बजाय । उसका साक्षात अवलोकन करें । तो ही उसका यथार्थ समझ आ सकता है । यदि कोई दुख से मुक्त होना चाहता है । तो उसे अहं को बनाने वाली सम्पूर्ण प्रक्रिया से वाकिफ होना होगा । इस अहं निर्माण की प्रक्रिया पर रोक लगानी होगी । अपने अस्तित्व की वास्तविकता में रहना होगा ।  जे. कृष्णमूर्ति

बुधवार, फ़रवरी 15, 2012

संसार रूपी वृक्ष पर चढ़े लोग नरक रूपी सागर में गिरते हैं

अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने । समस्त जगदाधारमूर्तये बृह्मणे नमः ।
जो बृह्म अचिन्त्य । अव्यक्त । तीनों गुणों से रहित ( फिर भी देखने वालों के अज्ञान की उपाधि से ) त्रिगुणात्मक । और समस्त जगत का । अधिष्ठान रूप है । ऐसे बृह्म को नमस्कार हो । 1
सूत सूत महाप्राज्ञ निगमागमपारग । गुरुस्वरूपमस्माकं ब्रूहि सर्वमलापहम ।
ऋषि बोले - हे महा ज्ञानी ! हे वेद वेदांगों के निष्णात ! सूत जी ! सर्व पापों का नाश करने वाले । गुरु का स्वरूप । हमें सुनाओ । 2
यस्य श्रवणमात्रेण देही दुःखाद्विमुच्यते । येन मार्गेण मुनयः सर्वज्ञत्वं प्रपेदिरे ।
यत्प्राप्य न पुनर्याति नरः संसारबन्धनम । तथाविधं परं तत्वं वक्तव्यमधुना त्वया ।
जिसको । सुनने मात्र से । मनुष्य दुख से । विमुक्त हो जाता है । जिस उपाय से । मुनियों ने । सर्वज्ञता प्राप्त की । जिसको प्राप्त करके । मनुष्य फ़िर से । संसार बन्धन में नहीं बँधता । ऐसे परम तत्व का । कथन । आप करें । 3 । 4
गुह्यादगुह्यतमं सारं गुरुगीता विशेषतः । त्वत्प्रसादाच्च श्रोतव्या तत्सर्वं ब्रूहि सूत नः ।
जो तत्व । परम रहस्यमय । एवं श्रेष्ठ सार भूत है । और विशेष कर । जो गुरु गीता है । वह आपकी कृपा से हम सुनना चाहते हैं । सूत जी ! वे सब हमें सुनाइये । 5
इति संप्राथितः सूतो मुनिसंघैर्मुहुर्मुहुः । कुतूहलेन महता प्रोवाच मधुरं वचः ।
इस प्रकार बार बार प्रार्थना किये जाने पर सूत जी बहुत प्रसन्न होकर मुनियों के समूह से मधुर वचन बोले । 6
श्रृणुध्वं मुनयः सर्वे श्रद्धया परया मुदा । वदामि भवरोगघ्नीं गीता मातृस्वरूपिणीम ।
सूत जी बोले - हे मुनि ! संसार रूपी रोग का । नाश करने वाली । मातृ स्वरूपिणी ( माता के समान ध्यान रखने वाली ) गुरु गीता कहता हूँ । उसको आप । अत्यंत श्रद्धा और प्रसन्नता से सुनिये । 7
पुरा कैलासशिखरे सिद्धगन्धर्वसेविते । तत्र कल्पलतापुष्पमन्दिरेऽत्यन्तसुन्दरे ।
व्याघ्राजिने समासिनं शुकादिमुनिवन्दितम । बोधयन्तं परं तत्वं मध्येमुनिगणंक्वचित ।
प्रणम्रवदना शश्वन्नमस्कुर्वन्तमादरात । दृष्टवा विस्मयमापन्ना पार्वती परिपृच्छति ।
प्राचीन काल में । सिद्धों । और गन्धर्वों के । आवास रूप । कैलास पर्वत के । शिखर पर । कल्प वृक्ष के । फूलों से बने हुए । अत्यंत सुन्दर मंदिर में । मुनियों के बीच । व्याघ्र चर्म पर । बैठे हुए । शुक आदि मुनियों द्वारा । वन्दन किये जाने वाले । और परम तत्व का । बोध देते हुए । भगवान शंकर को बार बार नमस्कार करते देखकर । अतिशय नमृ मुख वाली । पार्वती ने आश्चर्य चकित होकर पूछा । 8 । 9 । 10 ।
ॐ नमो देव देवेश परात्पर जगदगुरो । त्वां नमस्कुर्वते भक्त्या सुरासुरनराः सदा ।
पार्वती बोली - हे ॐकार के अर्थ स्वरूप । देवों के देव । श्रेष्ठों के श्रेष्ठ । हे जगद गुरु ! आपको प्रणाम हो । देव । दानव । और मानव । सब आपको । सदा । भक्ति पूर्वक । प्रणाम करते हैं । 11
विधिविष्णुमहेन्द्राद्यैर्वन्द्यः खलु सदा भवान । नमस्करोषि कस्मै त्वं नमस्काराश्रयः किलः ।
आप बृह्मा । विष्णु । इन्द्र । आदि के नमस्कार के योग्य हैं । ऐसे नमस्कार के । आश्रय रूप । होने पर भी । आप किसको नमस्कार करते हैं ? 12
भगवन सर्वधर्मज्ञ व्रतानां व्रतनायकम । ब्रूहि मे कृपया शम्भो गुरुमाहात्म्यमुत्तमम ।
हे भगवन ! हे सर्व धर्मों के ज्ञाता ।  हे शम्भो । जो वृत । सब वृतों में । श्रेष्ठ है । ऐसा उत्तम । गुरु माहात्म्य कृपा करके । मुझे कहें । 13
इति संप्रार्थितः शश्वन्महादेवो महेश्वरः । आनंदभरितः स्वान्ते पार्वतीमिदमब्रवीत ।
इस प्रकार ( पार्वती द्वारा ) बार बार । प्रार्थना किये जाने पर । महादेव ने । अंतर से । खूब प्रसन्न होते हुए पार्वती से इस प्रकार कहा । 14
न वक्तव्यमिदं देवि रहस्यातिरहस्यकम । न कस्यापि पुरा प्रोक्तं त्वद्भक्त्यर्थं वदामि तत ।
महादेव बोले -  हे देवी ! यह तत्व । रहस्यों का भी । रहस्य है । इसलिए कहना उचित नहीं । पहले किसी से भी नहीं कहा । फिर भी । तुम्हारी भक्ति देखकर । वह रहस्य कहता हूँ । 15
मम रूपासि देवि त्वमतस्तत्कथयामि ते । लोकोपकारकः प्रश्नो न केनापि कृतः पुरा ।
हे देवी ! तुम । मेरा ही स्वरूप हो । इसलिए ( यह रहस्य ) तुमको कहता हूँ । तुम्हारा यह प्रश्न । लोक का कल्याण कारक है । ऐसा प्रश्न । पहले कभी । किसी ने नहीं किया । 16
यस्य देवे परा भक्ति, यथा देवे तथा गुरौ । त्स्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ।
जिसको । ईश्वर में । उत्तम भक्ति । होती है । जैसी ईश्वर में । वैसी ही भक्ति । जिसको गुरु में । होती है । ऐसे महात्माओं को ही । यहाँ कही हुई । बात समझ में आयेगी । 17
यो गुरु स शिवः प्रोक्तो, यः शिवः स गुरुस्मृतः । विकल्पं यस्तु कुर्वीत स नरो गुरुतल्पगः ।
जो गुरु हैं । वे ही शिव हैं । जो शिव हैं । वे ही गुरु हैं । दोनों में । जो अन्तर मानता है । वह गुरु पत्नी गमन करने वाले के समान पापी है । 18
वेद्शास्त्रपुराणानि चेतिहासादिकानि च । मंत्रयंत्रविद्यादिनिमोहनोच्चाटनादिकम ।
शैवशाक्तागमादिनि ह्यन्ये च बहवो मताः । अपभृंशाः समस्तानां जीवानां भ्रांतचेतसाम ।
जपस्तपोवृतं तीर्थं यज्ञो दानं तथैव च । गुरु तत्वं अविज्ञाय सर्वं व्यर्थं भवेत प्रिये ।
हे प्रिय ! वेद । शास्त्र । पुराण । इतिहास आदि । मंत्र । यंत्र । मोहन । उच्चाटन आदि । विद्या । शैव । शाक्त । आगम । और अन्य सब । मत मतान्तर । ये सब बातें । गुरु तत्व को । जाने बिना । भ्रान्त चित्त वाले । जीवों को । पथ भृष्ट करने वाली हैं । और जप । तप । वृत । तीर्थ । यज्ञ । दान । ये सब व्यर्थ हो जाते हैं । 19 । 20 । 21
गुरुबुध्यात्मनो नान्यत सत्यं सत्यं वरानने । तल्लभार्थं प्रयत्नस्तु कर्त्तवयशच मनीषिभिः ।
आत्मा में । गुरु बुद्धि के सिवा । अन्य कुछ भी । सत्य नहीं है । सत्य नहीं है । इसलिये । इस आत्म ज्ञान को । प्राप्त करने के लिये । बुद्धिमानों को । प्रयत्न करना चाहिये । 22
गूढाविद्या जगन्माया देहशचाज्ञानसम्भवः । विज्ञानं यत्प्रसादेन गुरुशब्देन कथयते ।
जगत । गूढ़ । अविद्यात्मक । माया रूप है । और शरीर । अज्ञान से । उत्पन्न हुआ है । इनका । विश्लेषणात्मक । ज्ञान । जिनकी कृपा से । होता है । उस ज्ञान को । गुरु कहते हैं । 23
देही बृह्म भवेद्यस्मात त्वत्कृपार्थंवदामि तत । सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादसेवनात ।
जिस गुरु के । पाद सेवन से । मनुष्य सब पापों से । विशुद्धात्मा होकर । बृह्म रूप । हो जाता है । वह तुम पर कृपा करने के लिये कहता हूँ । 24
शोषणं पापपंकस्य दीपनं ज्ञानतेजसः । गुरोः पादोदकं सम्यक संसारार्णवतारकम ।
गुरु का । चरणामृत । पाप रूपी । कीचड़ का । सम्यक । शोषक है । ज्ञान तेज का । सम्यक । उद्यीपक है । और संसार सागर का । सम्यक । तारक है । 25
अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारकम । ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं गुरुपादोदकं पिबेत ।
अज्ञान की । जड़ को । उखाड़ने वाले । अनेक जन्मों के । कर्मों को । निवारने वाले । ज्ञान । और वैराग्य को । सिद्ध करने वाले । गुरु के । चरणामृत का । पान करना चाहिये । 26
स्वदेशिकस्यैव च नामकीर्तनम । भवेदनन्तस्यशिवस्य कीर्तनम ।
स्वदेशिकस्यैव च नामचिन्तनम । भवेदनन्तस्यशिवस्य नामचिन्तनम ।
गुरु के । नाम का । कीर्तन । अनंत स्वरूप । भगवान शिव का । ही कीर्तन है । गुरु के । नाम का । चिंतन । अनंत स्वरूप । भगवान शिव का । ही चिंतन है । 27
काशीक्षेत्रं निवासश्च जाह्नवी चरणोदकम । गुरुर्विश्वेश्वरः साक्षात तारकं बृह्मनिश्चयः ।
गुरु का । निवास स्थान । काशी क्षेत्र है । गुरु का पादोदक गंगा है । गुरु । भगवान विश्वनाथ । और निश्चय ही । साक्षात । तारक बृह्म हैं । 28
गुरुसेवा गया प्रोक्ता देहः स्यादक्षयो वटः । तत्पादं विष्णुपादं स्यात तत्रदत्तमनस्ततम ।
गुरु की । सेवा ही । तीर्थ राज गया है । गुरु का । शरीर अक्षय वट वृक्ष है । गुरु के श्री चरण । भगवान विष्णु के श्री चरण हैं । वहाँ लगाया हुआ । मन तदाकार हो जाता है । 29
गुरुवक्त्रे स्थितं बृह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः । गुरोर्ध्यानं सदा कुर्यात पुरूषं स्वैरिणी यथा ।
बृह्म । गुरु के । मुखारविन्द ( वचनामृत ) में स्थित है । वह बृह्म । उनकी कृपा से । प्राप्त हो जाता है । इसलिये । जिस प्रकार । स्वेच्छा चारी स्त्री । अपने प्रेमी पुरुष का । सदा चिंतन करती है । उसी प्रकार । सदा गुरु का । ध्यान करना चाहिये । 30
स्वाश्रमं च स्वजातिं च स्वकीर्ति पुष्टिवर्धनम । एतत्सर्वं परित्यज्य गुरुमेव समाश्रयेत ।
अपने आश्रम ( बृह्मचर्य श्रम आदि ) जाति । कीर्ति ( पद प्रतिष्ठा )  पालन । पोषण । ये सब छोड़ कर । गुरु का ही । सम्यक । आश्रय लेना चाहिये । 31
गुरुवक्त्रे स्थिता विद्या गुरुभक्त्या च लभ्यते । त्रैलोक्ये स्फ़ुटवक्तारो देवर्षिपितृमानवाः ।
विद्या । गुरु के । मुख में । रहती है । और वह । गुरु की । भक्ति से ही । प्राप्त होती है । यह बात । तीनों लोकों में । देव । ऋषि । पितृ । और मानवों द्वारा । स्पष्ट रूप से । कही गई है । 32
गुकारश्चान्धकारो हि रुकारस्तेज उच्यते । अज्ञानग्रासकं बृह्म गुरुरेव न संशयः ।
गु शब्द का अर्थ है - अंधकार ( अज्ञान ) । और रु शब्द का अर्थ है - प्रकाश ( ज्ञान ) । अज्ञान को नष्ट करने वाला । जो बृह्म रूप । प्रकाश है । वह गुरु है । इसमें कोई संशय नहीं है । 33
गुकारश्चान्धकारस्तु रुकारस्तन्निरोधकृत । अन्धकारविनाशित्वात गुरुरित्यभिधीयते ।
गु कार । अंधकार है । और उसको । दूर करने वाला । रु कार है । अज्ञान रूपी । अन्धकार को । नष्ट करने के कारण ही । गुरु कहलाते हैं । 34
गुकारश्च गुणातीतो रूपातीतो रुकारकः । गुणरूपविहीनत्वात गुरुरित्यभिधीयते ।
गु कार से । गुणातीत । कहा जाता है । रु कार से । रूपातीत । कहा जाता है । गुण और रूप से । परे होने के कारण ही । गुरु कहलाते हैं । 35
गुकारः प्रथमो वर्णो मायादि गुणभासकः । रुकारोऽस्ति परं बृह्म मायाभ्रान्तिविमोचकम ।
गुरु । शब्द का । प्रथम अक्षर । गु । माया आदि । गुणों का । प्रकाशक है । और । दूसरा अक्षर । रु कार । माया की । भ्रान्ति से । मुक्ति देने वाला । परबृह्म है । 36
सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदांबुजम । वेदान्तार्थप्रवक्तारं तस्मात्संपूजयेद गुरुम ।
गुरु । सब श्रुति रूप । श्रेष्ठ रत्नों से । सुशोभित । चरण कमल वाले हैं । और वेदान्त के । अर्थ के प्रवक्ता हैं । इसलिये । गुरु की । पूजा करनी चाहिये । 37
यस्यस्मरणमात्रेण ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम । सः एव सर्वसम्पत्तिः तस्मात्संपूजयेद गुरुम ।
जिनके । स्मरण मात्र से । ज्ञान । अपने आप । प्रकट । होने लगता है । और वे ही । सब ( शम दम आदि ) सम्पदा रूप हैं । अतः । गुरु की । पूजा करनी चाहिये । 38
संसारवृक्षमारूढ़ाः पतन्ति नरकार्णवे । यस्तानुद्धरते सर्वान तस्मै श्रीगुरवे नमः ।
संसार रूपी । वृक्ष पर । चढ़े हुए लोग । नरक रूपी । सागर में । गिरते हैं । उन सबका । उद्धार करने वाले । श्री गुरु को नमस्कार हो । 39
एक एव परो बन्धुर्विषमे समुपस्थिते । गुरुः सकलधर्मात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ।
जब । विकट परिस्थिति । उपस्थित होती है । तब । वे ही । एक मात्र । परम बांधव हैं । और । सब धर्मों के । आत्म स्वरूप हैं । ऐसे श्री गुरु को नमस्कार हो । 40
भवारण्यप्रविष्टस्य दिड्मोहभ्रान्तचेतसः । येन सन्दर्शितः पन्थाः तस्मै श्रीगुरवे नमः ।
संसार रूपी । अरण्य में । प्रवेश करने के बाद । दिग मूढ़ की । स्थिति में ( जब कोई मार्ग नहीं दिखाई देता है ) चित्त । भृमित हो जाता है । उस समय । जिसने मार्ग दिखाया । उन श्री गुरु को नमस्कार है । 41
तापत्रयाग्नितप्तानां अशान्तप्राणीनां भुवि । गुरुरेव परा गंगा तस्मै श्रीगुरुवे नमः ।
इस पृथ्वी पर । त्रिविध ताप ( आधि । व्याधि । उपाधि - देहिक । दैविक । भौतिक ) रूपी अग्नि से । जलने के कारण । अशांत हुए । प्राणियों के लिए । गुरु ही । एक मात्र । गंगा हैं । ऐसे श्री गुरु को नमस्कार हो । 42
सप्तसागरपर्यन्तं तीर्थस्नानफलं तु यत । गुरुपादपयोबिन्दोः सहस्रांशेन तत्फलम ।
7 समुद्र । पर्यन्त के । सब तीर्थों में । स्नान करने से । जितना फल । मिलता है । वह फल । गुरु के चरणामृत के । 1 बिन्दु के । फल का । हजारवाँ हिस्सा है । 43
शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन । लब्ध्वा कुलगुरुं सम्यगुरुमेव समाश्रयेत ।
यदि शिव नाराज़ हो जायें । तो गुरु । बचाने वाले हैं । किन्तु यदि । गुरु नाराज़ हो जायें । तो बचाने वाला । कोई नहीं । अतः गुरु को । संप्राप्त करके । सदा उनकी । शरण में रेहना चाहिए । 44
गुकारं च गुणातीतं रुकारं रुपवर्जितम । गुणातीतमरूपं च यो दद्यात स गुरुः स्मृतः ।
गुरु शब्द का । गु अक्षर । गुणातीत । अर्थ का । बोधक है । और । रु अक्षर । रूप रहित स्थिति का । बोधक है । ये दोनों ( गुणातीत और रूपातीत ) स्थितियाँ । जो देते हैं । उनको गुरु कहते हैं । 45
अत्रिनेत्रः शिवः साक्षात द्विबाहुश्च हरिः स्मृतः । योऽचतुर्वदनो बृह्मा श्रीगुरुः कथितः प्रिये ।
हे प्रिय !  गुरु ही । त्रिनेत्र  रहित ( दो नेत्र वाले ) साक्षात । शिव हैं । दो हाथ वाले । भगवान विष्णु हैं । और एक मुख वाले । बृह्मा हैं । 46
देवकिन्नरगन्धर्वाः पितृयक्षास्तु तुम्बुरुः । मुनयोऽपि न जानन्ति गुरुशुश्रूषणे विधिम ।
देव । किन्नर । गंधर्व । पितृ । यक्ष । तुम्बुरु ( गंधर्व का एक प्रकार ) और । मुनि लोग भी । गुरु सेवा की विधि नहीं जानते । 47
तार्किकाश्छान्दसाश्चैव देवज्ञाः कर्मठः प्रिये । लौकिकास्ते न जानन्ति गुरुतत्वं निराकुलम ।
हे प्रिय !  तार्किक । वैदिक । ज्योतिषी । कर्मकांडी । तथा लौकिक जन । निर्मल गुरु तत्व को । नहीं जानते । 48
यज्ञिनोऽपि न मुक्ताः स्युः न मुक्ताः योगिनस्तथा । तापसा अपि नो मुक्त गुरुतत्वात्पराडमुखाः ।
यदि । गुरु तत्व से । प्राडमुख हो जाये । तो । याज्ञिक । मुक्ति नहीं पा सकते । योगी मुक्त । नहीं हो सकते । और तपस्वी भी । मुक्त नहीं हो सकते । 49
न मुक्तास्तु गन्धर्वः पितृयक्षास्तु चारणाः । ॠष्यः सिद्धदेवाद्याः गुरुसेवापराडमुखाः ।
गुरु सेवा से । विमुख । गंधर्व । पितृ । यक्ष । चारण । ॠषि । सिद्ध । और देवता । आदि भी । मुक्त नहीं होंगे ।
इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमामहेश्वरसंवादे श्री गुरुगीतायां प्रथमोऽध्यायः ।

इस प्रकार उपदेश देने वाला बृह्म राक्षस होता है

बृह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं । द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम । भावतीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि ।
जो बृह्मानंद । स्वरूप हैं । परम सुख । देने वाले हैं । जो केवल । ज्ञान स्वरूप हैं । ( सुख । दुख । शीत । उष्ण आदि ) द्वन्द्वों से । रहित हैं । आकाश के समान । सूक्ष्म । और । सर्व व्यापक हैं । तत्वमसि आदि । महा वाक्यों के । लक्ष्यार्थ हैं । एक हैं । नित्य हैं । मल रहित हैं । अचल हैं । सब बुद्धियों के । साक्षी हैं । भावना से । परे हैं । सत । रज । और तम । तीनों गुणों से । रहित हैं । ऐसे । श्री सदगुरु देव को । मैं नमस्कार करता हूँ । 52
गुरुपदिष्टमार्गेण मनः शिद्धिं तु कारयेत । अनित्यं खण्डयेत्सर्वं यत्किंचिदात्मगोचरम ।
गुरु के द्वारा । उपदिष्ट मार्ग से । मन की । शुद्धि करनी चाहिए । जो कुछ भी अनित्य । वस्तु । अपनी इन्द्रियों की विषय । हो जायें । उनका खण्डन ( निराकरण ) करना चाहिए । 53
किमत्रं बहुनोक्तेन शास्त्रकोटिशतैरपि । दुर्लभा चित्तविश्रान्तिः विना गुरुकृपां पराम ।
यहाँ ज्यादा कहने से क्या लाभ ? गुरु की परम कृपा के बिना । करोड़ों शास्त्रों से भी चित्त की विश्रांति दुर्लभ है । 54
करुणाखड्गपातेन छित्त्वा पाशाष्टकं शिशोः । सम्यगानन्दजनकः सदगुरु सोऽभिधीयते ।
एवं श्रुत्वा महादेवि गुरुनिन्दा करोति यः । स याति नरकान घोरान यावच्चन्द्रदिवाकरौ ।
करुणा रूपी तलवार के । प्रहार से । शिष्य के आठों पाशों ( संशय । दया । भय । संकोच । निन्दा । प्रतिष्ठा । कुल अभिमान । संपत्ति ) को काटकर । निर्मल आनंद देने वाले को । गुरु कहते हैं । ऐसा सुनने पर भी । जो मनुष्य । गुरु निन्दा करता है । वह ( मनुष्य ) जब तक । सूर्य चन्द्र का । अस्तित्व रहता है । तब तक । घोर नरक में । रहता है । 55 । 56
यावत्कल्पान्तको देहस्तावद्देवि गुरुं स्मरेत । गुरुलोपो न कर्त्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत ।
हे देवी ! देह कल्प के अन्त तक रहे । तब तक । गुरु का स्मरण । करना चाहिए । और आत्म ज्ञानी होने के बाद भी ( स्वच्छन्द अर्थात स्वरूप का छन्द मिलने पर भी ) शिष्य को । गुरु की शरण । नहीं छोड़नी चाहिए । 57
हुंकारेण न वक्तव्यं प्राज्ञशिष्यै कदाचन । गुरुराग्रे न वक्तव्यमसत्यं तु कदाचन ।
गुरु के समक्ष । प्रज्ञावान शिष्य को । कभी हुँकार शब्द से ( मैने ऐसे किया । वैसा किया ) नहीं बोलना चाहिए । और कभी । असत्य नहीं । बोलना चाहिए । 58
गुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य गुरुसान्निध्यभाषणः । अरण्ये निर्जले देशे संभवेद बृह्मराक्षसः ।
गुरु के समक्ष । जो हुँकार शब्द से । बोलता है । अथवा गुरु को । तू कहकर । जो बोलता है । वह निर्जन मरु भूमि में । बृह्म राक्षस होता है । 59
अद्वैतं भावयेन्नित्यं सर्वावस्थासु सर्वदा । कदाचिदपि नो कुर्यादद्वैतं गुरुसन्निधौ ।
सदा । और सभी अवस्थाओं में । अद्वैत की । भावना करनी चाहिए । परन्तु गुरु के साथ । अद्वैत की । भावना कदापि नहीं करनी चाहिए । 60
दृश्यविस्मृतिपर्यन्तं कुर्याद गुरुपदार्चनम । तादृशस्यैव कैवल्यं न च तद्व्यतिरेकिणः ।
जब तक । दृश्य प्रपंच की । विस्मृति न हो जाय । तब तक । गुरु के । पावन चरणार विन्द की । पूजा अर्चना करनी चाहिए । ऐसा करने वाले को ही । कैवल्य पद की । प्राप्ति होती है । इसके विपरीत । करने वाले को । नहीं होती । 61
अपि संपूर्णतत्त्वज्ञो गुरुत्यागी भवेद्ददा । भवेत्येव हि तस्यान्तकाले विक्षेपमुत्कटम ।
संपूर्ण । तत्वज्ञ भी । यदि गुरु का । त्याग कर दे । तो । मृत्यु के समय । उसे महान विक्षेप । अवश्य हो जाता है । 62
गुरौ सति स्वयं देवी परेषां तु कदाचन । उपदेशं न वै कुर्यात तदा चेद्राक्षसो भवेत ।
हे देवी ! गुरु के रहने पर । अपने आप । कभी किसी को । उपदेश नहीं देना चाहिए । इस प्रकार । उपदेश देने वाला । बृह्म राक्षस होता है । 63
न गुरुराश्रमे कुर्यात् दुष्पानं परिसर्पणम । दीक्षा व्याख्या प्रभुत्वादि गुरोराज्ञां न कारयेत ।
गुरु के आश्रम में । नशा नहीं करना चाहिए । टहलना नहीं चाहिए । दीक्षा देना । व्याख्यान करना । प्रभुत्व दिखाना । और गुरु को । आज्ञा करना । ये सब निषिद्ध हैं । 64
नोपाश्रमं च पर्यंकं न च पादप्रसारणम । नांगभोगादिकं कुर्यान्न लीलामपरामपि ।
गुरु के आश्रम में । अपना छप्पर । और पलंग । नहीं बनाना चाहिए ( गुरु के सम्मुख ) पैर नहीं पसारना । शरीर के भोग । नहीं भोगने चाहिए । और अन्य लीलाएँ । नहीं करनी चाहिए । 65
गुरुणां सदसद्वापि यदुक्तं तन्न लंघयेत । कुर्वन्नाज्ञां दिवारात्रौ दासवन्निवसेद गुरौ ।
गुरुओं की बात । सच्ची हो । या झूठी । परन्तु उसका । कभी उल्लंघन । नहीं करना चाहिए । रात और दिन । गुरु की । आज्ञा का पालन । करते हुए । उनके सान्निध्य में । दास बन कर । रहना चाहिए । 66
अदत्तं न गुरोर्द्रव्यमुपभुंजीत कहिर्चित । दत्तं च रंकवद ग्राह्यं प्राणोप्येतेन लभ्यते ।
जो दृव्य । गुरुदेव ने नहीं दिया हो । उसका उपयोग । कभी नहीं । करना चाहिए । गुरु के दिये हुए । दृव्य को भी । गरीब की तरह । गृहण करना चाहिए । उससे प्राण भी । प्राप्त हो सकते हैं । 67
पादुकासनशय्यादि गुरुणा यदभिष्टितम । नमस्कुर्वीत तत्सर्वं पादाभ्यां न स्पृशेत क्वचित ।
पादुका । आसन । बिस्तर आदि । जो कुछ भी । गुरु के । उपयोग में आते हों । उन सबको । नमस्कार करना चाहिए । और उनको । पैर से । कभी नहीं । छूना चाहिए । 68
गच्छतः पृष्ठतो गच्छेत गुरुच्छायां न लंघयेत । नोल्बणं धारयेद्वेषं नालंकारास्ततोल्बणान ।
चलते हुए । गुरु के । पीछे चलना चाहिए । उनकी परछाईं का भी । उल्लंघन । नहीं करना चाहिए । गुरु के समक्ष । कीमती वेशभूषा । आभूषण आदि । धारण नहीं करने चाहिए । 69
गुरुनिन्दाकरं दृष्टवा धावयेदथ वासयेत । स्थानं वा तत्परित्याज्यं जिह्वाच्छेदाक्षमो यदि ।
गुरु की । निन्दा करने वाले को । देखकर । यदि उसकी । जिह्वा काट डालने में । समर्थ न हो । तो उसे । अपने स्थान से । भगा देना चाहिए । यदि वह ठहरे । तो स्वयं । उस स्थान का । परित्याग । करना चाहिए । 70
मुनिभिः पन्नगैर्वापि सुरैवा शापितो यदि । कालमृत्युभयाद्वापि गुरुः संत्राति पार्वति ।
हे पार्वती ! मुनियों । पन्नगों । और देवताओं के । शाप से । तथा यथा काल । आये हुए । मृत्यु के भय से भी । शिष्य को । गुरु बचा सकते हैं । 71
विजानन्ति महावाक्यं गुरोश्चरणसेवया । ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः ।
गुरु के । चरणों की । सेवा करके । महा वाक्य के । अर्थ को । जो समझते हैं । वे ही । सच्चे संन्यासी हैं । अन्य तो । मात्र वेशधारी हैं । 72
नित्यं बृह्म निराकारं निर्गुणं बोधयेत परम । भासयन बृह्मभावं च दीपो दीपान्तरं यथा ।
गुरु वे हैं । जो नित्य । निर्गुण । निराकार । परम बृह्म । का बोध देते हुए । जैसे एक दीपक । दूसरे दीपक को । प्रज्ज्वलित करता है । वैसे ही । शिष्य में । बृह्म भाव को । प्रकट करते हैं । 73
गुरुप्रादतः स्वात्मन्यात्मारामनिरिक्षणात । समता मुक्तिमर्गेण स्वात्मज्ञानं प्रवर्तते ।
गुरु की । कृपा से । अपने भीतर ही । आत्मानंद । प्राप्त करके । समता । और मुक्ति के । मार्ग द्वारा । शिष्य । आत्म ज्ञान को । उपलब्ध होता है । 74
स्फ़टिके स्फ़ाटिकं रूपं दर्पणे दर्पणो यथा । तथात्मनि चिदाकारमानन्दं सोऽहमित्युत ।
जैसे । स्फ़टिक मणि में । स्फ़टिक मणि । तथा दर्पण में । दर्पण । दिख सकता है । उसी प्रकार । आत्मा में । जो चित । और आनंदमय । दिखाई देता है । वह मैं हूँ । 75
अंगुष्ठमात्रं पुरुषं ध्यायेच्च चिन्मयं हृदि । तत्र स्फ़ुरति यो भावः श्रुणु तत्कथयामि ते ।
हृदय में । अंगुष्ठ मात्र ( अंगूठा के बराबर )  परिणाम वाले । चैतन्य पुरुष का । ध्यान । करना चाहिए । वहाँ । जो भाव । स्फ़ुरित होता है । वह मैं तुम्हें कहता हूँ । सुनो । 76
अजोऽहममरोऽहं च ह्यनादिनिधनोह्यहम । अविकारश्चिदानन्दो ह्यणियान महतो महान ।
मैं अजन्मा हूँ । मैं अमर हूँ । मेरा आदि नहीं है । मेरी मृत्यु नहीं है । मैं निर्विकार हूँ । मैं चिदानन्द हूँ । मैं अणु से भी छोटा हूँ । और महान से भी महान हूँ । 77
अपूर्वमपरं नित्यं स्वयं ज्योतिर्निरामयम । विरजं परमाकाशं ध्रुवमानन्दमव्ययम ।
अगोचरं तथाऽगम्यं नामरूपविवर्जितम । निःशब्दं तु विजानीयात्स्वाभावाद बृह्म पार्वति ।
हे पार्वती ! बृह्म को । स्वभाव से ही । अपूर्व ( जिससे पूर्व कोई नहीं ऐसा ) अद्वितीय । नित्य । ज्योति स्वरूप । निरोग । निर्मल । परम आकाश स्वरूप । अचल । आनन्द स्वरूप । अविनाशी । अगम्य । अगोचर । नाम । रूप । से रहित । तथा निशब्द । जानना चाहिए । 78 । 79
यथा गन्धस्वभावत्वं कर्पूरकुसुमादिषु । शीतोष्णस्वभावत्वं तथा बृह्मणि शाश्वतम ।
जिस प्रकार । कपूर । फ़ूल । इत्यादि में । गन्धत्व ( अग्नि में ) उष्णता । और ( जल में ) शीतलता । स्वभाव से ही । होते हैं । उसी प्रकार । बृह्म में । शाश्वतता भी । स्वभाव सिद्ध है । 80
यथा निजस्वभावेन कुंडलकटकादयः । सुवर्णत्वेन तिष्ठन्ति तथाऽहं बृह्म शाश्वतम ।
जिस प्रकार । कटक । कुण्डल आदि । आभूषण । स्वभाव से ही । सुवर्ण हैं । उसी प्रकार । मैं स्वभाव से ही । शाश्वत बृह्म ही हूँ । 81
स्वयं तथाविधो भूत्वा स्थातव्यं यत्रकुत्रचित । कीटो भृंग इव ध्यानात यथा भवति तादृशः ।
स्वयं । वैसा होकर । किसी न किसी । स्थान में रहना । जैसे कीडा । भृंग का । चिन्तन करते करते । भृंग ही । हो जाता है । वैसे ही । जीव । बृह्म का । ध्यान करते करते । बृह्म स्वरूप ही । हो जाता है । 82
गुरोर्ध्यानेनैव नित्यं देही बृह्ममयो भवेत । स्थितश्च यत्रकुत्रापि मुक्तोऽसौ नात्र संशयः ।
सदा । गुरु का । ध्यान करने से । जीव । बृह्म मय हो जाता है । वह किसी भी । स्थान में । रहता हो । फ़िर भी । मुक्त ही है । इसमें । कोई संशय नहीं है । 83
ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं यशः श्री समुदाहृतम । षड्गुणैश्वर्ययुक्तो हि भगवान श्री गुरुः प्रिये ।
हे प्रिय ! भगवत स्वरूप । गुरु । ज्ञान । वैराग्य । ऐश्वर्य । यश । लक्ष्मी । और मधुर वाणी । ये 6 गुण । रूप ऐश्वर्य से । संपन्न होते हैं । 84
गुरुः शिवो गुरुर्देवो गुरुर्बन्धुः शरीरिणाम । गुरुरात्मा गुरुर्जीवो गुरोरन्यन्न विद्यते ।
मनुष्य के लिए । गुरु ही । शिव हैं । गुरु ही । देव हैं । गुरु ही । बांधव हैं । गुरु ही । आत्मा हैं । और गुरु ही । जीव हैं । ( सचमुच ) गुरु के सिवा । अन्य कुछ भी नहीं है । 85
एकाकी निस्पृहः शान्तः चिंतासूयादिवर्जितः । बाल्यभावेन यो भाति बृह्मज्ञानी स उच्यते ।
अकेला । कामना रहित । शांत । चिन्ता रहित । ईर्ष्या रहित । और बालक की तरह । जो शोभता है । वह बृह्म ज्ञानी कहलाता है । 86
न सुखं वेदशास्त्रेषु न सुखं मंत्रयंत्रके । गुरोः प्रसादादन्यत्र सुखं नास्ति महीतले ।
वेदों । और शास्त्रों में । सुख नहीं है । मंत्र और यंत्र में । सुख नहीं है । इस पृथ्वी पर । गुरु के कृपा प्रसाद के । सिवा अन्यत्र । कहीं भी । सुख नहीं है । 87
चावार्कवैष्णवमते सुखं प्रभाकरे न हि । गुरोः पादान्तिके यद्वत्सुखं वेदान्तसम्मतम ।
गुरु के चरणों में । जो वेदान्त निर्दिष्ट । सुख है । वह सुख । न चावार्क मत में । न वैष्णव मत में । और न प्रभाकर ( सांख्य ) मत में है । 88
न तत्सुखं सुरेन्द्रस्य न सुखं चक्रवर्तिनाम । यत्सुखं वीतरागस्य मुनेरेकान्तवासिनः ।
एकान्त वासी । वीत रागी । मुनि को । जो सुख मिलता है । वह सुख । न इन्द्र को । और न । चक्रवर्ती राजाओं को । मिलता है । 89
नित्यं बृह्मरसं पीत्वा तृप्तो यः परमात्मनि । इन्द्रं च मन्यते रंकं नृपाणां तत्र का कथा ।
हमेशा । बृह्म रस का । पान करके । जो । परमात्मा में । तृप्त हो गया है । वह ( मुनि ) इन्द्र को भी । गरीब मानता है । तो राजाओं की । तो बात ही क्या ? 90
यतः परमकैवल्यं गुरुमार्गेण वै भवेत । गुरुभक्तिरतिः कार्या सर्वदा मोक्षकांक्षिभिः ।
मोक्ष की । आकांक्षा करने वालों को । गुरु भक्ति । खूब करनी चाहिए । क्योंकि । गुरु के द्वारा ही । परम मोक्ष की प्राप्ति होती है । 91
एक एवाद्वितीयोऽहं गुरुवाक्येन निश्चितः । एवमभ्यास्ता नित्यं न सेव्यं वै वनान्तरम ।
अभ्यासान्निमिषणैव समाधिमधिगच्छति । आजन्मजनितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ।
गुरु के । वाक्य की । सहायता से । जिसने ऐसा । निश्चय । कर लिया है कि - मैं एक । और अद्वितीय हूँ । और । उसी अभ्यास में । जो रत है । उसके लिए । अन्य वनवास का । सेवन आवश्यक नहीं है । क्योंकि । अभ्यास से ही । एक क्षण में । समाधि लग जाती है । और उसी क्षण । इस जन्म तक के । सब पाप । नष्ट हो जाते हैं । 92 । 93
गुरुर्विष्णुः सत्त्वमयो राजसश्चतुराननः । तामसो रूद्ररूपेण सृजत्यवति हन्ति च ।
गुरु ही । सत्व गुणी होकर । विष्णु रूप से । जगत का । पालन करते हैं । रजो गुणी होकर । बृह्मा रूप से । जगत का । सृजन करते हैं । और तमो गुणी होकर । शंकर रूप से । जगत का । संहार करते हैं । 94
तस्यावलोकनं प्राप्य सर्वसंगविवर्जितः । एकाकी निःस्पृहः शान्तः स्थातव्यं तत्प्रसादतः ।
उनका ( गुरु का ) दर्शन पाकर । उनके । कृपा प्रसाद से । सब प्रकार की । आसक्ति छोड़कर । एकाकी । निःस्पृह । और शान्त होकर । रहना चाहिए । 95
सर्वज्ञपदमित्याहुर्देही सर्वमयो भुवि । सदाऽनन्दः सदा शान्तो रमते यत्र कुत्रचित ।
जो जीव । इस जगत में । सर्वमय । आनंदमय । और शान्त होकर । सर्वत्र । विचरता है । उस जीव को । सर्वज्ञ कहते हैं । 96
यत्रैव तिष्ठते सोऽपि स देशः पुण्यभाजनः । मुक्तस्य लक्षणं देवी तवाग्रे कथितं मया ।
 ऐसा पुरुष । जहाँ रहता है । वह स्थान । पुण्य तीर्थ है । हे देवी ! तुम्हारे सामने । मैंने । मुक्त पुरूष का । लक्षण कहा । 97
यद्यप्यधीता निगमाः षडंगा आगमाः प्रिये । आध्यामादिनि शास्त्राणि ज्ञानं नास्ति गुरुं विना ।
हे प्रिय ! मनुष्य चाहे । चारों वेद । पढ़ ले । वेद के । छह अंग पढ़ ले । आध्यात्म शास्त्र आदि । अन्य सब । शास्त्र पढ़ ले । फ़िर भी । गुरु के बिना । ज्ञान नहीं मिलता । 98
शिवपूजारतो वापि विष्णुपूजारतोऽथवा । गुरुतत्वविहीनश्चेत्तत्सर्वं व्यर्थमेव हि ।
शिव की । पूजा में । रत हो । या । विष्णु की । पूजा में । रत हो । परन्तु गुरु तत्व के । ज्ञान से । रहित हो । तो वह । सब व्यर्थ है । 99
सर्वं स्यात्सफलं कर्म गुरुदीक्षाप्रभावतः । गुरुलाभात्सर्वलाभो गुरुहीनस्तु बालिशः ।
गुरु की । दीक्षा के । प्रभाव से । सब कर्म । सफल होते हैं । गुरु की । संप्राप्ति रूपी । परम लाभ से । अन्य सब । लाभ मिलते हैं । जिसका गुरु नहीं । वह मूर्ख है । 100
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सर्वसंगविवर्जितः । विहाय शास्त्रजालानि गुरुमेव समाश्रयेत ।
इसलिए । सब प्रकार के । प्रयत्न से । अनासक्त होकर । शास्त्र की । माया जाल छोड़कर । गुरु की ही । शरण लेनी चाहिए । 101
ज्ञानहीनो गुरुत्याज्यो मिथ्यावादी विडंबकः । स्वविश्रान्ति न जानाति परशान्तिं करोति किम ।
ज्ञान रहित । मिथ्या बोलने वाले । और दिखावट करने वाले । गुरु का । त्याग । कर देना चाहिए । क्योंकि जो । अपनी ही । शांति । पाना नहीं जानता । वह दूसरों को । क्या शांति दे सकेगा ? 102
शिलायाः किं परं ज्ञानं शिलासंघप्रतारणे । स्वयं तर्तुं न जानाति परं निसतारेयेत्कथम ।
पत्थरों के । समूह को । तैराने का ज्ञान । पत्थर में । कहाँ से । हो सकता है ? जो खुद । तैरना । नहीं जानता । वह दूसरों को । क्या तैरायेगा । 103
न वन्दनीयास्ते कष्टं दर्शनाद भ्रान्तिकारकः । वर्जयेतान गुरुन दूरे धीरानेव समाश्रयेत ।
जो गुरु । अपने दर्शन से ( दिखावे से ) शिष्य को । भ्रान्ति में । ड़ालता है । ऐसे गुरु को । प्रणाम । नहीं करना चाहिए । इतना ही नहीं । दूर से ही । उसका । त्याग करना चाहिए । ऐसी स्थिति में । धैर्यवान । गुरु का ही । आश्रय लेना चाहिए । 104
पाखण्डिनः पापरता नास्तिका भेदबुद्धयः । स्त्रीलम्पटा दुराचाराः कृतघ्ना बकवृतयः ।
कर्मभृष्टाः क्षमानष्टाः निन्द्यतर्कैश्च वादिनः । कामिनः क्रोधिनश्चैव हिंस्राश्चंड़ाः शठस्तथा ।
ज्ञानलुप्ता न कर्तव्या महापापास्तथा प्रिये । एभ्यो भिन्नो गुरुः सेव्य एकभक्त्या विचार्य च ।
भेद बुद्धि । उत्पन्न करने वाले । स्त्री लम्पट । दुराचारी । नमक हराम । बगुले की तरह ठगने वाले । क्षमा रहित । निन्दनीय । तर्कों से वितंडा वाद करने वाले । कामी । क्रोधी । हिंसक । उग्र । शठ । तथा अज्ञानी । और महा पापी । पुरुष को । गुरु । नहीं करना चाहिए । ऐसा विचार करके । ऊपर दिये । लक्षणों से भिन्न । लक्षणों वाले । गुरु की । एक निष्ठ भक्ति से । सेवा करनी चाहिए । 105 । 106 । 107
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं धर्मसारं मयोदितम । गुरुगीता समं स्तोत्रं नास्ति तत्वं गुरोः परम ।
गुरु गीता के । समान । अन्य कोई । स्तोत्र नहीं है । गुरु के समान । अन्य । कोई तत्व नहीं है । समग्र धर्म का । यह सार । मैंने कहा है । यह सत्य है । सत्य है । और बार बार सत्य है । 108
अनेन यद भवेद् कार्यं तद्वदामि तव प्रिये । लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु विवर्जयेत ।
हे प्रिय ! इस गुरु गीता का । पाठ करने से । जो कार्य । सिद्ध होता है । अब वह । कहता हूँ । हे देवी ! लोगों के लिए । यह उपकारक है । मात्र लौकिक का । त्याग करना चाहिए । 109
लौकिकाद्धर्मतो याति ज्ञानहीनो भवार्णवे । ज्ञानभावे च यत्सर्वं कर्म निष्कर्म शाम्यति ।
जो कोई । इसका उपयोग । लौकिक कार्य के लिए । करेगा । वह ज्ञान हीन होकर । संसार रूपी सागर में । गिरेगा । ज्ञान भाव से । जिस कर्म में । इसका उपयोग । किया जाएगा । वह कर्म । निष्कर्म में । परिणत होकर । शांत हो जाएगा । 110
इमां तु भक्तिभावेन पठेद्वै शृणुयादपि । लिखित्वा यत्प्रसादेन तत्सर्वं फलमश्नुते ।
भक्ति भाव से । इस गुरु गीता का । पाठ करने से । सुनने से । और लिखने से । वह ( भक्त ) सब फल भोगता है । 111
गुरुगीतामिमां देवि हृदि नित्यं विभावय । महाव्याधिगतैदुःखैः सर्वदा प्रजपेन्मुदा ।
हे देवी ! इस गुरु गीता को । नित्य । भाव पूर्वक । हृदय में । धारण करो । महा व्याधि वाले । दुखी लोगों को । सदा आनंद से । इसका । जप करना चाहिए । 112
गुरुगीताक्षरैकैकं मंत्रराजमिदं प्रिये । अन्ये च विविधा मंत्राः कलां नार्हन्ति षोडशीम ।
हे प्रिय ! गुरु गीता का । एक एक अक्षर । मंत्र राज है । अन्य जो । विविध मंत्र हैं । वे इसका सोलहवाँ भाग भी नहीं । 113
अनन्तफलमाप्नोति गुरुगीताजपेन तु । सर्वपापहरा देवि सर्वदारिद्रयनाशिनी ।
हे देवी ! गुरु गीता के जप से । अनंत फल । मिलता है । गुरु गीता । सब पापों को । हरने वाली । और सब । दारिद्रय का । नाश करने वाली है । 114
अकालमृत्युहंत्री च सर्वसंकटनाशिनी । यक्षराक्षसभूतादिचोरव्याघ्रविघातिनी ।
गुरु गीता । अकाल मृत्यु को । रोकती है । सब संकटों का । नाश करती है । यक्ष । राक्षस । भूत । चोर । और बाघ आदि का । घात करती है । 115
सर्वोपदृवकुष्ठदिदुष्टदोषनिवारिणी । यत्फलं गुरुसान्निध्यात्तत्फलं पठनाद भवेत ।
गुरु गीता । सब प्रकार के । उपद्रवों । कुष्ठ । और दुष्ट । रोगों । और दोषों का । निवारण । करने वाली है । गुरु के । सान्निध्य से । जो फल । मिलता है । वह फल । इस गुरु गीता का । पाठ करने से मिलता है । 116
महाव्याधिहरा सर्वविभूतेः सिद्धिदा भवेत । अथवा मोहने वश्ये स्वयमेव जपेत्सदा ।
इस गुरु गीता का । पाठ करने से । महा व्याधि । दूर होती है । सब ऐश्वर्य । और सिद्धियों की । प्राप्ति होती है । मोहन में । अथवा वशीकरण में । इसका पाठ । स्वयं ही । करना चाहिए । 117
मोहनं सर्वभूतानां बन्धमोक्षकरं परम । देवराज्ञां प्रियकरं राजानं वश्मानयेत ।
इस गुरु गीता का । पाठ करने वाले पर । सब प्राणी । मोहित हो जाते हैं । बन्धन में से । परम मुक्ति । मिलती है । देवराज इन्द्र को । वह प्रिय होता है । और राजा । उसके वश होता है । 118
मुखस्तम्भकरं चैव गुणाणां च विवर्धनम । दुष्कर्मनाश्नं चैव तथा सत्कर्मसिद्धिदम ।
इस गुरु गीता का । पाठ । शत्रु का । मुख । बन्द करने वाला है । गुणों की । वृद्धि । करने वाला है । दुष्कृत्यों का । नाश करने वाला । और सतकर्म में । सिद्धि देने वाला है । 119
असिद्धं साधयेत्कार्यं नवग्रहभयापहम । दुःस्वप्ननाशनं चैव सुस्वप्नफलदायकम ।
इसका पाठ । असाध्य कार्यों की । सिद्धि कराता है । नव ग्रहों का । भय हरता है । दुस्वपन का । नाश करता है । और सुस्वपन के । फल की प्राप्ति कराता है । 120
मोहशान्तिकरं चैव बन्धमोक्षकरं परम । स्वरूपज्ञाननिलयं गीतशास्त्रमिदं शिवे ।
हे शिवे ! यह गुरु गीता रूपी । शास्त्र । मोह को । शान्त करने वाला । बन्धन में से । परम मुक्त । करने वाला । और स्वरूप ज्ञान का । भण्डार है । 121
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चयम । नित्यं सौभाग्यदं पुण्यं तापत्रयकुलापहम ।
व्यक्ति । जो जो । अभिलाषा करके । इस गुरु गीता का । पठन चिन्तन । करता है । उसे वह । निश्चय ही । प्राप्त होता है । यह गुरु गीता । नित्य सौभाग्य । और पुण्य । प्रदान करने वाली । तथा तीनों तापों ( आधि । व्याधि । उपाधि ) का । शमन करने वाली है । 122
सर्वशान्तिकरं नित्यं तथा वन्ध्यासुपुत्रदम । अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यस्य विवर्धनम ।
यह गुरु गीता । सब प्रकार की । शांति करने वाली । वंध्या स्त्री को । सुपुत्र देने वाली । सधवा स्त्री के । वैध्व्य का । निवारण । करने वाली । और सौभाग्य की । वृद्धि करने वाली है । 123
आयुरारोग्मैश्वर्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम । निष्कामजापी विधवा पठेन्मोक्षमवाप्नुयात ।
यह गुरु गीता । आयुष्य । आरोग्य । ऐश्वर्य । और पुत्र । पौत्र की । वृद्धि करने वाली है । कोई विधवा । निष्काम भाव से । इसका जप । पाठ करे । तो मोक्ष की प्राप्ति होती है । 124
अवैधव्यं सकामा तु लभते चान्यजन्मनि । सर्वदुःखभयं विघ्नं नाश्येत्तापहारकम ।
यदि वह ( विधवा ) सकाम होकर । जप करे । तो अगले जन्म में । उसको संताप हरने वाला । अवैधव्य ( सौभाग्य ) प्राप्त होता है । उसके सब । दुख । भय । विघ्न । और संताप का । नाश होता है । 125
सर्वपापप्रशमनं धर्मकामार्थमोक्षदम । यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम ।
इस गुरु गीता का । पाठ । सब पापों का । शमन करता है । धर्म । अर्थ । और मोक्ष की । प्राप्ति कराता है । इसके पाठ से । जो जो । आकांक्षा की जाती है । वह अवश्य । सिद्ध होती है । 126
लिखित्वा पूजयेद्यस्तु मोक्षश्रियम्वाप्नुयात । गुरूभक्तिर्विशेषेण जायते हृदि सर्वदा ।
यदि कोई । इस गुरु गीता को लिखकर । उसकी पूजा करे । तो उसे । लक्ष्मी । और मोक्ष की । प्राप्ति होती है । और विशेष कर । उसके हृदय में । सर्वदा । गुरु भक्ति । उत्पन्न होती रहती है । 127
जपन्ति शाक्ताः सौराश्च गाणपत्याश्च वैष्णवाः । शैवाः पाशुपताः सर्वे सत्यं सत्यं न संशयः ।
शक्ति के । सूर्य के । गणपति के । शिव के । और पशुपति के । मतवादी । इसका ( गुरु गीता का ) पाठ करते हैं । यह सत्य है । सत्य है । इसमें कोई । संदेह नहीं है । 128
जपं हीनासनं कुर्वन् हीनकर्माफलप्रदम । गुरुगीतां प्रयाणे वा संग्रामे रिपुसंकटे ।
जपन् जयमवाप्नोति मरणे मुक्तिदायिका । सर्वकमाणि सिद्धयन्ति गुरुपुत्रे न संशयः ।
बिना आसन किया हुआ । जप । नीच कर्म । हो जाता है । और निष्फल । हो जाता है । यात्रा में । युद्ध में । शत्रुओं के उपद्रव में । गुरु गीता का । जप । पाठ करने से । विजय मिलता है । मरण काल में । जप करने से । मोक्ष मिलता है । गुरु पुत्र के ( शिष्य के ) सब कार्य । सिद्ध होते हैं । इसमें संदेह नहीं है । 129 । 130
गुरुमंत्रो मुखे यस्य तस्य सिद्धयन्ति नान्यथा । दीक्षया सर्वकर्माणि सिद्धयन्ति गुरुपुत्रके ।
जिसके मुख में । गुरु मंत्र है । उसके सब कार्य । सिद्ध होते हैं । दूसरे के नहीं । दीक्षा के कारण । शिष्य के सब कार्य । सिद्ध हो जाते हैं । 131
भवमूलविनाशाय चाष्टपाशनिवृतये । गुरुगीताम्भसि स्नानं तत्वज्ञ कुरुते सदा ।
सर्वशुद्धः पवित्रोऽसौ स्वभावाद्यत्र तिष्ठति । तत्र देवगणाः सर्वे क्षेत्रपीठे चरन्ति च ।
तत्वज्ञ पुरूष । संसा रूपी । वृक्ष की जड़ । नष्ट करने के लिए । और आठों प्रकार के बन्धन ( संशय । दया । भय । संकोच । निन्दा । प्रतिष्ठा । कुल अभिमान । और संपत्ति ) की निवृति करने के लिए । गुरु गीता रूपी । गंगा में । सदा स्नान करते रहते हैं । स्वभाव से ही । सर्वथा शुद्ध । और पवित्र । ऐसे वे महापुरूष । जहाँ रहते हैं । उस तीर्थ में । देवता विचरण करते हैं । 132 । 133
आसनस्था शयाना वा गच्छन्तष्तिष्ठन्तोऽपि वा । अश्वरूढ़ा गजारूढ़ा सुषुप्ता जाग्रतोऽपि वा ।
शुचिभूता ज्ञानवन्तो गुरुगीतां जपन्ति ये । तेषां दर्शनसंस्पर्शात पुनर्जन्म न विद्यते ।
आसन पर । बैठे हुए । या लेटे हुए । खड़े रहते । या चलते हुए । हाथी या घोड़े पर सवार । जागृत अवस्था में । या सुषुप्त अवस्था में । जो पवित्र ज्ञानवान पुरूष । इस गुरु गीता का । जप । पाठ करते हैं । उनके दर्शन और स्पर्श से । पुनर्जन्म नहीं होता । 134 । 135
कुशदुर्वासने देवि ह्यासने शुभ्रकम्बले । उपविश्य ततो देवि जपेदेकाग्रमानसः ।
हे देवी ! कुश और दुर्वा के आसन पर । सफ़ेद कम्बल बिछाकर । उसके ऊपर बैठकर । एकाग्र मन से । इसका ( गुरु गीता का ) जप करना चाहिए । 136
शुक्लं सर्वत्र वै प्रोक्तं वश्ये रक्तासनं प्रिये । पदमासने जपेन्नित्यं शान्तिवश्यकरं परम ।
सामान्यतया सफ़ेद आसन । उचित है । परंतु वशीकरण में । लाल आसन आवश्यक है । हे प्रिये ! शांति प्राप्ति के लिए । या वशीकरण में । नित्य पदमासन में । बैठकर जप करना चाहिए । 137
वस्त्रासने च दारिद्रयं पाषाणे रोगसंभवः । मेदिन्यां दुःखमाप्नोति काष्ठे भवति निष्फलम ।
कपड़े के आसन पर बैठकर । जप करने से - दारिद्रय आता है । पत्थर के आसन पर - रोग । भूमि पर बैठकर जप करने से - दुख आता है । और लकड़ी के आसन पर । किये हुए जप । निष्फल होते हैं । 138
कृष्णाजिने ज्ञानसिद्धिः मोक्षश्री व्याघ्रचर्मणि । कुशासने ज्ञानसिद्धिः सर्वसिद्धिस्तु कम्बले ।
काले मृग चर्म । और दर्भासन पर बैठकर । जप करने से । ज्ञान सिद्धि होती है । व्याघ्र चर्म पर जप करने से । मुक्ति प्राप्त होती है । परन्तु कम्बल के आसन पर । सर्व सिद्धि प्राप्त होती है । 139
आग्नेय्यां कर्षणं चैव वयव्यां शत्रुनाशनम । नैरॄत्यां दर्शनं चैव ईशान्यां ज्ञानमेव च ।
अग्नि कोण की तरफ । मुख करके । जप । पाठ । करने से - आकर्षण । वायव्य कोण की तरफ़ - शत्रुओं का नाश । नैऋत्य कोण की तरफ - दर्शन । और । ईशान कोण की तरफ । मुख करके । जप । पाठ । करने से ज्ञान की प्रप्ति है । 140
उदंमुखः शान्तिजाप्ये वश्ये पूर्वमुखतथा । याम्ये तु मारणं प्रोक्तं पश्चिमे च धनागमः ।
उत्तर दिशा की ओर । मुख करके । पाठ करने से - शांति । पूर्व दिशा की ओर - वशीकरण । दक्षिण दिशा की ओर - मारण । सिद्ध होता है । तथा । पश्चिम दिशा की ओर । मुख करके । जप । पाठ । करने से । धन प्राप्ति । होती है । 141
इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमामहेश्वरसंवादे श्री गुरुगीतायां द्वितीयोऽध्यायः

बृह्म निष्ठ महात्मा तीनों लोकों मे समान भाव से गति करते हैं

अथ काम्यजपस्थानं कथयामि वरानने । सागरान्ते सरित्तीरे तीर्थे हरिहरालये ।
शक्तिदेवालये गोष्ठे सर्वदेवालये शुभे । वटस्य धात्र्या मूले व मठे वृन्दावने तथा ।
पवित्रे निर्मले देशे नित्यानुष्ठानोऽपि वा । निर्वेदनेन मौनेन जपमेतत् समारभेत ।
हे सुमुखी ! अब सकामियों के लिए । जप करने के । स्थानों का । वर्णन करता हूँ । सागर । या नदी के तट पर । तीर्थ में । शिवालय में । विष्णु के । या देवी के । मंदिर में । गौशाला में । सभी शुभ देवालयों में । वट वृक्ष के । या आँवले के । वृक्ष के नीचे । मठ में । तुलसी वन में । पवित्र निर्मल स्थान में । नित्य अनुष्ठान के रूप में । अनासक्त रहकर । मौन पूर्वक इसके जप का आरंभ करना चाहिए ।
जाप्येन जयमाप्नोति जप सिद्धिं फलं तथा । हीनकर्म त्यजेत्सर्वं गर्हितस्थानमेव च ।
जप से जय प्राप्त होता है । तथा जप की सिद्धि रूप फल मिलता है । जपानुष्ठान के काल में सब नीच कर्म और निन्दित स्थान का त्याग करना चाहिए । 145
शमशाने बिल्वमूले वा वटमूलान्तिके तथा । सिद्धयन्ति कानके मूले चूतवृक्षस्य सन्निधौ ।
शमशान में । बिल्व । वट वृक्ष । या कनक वृक्ष के नीचे । और आम वृक्ष के पास । जप करने से से सिद्धि जल्दी होती है । 146
आकल्पजन्मकोटीनां यज्ञव्रततपः क्रियाः । ताः सर्वाः सफला देवि गुरुसंतोषमात्रतः ।
हे देवी ! कल्प पर्यन्त के । करोंड़ो जन्मों के यज्ञ । वृत । तप और शास्त्रोक्त क्रियाएँ । ये सब गुरु के संतोष मात्र से सफल हो जाते हैं । 147
मंदभाग्या ह्यशक्ताश्च ये जना नानुमन्वते । गुरुसेवासु विमुखाः पच्यन्ते नरकेऽशुचौ ।
भाग्य हीन । शक्ति हीन । और गुरु सेवा से विमुख । जो लोग इस उपदेश को नहीं मानते । वे घोर नरक में पड़ते हैं । 148
विद्या धनं बलं चैव तेषां भाग्यं निरर्थकम । येषां गुरुकृपा नास्ति अधो गच्छन्ति पार्वति ।
जिसके ऊपर गुरु की कृपा नहीं है । उसकी विद्या । धन । बल । और भाग्य । निरर्थक है । हे पार्वती ! उसका अधः पतन होता है । 149
धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोदभवः । धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद गुरुभक्तता ।
जिसके अंदर गुरु भक्ति हो । उसकी माता धन्य है । उसका पिता धन्य है । उसका वंश धन्य है । उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं । समग्र धरती धन्य है । 150
शरीरमिन्द्रियं प्राणच्चार्थः स्वजनबन्धुतां । मातृकुलं पितृकुलं गुरुरेव न संशयः ।
शरीर । इन्द्रियाँ । प्राण । धन । स्व जन । बन्धु बान्धव । माता का कुल । पिता का कुल । ये सब गुरु ही हैं । इसमें संशय नहीं है । 151
गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरौ निष्ठा परं तपः । गुरोः परतरं नास्ति त्रिवारं कथयामि ते ।
गुरु ही देव हैं । गुरु ही धर्म हैं । गुरु में निष्ठा ही परम तप है । गुरु से अधिक और कुछ नहीं है । यह मैं तीन बार कहता हूँ । 152
समुद्रे वै यथा तोयं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम । भिन्ने कुंभे यथाऽकाशं तथाऽत्मा परमात्मनि ।
जिस प्रकार सागर में पानी । दूध में दूध । घी में घी । अलग अलग घटों में आकाश । एक और अभिन्न है । उसी प्रकार परमात्मा में जीवात्मा एक और अभिन्न है । 153
तथैव ज्ञानवान जीव परमात्मनि सर्वदा । ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र कुत्र दिवानिशम ।
इसी प्रकार ज्ञानी सदा परमात्मा के साथ । अभिन्न होकर । रात दिन । आनंद विभोर होकर । सर्वत्र विचरते हैं । 154
गुरुसन्तोषणादेव मुक्तो भवति पार्वति । अणिमादिषु भोक्तृत्वं कृपया देवि जायते ।
हे पार्वती ! गुरु को संतुष्ट करने से । शिष्य मुक्त हो जाता है । हे देवी ! गुरु की कृपा से वह अणिमादि सिद्धियों का भोग प्राप्त करता है । 155
साम्येन रमते ज्ञानी दिवा वा यदि वा निशि । एवं विधौ महामौनी त्रैलोक्यसमतां वृजेत ।
ज्ञानी दिन में । या रात में । सदा सर्वदा । समत्व में रमण करते हैं । इस प्रकार के । महा मौनी । अर्थात बृह्म निष्ठ महात्मा । तीनों लोकों मे समान भाव से गति करते हैं । 156
गुरुभावः परं तीर्थमन्यतीर्थं निरर्थकम । सर्वतीर्थमयं देवि श्रीगुरोश्चरणाम्बुजम ।
गुरु भक्ति ही । सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है । अन्य तीर्थ । निरर्थक हैं । हे देवी ! गुरु के चरण कमल सर्व तीर्थ मय हैं । 157
कन्याभोगरतामन्दाः स्वकान्तायाः पराड्मुखाः । अतः परं मया देवि कथितन्न मम प्रिये ।
हे देवी ! कन्या के भोग में रत । स्व स्त्री से विमुख ( पर स्त्री गामी ) ऐसे बुद्धि शून्य लोगों को । मेरा यह आत्म प्रिय परम बोध मैंने नहीं कहा । 158
अभक्ते वंचके धूर्ते पाखंडे नास्तिकादिषु । मनसाऽपि न वक्तव्या गुरुगीता कदाचन ।
अभक्त । कपटी । धूर्त । पाखण्डी । नास्तिक इत्यादि को । यह गुरु गीता । कहने का मन में सोचना तक नहीं । 159
गुरवो बहवः सन्ति शिष्यवित्तापहारकाः । तमेकं दुर्लभं मन्ये शिष्यह्यत्तापहारकम ।
शिष्य के धन को । अपहरण करने वाले । गुरु तो बहुत हैं । लेकिन शिष्य के । हृदय का । संताप । हरने वाला । एक गुरु भी दुर्लभ है । ऐसा मैं मानता हूँ । 160
चातुर्यवान्विवेकी च अध्यात्मज्ञानवान् शुचिः । मानसं निर्मलं यस्य गुरुत्वं तस्य शोभते ।
जो चतुर हो । विवेकी हो । अध्यात्म के ज्ञाता हो । पवित्र हो । तथा निर्मल मान सवाले हो ।उनमें गुरुत्व शोभा पाता है । 161
गुरवो निर्मलाः शान्ताः साधवो मितभाषिणः । कामक्रोधविनिर्मुक्ताः सदाचारा जितेन्द्रियाः ।
गुरु निर्मल । शांत । साधु स्वभाव के । मित भाषी । काम क्रोध से अत्यंत रहित । सदाचारी और जितेन्द्रिय होते हैं । 162
सूचकादि प्रभेदेन गुरवो बहुधा स्मृताः । स्वयं समयक परीक्ष्याथ तत्वनिष्ठं भजेत्सुधीः ।
सूचक आदि भेद से । अनेक गुरु कहे गये हैं । बुद्धिमान मनुष्य को । स्वयं योग्य विचार करके । तत्व निष्ठ । गुरु की शरण लेनी चाहिए । 163
वर्णजालमिदं तद्वद्बाह्यशास्त्रं तु लौकिकम । यस्मिन देवि समभ्यस्तं स गुरुः सूचकः स्मृतः ।
हे देवी ! वर्ण । और अक्षरों से । सिद्ध करने वाले । बाह्य । लौकिक शास्त्रों का । जिसको अभ्यास हो । वह गुरु सूचक गुरु कहलाता है । 164
वर्णाश्रमोचितां विद्यां धर्माधर्मविधायिनीम । प्रवक्तारं गुरुं विद्धि वाचकस्त्वति पार्वति ।
हे पार्वती ! धर्म अधर्म का । विधान करने वाली । वर्ण । और आश्रम के । अनुसार । विद्या का । प्रवचन करने वाले । गुरु को । तुम वाचक गुरु जानो । 165
पंचाक्षर्यादिमंत्राणामुपदेष्टा त पार्वति । स गुरुर्बोधको भूयादुभयोरमुत्तमः ।
पंचाक्षरी । आदि मंत्रों का । उपदेश देने वाले । गुरु । बोधक गुरु । कहलाते हैं । हे पार्वती ! प्रथम दो प्रकार के गुरुओं से यह गुरु उत्तम हैं । 166
मोहमारणवश्यादितुच्छमंत्रोपदर्शिनम । निषिद्धगुरुरित्याहुः पण्डितस्तत्वदर्शिनः ।
मोहन । मारण । वशीकरण । आदि तुच्छ मंत्रों को । बताने वाले । गुरु को । तत्व दर्शी पंडित । निषिद्ध गुरु कहते हैं । 167
अनित्यमिति निर्दिश्य संसारे संकटालयम । वैराग्यपथदर्शी यः स गुरुर्विहितः प्रिये ।
हे प्रिये ! संसार । अनित्य । और दुखों का । घर है । ऐसा समझा कर । जो गुरु । वैराग्य का । मार्ग बताते हैं । वे । विहित गुरु । कहलाते हैं । 168
तत्वमस्यादिवाक्यानामुपदेष्टा तु पार्वति । कारणाख्यो गुरुः प्रोक्तो भवरोगनिवारकः ।
हे पार्वती ! तत्वमसि । आदि । महा वाक्यों का । उपदेश देने वाले । तथा संसार रूपी । रोगों का । निवारण करने वाले । गुरु कारणाख्य गुरु । कहलाते हैं । 169
सर्वसन्देहसन्दोहनिर्मूलनविचक्षणः । जन्ममृत्युभयघ्नो यः स गुरुः परमो मतः ।
सभी प्रकार के । सन्देहों का । जड़ से नाश करने में । जो चतुर हैं । जन्म । मृत्यु । तथा भय का । जो विनाश करते हैं । वे परम गुरु कहलाते हैं । 170
बहुजन्मकृतात पुण्याल्लभ्यतेऽसौ महागुरुः । लब्ध्वाऽमुं न पुनर्याति शिष्यः संसारबन्धनम ।
अनेक जन्मों के । किये हुए पुण्यों से । ऐसे । महा गुरु । प्राप्त होते हैं । उनको प्राप्त कर । शिष्य । पुनः संसार बन्धन में । नहीं बँधता । अर्थात । मुक्त हो जाता है । 171
एवं बहुविधालोके गुरवः सन्ति पार्वति । तेषु सर्वप्रत्नेन सेव्यो हि परमो गुरुः ।
हे पार्वती ! इस प्रकार । संसार में । अनेक प्रकार के । गुरु होते हैं । इन सबमें । एक परम गुरु का ही । सेवन । सर्व प्रयत्नों से करना चाहिए । 172
स्वयं मूढा मृत्युभीताः सुकृताद्विरतिं गताः । दैवन्निषिद्धगुरुगा यदि तेषां तु का गतिः ।
पार्वती बोली - प्रकृति से ही मूढ । मृत्यु से भयभीत । सतकर्म से विमुख । लोग यदि । दैवयोग से । निषिद्ध गुरु का । सेवन करें । तो उनकी क्या गति होती है ? 173
निषिद्धगुरुशिष्यस्तु दुष्टसंकल्पदूषितः । बृह्मप्रलयपर्यन्तं न पुनर्याति मृत्यताम ।
महादेव बोले - निषिद्ध गुरु का । शिष्य । दुष्ट संकल्पों से । दूषित होने के कारण । बृह्म प्रलय तक । मनुष्य नहीं होता । पशु योनि में रहता है । 174
श्रृणु तत्वमिदं देवि यदा स्याद्विरतो नरः । तदाऽसावधिकारीति प्रोच्यते श्रुतमस्तकैः ।
हे देवी ! इस तत्व को । ध्यान से सुनो । मनुष्य जब । विरक्त होता है । तभी वह । अधिकारी कहलाता है । ऐसा । उपनिषद कहते हैं । अर्थात । दैव योग से । गुरु प्राप्त होने की । बात अलग है । और विचार से । गुरु चुनने की । बात अलग है । 175
अखण्डैकरसं बृह्म नित्यमुक्तं निरामयम । स्वस्मिन संदर्शितं येन स भवेदस्य देशिकः ।
अखण्ड । एक रस । नित्य मुक्त । और निरामय बृह्म । जो अपने अंदर ही । दिखाते हैं । वे ही गुरु होने चाहिए । 176
जलानां सागरो राजा यथा भवति पार्वति । गुरुणां तत्र सर्वेषां राजायं परमो गुरुः ।
हे पार्वती ! जिस प्रकार । जलाशयों में । सागर राजा है । उसी प्रकार । सब गुरुओं में । ये परम गुरु । राजा हैं । 177
मोहादिरहितः शान्तो नित्यतृप्तो निराश्रयः । तृणीकृतबृह्मविष्णुवैभवः परमो गुरुः ।
मोह आदि । दोषों से रहित । शांत । नित्य । तृप्त । किसी के । आश्रय रहित । अर्थात स्वाश्रयी । बृह्मा । और विष्णु के । वैभव को भी । तृण वत ( तिनका समान तुच्छ ) । समझने वाले । गुरु ही परम गुरु हैं । 178
सर्वकालविदेशेषु स्वतंत्रो निश्चलस्सुखी । अखण्डैकरसास्वादतृप्तो हि परमो गुरुः ।
सर्व काल । और देश में । स्वतंत्र । निश्चल । सुखी । अखण्ड । एक रस के । आनन्द से तृप्त । ही सचमुच परम गुरु हैं । 179
द्वैताद्वैतविनिर्मुक्तः स्वानुभूतिप्रकाशवान । अज्ञानान्धमश्छेत्ता सर्वज्ञ परमो गुरुः ।
द्वैत । और अद्वैत से मुक्त । अपने अनुभुव रूप । प्रकाश वाले । अज्ञान रूपी । अंधकार को । छेदने वाले । और सर्वज्ञ ही । परम गुरु हैं  । 180
यस्य दर्शनमात्रेण मनसः स्यात प्रसन्नता । स्वयं भूयात धृतिश्शान्तिः स भवेत परमो गुरुः ।
जिनके । दर्शन मात्र से । मन प्रसन्न होता है । अपने आप । धैर्य और शांति । आ जाती है । वे परम गुरु हैं । 181
स्वशरीरं शवं पश्यन् तथा स्वात्मानमद्वयम । यः स्त्रीकनकमोहघ्नः स भवेत परमो गुरुः ।
जो । अपने शरीर को । शव समान । समझते हैं । अपने आत्मा को । अद्वय । जानते हैं । जो कामिनी । और कंचन के । मोह का । नाश कर्ता हैं । वे परम गुरु हैं । 182
मौनी वाग्मीति तत्वज्ञो द्विधाभूच्छृणु पार्वति । न कश्चिन्मौनिना लाभो लोकेऽस्मिन्भवति प्रिये ।
वाग्मी तूत्कटसंसारसागरोत्तारणक्षमः । यतोऽसौ संशयच्छेत्ता शास्त्रयुक्त्यनुभूतिभिः
हे पार्वती ! सुनो । तत्वज्ञ । दो प्रकार के । होते हैं । मौनी और वक्ता । इन दोंनों में से । मौनी गुरु द्वारा । लोगों को । कोई लाभ नहीं होता । परन्तु वक्ता गुरु । भयंकर संसार सागर को । पार कराने में । समर्थ होते हैं । क्योंकि शास्त्र । युक्ति ( तर्क ) और अनुभूति से । वे सभी संशयों का । छेदन करते हैं । 183 । 184
गुरुनामजपाद्येवि बहुजन्मार्जितान्यपि । पापानि विलयं यान्ति नास्ति सन्देहमण्वपि ।
हे देवी ! गुरु नाम के जप से । अनेक जन्मों के । इकठ्ठे हुए पाप भी । नष्ट होते हैं । इसमें अणु मात्र । संशय नहीं है । 185
कुलं धनं बलं शास्त्रं बान्धवास्सोदरा इमे । मरणे नोपयुज्यन्ते गुरुरेको हि तारकः ।
अपना कुल । धन । बल । शास्त्र । नाते । रिश्तेदार । भाई । ये सब । मृत्यु के । अवसर पर । काम नहीं आते । एक मात्र गुरु ही । उस समय तारणहार हैं । 186
कुलमेव पवित्रं स्यात सत्यं स्वगुरुसेवया । तृप्ताः स्युस्स्कला देवा बृह्माद्या गुरुतर्पणात ।
अपने गुरु की । सेवा करने से । अपना कुल भी । पवित्र होता है । गुरु के तर्पण से । बृह्मा आदि । सब देव तृप्त होते हैं । 187
स्वरूपज्ञानशून्येन कृतमप्यकृतं भवेत । तपो जपादिकं देवि सकलं बालजल्पवत ।
हे देवी ! स्वरूप के । ज्ञान के बिना । किये हुए । जप । तप आदि । सब कुछ । नहीं किये हुए । के बराबर हैं । बालक के । बकवाद के । समान ( व्यर्थ ) हैं । 188
न जानन्ति परं तत्वं गुरुदीक्षापराड्मुखाः । भ्रान्ताः पशुसमा ह्येते स्वपरिज्ञानवर्जिताः ।
गुरु दीक्षा से । विमुख रहे हुए लोग । भ्रांत हैं । अपने । वास्तविक ज्ञान से । रहित हैं । वे सचमुच । पशु के समान हैं । परम तत्व को । वे नहीं जानते । 189
तस्मात्कैवल्यसिद्धयर्थं गुरुमेव भजेत्प्रिये । गुरुं विना न जानन्ति मूढास्तत्परमं पदम ।
हे प्रिय ! कैवल्य की । सिद्धि के लिए । गुरु का ही । भजन करना चाहिए । गुरु के बिना । मूढ लोग । उस परम पद को । नहीं जान सकते । 190
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते सर्वकर्माणि गुरोः करुणया शिवे ।
हे शिवे ! गुरु की । कृपा से । हृदय की ग्रन्थि । छिन्न हो जाती है । सब संशय । कट जाते हैं । और सब कर्म । नष्ट हो जाते हैं । 191
कृताया गुरुभक्तेस्तु वेदशास्त्रनुसारतः । मुच्यते पातकाद घोराद् गुरुभक्तो विशेषतः ।
वेद । और शास्त्र के । अनुसार । विशेष रूप से । गुरु की । भक्ति करने से । गुरु भक्त । घोर पाप से भी । मुक्त हो जाता है । 192
दुःसंगं च परित्यज्य पापकर्म परित्यजेत । चित्तचिह्नमिदं यस्य तस्य दीक्षा विधीयते ।
दुर्जनों का । संग त्याग कर । पाप कर्म । छोड़ देने चाहिए । जिसके चित्त में । ऐसा चिह्न । देखा जाता है । उसके लिए । गुरु दीक्षा का । विधान है । 193
चित्तत्यागनियुक्तश्च क्रोधगर्वविवर्जितः । द्वैतभावपरित्यागी तस्य दीक्षा विधीयते ।
चित्त का । त्याग करने में । जो प्रयत्नशील है । क्रोध और । गर्व से रहित है । द्वैत भाव का । जिसने त्याग किया है । उसके लिए । गुरु दीक्षा का । विधान है । 194
एतल्लक्षणसंयुक्तं सर्वभूतहिते रतम । निर्मलं जीवितं यस्य तस्य दीक्षा विधीयते ।
जिसका जीवन । इन लक्षणों से । युक्त हो । निर्मल हो । जो सब जीवों के । कल्याण में । रत हो । उसके लिए । गुरु दीक्षा का । विधान है । 195
अत्यन्तचित्तपक्वस्य श्रद्धाभक्तियुतस्य च । प्रवक्तव्यमिदं देवि ममात्मप्रीतये सदा ।
हे देवी ! जिसका चित्त । अत्यन्त परिपक्व हो । श्रद्धा । और भक्ति से । युक्त हो । उसे यह तत्व । सदा मेरी । प्रसन्नता के लिए । कहना चाहिए । 196
सत्कर्मपरिपाकाच्च चित्तशुद्धस्य धीमतः । साधकस्यैव वक्तव्या गुरुगीता प्रयत्नतः ।
सतकर्म के । परिपाक से । शुद्ध हुए । चित्त वाले । बुद्धिमान साधक को ही । गुरु गीता । प्रयत्न पूर्वक कहनी चाहिए । 197
नास्तिकाय कृतघ्नाय दांभिकाय शठाय च । अभक्ताय विभक्ताय न वाच्येयं कदाचन ।
नास्तिक । कृतघ्न । दंभी । शठ । अभक्त । और विरोधी को । यह गुरु गीता । कदापि नहीं कहनी चाहिए । 198
स्त्रीलोलुपाय मूर्खाय कामोपहतचेतसे । निन्दकाय न वक्तव्या गुरुगीतास्वभावतः ।
स्त्री लम्पट । मूर्ख । काम वासना से गृस्त । चित्त वाले । तथा निंदक को । गुरु गीता नहीं कहनी चाहिए । 199
एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुर्नैव मन्यते । श्वनयोनिशतं गत्वा चाण्डालेष्वपि जायते ।
एकाक्षर मंत्र का । उपदेश करने वाले को । जो गुरु नहीं मानता । वह 100 जन्मों में । कुत्ता होकर । फिर चाण्डाल की योनि में जन्म लेता है । 200
गुरुत्यागाद भवेन्मृत्युर्मन्त्रत्यागाद्यरिद्रता । गुरुमंत्रपरित्यागी रौरवं नरकं व्रजेत ।
गुरु का त्याग करने से । मृत्यु होती है । गुरु मंत्र को छोड़ने से । दरिद्रता आती है । और गुरु एवं मंत्र । दोनों का । त्याग करने से । रौरव नरक मिलता है । 201
शिवक्रोधाद गुरुस्त्राता गुरुक्रोधाच्छिवो न हि । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराज्ञां न लंघयेत ।
शिव के क्रोध से । गुरु रक्षा करते हैं । लेकिन गुरु के क्रोध से । शिव रक्षा नहीं करते । अतः सब प्रयत्न से । गुरु की आज्ञा का । उल्लंघन नहीं करना चाहिए । 202
सप्तकोटिमहामंत्राश्चित्तविभृंशकारकाः । एक एव महामंत्रो गुरुरित्यक्षरद्वयम ।
7 करोड़ महा मंत्र विद्यमान हैं । वे सब । चित्त को । भृमित करने वाले हैं । गुरु नाम का । दो अक्षर वाला मंत्र । एक ही महा मंत्र है । 203
न मृषा स्यादियं देवि मदुक्तिः सत्यरूपिणि । गुरुगीतासमं स्तोत्रं नास्ति नास्ति महीतले ।
हे देवी ! मेरा यह कथन । कभी मिथ्या नहीं होगा । वह सत्य स्वरूप है । इस पृथ्वी पर । गुरु गीता के समान । अन्य कोई स्तोत्र नहीं है । 204
गुरुगीतामिमां देवि भवदुःखविनाशिनीम । गुरुदीक्षाविहीनस्य पुरतो न पठेत्क्वचित ।
भव दुख का । नाश करने वाली । इस गुरु गीता का । पाठ । गुरु दीक्षा विहीन । मनुष्य के आगे । कभी नहीं । करना चाहिए । 205
हस्यमरत्यन्तरहस्यमेतन्न पापिना लभ्यमिदं महेश्वरि । अनेकजन्मार्जितपुण्यपाकाद गुरोस्तु तत्वं लभते मनुष्यः ।
हे महेश्वरी ! यह रहस्य । अत्यंत गुप्त । रहस्य है । पापियों को । वह नहीं मिलता । अनेक जन्मों के । किये हुए । पुण्य के । परिपाक से ही । मनुष्य । गुरु तत्व को । प्राप्त कर सकता है । 206
सर्वतीर्थवगाहस्य संप्राप्नोति फलं नरः । गुरोः पादोदकं पीत्वा शेषं शिरसि धारयन ।
गुरु के । चरणामृत का । पान करने से । और उसे । मस्तक पर धारण करने से । मनुष्य सब तीर्थों में । स्नान करने का । फल प्राप्त करता है । 207
गुरुपादोदकं पानं गुरोरुच्छिष्टभोजनम । गुरुर्मूर्ते सदा ध्यानं गुरोर्नाम्नः सदा जपः ।
गुरु के । चरणामृत का । पान करना चाहिए । गुरु के । भोजन में से । बचा हुआ खाना । गुरु की मूर्ति का । ध्यान करना । और गुरु नाम का । जप करना चाहिए । 208
गुरुरेको जगत्सर्वं बृह्मविष्णुशिवात्मकम ।  गुरोः परतरं नास्ति तस्मात्संपूजयेद गुरुम ।
बृह्मा । विष्णु । शिव सहित । समग्र जगत । गुरु में समाविष्ट है । गुरु से अधिक । और कुछ भी । नहीं है । इसलिए गुरु की । पूजा करनी चाहिए । 209
ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभ्यते गुरुभक्तितः । गुरोः समानतो नान्यत् साधनं गुरुमार्गिणाम ।
गुरु के प्रति ( अनन्य ) भक्ति से । ज्ञान के बिना भी । मोक्ष पद । मिलता है । गुरु के मार्ग पर । चलने वालों के लिए । गुरु के समान । अन्य कोई साधन नहीं है । 210
गुरोः कृपाप्रसादेन बृह्मविष्णुशिवादयः । सामर्थ्यमभजन सर्वे सृष्टिस्थित्यंतकर्मणि ।
गुरु के । कृपा प्रसाद से ही । बृह्मा । विष्णु । और शिव । यथा कृम । जगत की सृष्टि । स्थिति । और लय करने का । सामर्थ्य प्राप्त करते हैं । 211
मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम । स्मृतिवेदपुराणानां सारमेव न संशयः ।
हे देवी ! गुरु । यह दो अक्षर वाला । मंत्र । सब मंत्रों में । राजा है । श्रेष्ठ है । स्मृतियाँ । वेद । और पुराणों का । वह सार ही है । इसमें संशय नहीं है । 212
यस्य प्रसादादहमेव सर्वं मय्येव सर्वं परिकल्पितं च । इत्थं विजानामि सदात्मरूपं त्स्यांघ्रिपद्मं प्रणतोऽस्मि नित्यम ।
मैं ही सब हूँ । मुझमें ही सब कल्पित है । ऐसा ज्ञान । जिनकी कृपा से हुआ है । ऐसे आत्म स्वरूप । गुरु के । चरण कमलों में । मैं नित्य प्रणाम करता हूँ । 213
अज्ञानतिमिरान्धस्य विषयाक्रान्तचेतसः । ज्ञानप्रभाप्रदानेन प्रसादं कुरु मे प्रभो ।
हे प्रभो ! अज्ञान रूपी । अंधकार में । अंध बने हुए । और विषयों से । आक्रान्त चित्त वाले । मुझको । ज्ञान का । प्रकाश देकर । कृपा करो । 214
इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमा महेश्वर संवादे श्री गुरु गीतायां तृतीयोऽध्यायः
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