रविवार, अगस्त 14, 2011

हे प्रभु ! ज्ञान और मुक्ति कैसे प्राप्त होती है ? अष्टावक्र गीता । अध्याय 1

कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति । वैराग्य च कथं प्राप्तमेतद ब्रूहि मम प्रभो । 1-1
राजा जनक ।  अष्टावक्र जी से बोले - हे प्रभु ! ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है ? मुक्ति कैसे प्राप्त होती है ? वैराग्य कैसे प्राप्त किया जाता है ? ये सब मुझे बतायें ।
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान विषवत्त्यज । क्षमार्जवदयातोष सत्यं पीयूषवद्भज । 1-2
तब अष्टावक्र बोले - यदि आप । मुक्ति चाहते हैं । तो अपने मन से । विषयों ( वस्तुओं के उपभोग की इच्छा ) को । विष की तरह । त्याग दीजिये । क्षमा । सरलता । दया । संतोष । तथा सत्य का । अमृत की तरह । सेवन कीजिये ।
न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुर्द्यौर्न वा भवान । एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये । 1-3
आप न । पृथ्वी हैं । न जल । न अग्नि । न वायु । अथवा आकाश ही हैं । मुक्ति के लिये । इन तत्त्वों के । साक्षी । चैतन्यरूप आत्मा को ही । जानिये ।
यदि देहं पृथक कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि । अधुनैव सुखी शान्तो बन्धमुक्तो भविष्यसि । 1-4
यदि आप । स्वयं को । इस शरीर से । अलग करके । चेतना में । विश्राम करें । तो तत्काल ही । सुख । शांति । और बंधन मुक्त । अवस्था को । प्राप्त होंगे ।
न त्वं विप्रादिको वर्ण: नाश्रमी नाक्षगोचर: । असङगोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव । 1-5
आप ब्राह्मण । आदि सभी जातियों । अथवा बृह्मचर्य आदि । सभी आश्रमों से । परे हैं । तथा आँखों से । दिखाई न पड़ने वाले हैं । आप निर्लिप्त । निराकार । और इस विश्व के साक्षी हैं । ऐसा जानकर सुखी हो जायें ।
धर्माधर्मौ सुखं दुखं मानसानि न ते विभो । न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा । 1-6
धर्म । अधर्म । सुख । दुख । मस्तिष्क से । जुड़े हैं । सर्व व्यापक । आपसे नहीं । न आप । करने वाले हैं । और न । भोगने वाले हैं । आप सदा । मुक्त ही हैं ।
एको दृष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा । अयमेव हि ते बन्धो दृष्टारं पश्यसीतरम । 1-7
आप । समस्त विश्व के । एकमात्र दृष्टा हैं । सदा मुक्त ही हैं । आपका बंधन । केवल इतना है । कि आप । दृष्टा । किसी और को । समझते हैं ।
अहं कर्तेत्यहंमानमहाकृष्णाहिदंशितः । नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखं भव । 1-8
अहंकार रूपी । महा सर्प के । प्रभाववश । आप । मैं कर्ता हूँ । ऐसा मान लेते हैं । मैं कर्ता नहीं हूँ । इस । विश्वास रूपी । अमृत को । पीकर सुखी हो जाइये ।
एको विशुद्धबोधोऽहं इति निश्चयवह्निना । प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव । 1-9
मैं एक । विशुद्ध ज्ञान हूँ । इस निश्चय रूपी । अग्नि से । गहन । अज्ञान वन को । जला दें । इस प्रकार । शोक रहित होकर । सुखी हो जायें ।
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत । आनंदपरमानन्दः स बोधस्त्वं सुखं चर । 1-10
जहाँ ये विश्व । रस्सी में सर्प की तरह । अवास्तविक लगे । उस आनंद । परम आनंद की । अनुभूति करके । सुख से रहें ।
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि । किवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत । 1-11
स्वयँ को । मुक्त मानने वाला । मुक्त ही है । और बद्ध । मानने वाला । बंधा हुआ ही है । यह कहावत । सत्य ही है कि । जैसी बुद्धि । होती है । वैसी ही । गति होती है ।
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः । असंगो निःस्पृहः शान्तो भृमात्संसारवानिव । 1-12
आत्मा साक्षी । सर्वव्यापी । पूर्ण । एक । मुक्त । चेतन । अक्रिय । असंग । इच्छा रहित । एवं शांत है । भृमवश ही । ये सांसारिक प्रतीत होती है ।
कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मानं परिभावय । आभासोऽहं भृमं मुक्त्वा भावं बाह्यमथान्तरम । 1-13
अपरिवर्तनीय । चेतन व अद्वैत । आत्मा का । चिंतन करें । और " मैं " के । भृम रूपी । आभास से मुक्त होकर । बाह्य विश्व की । अपने अन्दर ही भावना करें ।
देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक । बोधोऽहं ज्ञानखंगेन तन्निष्कृत्य सुखी भव । 1-14
हे पुत्र ! बहुत समय से । आप - मैं शरीर हूँ । इस भाव बंधन से । बंधे हैं । स्वयँ को । अनुभव कर । ज्ञान रूपी तलवार से । इस बंधन को । काटकर । सुखी हो जायें ।
निःसंगो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः । अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठति । 1-15
आप असंग । अक्रिय । स्वयं प्रकाशवान । तथा सर्वथा । दोषमुक्त हैं । आपका ध्यान द्वारा । मस्तिष्क को शांत रखने का । प्रयत्न ही । बंधन है ।
त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः । शुद्धबुद्धस्वरुपस्त्वं मा गमः क्षुद्रचित्तताम । 1-16
यह विश्व । तुम्हारे द्वारा । व्याप्त किया हुआ है । वास्तव में तुमने । इसे व्याप्त किया हुआ है । तुम शुद्ध । और ज्ञानस्वरुप हो । छोटेपन की । भावना से । गृस्त मत हो ।
निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः । अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासन: । 1-17
आप इच्छारहित । विकार रहित । घन ( ठोस ) शीतलता के धाम । अगाध बुद्धिमान हैं । शांत होकर । केवल चैतन्य की । इच्छा वाले । हो जाइये ।
साकारमनृतं विद्धि निराकारं तु निश्चलं । एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसंभव: । 1-18
आकार को । असत्य जानकर । निराकार को ही । चिर स्थायी मानिये । इस तत्त्व को । समझ लेने के बाद । पुनः जन्म लेना । संभव नहीं है ।
यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेऽन्तः परितस्तु सः । तथैवाऽस्मिन शरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः । 1-19
जिस प्रकार । दर्पण में । प्रतिबिंबित रूप । उसके अन्दर भी है । और बाहर भी । उसी प्रकार । परमात्मा । इस शरीर के । भीतर भी । निवास करता है । और उसके बाहर भी ।
एकं सर्वगतं व्योम बहिरन्तर्यथा घटे । नित्यं निरन्तरं बृह्म सर्वभूतगणे तथा । 1-20
जिस प्रकार । एक ही आकाश । पात्र के भीतर । और बाहर व्याप्त है । उसी प्रकार । शाश्वत । और सतत । परमात्मा । समस्त प्राणियों में । विद्यमान है ।

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