गुरुवार, नवंबर 17, 2011

बुद्धिमान पुरुष द्वन्द रहित हैं - अष्टावक्र गीता अध्याय - 16

अष्टावक्र उवाच - आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकशः । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद ऋते । 16-1
अष्टावक्र बोले - हे तात ! अनेक प्रकार से । अनेक शास्त्रों को । कह या सुन लेने से भी । बिना सबका विस्मरण किये । तुम्हें शांति नहीं मिलेगी । 1
भोगं कर्म समाधिं वा कुरु विज्ञ तथापि ते । चित्तं निरस्तसर्वाशमत्यर्थं रोचयिष्यति । 16-2
हे विज्ञ ( पुत्र ) ! चाहे तुम । भोगों का भोग करो । कर्मों को करो । चाहे तुम । समाधि को लगाओ । परन्तु सब आशाओं से । रहित होने पर ही । तुम अत्यंत सुख को । प्राप्त कर सकोगे । 2
आयासात्सकलो दुःखी नैनं जानाति कश्चन । अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निर्वृतिम । 16-3
शरीर निर्वाहार्थ ) परिश्रम करने के कारण ही । सभी मनुष्य दुखी हैं । इसको कोई नहीं जानता है । सुकृती ( महा ) पुरुष इसी उपदेश से । परम सुख को प्राप्त होते हैं । 3
व्यापारे खिद्यते यस्तु निमेषोन्मेषयोरपि । तस्यालस्य धुरीणस्य सुखं नन्यस्य कस्यचित । 16-4
जो नेत्रों के ढकने । और खोलने के । व्यापार से । खेद को प्राप्त होता है । उस आलसी पुरुष को ही सुख है । दूसरे किसी को नहीं । 4
इदं कृतमिदं नेति द्वंद्वैर्मुक्तं यदा मनः । धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत । 16-5
यह किया गया है । यह नहीं किया गया है । मन जब । ऐसे द्वन्द से । मुक्त हो जाय । तब वह धर्म । अर्थ । काम । और मोक्ष आदि से । निरपेक्ष ( इच्छा रहित ) होता है । 5
विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः । ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान । 16-6
बिषय का द्वेषी । विरक्त है । बिषय का लोभी । रागी है । ग्रहण और त्याग से रहित पुरुष । न ही त्यागी है । और न ही राग वान है । 6
हेयोपादेयता तावत्संसारविटपांकुरः । स्पृहा जीवति यावद वै निर्विचारदशास्पदम । 16-7
जब तक तृष्णा । जब तक अविवेक दशा की स्थिति है । तृष्णा युक्त पुरुष । तब तक जीता है । त्याज्य और ग्राह्य भाव । संसार रुपी वृक्ष का अंकुर है । 7
प्रवृत्तौ जायते रागो निर्वृत्तौ द्वेष एव हि । निर्द्वन्द्वो बालवद धीमान एवमेव व्यवस्थितः । 16-8
प्रवृत्ति में राग होता है । निवृत्ति में द्वेष होता है । इसीलिए बुद्धिमान पुरुष । द्वन्द रहित होकर । जैसे है । उसी भाव में स्थित रहते हैं । 8
हातुमिच्छति संसारं रागी दुःखजिहासया । वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति । 16-9
रागवान पुरुष । दुःख निवृत्ति की । इच्छा से । संसार को । त्यागना चाहता है ।  राग रहित पुरुष । निश्चय करके । दुःख से मुक्त होकर । संसार के बने रहने पर भी । खेद को नहीं प्राप्त होता है । 9
यस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा ।  न च ज्ञानी न वा योगी केवलं दुःखभागसौ । 16-10
जिसको मोक्ष । और देह का भी । अभिमान है । वह न ही । ज्ञानी है । और न ही । योगी है । वह केवल दुःख का भागी है । 10
हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा । तथापि न तव स्वाथ्यं सर्वविस्मरणादृते । 16-11
अगर तुम्हारा उपदेशक ( गुरु ) शिव । विष्णु अथवा बृह्मा भी हो । तो भी बिना सबके विस्मरण ( त्याग ) के तुम्हें शांति नहीं मिलेगी । 11

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