मंगलवार, जून 22, 2010

प्रलय में पानी की भूमिका..

मेरी तरह चालीस साल के बूढे ( 40 year old ) बस अपनी जिंदगी को पच्चीस तीस बरस पीछे ले जाँय । आ हा हा..छोटे शहर । कम आवादी । गरीब अमीर सबके पास बङे बङे मकान । मकान के आगे । उससे भी बङा चबूतरा । जितने में बनता है । आज पूरा मकान ? चबूतरे पर खङे एक या दो विशाल नीम आदि के पेङ । न t .v . । न बिजली । दरवाजे पर बिछी चार छह चारपाइयों पर मजे से हँकती हुयी गप्पें । this is my india..i love my india . तभी कुछ लोगों को प्यास महसूस होती है । और घर के पप्पू गप्पू तुरन्त कुँआ से ताजा ठंडा पानी निकालकर पिलाते हैं । निसंदेह बहुत लोगों को यह सब याद होगा । बू ..हू..हू.. जिस तरह मरने से पूर्व मरने वाले को अपना सब किया धरा याद आ जाता है । और उस समय हाथ जोङ जोङकर वह उन लोगों से स्वतः माफ़ी माँगता है ।जिनके साथ कभी उसने भारी ज्यादती की थी । ठीक वैसे ही आज मुझे कुँआ ..तालाब ..पोखर..झील..सब याद आ रहें है । जिनके न होने से आज हम प्रलय के द्वार पर आकर खङे हो गये । प्रलय का काउंटडाउन शुरु हो चुका है । लेकिन प्रलय का कुँआ तालाब या समर्सिबल पम्प से क्या ताल्लुक ? आइये विचार करते हैं । 2014 to 2015 के आसपास होने बाली प्रलय के मुख्य कारणों में से कुँओं तालाब का न होना । और समर या जेट पम्प का बहुत होना भी मुख्य भूमिका निभाने जा रहा है । " ये प्रलय जगह जगह धरती के चटखने और विशाल मात्रा में जहरीली गैसों के रिसाव से होगी । ये गैसे निसंदेह " मानवीय अत्याचार से क्रुद्ध " देवी प्रथ्वी के गर्भ से एक विनाशकारी जलजले के रूप में आयेंगी । अब जरा विचार करें ऐसा होगा क्यों ? प्रथ्वी के आंतरिक हिस्सों में बैलेंस बनाये रखने के लिये । उसके गर्भ में खौलते लावे की तपन शान्त करने के लिये विशाल मात्रा में उस पानी की आवश्यकता होती है । जो विभिन्न गढ्ढों ..तालावों..पोखरों कुओं आदि के माध्यम से संचित होता था । पहले के समय में अधिकतर कच्ची भूमि भी इसमें भारी सहयोग करती थी । आज यदि गिने चुने पार्क जैसी जगहों को छोङ दें । तो हर तरफ़ पक्की जमीन का बोलबाला हैं । फ़ोर वे 8 वे जैसे पूरी दुनिया में फ़ैली सङकें । कंक्रीट के जंगलों की तरह चारों और फ़ैले अनगिनत पक्के भवन । कहने का आशय ये है । कि कच्ची जमीन और मिट्टी आज दुर्लभ होती जा रही है । लगभग पूरी प्रथ्वी में घर घर में लगे समर्सिबल पम्प बेहद तेजी से प्रथ्वी के स्रोतों से बचा खुचा पानी समाप्त करते जा रहें हैं । और इस्तेमाल के बाद ये पानी पक्की नालियों नालों और फ़िर नदी नहरों के माध्यम से समुद्र में चला जाता है । इस तरह प्रथ्वी का एक बङा हिस्सा जाने कब से प्यासा है । और हम उसकी प्यास बुझाने के स्थान पर उसका बचा खुचा पानी भी तेजी से छीन रहे हैं ।इस तरह देखा जाय । तो प्रथ्वी के वही हिस्से प्यासे हैं जहाँ हम रहते हैं । और इन्ही स्थानों पर प्रथ्वी के अंदर पानी की कमी है । इस तरह पूरे विश्व में ऐसे स्थान प्रथ्वी के कहर का शिकार होगें । और भाग्यवश आज भी जिन जगहों पर पुराने समय
जैसी स्थिति है । वे " तथाकथित पिछङे और आपकी नजर में घटिया इलाके " प्रथ्वी की दया , सहानुभूति , और विशेष प्रेम के पात्र होंगे और निसंदेह उसके क्रोध से बचे रहेंगे ।
प्रलय में एक भूमिका हमारी आधुनिक फ़्लश लैट्रीन की भी होगी । वजह प्रथ्वी के बैलेंस में महत्वपूर्ण रोल अदा करने में हमारे द्वारा त्याज्य मल । पशुओं आदि के द्वारा त्याज्य मल का भी बहुत बङा हाथ होता है । पहले ये सभी मल खेतों और कच्ची जमीन में सप्लाई होता था । ये मल और इसमें हो जाने वाले सुङी , गिडार ,गुबरेला , ढोर आदि केंचुआ नुमा कीङे दोनों ही जमीन की मिट्टी को काफ़ी गहरायी तक भुरभुरा बना देते थे । इससे जो बरसात होती थी । उसका काफ़ी पानी जमीन के अन्दर समा जाता था ।(आज वो पानी जमीन कठोर होने से ऊपर ही ऊपर रहकर नालियों आदि के द्वारा बेकार बह जाता है । ) आज हमने खाद के रूप में अपना मल छोङो । पशुओं का मल भी जमीन खेतों आदि को देना बन्द कर दिया । फ़लस्वरूप अधिकांश स्थानों की जमीन की ऊपरी परत कठोर हो चुकी है । और पानी नहीं सोख पाती है । जिस प्रकार सामान्य भाषा में बिजली में ठंडे और गर्म दो तार कहे जाते है । ये दोनों तार सही होने पर बिजली सही काम करती है । इसी प्रकार अनेकानेक विभिन्न स्रोतों से सोखा गया पानी प्रथ्वी को ठंडा और शांत रखने में अपनी भूमिका निभाता है । अब प्रथ्वी के अंदर ज्वालामुखी आदि ज्वलनशील क्रियाएं तो बखूबी हो रही हैं । पर उन्हें बैलेंस करने बाला जल नहीं है । लिहाजा प्रथ्वी की " परत " दिनोंदिन कमजोर होती जायेगी । और अंत में जगह जगह से प्रथ्वी से आग उसी तरह अग्नि फ़ब्बारे के रूप में निकलेगी । मानों प्रथ्वी दीबाली पर " अनार " नाम से मशहूर पठाखा चला रही हो ।
अंत में मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा । कि हम विनाश की दहलीज पर आकर खङे हो गये हैं । और ये 65 % का विनाश करने वाली प्रलय किसी भी हालत में नहीं टलेगी । चाहे बैग्यानिक इसके लिये कोई उपाय करे या फ़िर सरकार । प्रलय तो अब होकर रहेगी । प्रलय के बारे में और विस्त्रत जानने के लिये मेरे ब्लाग्स में प्रलय 2012..को भी देखें । प्रलय की सिर्फ़ ये ही वजहें नहीं हैं । बल्कि और भी वजहें होंगी । जिसके बारे में आगे फ़िर बात होगी ।
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Agra, uttar pradesh, India
भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।

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