सोमवार, जून 28, 2010

विधा दो प्रकार की होती है ।

विधा दो प्रकार की होती है ।
1--अपरा--कहना , सुनना , देखना , लिखना , पढना , आदि भौतिक तत्वो के मध्य सब कुछ आदि ।
2-- परा-- न वाणी के माध्यम से कही जाती है । न इन्द्रियों द्वारा देखी कही सुनी जाती है । और भौतिक से संगत नहीं करती । इसे " सहज योग " राज योग " राज विधा " ब्रह्म विधा " या गुहियम भेद भी कहा गया है । जो पराविधा का अभ्यास करता है । वह ग्यान तथा विग्यान दोनों को पाकर । विग्यान के परे जाकर परमात्मा का स्वरूप अनुभव करता है । जो अंतकरणः के सबसे भीतरी स्थान के समस्त ग्यान का आदिकरण है । अपने शरीर को मानना ही परिवर्तन है । यानी जन्म मरण है । कर्तापन के अभिमान से ही यह अच्छा बुरा भोगता है ।सुष्मणा से कन्ठ पर चूल्हे की आकृति की " हुता " नामक नाङी स्थित है । इस नाङी से जीव संगत करता है । और संस्कारों को उसी नाङी में जमा करता है । उन्ही संस्कारों का प्रतिफ़ल पाता है । और अंत समय अपने साथ ले जाता है । कन्ठ देश से ऊपर जिहवा का तन्तु है । उसको जानने से तन्तु भूख प्यास की चेष्टा बन्द कर देता है । जीव अंत समय में संसार की जिन वस्तुओं का ध्यान करता है । उन्ही के आकार का । उसी के अनुसार शरीर धारणकर भोग भोगने पङते हैं ।
अब आईये वाणी के बारे में जानें ?
वाणी चार प्रकार की होती है । 1--बैखरी--तेज चिल्लाकर बोलना । 2--मध्यमा--साधारण बातचीत । 3--पश्यन्ति--ऊँ आँ ओ..एई..आ..अह..आदि । 4--परा--जीभ को तालू से लगाकर स्वांस को नाभि तक पूरा जाने दें । तथा फ़िर बाहर पूरी तरह से निकालें । फ़िर उसके अन्दर ध्यान से सुनने पर एक " ध्वनात्मक शब्द " सुनाई देता है । वह परावाणी है । इसी वाणी में वह अक्षर निहित है ।
सन्यास चार प्रकार का होता है । 1--मीन--मछली जैसे पानी की धारा विचार करती हुयी चङती चली जाती है ।
2--मरकट-- जिस प्रकार बन्दर एक डाली से दूसरी डाली पर कूदने में संजम कर वापस लौट आता है ।
3--विहंगम--पक्षी आकाश में उङता चला जाता है । और आगे का ग्यान न होने पर वापस लौट आता है ।
4--शून्य--साधक इन्द्रियों के परे जाकर प्राण में अक्षर में मिल जाता है । यह अक्षर शून्य से सता रखता है ।
यह योगी अत्यन्त श्रेष्ठ योगी है । वह शक्तियों को प्राप्त कर चारों पदार्थों को पाता है ।
विशेष--योगी भ्रंग की ध्वनि का अभ्यास नित्य करे तो संस्कार से रहित हो जाता है । यह ध्वनि साधक जिह्वा को तालू से लगाकर नाभि स्वांस को बहुत धीमी गति से देर तक निकाले । तथा देर तक धीरे धीरे स्वांस को कुम्भक करे । और अपने ध्यान को कंठ पर दृणता से जमाये । तो वहाँ भ्रंग ध्वनि पैदा हो जायेगी । तब कंठ की " हुता " नाङी में रखे सब संस्कार जलकर भस्म हो जायेंगे । जो स्वांस ऊपर को जाता है । वह " संस्कार " शब्द का उच्चारण करता हुआ नाभि पर ठहरता है । नाभि से बाहर आने वाला स्वांस " हंकार " शब्द को प्रकट करता हुआ आता है । वह हंसा प्राण का ही शब्द है । बार बार स्वांस के आने जाने में प्राण में " हंसो हंसो " शब्द पलटकर " सोहं सोहं " का शब्द प्रकट होता है । इस का अभ्यास योग के द्वारा करके क्रियात्मक रूप से योगीजन योग में पारंगत हो जाते हैं । आत्मा ( हंस ) शरीर में सात द्वार ऊपर है । मुख , नाक , कान आँख सात द्वार ऊपर हैं । तथा गुदा और लिंग दो द्वार नीचे हैं । ये नौ द्वार हैं । आत्मा हंस रूप में आने जाने वाली स्वांस के द्वारा सारे शरीर में व्यापक स्थित है । " हंसो..सोहंग " प्राणवाक्य हंस शब्द ग्यान और मोक्ष यानी मुक्ति का साधन रूप है । रात दिन 24 घन्टो में स्वांस गति ( गिनती ) 21600 है । यह " हंसो " ही अजपा है । इसी को प्रणव मन्त्र या महामन्त्र भी कहते है । यह तत्व से जीव जपता है ।
बार बार प्राण वायु को शरीर से बाहर निकालने का तथा यथाशक्ति बाहर रोके रहने का आग्रह अभ्यास करने से मन में निर्मलता आ जाती है । तथा शरीर में सभी नाङियां साफ़ होकर मल से रहित हो जाती है । फ़िर शरीर किसी भी प्रकार के रोग " वात पित्त कफ़ " से रहित होकर शक्ति को प्राप्त करता है । इस प्रकार के विषय जीवों को लगे हैं । शब्द यानी ध्वनि का विषय सर्प और मृग आदि को लगा है । वह बीन के वश में हो जाता है । रूप का विषय " पतंगा को लगा है । प्रकाश की लौ पर आकर्षित होकर जलकर मर जाता है । रस " मछली " को स्वाद की खातिर कांटे में फ़ँसकर मर जाती है । गन्ध का विषय " भंवरा " को लगा है । कमल के फ़ूल में बन्द होकर मर जाता है । स्पर्श का विषय " हाथी " को प्रिय है । भूसा भरी हथिनी को देखकर काम स्पर्श के उद्देश्य से उसके समीप जाता है । और कैद कर लिया जाता है । शब्द रूप रस गन्ध स्पर्श ये पाँचों विषय मनुष्य को लगे हैं । इन्ही से बन्धन में है ।
सूक्ष्म तन्मात्राओं में ये पाँच अनुभव होते हैं । शब्द में दिव्य शब्द । रूप में अदभुत रूप । रस में जिह्वा पर
अनुभूति ।गन्ध में विशेष गन्ध । स्पर्श में परमात्म स्पर्श । एक भी तन्मात्रा प्राप्त होने पर परमात्मा का
सानिंध्य पाने लगता है । बीज मन्त्र सात है । " ॐ , ह्यीं , श्रीं , क्लीं , एं , रंग . सोहंग " और अंत में " दोष पराया देख कर चले हसंत हसंत । अपनो याद न आवये जाको आदि न अंत । "
अब एक विशेष बात -- ये कुछ लेख मैंने पाठको के विशेष आग्रह पर लिखे है । इसलिये मैं बता देना चाहता हूँ कि ये " योग और योगियों का ग्यान है । इस से शक्ति प्राप्त होती है । आत्मग्यान या परमात्मा नहीं । उक्त ग्यान को मेरे अनुसार " भक्ति " नहीं कह सकते । दूसरे आप इनमें से कोई क्रिया प्रक्टीकल के तौर पर न करें । ये सामान्य बात नहीं है । इनको विशेष देखरेख में करना होता है ।
विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "

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