बुधवार, जून 30, 2010

सांख्य और योग में समाधि लाभ

आत्मा तथा परमात्मा का अस्तित्व प्रमाण और लक्षण से सिद्ध करने के बाद शोधकर्ताओं ने न केवल आत्मा का या परमात्मा का बल्कि अतीन्द्रिय जङ पदार्थों का भी रहस्य जानने के लिये योग साधना को ही उपयुक्त माना है । और अन्य साधनों से यह प्राप्त नहीं होगा । ऐसा निश्चय किया है । आत्मा और मन का जब योग समाधि द्वारा प्रत्यक्ष संयोग होता है । तब उस संयोग से ही आत्मा का प्रत्यक्ष होता है । इसी प्रकार सूक्ष्म और इन्द्रियों से परे पदार्थों का भी प्रत्यक्ष या देखना होता है । जो योगी समाधि को समाप्त कर चुके हैं । वो विना समाधि अवस्था के ही इनको देखते हैं । आत्मा में प्रविष्ट होने से आत्मा के गुणों को जाना जाता
है । समाधि विशेष के अभ्यास से तत्व ग्यान को जाना जा सकता है । सांख्य के समान दूसरा ग्यान नहीं । योग के समान दूसरा बल नहीं । ऐसा पुरातन प्रमाण कहा गया है । चित्त को नाश करके योग में गति होती है । अतः चित्त को नाश करने की दो निष्ठायें कहीं जाती हैं । ये सांख्य और योग हैं । चित्त वृति के निरोध से योग और सम्यक ग्यान से सांख्य की प्राप्ति होती है । सांख्य और योग अलग अलग नहीं हैं । दोनों का फ़ल एक ही है ।
योग द्वारा अंतर्मुख होने के लिये । यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार । ये पाँच बाह्य उपाय हैं । धारणा ध्यान समाधि । ये तीन आन्तरिक उपाय हैं । सांख्य द्वारा अंतर्मुख होने के लिये पाँच बाह्य उपाय योग के ही होते हैं । योग में धारणा ध्यान समाधि किसी विषय को ध्येय बनाकर करते हैं । इसके विपरीत सांख्य में बिना ध्येय के अन्तर्मुख होते हैं । इसमें चित्त और उसकी वृतियां तीन गुणो वाली हैं । यानी गुण ही गुणों में वरत रहे हैं । इस भाव से आत्मा को चित्त से अलग करके देखते हैं । इस प्रकार वैराग द्वारा इस वइति का निरोध होने पर शुद्ध चैतन्यस्वरूप स्थित को देखते हैं ।
योग में उत्तम अधिकारियों के लिये असम्प्रग्यात समाधि लाभ के विशेष उपाय और ईश्वर प्रणिधान को इस
तरह जानें । यह ॐ की मात्राओं द्वारा उपासना है ।
वाणी से जाप--एक मात्रा वाले अकार ॐ की उपासना । इसमें स्थूल शरीर का अभिमान होता है । स्थूल शरीर से आत्मा की संग्या " विश्व " उपासक होता है । स्थूल शरीर से परमात्मा विराट है । वह उपास्य होता है ।
दूसरा " मानसिक जाप --अकार उकार दो मात्रा वाले ॐ की उपासना है । इसमें सूक्ष्म शरीर का अभिमान है ।सूक्ष्म शरीर से आत्मा की संग्या " तेजस " उपासक कही गयी है । सूक्ष्म जगत से परमात्मा हिरण्यगर्भ
उपास्य है ।
तीसरा " ध्यान ध्वनि जाप " है । अकार उकार मकार तीन मात्रा वाले ॐ की उपासना । इसमें कारण शरीर का अभिमान होता है । कारण शरीर से आत्मा की संग्या " प्राग्य " उपासक है । कारण जगत से परमात्मा " ईश्वर उपास्य है ।
( मेरे ख्याल से शास्त्रकारों से कहीं त्रुटि हुयी है । स्थूल से ईश्वर । सूक्ष्म से हिरण्यगर्भ । और कारण से विराट । ऐसा होना चाहिये । यह मत शास्त्रों के अनुसार है । संभवत टीकाकारों या मुद्रण में गलती से ऐसा हुआ हो । वैसे भी धर्म में " मतभेद " होना स्वाभाविक है । )
जब ये तीन मात्रा वाली ध्वनि सूक्ष्म होते होते निरुद्ध हो जाय । और अमात्र विराम रह जाय । तब यह कारण शरीर कारण जगत से परे शुद्ध परमात्म प्राप्ति रूप अवस्था है । जो प्राणि मात्र का ध्येय है । ( मेरे हिसाब से ऐसा कह सकते है । पर यही अंतिम सत्य नहीं है । और यही परमात्मा है । ये तो एकदम ही गलत है । यह योग की उच्च स्थित है । इससे ऊपर योग में ही तीन शरीर अन्य है । उनको प्राप्त करने के बाद परमात्मा के मार्ग पर दृष्टि जाती है । यह योगियों का मत है । संतो का नहीं ? ) सांख्य में उपरोक्त उपाय " ध्यानं निर्विषयं मनः " द्वारा है । इसके द्वारा जो वृति आये उसको दवाना होता है । अंत में सब वृतिया रुक जाने पर निरोध वृति का भी निरोध करें । यहीं स्वरूप को जानना है । योग का भक्ति का लम्बा मार्ग सुगम है । इसके विपरीत सांख्य के ग्यान का छोटा मार्ग कठिन है । " जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

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