गुरुवार, नवंबर 17, 2011

वह मुक्त हो जाता है - अष्टावक्र गीता अध्याय - 12

जनक उवाच - कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः । अथ चिन्तासहस्तस्माद एवमेवाहमास्थितः । 12-1
जनक बोले - पहले मैं । शारीरिक कर्मों से । निरपेक्ष ( उदासीन ) हुआ । फिर वाणी से । निरपेक्ष ( उदासीन ) हुआ । अब चिंता से । निरपेक्ष ( उदासीन ) होकर । अपने स्वरुप में स्थित हूँ । 1
प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः । विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः । 12-2
शब्द आदि । विषयों में । आसक्ति रहित होकर । और आत्मा के । दृष्टि का । विषय न होने के कारण । मैं निश्चल । और एकाग्र ह्रदय से । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 2
समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये । एवं विलोक्य नियमं एवमेवाहमास्थितः । 12-3
अध्यास ( असत्य ज्ञान ) आदि । असामान्य स्थितियों । और समाधि को । एक नियम के । समान देखते हुए । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 3
हेयोपादेयविरहाद एवं हर्षविषादयोः । अभावादद्य हे बृह्मन्न एवमेवाहमास्थितः । 12-4
हे बृह्म को । जानने वाले । त्याज्य ( छोड़ने योग्य ) और संगृहणीय से । दूर होकर । और सुख दुःख के । अभाव में । मैं अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 4
आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनं । विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः । 12-5
आश्रम । अनाश्रम । ध्यान और मन द्वारा । स्वीकृत । और निषिद्ध । नियमों को देखकर । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 5
कर्मानुष्ठानमज्ञानाद यथैवोपरमस्तथा । बुध्वा सम्यगिदं तत्त्वं एवमेवाहमास्थितः । 12-6
कर्मों के । अनुष्ठान रूपी । अज्ञान से । निवृत्त होकर । और तत्त्व को । सम्यक रूप से जानकर । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 6
अचिंत्यं चिंत्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ । त्यक्त्वा तदभावनं तस्माद् एवमेवाहमास्थितः । 12-7
अचिन्त्य के । सम्बन्ध में । विचार करते हुए भी । विचार पर ही । चिंतन । किया जाता है । अतः । उस विचार का भी । परित्याग करके । मैं । अपने स्वरुप में । स्थित हूँ । 7
एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ । एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ । 12-8
जो । इस प्रकार से । आचरण करता है । वह कृतार्थ ( मुक्त ) हो जाता है । जिसका । इस प्रकार का । स्वभाव है । वह कृतार्थ ( मुक्त ) हो जाता है । 8

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