सोमवार, मार्च 22, 2010

मोक्ष का द्वार कहाँ है

तुलसी रामायण मैं लिखा है ..
बड़े भाग मानुष तन पावा ,सुर दुर्लभ सद ग्रंथन ग़ावा । साधन धाम मोक्ष का द्वारा ,पाय न जेहि परलोक संवारा । सदग्रंथो मैं वर्णित देवताओं के लिए दुर्लभ ये मनुष्य शरीर हमे बड़े भाग्य से मिला है । ये पहली पंक्ति का अर्थ है और सामान्य है । लेकिन इसकी दूसरी पंक्ति गूड है । साधन धाम मोक्ष का द्वार ये शरीर है ।
इस शरीर से क्या साधन हो सकते है ?? और इसमें मोक्ष का द्वार कहाँ है ???
वास्तव मैं मोक्ष का रास्ता दसवें द्वार से होकर जाता है । हमारे शरीर के 9 द्वारों से हम परिचित है और इन्ही मैं हम वर्तते है... दो द्वार कानों के छेद है । म्रत्यु के उपरांत यदि आत्मा इन द्वारो से निकलता है तो विभिन्न प्रकार की प्रेत योनियों मैं जाता है क्योंकि शब्द कानो का विषय है और प्रेत आत्मा की पहचान शब्द से ही होती है । दो द्वार आँखों के छिद्र है इन से प्राण निकलने पर जीव कीट पतंगा योनियों मैं जाता है क्योंकि प्रकाश आँखों का विषय है और कीट पतंगों को प्रकाश से लगाव होता है ।
दो द्वार नाक के छिद्र है इनसे प्राण निकलने पर जीव हवा मैं रहने वाले पछियों की योनी मैं जाता है क्योंकि वायु नासिका का विषय है और पछि वायु मैं ही रहते है , एक द्वार मुंह का छिद्र है यहाँ से प्राण निकलने पर जीव पशुवत योनियों को प्राप्त होता है क्योंकि मुंह का कार्य सब प्रकार से शारीर का पोषण करना ही है और यही काम पशु भी करते है ।
एक द्वार लिंग या योनी का होता यहाँ से प्राण निकलने पर जीव जल जीवों की योनियों मैं जाता है क्योंकि इन इन्द्रियों से मूत्र के रूप मैं जल ही निकलता है । एक द्वार गुदा का होता है गुदा से प्राण निकलने पर जीव नरक को जाता है क्योंकि गुदा से विष्ठा के रूप जो गन्दगी निकलती है वह नरक के सामान ही होती है ..क्योंकि जीव इन्ही नो द्वारों मैं वरतता है इसलिए वह म्रत्यु के समय इन्ही से निकल जाता है और बड़ा कीमती ये मनुष्य शरीर व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है ।
मोक्ष का दसवां द्वार गुप्त है और इसी शरीर मैं है । अगर मनुष्य उसको जान ले और गुरु की बताई साधना कर ले तो वह फिर से मनुष्य जन्म का अधिकारी हो जाता है । और यदि साधना मैं थोड़ी ऊँचाई प्राप्त कर ले तो जन्म मरण के चक्कर से मुक्त हो जाता है ये दोनों ज्ञान ढाई अक्षर के महामंत्र से होते ही जिन्हे केवल सतगुरु से ही प्राप्त किया जा सकता है ।

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