बुधवार, जून 30, 2010

समाधि के विषय में ..।

आईये धारणा ध्यान समाधि के बारे में बात करते हैं ।
पहली " धारणा " है । ध्यान अवस्था में जब इन्द्रियाँ अन्तर्मुख हो जाती है । तब ध्य्र्य विषय । नाभि ह्रदयकमल । नाक का अग्र भाग । भृकुटि । ब्रह्मरन्ध्र आदि अध्यात्मिक देशरूप या विषय या चन्द्रध्रुव आदि बाहर देशरूप विषय इसी को ध्येय कहते हैं । ध्येय यानी ध्यान का विषय । इसमें स्थिर होना होता है । इसी एक ध्येय विषय में वृति को बाँधने को धारणा कहा गया है ।
दूसरा " ध्यान " है । ध्यान में चित्त जिस विषय में लगता है । वह विषय लगातार दिखाई दे । अन्य कुछ बीच में न आये और स्थिरता होने लगे । उसको ध्यान कहते हैं ।
तीसरा " समाधि " है । जिस विषय में धारणा करते हुये ध्यान के द्वारा वृति स्थिर होकर जब उसमें ध्येय केवल अर्थमात्र से नजर आता है । और ध्यान का स्वरूप शून्य जैसा हो जाता है ।उसे समाधि कहा गया है ।
जब किसी विषय में चित्त को ठहराते है । तब चित्त की वह विषयाकारवृति तीनों आकारों के इकठ्ठी होने से त्रिपुटी होती है । समाधि का अनुभव इस तरह होता है कि ये पता नहीं लगता कि मैं ध्यान कर रहा हूँ ।
लेकिन जब धारणा ध्यान समाधि एक ही विषय में करनी हो तो उसको " सयंम " कहते हैं । अभ्यास के बल से सयंम का परिपक्व हो जाना सयंम की जीत है । सयंम को स्थूल सूक्ष्म आलम्बन के भेद से रहती हुयी चित्तवृतियों में लगाना चाहिये । पहले स्थूल को जीतें फ़िर सूक्ष्म को । इस तरह कृमशः नीचे की भूमियों को जीतें । तदुपरान्त ऊपर की भूमि में सयंम करें । नीचे की भूमियों को जीते विना ऊपर की भूमियों में सयंम करने वाला विवेक ग्यान रूपी फ़ल नहीं पाता । यदि ईश्वर के अनुग्रह से योगी का चित्त पहले ही उत्तरभूमि में लगने योग्य है । तो फ़िर नीचे लगाने की आवश्यकता नहीं होती । चित्त किस योग्यता का है । इसका ग्यान योगी को योग द्वारा स्वयं हो जाता है ।
आईये शब्द के बारे में जानें । शब्द तीन प्रकार का है । पहला वर्णात्मक है । क ख ग आदि जो वाणी रूपी इन्द्रिय से उत्पन्न होता है । दूसरा धुनात्मक या नादात्मक है । यह प्रयत्न द्वारा प्रेरित उदान वायु का परिणाम विशेष है । यही शब्दों की धारा को उत्पन्न करता हुआ श्रोता के कान तक जाता है ।
तीसरा स्फ़ोट होता है । यह अर्थव बोधक केवल बुद्धि से ग्रहीत होता है । निरवयव नित्य और निष्कर्म है । वर्ण शीघ्र उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं । इनका मेल नहीं होता । क्योंकि गौ = ग के समय औ नहीं है । पचति में इकार स्फ़ोट व्यंजक है । वैसे स्फ़ोट का बङा शास्त्रार्थ है । शब्द अर्थ ग्यान का परस्वर अध्यास भिन्नों में अभिन्न बुद्धि से होता है । आरोप को अर्थात में अन्य में अन्य बुद्धि करने को अध्यास कहते है ।
शब्दों का अर्थ और ग्यान के साथ संकेतरूप । इसका यह अर्थ है । यह अध्यास है । पर वास्तव में शब्द अर्थ और प्रत्यय तीनों भिन्न हैं । जब उनके भेद में योगी चित्त को एकाग्र करता है । तब उनका प्रत्यक्ष कर पशु पक्षियों की बोली जान लेता है । ये क्या बोल रहे हैं । योगियों में विचित्र शक्ति होती है । इसीलिये धारणा ध्यान समाधि की बेहद महिमा है । साधारण लोगों को जो शब्द अर्थ और ग्यान का भेद प्रतीत होता है । वह समाधि जन्य नहीं है । इससे वे नहीं जान सकते ।
संस्कार का साक्षात करने से पूर्व जन्मों का ग्यान होता है । संस्कार दो प्रकार के होते हैं । एक स्मृति बीज रूप में रहते हैं । जो स्मृति और कलेशों का कारण हैं । दूसरे विपाक के कारण वासना रूप में रहते हैं । जो जन्म आयु भोग और सुख दुख का कारण हैं । ये धर्म और अधर्म रूप हैं । ये सब संस्कार इस जन्म और पिछले जन्म में किये हुये कर्मों के कारण रिकार्ड की तरह चित्त में चित्रित रहते हैं । इसमें सयंम करने से जिस देश काल और निमित्त में वे संस्कार बने हैं । उनका ग्यान हो जाता है । दूसरों के संस्कार साक्षात करने से दूसरों का तथा आगे के संस्कार साक्षात करने से आगे का ग्यान हो जाता है ।
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