शनिवार, जनवरी 01, 2011

मौत का आहवान


महापुरूष रामतीर्थ - 22 अक्टूबर । 1873 को गुजरांवाला में एक बालक जन्मा । नाम रखा गया । तीर्थराम । पढने लिखने में कुशल तीर्थराम ने पंजाब भर में प्रथम स्थान प्राप्त एंट्रेंस परीक्षा उत्तीर्ण की । लाहौर जैसे शहर में छात्रवृति एवं टयूशन द्वारा खर्च निकालकर वे पढते रहे । बीए. में फिर वे प्रथम आए । एम.ए. का फार्म भर रहे थे तो अँगरेज प्रिंसिपल ने बडे़ स्नेह से पूछा, "क्या मैं तुम्हारा नाम इंडियन सिविल सर्विसेज (आई.सी.एस.) के लिए भेज दूँ । तुम योग्य हो । " तीर्थराम बोले ," मैंने यह ज्ञान का खजाना धन या उच्च पद पाने के लिए नहीं पाया । मै इस दौलत को बाँटना चाहता हूँ । मै सारा जीवन प्रभु की इस मानव जाति की सेवा करुँगा । तीर्थराम पर स्वामी विवेकानंद । जो उनसे दस वर्ष बडे थे । का बड़ा प्रभाव था । एक दिन वे उत्तराखंड के जंगलों की और निकल गए । नारायण स्वामी से उनका साक्षात्कार हुआ । यहीं वे रामतीर्थ बने । टेहरी नरेश के आग्रह पर । वे टोकियो में आयोजित विश्वधर्म सम्मेलन में गए । जापान । अमेरिका । यूरोप तथा मिस्र में उनने व्यावहारिक वेदांत की शिक्षा दी । सन 1906 की दीपावली पर उनकी लिखी । मौत का आहवान । नामक रचना अपने शिष्य को सौपने के बाद तैतीस वर्ष आयु में ही भागीरथी में जल समाधि ले ली । धन्य है यह देश । भारत । जहाँ ऐसे महापुरूष जन्मे ।
मौत का आहवान - 1909 की बात है । मथुरा नगर में आयोजित एक धर्म सम्मेलन में सभी धर्मों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया । सम्मेलन के अध्यक्ष थे । स्वामी रामतीर्थ । जिनकी प्रसिद्धि अच्छी खासी तब तक हो चुकी थी । न उनका कोई मठ था । न कोई आश्रम । ईसाइ धर्म के प्रतिनिधि फादर स्कॉट ने अपने धर्म का विवेचन करते हुए हिंदू धर्म पर कुछ भोंडे आक्षेप किए । यह उसने जान बूझकर किया था । ताकि लोग उत्तेजित हों । श्रोतागण क्षुब्ध हो गए । स्वामी जी ने सबको शांत रहने का आग्रह करते हुए बड़ी विनम्रता से फादर स्कॉट के एक एक आक्षेप का विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया । सबके समक्ष फादर ने माफी माँगी । वस्तुत: यह स्वामी जी के व्यक्तित्व । वाणी के तेज एवं उनके वाक चातुर्य के साथ अगाध ज्ञान का ही परिणाम था । तीर्थराम से रामतीर्थ बने स्वामी जी ने 1906 की दीपावली के दिन । मौत का आह्वान । नामक लेख लिखा और यह कहते हुए ," ऐ माँ की गोद के समान । शांतिदायिनी मृत्यु । आओ । इस भौतिक शरीर को ले जाओ । मैं शुद्ध । बुद्ध । निरूपाधि ब्रह्म हूँ । " गंगा में जलसमाधि ले ली । धन्य है भारतवर्ष । जिसे ऐसे संत । महापुरूषों की थाती मिली है ।
माथे पर तो भारत ही रहेगा - अपने ढाई वर्ष के अमरीकी प्रवास में स्वामी रामतीर्थ को भेंटस्वरूप जो प्रचुर धनराशि मिली थी । वह सब उन्होंने अन्य देशों के बुभुक्षितों के लिए समर्पित कर दी । उनके पास रह गयी । केवल एक अमरीकी पोशाक । स्वामी राम ने अमरीका से वापस लौट आने के बाद वह पोशाक पहनी । कोट पैंट तो पहनने के बजाय उन्होंने कंधों से लटका लिये और अमरीकी जूते पाँव में डालकर खड़े हो गये । किंतु कीमती टोपी की जगह उन्होंने अपना सादा साफा ही सिर पर बाँधा ।
जब उनसे पूछा गया कि इतना सुंदर हैट तो आपने पहना ही नहीं ? तो बड़ी मस्ती से उन्होंने जवाब दिया ." राम के सिर माथे पर तो हमेशा महान भारत ही रहेगा । अलबत्ता अमरीका पाँवों में पड़ा रह सकता है..। " इतना कह उन्होंने नीचे झुककर मातृभूमि की मिट्टी उठायी और उसे माथे पर लगा लिया ।
** श्री राजेंद्र माहेश्वरी जी द्वारा मेरे लेख जब सृष्टि 3 घन्टे को रुक गयी ?? पर comment के रूप में दी गयी । स्वामी रामतीर्थ । के बारे में यह जानकारी उपयोगी होने के कारण लेख रूप में प्रकाशित कर रहा हूं । श्री राजेंद्र माहेश्वरी जी । आपका बहुत बहुत आभार । महान संत स्वामी रामतीर्थ । के बारे में और जानने के लिये जब सृष्टि 3 घन्टे को रुक गयी ?? को भी पढें । राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ।

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