बुधवार, जनवरी 26, 2011

क्या यही परमात्मा है ?

2009 may की एक चिलचिलाती दोपहर थी । मैं अपने गुरुभाई गौतम के साथ तपोभूमि में बैठा हुआ था । उधर से गुजरते हुये मेरा इरादा किसी महात्मा के साथ बात करते हुये समय का सदुपयोग करना था । लेकिन अन्दर जाकर पता चला कि सभी महात्मा अपने अपने कक्ष में या पेङों की छाँह में औंघ रहे थे । एकाध महात्मा को राम राम श्याम श्याम करते हुये छेङने की कोशिश भी की । तो उन्होंने अधमुंदी आँखों से ही.. जय हो जय हो.. कहते हुये पुनः निद्रासन लगा लिया ।..जाने भी दो यारो..सोचते हुये मैं एक वृक्ष के नीचे बैठे हुये उस समय के बारे में सोचने लगा । जब 110 वर्ष पूर्व यह स्थान एक जंगल था । जहाँ दोपहर के इस समय तमाम चरवाहे आकर विश्राम करते हुये एकत्र महात्माओं से दुर्लभ ग्यान सुनते थे । पर इन सबसे बेखबर जमीन में अन्डरग्राउन्ड बनी एक छोटी सी कच्ची गुफ़ा में एक तपस्वी वर्षों से साधना में लीन थे । साधना उस स्तर पर पहुँच गयी थी कि गुफ़ा की दीवारों से स्वतः ही हरिहर..हरिहर का शब्द अनेक स्थानों से उच्चरित हो रहा था । इस बिना किसी माध्यम के होते शब्द को सुनने तमाम लोग आये । और तपस्वी का नाम ही हरिहर बाबा पङ गया । सच्चे संतो की इस तरह की तपस्थली की खासियत ही यह होती है कि यदि आप गहराई से किसी पूर्व समय का चिंतन करते हैं । तो TRANS होकर TRANCE में पहुँच जाते हैं । मेरे इस TRANCE को उस समय झटका सा लगा । जब तपोभूमि में एक ई बाइक आकर रुकी । और उससे दो युवतियाँ उतरी । मैंने गौतम की तरफ़ देखा । वह मन्त्रमुग्ध सा पेङ पर चहचहाती चिङियों को देख रहा था । ई बाइक से आने वाली महिलाओं में एक लगभग 37 वर्ष की सरदारनी थी । और दूसरी उसकी 17 साल की बेटी थी । उन्होंने एक उङती सी निगाह हम दोनों पर डाली । और सीधी दर्शन हेतु दिव्यगुफ़ा में चली गयीं । गूलर के वृक्ष से हर दो तीन सेकेंड में टपटप गूलर गिर रहे थे ।
दर्शन के बाद बाहर आकर उन दोनों ने किसी बुजुर्ग महात्मा की तलाश में इधर उधर देखा । पर सभी सोये हुये थे । वे अपनी बाइक की तरफ़ बङी । मैंने गौतम को इशारा किया । उसने एक्सक्यूज मी..कहते हुये मेरी तरफ़ इशारा कर दिया । दोनों ने कुछ आश्चर्य से मेरी तरफ़ देखा । मैंने जय गुरुदेव की अभिवादन करते हुये उनसे बात शुरू की ।
दरअसल मेरी जिग्यासा उनके बारे में जानने की थी । मैंने उनके गुरूजी के बारे में । उनके निवास आदि के बारे में बात की । जिसका उन्होंने बेहद झिझकते हुये उत्तर दिया । उन्हें नामदान लिये हुये लगभग आठ साल हो गये थे । बस यही तो वो बात थी । जिसके लिये मैंने उन्हें रोका था । मैंने कहा । कितनी देर तक अभ्यास कर लेती हो ? और अभ्यास कहाँ तक पहुँचा ?
इस पर माँ ने उत्सुकता से कहा । हमें जी । हमारे गुरुजी का दर्शन होता है । लङकी कुछ न बोलते हुये हमें देख रही थी । जब गौतम की हँसी न रुकने में आयी । तो वह चिङियों के बहाने ऊपर पेङ की ओर देखने लगा । ठहाका लगाने को इच्छुक अंतर्मन को मैंने बलपूर्वक नियंत्रित किया । और ऊपर से शालीनता से बोला । बहुत सुन्दर..अंतर में गुरुजी का दर्शन होना बङी उपलब्धि होती है । वैसे आपने और क्या क्या अनुभव किया ? क्योंकि गुरु के दर्शन से पहले बहुत कुछ रमणीय स्थल । चित्र विचित्र स्थान । डरावने सुखद अनुभव भी होते हैं ।
इस पर सरदारनी जी सकपका गयीं । झूठ आखिर कोई इंसान कितना बोल सकता है ? मैंने भी ये जाहिर नहीं किया । कि उनकी बात मुझे झूठ लगी थी । और कुछ सामान्य बातें करते हुये उन्हें सही बात बताने लगा । पहले कुछ बोरियत सी महसूस कर रही युवा लङकी सतर्क होकर दिलचस्पी से मेरी बात सुनने लगी । अच्छा जी । आप लोग कभी घर अवश्य आना । कहकर वे चली गयीं ।
मैं फ़िर से सोचने लगा । मैंने कहा । गौतम कितने ताज्जुब की बात है । शाश्वत सत्य का मार्ग चुनने के बाद । सत्यनाम की दीक्षा के बाद भी इंसान व्यवहारिक जिन्दगी की तरह यहाँ भी झूठ बोलता है । तुम एक अनुभवी साधक हो । यही प्रश्न अगर मैं तुमसे करता । तो क्या जबाब देते ?
गौतम ने कहा । राम भजो महाराज । अंतर में गुरु के दर्शन की विलक्षता को वाणी बयान भी नहीं कर सकती । अभी तो..वहाँ तक पहुँचने की बात मेरे लिये एक हसीन सपने के समान ही है ।
तमाम मत । तमाम मंडल । तमाम पंथ । तमाम साधुओं से जब भी मेरी बात होती है । तो मेरी समस्त जिग्यासा इसी बात को लेकर होती है । कि साधना का जो पथ चुनते हुये उन्होंने किसी मन्त्र से दीक्षित होकर जिन्दगी से पलायन किया । तो आखिर इस वैराग का फ़ल क्या मिला ?
कहीं ..दुविधा में दोनों गये । माया मिली ना राम..वाला हिसाब तो नहीं हो रहा । और आश्चर्य इस बात का अपनी प्राप्ति को जोरशोर से बताने वाले कुछ ही देर में लङखङा गये । और..महाराज..महाराज करने लगे । झूठ बोलने से क्या लाभ हो सकता है ? सिर्फ़ दूसरे के सामने अपने को ऊँचा साबित करना या अपने झूठे अहम की तुष्टि । 70 साल तक के हो चुके अनुभवी बुजुर्ग । जो किसी साधना मार्ग में 40 साल से हैं । वही एक । कई लोगों से सुनी सुनाई बात दोहराते हैं ।.. कुछ धुँधले धुँधले से चित्र दिखते हैं । जिसमें पहाङ घाटियाँ वृक्ष आदि दिखते हैं । ( और ये सच भी है । कुछ लगनशीलों को इतना दिखता भी है । ) पर क्या यही परमात्मा है ? यही दिव्य साधना है ? यही वो ग्यान है ? जिसके लिये करोङो वर्षों से तमाम ऋषि मुनि महर्षि अपने शरीर को गलाते रहे हैं । वृक्ष । पहाङ । घाटियाँ आदि सुरम्य स्थल मेरे घर से सिर्फ़ दो किमी दूर हैं । अगर वर्षों की साधना का फ़ल इन्हीं को देखना है । तो बिना किसी साधना के मैं प्रत्यक्ष इन्हें न सिर्फ़ कुछ ही मिनटों में देख सकता हूँ । बल्कि साथ में छोटे छोटे बच्चों को भी दिखा सकता हूँ ।
वास्तव में अंतर के तमाम बेहद निचले मंडलों में भी शुरूआत के समय यही दृश्य अक्सर पहले आता है । और इसका महत्वपूर्ण कारण ये है कि समस्त दृश्य अदृश्य सृष्टि अन्दर बाहर लगभग एक समान ही है । बस कहीं ये दिव्य । कहीं अति दिव्य । कहीं साधारण । और कहीं निम्न है । इसी हिसाब से इनकी निर्धनता और ऐश्वर्य झलकता है । इस तरह आप किसी बेहद निचले मंडल । तांत्रिक मंडल । प्रेतलोक आदि में भृमण कर भी लेते हैं ? और आपको सही बोध न होने के कारण । उसी को साधना का पूर्ण होना मान लेते हैं । यह कितनी बङी भूल है । सही मार्गदर्शन न होने से ऐसे ही साधक किसी नीच मंडल की आत्माओं से अटैच्ड होकर छोटे मोटे चमत्कार दिखाने लगते हैं । और पतन की उस गहरी घाटी में चले जाते हैं । जिसका अंत लाखों वर्ष का कठोर नर्क ही है । तब ऐसी साधना से क्या लाभ ? इससे अच्छा तो आप साधारण जीवन गुजारें । जिससे व्यर्थ का नर्क तो नहीं भोगना होगा ।
अद्वैत वैराग कठिन है भाई । अटके मुनिवर जोगी । अक्षर ही को सत्य बतायें । वे हैं मुक्त वियोगी ।
अक्षरतीत शब्द एक बाँका । अजपा हू से है जो नाका । जाहि लखे जो जोगी । फ़ेर जन्म नहिं होई ।

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