बुधवार, जनवरी 26, 2011

ज्योति पर ही समस्त योनियों के शरीर बनते हैं ।

अद्वैत वैराग कठिन है भाई । अटके मुनिवर जोगी । अक्षर ही को सत्य बतायें । वे हैं मुक्त वियोगी ।
अक्षरतीत शब्द एक बाँका । अजपा हू से है जो नाका । जाहि लखे जो जोगी । फ़ेर जन्म नहिं होई ।
सही अर्थ..अद्वैत वैराग यानी दूसरा कोई नहीं है । सर्वत्र एक परमात्मा ही है । इस प्रकार का भाव बना पाना अत्यन्त कठिन ही है । जबकि शाश्वत सत्य यही है । अगर इस बात का पक्का निश्चय हो जाय । तो सहज योग साधना एकदम सरल हो जाती है । मामूली धार्मिक जानकारी रखने वाला भी इस बात को जानता है । मगर व्यवहार के तौर पर स्वीकार नहीं कर पाता । तब दो हो जाते हैं । दो होते ही अनेक हो जाते हैं । फ़िर अहम या मैं अत्यन्त प्रबल हो जाता है । और सहज योग जटिल योग जैसा लगने लगता है । इसलिये अद्वैत भाव को कठिन कहा गया है । और ग्यान की बङी बङी खोजों के बाद भी योगी मुनि ऋषि इसी मैं के चलते अटक जाते हैं । यहाँ कुछ लोग क्षणिक भावना में सोच लेते हैं कि मैं मैं को बाधा नहीं बनने दूँगा । पर ये भावनात्मक बात अधिक है । आपका आंतरिक मैं बङा ही प्रबल है । जिस पर करोङों जन्मों का आवरण चङा हुआ है । अक्षर यानी ज्योति को ही सत्य बताने वाले योगी मुक्त वियोगी होते हैं । ये अक्षर पर पहुँचकर रुक जाते हैं । और उसी को अंतिम सत्य मान लेते हैं । अक्षर यानी जिसका क्षय या क्षरण कभी नहीं होता । जो सदा एक ही स्थिति में रहता है । इसी ज्योति पर ही समस्त योनियों के शरीर बनते हैं । एक मामूली मच्छर से लेकर हाथी जैसे शरीर भी इसी ज्योति पर ही बनते हैं ।..अगर इसी को अंतिम सत्य मान लिया जाय । तो यह बात बची रहेगी कि ऐसा आखिर किसकी इच्छा । किसके नियम से हो रहा है ?? इसका मास्टर आखिर कौन है ?? सहज योग इसके भी ( अक्षर ) पार ले जाता है । जहाँ जाप । अजपा । अनहद के मरने की स्थिति बनती है । तब शाश्वत सत्य प्रकट होता है । और इसके बाद आवागमन मिट जाता है ।..वास्तव में जितनी सरलता से यह बात लिखी है । अक्सर मामला उतना सरल होते हुये भी सरल नहीं हो पाता । क्योंकि इस परम ग्यान को भी इंसान सांसारिक व्यवहार की तरह निभाना चाहता है । इसमें सुमरन ( खुद का मरना । शरीर का मरना न समझें ) करना होता है । और यही बात अटकाव वाली है । परमात्मा को पाने में भी इंसान समय । मजबूरी । बिजनेस । परिवार । परिस्थिति का रोना रोता है । ये मेरा 25 साल का अनुभव है । और इस बात से मुझे बङी ही हैरत होती है ।
ग्यान को पन्थ कृपाण की धारा । कहो खगेस को बरनै पारा ।
सही अर्थ...यह प्रसंग कागभुशुण्डि जी द्वारा पक्षिराज गरुण के लिये तुलसी के रामचरितमानस में कहा गया है । इस बात को सुनकर अक्सर ही साधु अकारण भयभीत हो उठते हैं । वे इसका स्थूल अर्थ लगा लेते हैं । कृपाण पर चलना तो बहुत दुखदायी है । परमात्मा के पास जाने में तलवार की धार पर चलना होगा । राम भजो भई राम भजो । ग्यान का मार्ग कृपाण की धार इसलिये कहा गया है कि किसी भी भक्तिमार्ग में चाहे वह द्वैत की हो या अद्वैत की । एक कठिन परीक्षा से गुजरना होता है । जिसमें सांसारिक चुनौतियाँ अंतर में देवताओं अप्सराओं द्वारा पैदा किये विघ्न साधक को कङी अग्निपरीक्षा से गुजारते हैं । और कोई भी साधक इन कङी परिस्थितियों से गुजरकर ही तप की भट्टी में तपकर दैदीप्यमान हो सकता है । जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण मीरा प्रहलाद ध्रुव आदि हुये हैं । ये कृपाण धार पर ही चले थे । अगर जीवन में भी देखा जाय । तो सब कुछ क्या हमें बिना प्रयत्न के हासिल हो जाता है । क्षणभंगुर और किसी भी पल विनाश हो जाने वाली इस उपलब्धि के लिये भी हमें लोहे के चने चबाने पङते हैं । तो दिव्य साधना तो स्थायी सुख शान्ति और भोग ऐश्वर्य प्रदान करती है । तब उसको बातों बातों में सिर्फ़ बातों से कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? क्या ये सोचने की बात नहीं है ।
राम खुदा सब कहें । नाम कोई बिरला नर पावे । है । बिन अक्षर नाम । मिले बिन दाम । सदा सुखकारी ।
बाई शख्स को मिले । आस जाने मारी । बहुतक मुन्डा भये । कमन्डल लये । लम्बे केश । सन्त के वेश । दृव्य हर लेत । मन्त्र दे कानन भरमावे । ऐसे गुरु मत करे । फ़न्द मत परे । मन्त्र सिखलावें । तेरो रुक जाय कन्ठ । मन्त्र काम नहि आवे । ऐसे गुरु करि भृंग । सदा रहे संग । लोक तोहि चौथा दरसावें ।
सही अर्थ - राम खुदा अल्लाह गाड आदि जाने कितने नामों से इंसान भगवान को पुकारता है । और ये अलग अलग उपमायें ही एक बङे कभी न हल होने वाले विवाद का कारण बन चुकी हैं । मेरा भगवान अच्छा । तेरा बुरा । मेरा धर्म अच्छा । तेरा बुरा । ये बात एक बीमारी की तरह फ़ैल गयी है । जबकि कामन रूप से सभी यह मानते हैं कि सबका मालिक एक है । और वो सिर्फ़ एक ही है । फ़िर उसके संदेश द्वेश फ़ैलाने वाले कैसे हो सकते हैं ? वह अपनी ही संतति को झगङे में क्यों डालेगा ? वास्तव में उसका संदेश भी एक ही है । हमारी अल्प समझ और भाषांतर ने एक अबूझ भृम पैदा कर दिया है । इसलिये इस धार्मिक झगङे के बीच वास्तविक नाम कोई बिरला ही जान पाता है । और आश्चर्य कि उस नाम में विश्व की तमाम भाषाओं को कोई अक्षर है ही नहीं । नाम है । लेकिन बिना अक्षर नाम है । अब अक्षर नहीं है । तो वाणी से बताना असंभव ही है । ये नाम अनमोल होने के बाद भी संतो द्वारा पात्र को बिनमोल दिया जाता है । हमेशा के लिये सुखी कर देने वाला यह नाम उसी को मिलता है । जो अपनी समस्त इच्छाओं का त्याग कर पाता है । इसीलिये अब तक आदिकाल से अनगिनत कमन्डल लेकर । लम्बे केश । और संत का वेश बनाकर दूसरों के धन को ठगने वाले । उलटे सीधे मन्त्र बताकर जीव को उचित मार्ग देने के बजाय भृमित और कर देते हैं । इसलिये ऐसे गुरुओं के फ़न्दे से तुम बचकर रहो । सतर्क रहो । जो तुम्हें परमात्मा की प्राप्ति के नाम पर वाणी से जपा जाने वाला कोई मन्त्र बताते हैं । असली नाम जपा नहीं जाता । वह थोङे अभ्यास के बाद चेतनधारा में भूचरी योग से स्वतः प्रकट हो जाता है । तब सिर्फ़ उसको देखा सुना जाता है । इसी को वास्तविक ध्यान । वास्तविक भजन करना कहा जाता है । इसलिये मृत्यु के समय जब गला रुक जाता है । तो वाणी का नाम बोलना असंभव ही होता है । पर असली नाम तो वो है । जिसको बोलना ही नहीं है । इसलिये हमें भृंगी गुरु की ही तलाश करनी चाहिये । जो नाम की गुंजार सुनाता हुआ हमें काल सीमा से परे चौथा लोक दिखाते हैं । कोटि जन्म मुनि जतन कराहीं । अंत राम कह आवत नाहीं ।

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