शनिवार, अगस्त 13, 2011

ऐसे भक्तों का मैं बहुत जल्दी इस मृत्यु रूपी संसार से उद्धार करता हूँ - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 12

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः । 12-1
अर्जुन बोला - दोनों में से । कौन । उत्तम हैं ? जो भक्त । सदा आपकी । भक्ति युक्त रहकर । आपकी उपासना करते हैं । और जो । अक्षर और अव्यक्त की । उपासना करते हैं ।
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः । 12-2
श्रीकृष्ण बोले - जो भक्त । मुझमें मन को लगाकर । निरन्तर श्रद्धा से । मेरी उपासना करते हैं । वे । मेरे मत में । उत्तम हैं ।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम । 12-3
जो अक्षर । अनिर्देश्य ( जिसके स्वरुप को बताया नहीं जा सकता ।  अव्यक्त । सर्वत्र गम्य ( हर जगह उपस्थित ) अचिन्तीय । सदा एक स्थान पर स्थित । अचल और ध्रुव ( पक्का । न हिलने वाला ) की उपासना करते हैं ।
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः । 12-4
इन्द्रियों के समूह को । संयमित कर । हर ओर । हर जगह । समता की बुद्धि से । देखते हुये । सभी प्राणियों के हितकर । वे भी मुझे ही प्राप्त करते हैं ।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवदिभरवाप्यते । 12-5
लेकिन । उनके पथ में । कठिनाई ज़्यादा है । जो अव्यक्त में । चित्त लगाने में । आसक्त हैं । क्योंकि । देह धारियों के लिये । अव्यक्त को । प्राप्त करना । कठिन है ।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते । 12-6
लेकिन । जो सभी कर्मों को । मुझ पर त्याग कर । मुझ ही पर आसार हुये ( मेरी प्राप्ति का लक्ष्य किये ) अनन्य भक्ति योग द्वारा । मुझ पर ही । ध्यान करते हैं । और मेरी उपासना करते हैं ।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात । भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम । 12-7
ऐसे भक्तों को । मैं बहुत जल्दी ( बिना किसी देर किये ) ही । इस मृत्यु संसार रुपी सागर से । उद्धार करने वाला । बनता हूँ । जिनका चित्त । मुझ ही में लगा हुआ है ( मुझमें ही समाया हुआ है )।
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः । 12-8
इसलिये । अपने मन को । मुझमें ही । स्थापित करो । मुझमें ही । अपनी बुद्धि को । लगाओ । इस प्रकार करते हुये । तुम । केवल मुझमें ही । निवास करोगे  ( मुझमें ही रहोगे ) इसमें । कोई संशय नहीं है ।
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय । 12-9
और यदि तुम । अपने चित्त को । मुझमें । स्थिरता से स्थापित ( मुझ पर अटूट ध्यान ) नहीं । कर पा रहे हो । तो अभ्यास ( भगवान में चित्त लगाने के अभ्यास ) करो । और मेरी ही इच्छा करो । हे धनंजय !
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि । 12-10
और यदि तुम । मुझमें । चित्त लगाने का । अभ्यास करने में भी । असमर्थ हो । तो मेरे लिये ही । कर्म करने की । ठानो । इस प्रकार । मेरे ही लिये । कर्म करते हुये । तुम सिद्धि ( योग सिद्धि ) प्राप्त । कर लोगे ।
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान । 12-11
और यदि तुम । यह करने में भी । सफल न हो पाओ । तो मेरे बताये । योग का आश्रय लेकर । अपने मन । और आत्मा पर संयम कर । तुम सभी कर्मों के । फलों को छोड़ दो ( त्याग कर दो )।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते । ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम । 12-12
अभ्यास से बढकर । ज्ञान ( समझ आ जाना ) है । ज्ञान ( समझ ) से बढकर । ध्यान है । और ध्यान से भी उत्तम । कर्म के फल का । त्याग है । क्योंकि । ऐसा करते ही । तुरन्त शान्ति प्राप्त होती है ।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी । 12-13
जो । सभी जीवों के प्रति । द्वेषहीन है । मैत्री ( मित्र भाव ) है । करुणाशील है । जो मैं । और मेरे के । विचारों से मुक्त है । अहंकार रहित है । सुख और दुख को । एक सा देखता है । जो क्षमी है ।
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मदभक्तः स मे प्रियः । 12-14
जो योगी । सदा संतुष्ट है । जिसका । अपने आत्म पर । काबू है । जो दृण निश्चय है । जो मन । और बुद्धि से । मुझे अर्पित है । ऐसा मनुष्य । मेरा भक्त । मुझे प्रिय है ।
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः । 12-15
जिससे लोग । उद्विचित ( व्याकुल । परेशान ) नहीं होते ( अर्थात जो किसी को परेशान नहीं करता । उद्विग्नता नहीं देता )  और जो स्वयं भी । लोगों से उद्विजित नहीं होता । जो हर्ष । ईर्ष्या । भय । उद्वेग से मुक्त है । ऐसा मनुष्य मुझे प्रिय है ।
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्वभक्तः स मे प्रियः । 12-16
जो आकांक्षा रहित है । शुद्ध है । दक्ष है । उदासीन ( मतलब रहित ) है । व्यथा रहित है । सभी आरम्भों का त्यागी है । ऐसा मेरा भक्त । मुझे प्रिय है ।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः । 12-17
जो न प्रसन्न होता है । न दुखी ( द्वेष ) होता है । न शोक करता है । और न ही । आकांक्षा करता है । शुभ और अशुभ । दोनों का । जिसने त्याग कर दिया है । ऐसा भक्तिमान पुरुष । मुझे प्रिय है ।
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङगविवर्जितः । 12-18
जो शत्रु और मित्र के प्रति । समान है । तथा मान और अपमान में भी । 1 सा है । जिसके लिये सरदी गरमी 1 हैं । और जो सुख और दुख में एक सा है । हर प्रकार से संग रहित है ।
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः । 12-19
जो अपनी निन्दा और स्तुति को 1 सा भाव देता है ( 1 सा मानता है ) जो मौनी है । किसी भी तरह ( थोड़े बहुत में ) संतुष्ट है । घर बार से जुड़ा नहीं है । जो स्थिर मति है । ऐसा भक्ति मान नर मुझे प्रिय है ।
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः । 12-20
और जो श्रद्धावान भक्त मुझ ही पर परायण ( मुझे ही लक्ष्य मानते ) हुये । इस बताये गये धर्म अमृत की उपासना करते हैं ( मानते हैं । और पालन करते हैं ) ऐसे भक्त मुझे अत्यन्त ( अतीव ) प्रिय हैं ।

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