गुरुवार, नवंबर 17, 2011

अब मैं किससे मोह करूँ - अष्टावक्र गीता अध्याय - 2

जनक उवाच - अहो निरंजनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः । एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडंबितः । 2-1
जनक बोले - आश्चर्य । मैं निष्कलंक । शांत । प्रकृति से परे । ज्ञान स्वरुप हूँ । इतने समय तक मैं मोह से संतप्त किया गया । 1
यथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत । अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किंचन । 2-2
जिस प्रकार । मैं इस शरीर को । प्रकाशित करता हूँ । उसी प्रकार । इस विश्व को भी । अतः मैं । यह समस्त विश्व ही हूँ । अथवा कुछ भी नहीं । 2
स शरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाधुना । कुतश्चित कौशलाद एव परमात्मा विलोक्यते । 2-3
अब शरीर सहित । इस विश्व को । त्याग कर । किसी कौशल द्वारा ही । मेरे द्वारा । परमात्मा का दर्शन किया जाता है । 3
यथा न तोयतो भिन्नास्तरंगाः फेनबुदबुदाः । आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम । 2-4
जिस प्रकार । पानी लहर । फेन और बुलबुलों से । पृथक नहीं है । उसी प्रकार । आत्मा भी । स्वयं से निकले । इस विश्व से अलग नहीं है । 4
तन्तुमात्रो भवेद एव पटो यद्वद विचारितः । आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद विश्वं विचारितम । 2-5
जिस प्रकार । विचार करने पर । वस्त्र तंतु ( धागा ) मात्र ही । ज्ञात होता है । उसी प्रकार । यह समस्त विश्व । आत्मा मात्र ही है । 5
यथैवेक्षुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा । तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम । 2-6
जिस प्रकार । गन्ने के रस से बनी शक्कर । उससे ही व्याप्त होती है । उसी प्रकार । यह विश्व । मुझसे ही बना है । और निरंतर । मुझसे ही व्याप्त है । 6
आत्मज्ञानाज्जगद भाति आत्मज्ञानान्न भासते । रज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद भासते न हि । 2-7
आत्मा । अज्ञानवश ही । विश्व के रूप में । दिखाई देती है । आत्म ज्ञान होने पर । यह विश्व । दिखाई नहीं देता । रस्सी अज्ञानवश । सर्प जैसी । दिखाई देती है । रस्सी का ज्ञान हो जाने पर । सर्प दिखाई नहीं देता है  । 7
प्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः । यदा प्रकाशते विश्वं तदाहं भास एव हि । 2-8
प्रकाश । मेरा स्वरुप है । इसके अतिरिक्त । मैं । कुछ और । नहीं हूँ । वह प्रकाश । जैसे इस विश्व को । प्रकाशित करता है । वैसे ही इस " मैं " भाव को भी । 8
अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते । रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा । 2-9
आश्चर्य । यह कल्पित विश्व । अज्ञान से । मुझमें दिखाई देता है । जैसे सीप में चाँदी । रस्सी में सर्प । और सूर्य किरणों में पानी । 9
मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति । मृदि कुंभो जले वीचिः कनके कटकं यथा । 2-10
मुझसे । उत्पन्न हुआ । विश्व । मुझमें ही । विलीन हो जाता है । जैसे घड़ा मिटटी में । लहर जल में । और कड़ा सोने में विलीन हो जाता है । 10
अहो अहं नमो मह्यं विनाशो यस्य नास्ति मे । बृह्मादिस्तंबपर्यन्तं जगन्नाशोऽपि तिष्ठतः । 2-11
आश्चर्य है । मुझको । नमस्कार है । समस्त विश्व के । नष्ट हो जाने पर भी । जिसका । विनाश नहीं होता । जो तृण से बृह्मा तक । सबका विनाश होने पर भी । विद्यमान रहता है । 11
अहो अहं नमो मह्यं एकोऽहं देहवानपि । क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः । 2-12
आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । मैं एक हूँ । शरीर वाला होते हुए भी । जो न कहीं जाता है । और न कहीं आता है । और समस्त विश्व को व्याप्त करके स्थित है । 12
अहो अहं नमो मह्यं दक्षो नास्तीह मत्समः । असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिरं धृतम । 2-13
आश्चर्य है । मुझको । नमस्कार है । जो कुशल है । और जिसके समान । कोई और । नहीं है । जिसने इस शरीर को । बिना स्पर्श करते हुए । इस विश्व को । अनादि काल से । धारण किया हुआ है । 13
अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किंचन । अथवा यस्य मे सर्वं यद् वाङ्मनसगोचरम । 2-14
आश्चर्य है । मुझको । नमस्कार है । जिसका यह । कुछ भी नहीं है । अथवा जो भी । वाणी और मन से । समझ में । आता है । वह सब । जिसका है । 14
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम । अज्ञानाद भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरंजनः । 2-15
ज्ञान । ज्ञेय । और ज्ञाता । यह तीनों । वास्तव में नहीं हैं । यह जो । अज्ञानवश । दिखाई देता है । वह निष्कलंक । मैं ही हूँ । 15
द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्याऽस्ति भेषजम । दृश्यमेतन मृषा सर्वं एकोऽहं चिद्रसोमलः । 2-16
द्वैत ( भेद ) सभी दुखों का । मूल कारण है । इसकी । इसके अतिरिक्त । कोई और । औषधि नहीं है कि यह सब जो । दिखाई दे रहा है । वह सब । असत्य है । मैं एक । चैतन्य और निर्मल हूँ । 16
बोधमात्रोऽहमज्ञानाद उपाधिः कल्पितो मया । एवं विमृशतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम । 2-17
मैं केवल । ज्ञान स्वरुप हूँ । अज्ञान से ही । मेरे द्वारा । स्वयं में । अन्य गुण । कल्पित किये गए हैं । ऐसा विचार करके । मैं सनातन । और कारण रहित । रूप से । स्थित हूँ । 17
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्तो निराश्रया । अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम । 2-18
न मुझे । कोई बंधन है । और न कोई । मुक्ति का भृम । मैं शांत । और । आश्रयरहित हूँ । मुझमें स्थित । यह विश्व भी । वस्तुतः मुझमें स्थित नहीं है । 18
सशरीरमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चितम । शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन् कल्पनाधुना । 2-19
यह निश्चित है कि इस शरीर सहित । यह विश्व । अस्तित्वहीन है । केवल शुद्ध चैतन्य । आत्मा का ही । अस्तित्व है । अब इसमें क्या । कल्पना की जाये । 19
शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा । कल्पनामात्रमेवैतत किं मे कार्यं चिदात्मनः । 2-20
शरीर । स्वर्ग । नरक । बंधन । मोक्ष । और भय । ये सब । कल्पना मात्र ही हैं । इनसे मुझ । चैतन्य स्वरुप का । क्या प्रयोजन है । 20
अहो जनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम । अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम । 2-21
आश्चर्य कि मैं । लोगों के । समूह में भी । दूसरे को । नहीं देखता हूँ । वह भी निर्जन ही । प्रतीत होता है । अब मैं । किससे मोह करूँ । 21
नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित । अयमेव हि मे बन्ध आसीद्या जीविते स्पृहा । 2-22
न मैं । शरीर हूँ । न यह । शरीर ही । मेरा है । न मैं । जीव हूँ । मैं चैतन्य हूँ । मेरे अन्दर । जीने की इच्छा ही । मेरा बंधन थी । 22
अहो भुवनकल्लोलैर्विचित्रैर्द्राक समुत्थितम । मय्यनंतमहांभोधौ चित्तवाते समुद्यते । 2-23
आश्चर्य । मुझ अनंत । महासागर में । चित्त वायु । उठने पर । बृह्माण्ड रूपी । विचित्र तरंगें । उपस्थित हो जाती हैं । 23
मय्यनंतमहांभोधौ चित्तवाते प्रशाम्यति । अभाग्याज्जीववणिजो जगत्पोतो विनश्वरः । 2-24
मुझ अनंत । महासागर में । चित्त वायु के । शांत होने पर । जीव रूपी । वणिक का । संसार रूपी जहाज । जैसे दुर्भाग्य से । नष्ट हो जाता है । 24
मय्यनन्तमहांभोधावाश्चर्यं जीववीचयः । उद्यन्ति घ्नन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावतः । 2-25
आश्चर्य । मुझ अनंत । महासागर में । जीव रूपी । लहरें । उत्पन्न होती हैं । मिलती हैं । खेलती हैं । और स्वभाव से । मुझमें । प्रवेश कर जाती हैं । 25

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