शुक्रवार, मार्च 19, 2010

आत्म ज्ञान के तीन प्रमुख तत्व

जब कोई साधक पूजा उपासना से थोडा ऊपर उठाकर विशिष्ट ज्ञान के दायरे मैं आ जाता है तब अलग अलग संतों और संसार मैं प्रचलित विभिन्न मतों से उसे ज्ञात होता है के जो पूजा अब तक वह करता रहा है उसका कोई खास लाभ नहीं है । तब ज्ञान बुद्धि से उसे पता चलता है के संसार मैं तीन तरह के मत प्रचलित है ।
पहला अद्वैत ज्ञान - इसका अर्थ है के वो परमात्मा एक ही है और इसके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है सब तरफ वो ही वो है .वास्तव मैं ययः एक अकाट्य सत्य है पर इस सत्य को जान्ने वाला कोई विरला साधू ही होता है । अत्यंत दुर्लभ ये ज्ञान करोड़ों जन्मों की तपस्या के बाद मिलाता है इस ज्ञान को जानने वाले ६०० बरसों मैं गिने चुने संत ही थे जिनमें कबीर साहिब रैदास जी दादू जी पालतू जी मीराबाई रिहाई जी तुलसीदास जी रामकृष्ण परमहंस आदि हुए हैं मैंने कहा के ये अत्यंत दुर्लभ ज्ञान है जब तक आप को इस ज्ञान का कोई संत नहीं मिलता आप इस ज्ञान की कल्पना भी नहीं कर सकते है ।
VAISE जिन लोगों की रूचि इस ज्ञान मैं है उन्हे मई बता दूँ के आप कबीर का अनुराग सागर कबीर का बीजक आदि पद लें आप को उसमें पूरे उत्तर मिल जायेंगे ..वास्तव मैं कबीर का अनुराग सागर उन लोगो की आँखें खोलने के लिए पर्यत है जो मूर्ति पूजा को जाने क्या मानते है । १०० रूपये मूल्य की ये किताब आपके सोचने का तरीका बदल देगी और आप सब कुछ भूल कर किसी सच्चे संत की तलाश मैं निकल पड़ेंगे ।
दूसरा द्वैत ज्ञान है - इसका मतलब है के पुरुष और प्रकृति दो ही है । पुरुष अर्थात चेतन और प्रकृति अर्थात जड़ तत्व इसका सिधांत ये है के चेतन के होने से प्रकृति मैं क्रिया हो रही है । वास्तव मैं इस ज्ञान को जान्ने वाले भी दुर्लभ ही है क्योंकि इस ज्ञान को जान्ने वाला भी काल की पहुँच से ऊपर होता है क्योंकि ये सिद्धांत भी किसी देवी शक्ति या एनी शक्ति को नहीं मानता है फिर भी इसके संत अद्वैत के मुकाबले काफी अधिक होते है । जबकि ये संत आम आदमी को कभी शायद ही मिल पाए क्योंकि ये गुप्त साधना करना पसंद करते है और बहुत कम शिष्य बनाना पसंद करते है इसलिए ये ज्ञान भी दुर्लभ ज्ञान की SHRANI मैं AATA है ।
TEESARA ज्ञान TRAIT का है
पर्म्मात्मा प्रकृति और जीव इसी ज्ञान मैं बहुत सी पूजा पद्धिति आती है वास्तव मैं मैंने इसके लिए एक परिभाषा की तरह शब्दों का इस्तेमाल किया है इसकी वजह से आपको इनका मतलब समझने मैं दिक्कत हो सकती है ।
जैसे के साधारण भाषा मैं तरत को भगवन माँ शक्ति और जीव कहा गया है ...दुसरे ज्ञान मैं इसी पुरुष और प्रकृति से साड़ी स्रष्टि का उत्पन्न होना बताया गया है परन्तु उन्हें एक पहला आदमी पहली ओरत बताया गया है बिबले मैं इसको एडम और एव बताया गया है परन्तु वास्तव मैं सच कुछ और ही है ...हम लोग जिस ज्ञान की साधना करते है वह अद्वैत की साधना है । इसे ही सहज योग कहा जाता है इसमें सतगुरु द्वारा ढाई अक्षर का महामंत्र दे कर (जगाकर ) महाशक्ति से उसी तरह से कनेक्शन जोड़ दिया जाता है जिस तरह आप अपने घर मैं खम्बे से बिजली का तार जोड़ लेते है ।

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