बुधवार, जनवरी 26, 2011

संतों को धोखा देने का मतलब ।

2009 के april महीने की बात है । दोपहर का समय था । मैं अपने घर से 400 मीटर की दूरी पर कंज के वृक्ष के नीचे बैठा था । कंज की घनी छाया और मन्द मन्द चलती हवा एक अजीव सा सकून दे रही थी । तभी मेरे पास एक तन्दुरुस्त 36 साल का व्यक्ति आया । और जय सियाराम महाराज करके बैठ गया । उस समय मैं अपनी ही सोचों में खोया था । मैं अपनी इस जीवन यात्रा को शीघ्र समाप्त कर वापस जाना चाहता था । जब सच्चा वैराग्य जागृत हो जाता है । संसार असार और नीरस हो जाता है । फ़िर देर तक ठहरने की इच्छा समाप्त हो जाती है । रामकृष्ण परमहँस । विवेकानन्द । रामतीर्थ । आदि शंकराचार्य । ग्यानेश्वर आदि सभी लगभग 40 की आयु से पहले ही चले गये । लेकिन ग्यान में अपनी मर्जी नहीं चलती । जो जिसका निमित्त है । उसे वो कार्य करना ही होगा । भले ही वो उसे रुचिकर लगे । अथवा न लगे ।
मैं इसी प्रकार की सोच में डूबा हुआ था । जबकि उस आदमी की बात पर मेरा ध्यान भंग हुआ । वह मुझसे कह रहा था । महाराज जी । अगर इजाजत हो तो एक बात पूछना चाहता हूँ ? जिसकी मुझे अन्दर से प्रेरणा सी हो रही है ।
मेरे..कहिये..कहने पर उसके चेहरे पर एकदम आशा की किरणें सी चमकने लगी । और वह बोला । बस इतना सही सही बता दीजिये कि मैं जीवित रहूँगा या मर जाऊँगा ? बात चाहे जो भी हो । बताना । एकदम सही ।
तब पहली बार मेरा ध्यान उस पर गया ।
उसका नाम गोपालदास । काल्पनिक । था । गोपालदास को मुँह का भयानक केंसर हुआ था । जिसका आपरेशन हो चुका था । और जिसका घुमावदार चीरे का लगभग आठ इंच निशान उसके गाल पर मौजूद था । गोपालदास आगरा से 150 किमी दूर एक स्थान का रहने वाला था । और केंसर के कीटाणु नष्ट करने हेतु होने वाली सिकाई के लिये आगरा में रुका हुआ था ।
उसने एक ऐसा विचित्र सवाल किया था । जो सबकी जिन्दगी का एक महत्वपूर्ण सवाल था । पर विपदा और मृत्यु सम स्थिति में ही याद आता है ।..लेकिन पता होने पर भी जिसका कोई ज्यों का त्यों उत्तर नहीं दे सकता । अतः मैंने कहा । इस तरह निराश क्यों होते हो । आजकल बङे बङे रोग ठीक हो जाते हैं ।
पर उसे न जाने क्यों आभास हो रहा था कि अब वह मर जायेगा । तब मैंने उसे नाम ( ढाई अक्षर का महामन्त्र ) की महिमा सुनाकर सतसंग दिया । जिसके अनुसार मृत्यु भी टल जाती है । हालात कुछ ऐसे हो गये कि उसके बेहद गिङगिङाने पर मैंने उसकी अर्जी लगा दी । क्योंकि उसने कहा । यदि फ़िर से उसे नया जीवन मिल जाता है । तो वह पूरी श्रद्धाभक्ति से नाम की कमाई करेगा । और अपनी कमाई का 25 % धार्मिक कार्यों में लगायेगा । इस प्रकार के दो कौल उसने भरे । मैंने उसकी गुरूजी से भी बात करा दी ।
अब वह रोज ही मेरे पास बैठने लगा । उसकी सिकाई सप्ताह में दो दिन ही होती थी । एक दिन उसने कहा । जब वह मेरे पास बैठकर प्रभु का नाम सतसंग सुनता है । तो उसका दर्द एकदम गायब हो जाता है । जबकि वैसे उसे काफ़ी परेशानी होती है । मैंने कहा । जब स्थिति थोङा ठीक हो जाय । तब वह महाराज जी से विधिवत नामदान ले लें । उसने खुशी से कहा । मैं स्वयँ भी ऐसा ही चाहता हूँ ।
..कुछ ही दिनों में उसके स्वास्थय में सुधार होने लगा । उसके चेहरे पर जिन्दगी की उमंग फ़ैलने लगी । मरने की बात तो मानों वह भूल ही गया । खैर..दो महीने बाद सिकाई करा के वह वापस घर चला गया । दीक्षा भी उसने बीच में समय मिलने पर ले ली थी । वह मुझसे समय समय पर फ़ोन पर बात भी करता रहता था । और दस बीस मिनट भजन का अभ्यास भी करता । चार महीने बाद वह थोङी थोङी रोटी भी खाने लगा । और पुनः अपने काम पर जाने लगा ।
लेकिन..धीरे धीरे ठीक होने के साथ साथ उसके महाराज जी में भाव कम होने लगे । नाम अभ्यास भी ठीक से नहीं होता था । कौल भंग होने से महाराज जी पर उस बीमारी का प्रभाव होने लगा । और उनके जाँघ में लम्बे फ़ोङे होने लगे । पर महाराज जी ने इस बारे में मुझे कभी कुछ नहीं बताया । मुझे महाराज जी के फ़ोङे होने पर बेहद आश्चर्य हो रहा था । तब एक बार उन्होंने कहा । जरूरी नहीं । हरेक परेशानी अपनी ही हो । कोई भी अर्जी भावना में बहकर लगाना उचित नहीं होता । दूसरे का दन्ड भोगना पङ सकता है । मैंने सबक लेते हुये आगे के लिये । हमेशा के लिये कान पकङ लिये । कुछ दिन में फ़ोङे ठीक हो गये ।
उधर गोपालदास तेजी से ठीक होने लगा । पर एक दिन वह बङी गलती कर ही गया । हुआ ये कि महाराज जी और उसका बीस कदम की दूरी से भेंटा हो गया । और उसने मर्यादा अनुसार गुरु को प्रणाम करने की कोई कोशिश नहीं की । उल्टे वह निगाह चुराने की कोशिश करने लगा । गुरूजी और गोपालदास दोनों को ही जानने वाले एक आदमी ने कहा भी । कि तुम्हारे गुरूजी हैं वहाँ ।
उसने कहा । बने रहने दो गुरूजी ?
बस यही गलती हो गयी । सतनाम में हर बात जिन्दगी की तरह हँसीमजाक नहीं होती । वह नहीं जानता था कि कितनी बङी भूल हो गयी । उसी क्षण उसकी अरजी केंसिल हो गयी ? महाराज जी ने उससे कुछ नहीं कहा । और अपने गंतव्य चले गये ।
दो महीने बाद...महाराज जी उसी के गाँव के पास थे । जब गोपालदास के पिताजी बङी विनती करते हुये महाराज जी को अपने घर ले गये । गोपालदास और उसकी पत्नी उसके पिता आदि सभी रोते हुये महाराज जी के पैरों में गिर पङे । और रोते हुये बोले । हमसे बङी भूल हुयी । हमने आपको पहचानने में गलती कर दी । किसी तरह इस बार और बचा लो ।
गोपालदास का रोग उखङ गया था । और उसे भयंकर TB भी हो गयी थी । वह एकदम कमजोर और शक्तिहीन हो गया था । वह और उसका घर बारबार महाराज जी से कृपा करने की कहने लगे । मेरे द्वारा सिम बदल लेने पर उनके पास मेरा नम्बर नहीं था । अन्यथा वह मुझसे भी कहते । उस सिम के खो जाने से उनका नम्बर भी मेरे पास नहीं रहा था ।
महाराज जी ने कहा । हर बात हँसीमजाक नहीं होती । सच्ची भक्ति और साधु का अकारण तिरस्कार बेहद दन्डनीय होता है । इसकी सहज माफ़ी नहीं होती । फ़िर भी तुम अधिक से अधिक नाम की कमाई करो । भले ही तुम मर भी जाओ । तो भी इससे बहुत लाभ होगा । और कृपा हो गयी । तो जीते भी रह सकते हो । इससे ज्यादा कहने को मेरे पास कुछ भी नहीं है । बाद में..यह बात श्री महाराज जी ने मुझे बतायी । पर कौल भंग और मर्यादा न निभाने के कारण मुझे अब कोई सहानुभूति नहीं थी ।
साहिब से सांचे मिलो । साधु मिलो सतभाव । दुनियाँ से ऐसे मिलो । जैसो जाको भाव ।

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...