गुरुवार, नवंबर 17, 2011

ज्ञानी सर्वत्र रस रहित है - अष्टावक्र गीता अध्याय - 17

अष्टावक्र उवाच - तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा । तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यं एकाकी रमते तु यः । 17-1
अष्टावक्र बोले - जो पुरुष । नित्य तृप्त है । शुद्ध इन्द्रिय वाला है । और अकेला रमता है । उसे ही ज्ञान का फल । और योग के अभ्यास का फल प्राप्त होता है । 1
न कदाचिज्जगत्यस्मिन तत्त्वज्ञा हन्त खिद्यति । यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम । 17-2
तत्व ज्ञानी । इस जगत के लिए । कभी भी । खेद को । प्राप्त नहीं होता है । क्योंकि ( वह जानता है कि ) उसी एक से । यह बृह्मांड मंडल पूर्ण है । 2
न जातु विषयाः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी । सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निंबपल्लवाः । 17-3
ये कोई भी बिषय । स्वात्माराम ( आत्मा में रमण करने वाले ) को । कभी भी । हर्षित नहीं करते हैं । जैसे सल्लकी ( गन्नों ) के पत्तों से प्रसन्न हुए । हाथी को । नीम के पत्ते । हर्षित नहीं करते । 3
यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासिता । अभुक्तेषु निराकांक्षी तदृशो भवदुर्लभः । 17-4
जो भोगे हुए । भोगों में । आसक्त नहीं । होता है । और अभुक्त । पदार्थों के प्रति । आकांक्षा रहित है । ऐसा मनुष्य । संसार में दुर्लभ है । 4
बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते । भोगमोक्षनिराकांक्षी विरलो हि महाशयः । 17-5
इस संसार में । भोग और मोक्ष की । इच्छा वाले ( अनेकों मनुष्य ) देखे जाते हैं । परन्तु । भोग और मोक्ष की । आकांक्षा से रहित । कोई विरला ही महापुरुष है । 5
धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा । कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता न हि । 17-6
धर्म । अर्थ । काम । मोक्ष । जीवन । और मरण । किस उदार चित्त के लिए । गृहण और त्याग करने योग्य । नहीं है ? ( अर्थात इनसे कौन उदासीन है ।) 6
वांछा न विश्वविलये न द्वेषस्तस्य च स्थितौ । यथा जीविकया तस्माद धन्य आस्ते यथा सुखम । 17-7
विश्व के । लय होने में । जिसका राग नहीं है । उसकी स्थिति में । जिसको द्वेष नहीं है । यथा प्राप्य जीविका द्वारा । जो पुरुष । सुख पूर्वक रहता है । इसी कारण । वह धन्य है । 7
कृतार्थोऽनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधीः कृती । पश्यन शृण्वन स्पृशन जिघ्रन्न अश्नन्नास्ते यथा सुखम । 17-8
इस ज्ञान से । मैं कृतार्थ हूँ । इस प्रकार । जिसकी बुद्धि । गलित ( निष्ठ ) हो गयी है । ऐसा ज्ञानी पुरुष । देखता हुआ । सुनता हुआ । स्पर्श करता हुआ । सूंघता हुआ । खाता हुआ । सुख पूर्वक रहता है । 8
शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च । न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे । 17-9
जिसके लिए । संसार सागर । नष्ट हो गया है । ऐसे पुरुष की । दृष्टि । शून्य हो जाती है । चेष्टाएँ ( व्यापार ) व्यर्थ हो जाती हैं । इन्द्रियाँ विकल हो जाती हैं । उसकी ( संसार में ) कोई इच्छा । अथवा विरक्ति नहीं रहती है । 9
न जागर्ति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति । अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः । 17-10
न जागता है । न सोता है । न पलक को खोलता है । और न पलक को बंद करता है । आश्चर्य है । मुक्त चित्त ( ज्ञानी ) कैसी उत्कृष्ट दशा में । वरतता ( रहता ) है । 10
सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः । समस्तवासना मुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते । 17-11
जीवन मुक्त ज्ञानी । सब जगह । स्वस्थ ( शांत ) सब जगह । निर्मल । अन्तःकरण वाला । दिखलाई देता है । और सब जगह । सब वासनाओं से रहित होकर । विराजता ( रहता ) है । 11
पश्यन शृण्वन् स्पृशन जिघ्रन्न अश्नन गृण्हन वदन व्रजन । ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः । 17-12
देखता हुआ । सुनता हुआ । स्पर्श करता हुआ । सूंघता हुआ । खाता हुआ । ग्रहण करता हुआ । बोलता हुआ । जाता हुआ । निश्चय ही । राग द्वेष से मुक्त ( छूटा ) हुआ । ऐसा महापुरुष मुक्त ( ज्ञानी ) है । 12
न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति । न ददाति न गृण्हाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः । 17-13
न निंदा करता है । न स्तुति करता है । न हर्ष को प्राप्त होता है । न क्रोध करता है । न देता है । न लेता है । ज्ञानी सर्वत्र रस रहित है । 13
सानुरागां स्त्रियं दृष्टवा मृत्युं वा समुपस्थितम । अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशयः । 17-14
प्रीति युक्त स्त्री को । और समीप में स्थित । मृत्यु को देख कर । व्याकुलता से रहित । और शांत महापुरुष । निश्चय ही मुक्त ( ज्ञानी ) है । 14
सुखे दुःखे नरे नार्यां संपत्सु विपत्सु च । विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः । 17-15
सुख में । दुःख में । नर ( पुरुष ) में । नारी ( स्त्री ) में । संपत्तियों में । विपत्तियों में । ज्ञानी बिशेष रूप से । सर्वत्र समदर्शी ( भेद रहित ) है । 15
न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता । नाश्चर्यं नैव च क्षोभः क्षीणसंसरणे नरे । 17-16
जिस मनुष्य के लिए । न हिंसा है । न दयालुता है । न उदंडता है । न दीनता है । न आश्चर्य है । और न क्षोभ है । उसी का संसार क्षीण हुआ है । ( वही जीवन मुक्त है ) 16
न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुपः । असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते । 17-17
जो न बिषयों में । द्वेष करने वाला । और न ( ही ) बिषयों में । लोभ करने वाला है । तथा जो सदा । आसक्ति रहित । मन से प्राप्त । और अप्राप्त । वस्तुओं का । भोग करता है । वही जीवनमुक्त है । 17
समाधानसमाधानहिताहितविकल्पनाः । शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः । 17-18
जो समाधान । और असमाधान । हित और अहित की । कल्पना को । नहीं जानता है । ऐसा शून्य चित्त वाला ( ज्ञानी ) कैवल्य को प्राप्त हुआ ( मोक्ष रूप से ) स्थित है । वही जीवनमुक्त है । 18
निर्ममो निरहंकारो न किंचिदिति निश्चितः । अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि करोति न । 17-19
जो ममता । और अहंकार । रहित है । जिसकी आशाएं । उसके अभ्यंतर में । गल ( विलीन हो ) गयी हैं । जो कुछ भी ( मेरा ) नहीं है । ऐसा निश्चय करके । कर्म करता है । वह ( कर्मों में कभी ) लिप्त । नहीं होता है । 19
मनःप्रकाशसंमोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः । दशां कामपि संप्राप्तो भवेद गलितमानसः । 17-20
जिसका मन । गल ( नष्ट हो ) गया है । वह मन के प्रकाश से । चित्त की शांति से । स्वपन और सुषुप्ति से भी । ऊपर उठकर । अनिर्वचनीय ( आत्मानंद ) की दशा को प्राप्त होता है । ( वही जीवन मुक्त है ) 20

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