शुक्रवार, जून 24, 2011

आत्मस्वरूप परमात्मा का वास्तविक नाम विदेह है

कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! जब तक देह से परे विदेह नाम का ध्यान होने में नहीं आता । तब तक जीव इस असार संसार में ही भटकता रहता है । विदेह ध्यान और विदेह नाम इन दोनों को अच्छी तरह से समझ लेता है । तो उसके सभी संदेह मिट जाते हैं ।
जब लग ध्यान विदेह न आवे । तब लग जिव भव भटका खावे ।
ध्यान विदेह और नाम विदेहा । दोउ लखि पावे मिटे संदेहा ।
मनुष्य का 5 तत्वों से बना यह शरीर जङ परिवर्तनशील तथा नाशवान है । यह अनित्य है । इस शरीर का एक नाम रूप होता है । परन्तु वह स्थायी नहीं रहता । राम कृष्ण ईसा लक्ष्मी दुर्गा शंकर आदि जितने भी नाम इस संसार में बोले जाते हैं । ये सब शरीरी नाम हैं । वाणी के नाम हैं ।
लेकिन इसके विपरीत इस जङ और नाशवान देह से परे उस अविनाशी चैतन्य शाश्वत और निज आत्मस्वरूप परमात्मा का वास्तविक नाम विदेह है । और ध्वनि रूप है । वही सत्य है । वही सर्वोपरि है । अतः मन से सत्यनाम का सुमरन करो । वहाँ दिन रात की स्थिति तथा प्रथ्वी अग्नि वायु आदि 5 तत्वों का स्थान नहीं है ।  वहाँ ध्यान लगाने से किसी भी योनि के जन्म मरण का दुख जीव को प्राप्त नहीं होता । वहाँ के सुख ( ध्यान में मिलने वाला ) आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता । जैसे गूँगे को सपना दिखता है । वैसे ही जीवित जन्म को देखो । जीते जी इसी जन्म में देखो ।
हे धर्मदास ! ध्यान करते हुये जब साधक का ध्यान क्षण भर के लिये भी विदेह परमात्मा में लीन हो जाता है । तो उस क्षण की महिमा आनन्द का वर्णन करना असंभव ही है । भगवान आदि के शरीर के रूप तथा नामों को याद करके सब पुकारते हैं । परन्तु उस विदेह स्वरूप के विदेह नाम को कोई विरला ही जान पाता है ।
 जो कोई चारों युगों सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग में पवित्र कही जाने वाली काशी नगरी में निवास करे । नैमिषारण्य बद्रीनाथ आदि तीर्थों पर जाये । और गया द्वारका प्रयाग में स्नान करे । परन्तु सार शब्द ( निर्वाणी नाम ) का रहस्य जाने बिना वह जन्म मरण के दुख और बेहद कष्टदायी यमपुर में ही जायेगा । और वास करेगा ।
हे धर्मदास ! चाहे कोई 68 तीर्थों मथुरा काशी हरिद्वार रामेश्वर गंगासागर आदि में स्नान कर ले । चाहे सारी प्रथ्वी की परिकृमा कर ले । परन्तु सार शब्द का ग्यान जाने बिना उसका भृम अग्यान नहीं मिट सकता ।
हे धर्मदास ! मैं कहाँ तक उस सार शब्द के नाम के प्रभाव का वर्णन करूँ । जो उसका हँसदीक्षा लेकर नियम से उसका सुमरन करेगा । उसका मृत्यु का भय सदा के लिये समाप्त हो जायेगा ।
सभी नामों से अदभुत सत्यपुरुष का सार नाम सिर्फ़ सदगुरु से ही प्राप्त होता है । उस सार नाम की डोर पकङकर ही भक्त साधक सत्यलोक को जाता है । उस सार नाम का ध्यान करने से सदगुरु का वह हँस भक्त 5 तत्वों से परे परम तत्व में समा जाता है । अर्थात वैसा ही हो जाता है ।

सार शब्द रहस्य पर लेख शीघ्र प्रकाशित होगा ।
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