शनिवार, अगस्त 13, 2011

तुम मेरी कृपा से सभी कठिनाईयों को पार कर जाओगे - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 18

संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन । 18-1
अर्जुन बोले - हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशिनिषूदन ! मैं संन्यास और त्याग ( कर्म योग ) के सार को अलग अलग जानना चाहता हूँ ।
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः । 18-2
श्रीकृष्ण बोले - बुद्धिमान । ज्ञानी जन । कामनाओं से उत्पन्न हुये । कर्मों के त्याग को । सन्यास समझते हैं । और सभी कर्मों के फलों के त्याग को । बुद्धिमान लोग त्याग ( कर्म योग ) कहते हैं ।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे । 18-3
कुछ मुनि जन कहते हैं कि - सभी कर्म दोषमयी होने के कारण । त्यागने योग्य हैं । दूसरे कहते हैं कि यज्ञ । दान । और तप । कर्मों का त्याग । नहीं करना चाहिये ।
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः । 18-4
कर्मों के त्याग के विषय में । तुम मेरा निश्चय सुनो । हे भरतसत्तम ! हे पुरुषव्याघ्र ! त्याग को 3 प्रकार का बताया गया है ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम । 18-5
यज्ञ । दान । और तप । कर्मों का त्याग करना । उचित नहीं है । इन्हें करना चाहिये । यज्ञ । दान । और तप । मुनियों को पवित्र करते हैं ।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम । 18-6
परन्तु ये कर्म ( यज्ञ । दान । तप । कर्म ) भी संग त्याग कर । तथा फल की इच्छा त्याग कर । करने चाहिये । केवल अपना कर्तव्य जानकर । यह मेरा उत्तम निश्चय है ।
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः । 18-7
नियत कर्म का त्याग करना । उचित नहीं हैं । मोह के कारण । कर्तव्य कर्म का त्याग करना । तामसिक कहा जाता है ।
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत । 18-8
शरीर को कष्ट देने के भय से । कर्म को दुख मानते हुये । उसे त्याग देने से । मनुष्य को । उस त्याग का फल । प्राप्त नहीं होता । ऐसे त्याग को । राजसिक त्याग । कहा जाता है ।
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । सङगं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः । 18-9
हे अर्जुन ! जिस नियत कार्य को । कर्तव्य समझ कर । किया जाये । संग को त्याग कर । तथा फल को । मन से त्याग कर । किया जाय । ऐसे त्याग को । सात्विक माना जाता है ।
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः । 18-10
जो मनुष्य । न अकुशल कर्म से । द्वेष करता है । और न ही । कुशल कर्म के प्रति । खिंचता है ( अर्थात न लाभदायक फल की इच्छा करता है । और न अलाभ के प्रति द्वेष करता है )  ऐसा त्यागी मनुष्य । सत्त्व में समाहित है । मेधावी ( बुद्धिमान ) है । और संशय हीन है ।
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते । 18-11
देहधारियों के लिये । समस्त कर्मों का त्याग करना । सम्भव नहीं है । परन्तु जो । कर्मों के फलों का । त्याग करता है । वही वास्तव में त्यागी है ।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित । 18-12
कर्म का । 3 प्रकार का फल । हो सकता है । अनिष्ट ( बुरा ) इष्ट ( अच्छा अथवा प्रिय ) और मिला जुला ( दोनों ) । जिन्होंने । कर्म के फलों का । त्याग नहीं किया । उन्हें वे फल । मृत्यु के पश्चात भी । प्राप्त होते हैं । परन्तु उन्हें कभी नहीं । जिन्होंने उनका त्याग कर दिया है ।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे  । सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम । 18-13
हे महाबाहो ! सभी कर्मों के । सिद्ध होने के पीछे । 5 कारण । साँख्य सिद्धांत में । बताये गये हैं । उनका तुम मुझसे ज्ञान लो ।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम । विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम । 18-14
ये 5 हैं - अधिष्ठान । कर्ता । विविध प्रकार के करण । विविध प्रकार की चेष्टायें । तथा देव ।
शरीरवाङमनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः । 18-15
मनुष्य अपने शरीर । वाणी । अथवा मन से । जो भी कर्म का आरम्भ करता है । चाहे वह न्याय पूर्ण हो । या उसके विपरीत । यह 5 उस कर्म के हेतु ( कारण ) होते हैं ।
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः । 18-16
जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि द्वारा । केवल अपने आत्म को ही । कर्ता देखता है ( कर्म करने का एकमात्र कारण ) वह दुर्मति सत्य नहीं देखता ।
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते । 18-17
जिसमें यह भाव नहीं है कि - मैंने किया है । और जिसकी बुद्धि लिपी नहीं है ( शुद्ध है ) वह इस संसार में ( किसी जीव को ) मारकर भी नहीं मारता । और न ही ( कर्मफल में ) बँधता है ।
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः । 18-18
ज्ञान । ज्ञेय ( जाने जाने योग्य ) औऱ परिज्ञाता - ये कर्म में प्रेरित करते हैं । और करण । कर्म । और कर्ता - यह कर्म के संग्रह ( निवास स्थान ) हैं ।
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि । 18-19
ज्ञान ( कोई जानकारी ) कर्म । और कर्ता भी । साँख्य सिद्धांत में । गुणों के अनुसार । 3 प्रकार के । बताये गये हैं । उनका भी तुम । मुझसे यथावत श्रवण करो ।
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम । 18-20
जिस ज्ञान द्वारा । मनुष्य सभी जीवों में । 1 ही अव्यय भाव ( परमेश्वर ) को देखता है । 1 ही अविभक्त ( जो बाँटा हुआ नहीं है ) को विभिन्न विभिन्न रूपों में देखता है । उस ज्ञान को तुम सात्विक जानो ।
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम । 18-21
जिस ज्ञान द्वारा मनुष्य । सभी जीवों को । अलग अलग विभिन्न प्रकार का । देखता है । उस ज्ञान दृष्टि को तुम राजसिक जानो ।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम । 18-22
और जिस ज्ञान से मनुष्य । 1 ही व्यर्थ कार्य से जुड जाता है । मानो वही सब कुछ हो । वह तत्वहीन । अल्प ( छोटे ) ज्ञान को । तुम तामसिक जानो ।
नियतं सङगरहितमरागद्वेषतः कृतम । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते । 19-23
जो कर्म नियत है ( कर्तव्य है ) उसे संग रहित । और बिना राग द्वेष के किया गया है । जिसे फल की इच्छा । नहीं रखकर । किया गया है । उस कर्म को । सात्विक कहा जाता है ।
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम । 18-24
जो कर्म बहुत परिश्रम से । फल की कामना करते हुये । किया गया है । अहंकार युक्त पुरुष द्वारा । किया गया है । वह कर्म राजसिक है ।
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते । 18-25
जो कर्म सामर्थ्य का । परिणाम का । हानि और हिंसा का । ध्यान न करते हुये । मोह द्वारा आरम्भ किया गया है । वो कर्म तामसिक कहलाता है ।
मुक्तसङगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते । 18-26
जो कर्ता संग मुक्त है । अहम वादी नहीं है । धृति ( स्थिरता ) और उत्साह पूर्ण है । तथा कार्य के सिद्ध और न सिद्ध होने में । 1 सा है ( अर्थात फल से जिसे कोई मतलब नहीं है ) ऐसे कर्ता को सात्विक कहा जाता है ।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः । 18-27
जो कर्ता रागी होता है । अपने किये काम के । फल के प्रति । इच्छा और लोभ रखता है । हिंसात्मक । और अपवित्र वृत्ति वाला । होता है । तथा ( कर्म के सिद्ध होने या न होने पर ) प्रसन्नता । और शोक ग्रस्त होता है । उसे राजसिक कहा जाता है ।
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते । 18-28
जो कर्ता अयुक्त ( कर्म भावना का न होना । सही चेतना न होना ) हो । स्तब्ध हो । आलसी हो । विषादी । तथा दीर्घ सूत्री हो ( लम्बा खींचने वाला हो ) ( जिसकी कर्म न करने में ही रुचि हो । तथा आलस से भरा हो ) ऐसे कर्ता को तामसिक कहते हैं ।
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय । 18-29
हे धनंजय ! अब तुम अशेष रूप से । अलग अलग । बुद्धि तथा धृति ( स्थिरता ) के भी । तीनों गुणों के अनुसार । जो भेद हैं । वे सुनो ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये । बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्विकी । 18-30
प्रवृत्ति ( किसी भी चीज़ या कर्म में लगना ) और निवृत्ति ( किसी भी चीज़ या कर्म से मानसिक छुटकारा पाना ) क्या है ( तथा किस चीज में प्रवृत्त होना चाहिये । और किससे निवृत्त होना चाहिये )  कार्य क्या है ? और अकार्य ( कार्य न करना ) क्या है ? भय क्या है ? और अभय क्या है ? किससे बन्धन उत्पन्न होता है ? और किससे मोक्ष उत्पन्न होता है ? जो बुद्धि । इन सबको जानती है ( इनका भेद देखती है )  हे पार्थ ! वह बुद्धि । सात्त्विक है ।
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च । अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी । 18-31
हे पार्थ ! जिस बुद्धि द्वारा मनुष्य । अपने धर्म ( कर्तव्य ) और अधर्म को । तथा कार्य ( जो करना चाहिये ) और अकार्य को । सार से नहीं जानता । वह बुद्धि । राजसिक है ।
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी । 18-32
हे पार्थ ! जिस बुद्धि से मनुष्य । अधर्म को ही धर्म मानता है । अंधकार से ढकी जिस बुद्धि द्वारा । मनुष्य सभी हितकारी गुणों । अथवा कर्तव्यों को । विपरीत ही देखता है । वह बुद्धि । तामसिक है ।
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्विकी । 18-33
हे पार्थ ! जिस धृति ( मानसिक स्थिरता ) द्वारा मनुष्य । अपने प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को । नियमित करता है । तथा उन्हें नित्य योग साधना में । प्रविष्ट करता है । ऐसी धृति । सात्विक है ।
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन । प्रसङ्गेन फलाकांङक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी । 18-34
हे अर्जुन ! जब मनुष्य फलों की इच्छा रखते हुये । अपने ( स्वार्थ हेतु ) धर्म । इच्छा और धन की प्राप्ति के लिये । कर्मों तथा चेष्टाओं में । प्रवृत्त रहता है । वह धृति । राजसिक है । हे पार्थ !
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी । 18-35
हे पार्थ ! जिस दुर्बुद्धि भरी धृति के कारण । मनुष्य । स्वपन ( निद्रा ) भय । शोक । विषाद । मद ( घमण्ड ) को नहीं त्यागता । वह तामसिक है ।
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति । 18-36
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम । तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम । 18-37
उसी प्रकार । हे भरतर्षभ ! तुम मुझसे । 3 प्रकार के सुख के विषय में भी सुनो । वह सुख जो ( योग ) अभ्यास द्वारा प्राप्त होता है । तथा जिससे मनुष्य को । दुखों का अन्त प्राप्त होता है । जो शुरु में तो । विष के समान । प्रतीत होता है ( प्रिय नहीं लगता ) परन्तु उसका परिणाम । अमृत समान होता है ( प्रिय लगता है ) उस स्वयं की बुद्धि की । प्रसन्नता ( सुख ) से प्राप्त होने वाले सुख को । सात्विक कहा जाता है ।
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम । 18-38
जो सुख भावना विषयों की इन्द्रियों के । संयोग से प्राप्त होती है ( जैसे स्वादिष्ट भोजन आदि ) जो शुरु में तो । अमृत समान प्रतीत होता है । परन्तु उसका परिणाम । विष जैसा होता है । उस सुख को तुम । राजसिक जानो ।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम । 18-39
जो सुख शुरु में । तथा अन्त में भी । आत्मा को मोहित करता है । निद्रा । आलस्य । और प्रमाद से उत्पन्न होने वाले । ऐसी सुख भावना को । तामसिक कहा जाता है ।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः । 18-40
ऐसा कोई भी जीव नहीं है । न इस पृथ्वी पर । और न ही दिव्य लोक के । देवताओं में । जो प्रकृति से उत्पन्न हुये । इन 3 गुणों से मुक्त हो ।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः । 18-41
हे परन्तप ! ब्राह्मणों । क्षत्रियों । वैश्यों । और शूद्रों के कर्म । उनके स्वभाव से उत्पन्न । गुणों के अनुसार ही । विभक्त किये गये हैं ।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं बृह्मकर्म स्वभावजम । 18-42
मानसिक शान्ति । संयम । तपस्या । पवित्रता । शान्ति । सरलता । ज्ञान । तथा अनुभव । यह सब ब्राह्मण के स्वभाव से ही उत्पन्न । कर्म हैं ।
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम । 18-43
शौर्य । तेज । स्थिरता । दक्षता । युद्ध में पीठ न दिखाना । दान । स्वामी भाव - यह सब एक क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम । 18-44
कृषि । गौ रक्षा । वाणिज्य । यह वैश्य के स्वभाव से उत्पन्न । कर्म हैं । परिचर्या । यह शूद्र के स्वाभाविक कर्म हैं ।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु  । 18-45
अपने अपने ( स्वभाव से उत्पन्न ) कर्मों का पालन करते हुये । मनुष्य सिद्धि ( सफलता ) को । प्राप्त करता है । मनुष्य वह सिद्धि लाभ । कैसे प्राप्त करता है । वह तुम सुनो ।
यतः प्रवृतिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः । 18-46
जिन ( परमात्मा ) से । यह सभी जीव । प्रवृत्त हुये हैं ( उत्पन्न हुये हैं )  जिनसे । यह संपूर्ण संसार । व्याप्त है । उन परमात्मा की । अपने कर्म करने द्वारा । अर्चना कर । मनुष्य सिद्धि को । प्राप्त कर लेता है ।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम । 18-47
दूसरे का गुण संपन्न धर्म के बराबर अपना धर्म ( कर्तव्य । कर्म ) ही श्रेय है ( बेहतर है ) भले ही उसमें । कोई गुण न हों । क्योंकि अपने स्वभाव द्वारा । नियत कर्म करते हुये । मनुष्य । पाप प्राप्त नहीं करता ।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः । 18-48
हे कौन्तेय ! अपने जन्म से उत्पन्न ( स्वाभाविक ) कर्म को । उसमें दोष होने पर भी । नहीं त्यागना चाहिये । क्योंकि सभी आरम्भों में ( कर्मों में ) ही । कोई न कोई दोष होता है । जैसे अग्नि धूँयें से ढकी होती है ।
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति । 18-49
हर जगह असक्त ( संग रहित ) बुद्धि मनुष्य । जिसने अपने आप पर । जीत पा ली है । हलचल ( स्पृह ) मुक्त है । ऐसा मनुष्य सन्यास ( मन से इच्छा कर्मों के त्याग ) द्वारा । नैष्कर्म सिद्धि को प्राप्त होता है ।
सिद्धिं प्राप्तो यथा बृह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा । 18-50
इस प्रकार सिद्धि प्राप्त किया मनुष्य । किस प्रकार बृह्म को प्राप्त करता है ? तथा उसके ज्ञान की । क्या निष्ठा होती है ? वह तुम मुझसे संक्षेप में सुनो ।
बुद्धया विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च । 18-51
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः । 18-52
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम । विमुच्य निर्ममः शान्तो बृह्मभूयाय कल्पते । 18-53
पवित्र बुद्धि से युक्त । अपने आत्मा को । स्थिरता से नियमित कर । शब्द आदि विषयों को त्याग कर । तथा राग द्वेष आदि को छोडकर । अकेले स्थान पर निवास करते हुये । नियमित आहार करते हुये । अपने शरीर । वाणी । और मन को । योग में प्रविष्ट करते हुये । वह योगी । नित्य ध्यान योग में लगा । वैराग्य पर आश्रित रहता है । तथा अहंकार । बल । घमण्ड । इच्छा । क्रोध । और घर । संपत्ति । आदि को मन से त्याग कर । मैं भाव से मुक्त हो । शान्ति को प्राप्त करता है । और बृह्म प्राप्ति का । पात्र बनता है ।
बृह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङक्षिति । समः सर्वेषु भूतेषु मदभक्तिं लभते पराम । 18-54
बृह्म के साथ 1 हो जाने पर । वह प्रसन्न आत्मा । न शोक करता है । न इच्छा करता है । सभी जीवों के प्रति 1 सा होकर । वह मेरी परम भक्ति । प्राप्त करता है ।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम । 18-55
उस भक्ति के द्वारा । वह मुझे पूर्णतया । जितना मैं हूँ । सार तक मुझे जान लेता है । और मुझे सार तक जान लेने पर । मुझमें ही प्रवेश कर जाता है ( मुझ में 1 हो जाता है ) ।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम । 18-56
सभी कर्मों को । सदा मेरा ही आश्रय लेकर करो । मेरी कृपा से तुम । उस अव्यय शाश्वत पद को प्राप्त कर लोगे ।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव । 18-57
सभी कर्मों को । अपने चित्त से । मुझ पर त्याग दो ( उनके फलों को मुझ पर छोड दो । और कर्मों को मेरे हवाले करते केवल मेरे लिये करो ) । सदा इसी बुद्धि योग का आश्रय लेते हुये । सदा मेरे ही चित्त वाले बनो ।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङक्ष्यसि । 18-58
मुझमें ही चित्त रखकर । तुम मेरी कृपा से । सभी कठिनाईयों को । पार कर जाओगे । परन्तु यदि तुम अहंकार वश । मेरी आज्ञा नहीं सुनोगे । तो विनाश को प्राप्त होगे ।
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति । 18-59
यदि तुम अहंकार वश ( अहंकार का आश्रय लिये ) यह मानते हो कि तुम युद्ध नहीं करोगे । तो तुम्हारा यह व्यवसाय ( धारणा ) मिथ्या है । क्योंकि तुम्हारी प्रकृति तुम्हें ( युद्ध में ) नियोजित कर देगी ।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत । 18-60
हे कौन्तेय ! सभी अपने स्वभाव के कारण अपने कर्मों से बंधे हुये हैं । जिसे तुम मोह के कारण नहीं करना चाहते । उसे तुम विवश होकर फिर भी करोगे ।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया । 18-61
हे अर्जुन ! ईश्वर सभी प्राणियों के । हृदय में विराजमान हैं । और अपनी माया द्वारा । सभी जीवों को । भृमित कर रहे हैं । मानो वे ( प्राणी ) किसी यन्त्र पर बैठे हों ।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम । 18-62
उन्हीं की शरण में । तुम संपूर्ण भावना से जाओ । हे भारत ! उन्हीं की कृपा से । तुम्हें परम शान्ति । और शाश्वत स्थान प्राप्त होगा ।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यादगुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु । 18-63
इस प्रकार मैंने तुम्हें गुह्य से भी गूह्य इस ज्ञान का वर्णन किया । इस पर पूर्णतया विचार करके जैसी तु्म्हारी इच्छा हो करो ।
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम । 18-64
तुम एक बार फिर से सबसे ज्यादा रहस्यमयी मेरे परम वचन सुनो । तुम मुझे बहुत प्रिय हो । इसलिये मैं तुम्हारे हित के लिये तुम्हें बताता हूँ ।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे । 18-65
मेरे मन वाले बनो । मेरे भक्त बनो । मेरी पूजा करने वाले बनो । मुझे नमस्कार करो । इस प्रकार तुम मुझे ही प्राप्त करोगे । मैं तुम्हें वचन देता हूँ । क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो ।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः । 18-66
सभी धर्मों को त्याग कर ( हर आश्रय त्याग कर ) केवल मेरी शरण में । बैठ जाओ । मैं तुम्हें । सभी पापों से । मुक्ति दिला दूँगा । इसलिये शोक मत करो ।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति । 18-67
इसे कभी भी उसे मत बताना । जो तपस्या न करता हो । जो मेरा भक्त न हो । और न उसे । जिसमें सेवा भाव न हो । और न ही उसे । जो मुझमें दोष निकालता हो ।
य इमं परमं गुह्यं मदभक्तेष्वभिधास्यति । भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः । 18-68
जो इस परम रहस्य को । मेरे भक्तों को बताता है । वह मेरी परम भक्ति करने के कारण । मुझे ही प्राप्त करता है । इसमें कोई संशय नहीं ।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि । 18-69
न ही मनुष्यों में उससे बढकर । कोई मुझे प्रिय कर्म करने वाला है । और न ही इस पृथ्वी पर । उससे बढकर । कोई और मुझे प्रिय होगा ।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः । ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः । 18-70
जो हम दोनों के । इस धर्म संवाद का । अध्ययन करेगा । वह ज्ञान यज्ञ द्वारा । मेरा पूजन करेगा । यह मेरा मत है ।
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम । 18-71
जो मनुष्य इसको श्रद्धा । और दोष दृष्टि रहित मन से । सुनेगा । वह भी ( अशुभ से ) मुक्त हो । पुण्य कर्म करने वालों के शुभ लोकों में । स्थान गृहण करेगा ।
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय । 18-72
हे पार्थ ! क्या यह तुमने । एकाग्र मन से सुना है ? हे धनंजय ! क्या तुम्हारा । अज्ञान से उत्पन्न । सम्मोह नष्ट हुआ है ।

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव । 18-73
अर्जुन बोले -  हे अच्युत ! आपकी कृपा से । मेरा मोह नष्ट हुआ । और मुझे वापिस स्मृति प्राप्त हुई है । मेरे सन्देह दूर हो गये हैं । और मैं आपके वचनों पर स्थित हुआ । आपकी आज्ञा का पालन करूंगा ।

इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम । 18-74
संजय बोले - इस प्रकार मैंने । वासुदेव और पार्थ के । इस अदभुत रोम हर्षित करने वाले । संवाद को । सुना ।
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतदगुह्यमहं परम । योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम । 18-75
व्यास के कृपा से मैंने इस परम गूह्य ( रहस्य ) योग को साक्षात योगेश्वर श्रीकृष्ण के वचनों द्वारा सुना ।
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम । केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः । 18-76
हे राजन ! भगवान केशव और अर्जुन के । इस अदभुत पुण्य संवाद को । बारबार याद कर । मेरा हृदय । पुनः पुनः । हर्षित हो रहा है ।
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यदभुतं हरेः । विस्मयो मे महान राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः । 18-77
और पुनः पुनः । भगवान हरि के । उस अति अदभुत रूप को । याद कर । मुझे । महान विस्मय हो रहा है । हे राजन ! और मेरा मन । पुनः पुनः । हर्ष से । भरे जा रहा है ।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम । 18-78
जहाँ । योगेश्वर कृष्ण हैं । जहाँ । धनुर्धर पार्थ हैं । वहीं पर । श्री ( लक्ष्मी । ऐश्वर्य । पवित्रता ) विजय । विभूति । और स्थिर नीति हैं । यही मेरा मत है ।

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