शुक्रवार, अगस्त 06, 2010

राजा प्रियवृत का वंश वर्णन

राजा प्रियवृत के आग्नीध । अग्निबाहु । वपुष्मान । धुतिमान । मेधा । मेधातिथि । भव्य ।शवल । पुत्र । ज्योतिष्मान ये दस पुत्र हुये । इन पुत्रों में से मेधा । अग्निबाहु । पुत्र । नाम के तीन पुत्र योगी और जातिस्मर
यानी पूर्व जन्म की याद रखने वाले थे । इन लोगों ने राज्य के प्रति कोई रुचि प्रकट नहीं की । अतः प्रियवृत ने सप्तदीपा प्रथ्वी को अपने अन्य सात पुत्रों में विभक्त कर दिया । पचास करोड योजन में विस्त्रत ( एक योजन में चार कोस या बारह किलोमीटर होते है । ) पूरी प्रथ्वी नदी में तैरती हुयी नाव के समान । चारों और अवस्थित अथाह जल के ऊपर स्थित है । इसमें जम्बू । प्लक्ष । शाल्मल । कुश । क्रौंच । शाक । पुष्कर
ये सात दीप हैं । जो सात समुद्रों से घिरे हुये हैं । इन सात समुद्रों के नाम । लवण । इक्षु । सुरा । घृत । दधि । दुग्ध और जल सागर हैं । ये सभी दीप तथा समुद्र इस क्रम में एक दूसरे से दुगने परिमाण में अवस्थित हैं । जम्बू दीप में मेरु नामक पर्वत है । जो एक लाख योजन में फ़ैला हुआ है । इसकी ऊंचाई चौरासी हजार योजन है । ये प्रथ्वी में सौलह हजार योजन धंसा हुआ है । और शिखर बत्तीस हजार योजन फ़ैला हुआ है । इसका अधोभाग जो प्रथ्वी के ऊपर सन्निहित है । वह भी सोलह हजार योजन के विस्तार में कर्णिका के रूप में अवस्थित है । इसके दक्षिण में हिमालय । हेमकूट । तथा निषध । उत्तर में नील । श्वेत और श्रंगी नामक वर्ष पर्वत हैं । प्लक्ष आदि दीपों के निवासी मरण धर्म से मुक्त हैं । उनमें युग और अवस्था के आधार पर विषमता नहीं होती । जम्बू दीप के राजा आग्नीध के नौ पुत्र हुये । उनके नाम । नाभि । किम्पुरुष । हरिवर्ष । इलावृत । रम्य । हिरण्यमय । कुरु । भद्राश्व । केतुमाल थे । राजा आग्नीध ने उन सब पुत्रों को उनके नाम से प्रसिद्ध भूखण्ड दिया । राजा नाभि और उनकी पत्नी मेरुदेवी से ऋषभ नाम का पुत्र हुआ । उनसे भरत हुये । भरत का पुत्र सुमति हुआ । सुमति के तेजस नाम के पुत्र हुये । तेजस के इन्द्रधुम्न । इन्द्रधुम्न के परमेष्ठी । परमेष्ठी के प्रतीहार । प्रतीहार के प्रतिहर्ता । प्रतिहर्ता के प्रस्तार । प्रस्तार के विभु । विभु के नक्त । नक्त के गय । गय का नर । नर से विराट । विराट से धीमान । धीमान से भौवन । भौवन से त्वष्टा । त्वष्टा के विरजा । विरजा के रज । रज के शतजित । शतजित के विष्वग्ज्योति नामक पुत्र हुआ
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
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