गुरुवार, सितंबर 16, 2010

जानों । जानने से लाभ होता है । मानो मत ।




मेरी समझ से internet को हम सूचनाओं का खजाना तो कह सकते हैं । पर ग्यान का खजाना नहीं कह सकते । हो सकता है । इस point पर मैं गलत होऊं । पर मैंने जितने भी समय internet को use किया है । और इच्छित चीजों को search किया है । तो उनके result से मुझे निराशा ही हाथ लगी है । ये तुलना मैं library से कर रहा हूं । library में कुछ देर के प्रयास के बाद कोई ऐसी अनमोल और पुरानी पुस्तक हाथ लग ही जाती थी । जो अगले आठ दिनों तक न सिर्फ़ ग्यान में भारी इजाफ़ा करती । बल्कि मानसिक खुराक का काम भी देती थी । ये घटना लगभग दस साल पहले की है । जब प्राचीन रहस्यों और प्राचीन ग्यान पर एक शोधकर्ता विद्धान की पुस्तक मुझे मिली । मैंने इस पुस्तक को खरीदने हेतु बहुत पता किया । पर वह बाजार आदि में उपलब्ध नहीं थी । और संक्षेप में वह पुस्तक मुझे नहीं मिल पायी । तब मैंने उसके महत्वपूर्ण अंशो को एक डायरी में लिख लिया । लेकिन बाद के साधनाकाल में बहुत कुछ ऐसा घटित हुआ कि वो डायरी ही कहीं खो गयी । खैर । उस डायरी की याद मुझे एक तोतलाते बालक को देखकर याद आयी । उस diary में चार या पांच अक्षरों का एक ऐसा शब्द था । जिससे हकलाना और तुतलाना ठीक हो जाता था । ये बात एक दिन मुझे महाराज जी के सामने याद आ गयी । मैंने कहा । महाराज जी वह कौन सा शब्द हो सकता है ? आत्मग्यान के साधक को जैसा उत्तर मिल सकता था । वैसा ही मुझे महाराज जी से मिला । थोपे हुये ग्यान को ग्रहण मत करो । तुम्हारी आत्मा के पास हर उत्तर है । और जीवन का वास्तविक लक्ष्य हमेशा याद रखो । ये शरीर तुम्हें बारबार मिलने वाला नहीं है ? सीधी सी बात थी । महाराज जी उस दिन अलग तरह के मूड में थे । इंसान के दिमाग में एक खासियत होती है कि एक बार कोई बात आ जाय । तो सहज निकलती नहीं है । शायद महाराज जी ने यह बात जान ली थी । इसके लगभग दो तीन महीने बाद की बात है । महाराज जी के पास उनका एक शिष्य मिलने आया । जिसके साथ दस साल का बालक था । वह क शब्द को त बोलता था । और भी शब्दों में तुतलाने का अधिक समावेश था । वह शिष्य बालक को यूं ही ले आया था । उसके साथ क्या होने वाला है । ये शायद उसको भी पता नहीं था ? पापा दे तौन एं ? पापा ये कौन हैं ? उसने एक आदमी की तरफ़ इशारा करके पूछा । महाराज जी ने कहा । क बोलो । ता बोलई ना पात । ज बोलो । दा । उसने बोला । मैंने महाराज जी की तरफ़ देखा । उनके चेहरे पर वही शान्ति थी । उनका किसी की तरफ़ कोई ध्यान नहीं था । फ़िर वे उस बालक को बताने लगे । देखो क यहां से निकलता है ? यहां से जोर देकर बोलो । बालक ने वैसा ही किया । कुछ अस्पष्ट खरखराहट उसके कंठ से निकली । इसके बाद लगभग पचास बार के प्रयास में वह तुरन्त क बोलने लगा । अब ज इस तरह से बोलो । यहां जोर देना हैं ..। पांच छह दिन में ही बालक बिना किसी दवा के
एकदम साफ़ उच्चारण करने लगा । उसका पिता इसको चमत्कार बताते हुये महाराज जी के पैरों में गिर गया । महाराज जी ने कहा । ये कोई चमत्कार नहीं है । इसका स्वर यन्त्र अवरुद्ध था । क च प द ग ह आदि अक्षर कंठ तालु नाभि आदि स्थानों से आते हैं । उन स्थानों पर जोर देकर बोलने से उच्चारण सही होने लगता है । और यन्त्र बखूबी कार्य करने लगता है । जाहिर था । महाराज जी ने मेरी शंका का समाधान निराले अंदाज में किया था । बहुत साधारण तरीका । प्रक्टीकल । और एक जीव का भला ।
यही महाराज जी अपने प्रवचन में हमेशा कहते है कि जानों । जानने से लाभ होता है । मानो मत । मानने से कोई लाभ नहीं होता । उलटे तरह तरह के विचारों से आदमी धर्म को लेकर भृमित हो जाता है । सनातन धर्म के बारे में अनेक धारणायें मानने का ही परिणाम है ।

1 टिप्पणी:

vinay ने कहा…

बहुत अच्छा वेग्यानिक तरीका था ।

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...