गुरुवार, सितंबर 02, 2010

जीव माया की मोह निद्रा में है ।




तेरी अजर बनी अबनौती । इसमें बिगडा बनी न होती ।
कई दिनों बाद पूज्य श्री महाराज जी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ । अबकी बार श्री महाराज जी से एकान्त में गम्भीर वार्ता का काफ़ी समय मिला । और काफ़ी अलौकिक रहस्यों के बारे में जाना । पहले काफ़ी चिल्ला ( डांट ) खायी । क्योंकि आत्म ग्यान में बडे से बडे रहस्य को मौखिक तौर पर जानना तुच्छ समझा जाता है । मुंहजबानी जानने के बजाय साधना से उसे practical स्तर पर जानने का अधिक महत्व होता है । तब मैंने निवेदन किया । महाराज जी सामान्य जन के लिये मौखिक ग्यान प्रेरणा का कार्य करता है । इस पर पहले तो चिल्ला पडी । कि जीव ( आम आदमी ) कहीं भक्ति करना चाहता है ? वह तो धन वासना के पीछे भागता हुआ निरन्तर काल के गाल में जाता हुआ खुश हो रहा है ? तब मैंने निवेदन किया । महाराज जी जीव माया की मोह निद्रा में है । साधु संतों का कार्य ही है । जीव को इस मोह निद्रा से जगाना । हे गुरुदेव । मुझ तुच्छ को आपने ही अहसास कराया । मोह का क्षय हो जाना ही वास्तविक मोक्ष है । न सिर्फ़ बताया । बल्कि मोह का क्षय कैसे होता है । ये सिखाया भी । निर्मल आत्मा का । निज स्वरूप का दर्शन कैसे होता है । इसका सप्रमाणिक रास्ता दिखाया । जिस पर चलते हुये अनेक साधक वास्तविक भक्ति का स्वरूप जान गये । और ग्रहस्थ में रहते हुये भली प्रकार वह भक्ति कर रहे हैं । जो पूर्व में अग्यानतावश समझी जाता था कि हिमालय पर बैठकर ही की जा सकती है ? खैर । अबकी बार जो भी जाना । उसे लगभग सात आठ लेखों में अपने ब्लाग्स में प्रकाशित कर रहा हूं । जो धार्मिक । ऐतहासिक । और ज्योतिष आदि का शोध करने के साथ साथ भक्तों के भी बेहद काम आयेगा । इसी के साथ अमेरिका के मेरे मित्र त्रयम्बक उपाध्याय ने जो मुझे गुरुजी के नये नये फ़ोटो खींचने का शौक लगा दिया । वह भी मैं गुरु जी के भक्तों शिष्यों के लिये प्रकाशित कर रहा हूं ।

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