बुधवार, फ़रवरी 15, 2012

बृह्म निष्ठ महात्मा तीनों लोकों मे समान भाव से गति करते हैं

अथ काम्यजपस्थानं कथयामि वरानने । सागरान्ते सरित्तीरे तीर्थे हरिहरालये ।
शक्तिदेवालये गोष्ठे सर्वदेवालये शुभे । वटस्य धात्र्या मूले व मठे वृन्दावने तथा ।
पवित्रे निर्मले देशे नित्यानुष्ठानोऽपि वा । निर्वेदनेन मौनेन जपमेतत् समारभेत ।
हे सुमुखी ! अब सकामियों के लिए । जप करने के । स्थानों का । वर्णन करता हूँ । सागर । या नदी के तट पर । तीर्थ में । शिवालय में । विष्णु के । या देवी के । मंदिर में । गौशाला में । सभी शुभ देवालयों में । वट वृक्ष के । या आँवले के । वृक्ष के नीचे । मठ में । तुलसी वन में । पवित्र निर्मल स्थान में । नित्य अनुष्ठान के रूप में । अनासक्त रहकर । मौन पूर्वक इसके जप का आरंभ करना चाहिए ।
जाप्येन जयमाप्नोति जप सिद्धिं फलं तथा । हीनकर्म त्यजेत्सर्वं गर्हितस्थानमेव च ।
जप से जय प्राप्त होता है । तथा जप की सिद्धि रूप फल मिलता है । जपानुष्ठान के काल में सब नीच कर्म और निन्दित स्थान का त्याग करना चाहिए । 145
शमशाने बिल्वमूले वा वटमूलान्तिके तथा । सिद्धयन्ति कानके मूले चूतवृक्षस्य सन्निधौ ।
शमशान में । बिल्व । वट वृक्ष । या कनक वृक्ष के नीचे । और आम वृक्ष के पास । जप करने से से सिद्धि जल्दी होती है । 146
आकल्पजन्मकोटीनां यज्ञव्रततपः क्रियाः । ताः सर्वाः सफला देवि गुरुसंतोषमात्रतः ।
हे देवी ! कल्प पर्यन्त के । करोंड़ो जन्मों के यज्ञ । वृत । तप और शास्त्रोक्त क्रियाएँ । ये सब गुरु के संतोष मात्र से सफल हो जाते हैं । 147
मंदभाग्या ह्यशक्ताश्च ये जना नानुमन्वते । गुरुसेवासु विमुखाः पच्यन्ते नरकेऽशुचौ ।
भाग्य हीन । शक्ति हीन । और गुरु सेवा से विमुख । जो लोग इस उपदेश को नहीं मानते । वे घोर नरक में पड़ते हैं । 148
विद्या धनं बलं चैव तेषां भाग्यं निरर्थकम । येषां गुरुकृपा नास्ति अधो गच्छन्ति पार्वति ।
जिसके ऊपर गुरु की कृपा नहीं है । उसकी विद्या । धन । बल । और भाग्य । निरर्थक है । हे पार्वती ! उसका अधः पतन होता है । 149
धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोदभवः । धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद गुरुभक्तता ।
जिसके अंदर गुरु भक्ति हो । उसकी माता धन्य है । उसका पिता धन्य है । उसका वंश धन्य है । उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं । समग्र धरती धन्य है । 150
शरीरमिन्द्रियं प्राणच्चार्थः स्वजनबन्धुतां । मातृकुलं पितृकुलं गुरुरेव न संशयः ।
शरीर । इन्द्रियाँ । प्राण । धन । स्व जन । बन्धु बान्धव । माता का कुल । पिता का कुल । ये सब गुरु ही हैं । इसमें संशय नहीं है । 151
गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरौ निष्ठा परं तपः । गुरोः परतरं नास्ति त्रिवारं कथयामि ते ।
गुरु ही देव हैं । गुरु ही धर्म हैं । गुरु में निष्ठा ही परम तप है । गुरु से अधिक और कुछ नहीं है । यह मैं तीन बार कहता हूँ । 152
समुद्रे वै यथा तोयं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम । भिन्ने कुंभे यथाऽकाशं तथाऽत्मा परमात्मनि ।
जिस प्रकार सागर में पानी । दूध में दूध । घी में घी । अलग अलग घटों में आकाश । एक और अभिन्न है । उसी प्रकार परमात्मा में जीवात्मा एक और अभिन्न है । 153
तथैव ज्ञानवान जीव परमात्मनि सर्वदा । ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र कुत्र दिवानिशम ।
इसी प्रकार ज्ञानी सदा परमात्मा के साथ । अभिन्न होकर । रात दिन । आनंद विभोर होकर । सर्वत्र विचरते हैं । 154
गुरुसन्तोषणादेव मुक्तो भवति पार्वति । अणिमादिषु भोक्तृत्वं कृपया देवि जायते ।
हे पार्वती ! गुरु को संतुष्ट करने से । शिष्य मुक्त हो जाता है । हे देवी ! गुरु की कृपा से वह अणिमादि सिद्धियों का भोग प्राप्त करता है । 155
साम्येन रमते ज्ञानी दिवा वा यदि वा निशि । एवं विधौ महामौनी त्रैलोक्यसमतां वृजेत ।
ज्ञानी दिन में । या रात में । सदा सर्वदा । समत्व में रमण करते हैं । इस प्रकार के । महा मौनी । अर्थात बृह्म निष्ठ महात्मा । तीनों लोकों मे समान भाव से गति करते हैं । 156
गुरुभावः परं तीर्थमन्यतीर्थं निरर्थकम । सर्वतीर्थमयं देवि श्रीगुरोश्चरणाम्बुजम ।
गुरु भक्ति ही । सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है । अन्य तीर्थ । निरर्थक हैं । हे देवी ! गुरु के चरण कमल सर्व तीर्थ मय हैं । 157
कन्याभोगरतामन्दाः स्वकान्तायाः पराड्मुखाः । अतः परं मया देवि कथितन्न मम प्रिये ।
हे देवी ! कन्या के भोग में रत । स्व स्त्री से विमुख ( पर स्त्री गामी ) ऐसे बुद्धि शून्य लोगों को । मेरा यह आत्म प्रिय परम बोध मैंने नहीं कहा । 158
अभक्ते वंचके धूर्ते पाखंडे नास्तिकादिषु । मनसाऽपि न वक्तव्या गुरुगीता कदाचन ।
अभक्त । कपटी । धूर्त । पाखण्डी । नास्तिक इत्यादि को । यह गुरु गीता । कहने का मन में सोचना तक नहीं । 159
गुरवो बहवः सन्ति शिष्यवित्तापहारकाः । तमेकं दुर्लभं मन्ये शिष्यह्यत्तापहारकम ।
शिष्य के धन को । अपहरण करने वाले । गुरु तो बहुत हैं । लेकिन शिष्य के । हृदय का । संताप । हरने वाला । एक गुरु भी दुर्लभ है । ऐसा मैं मानता हूँ । 160
चातुर्यवान्विवेकी च अध्यात्मज्ञानवान् शुचिः । मानसं निर्मलं यस्य गुरुत्वं तस्य शोभते ।
जो चतुर हो । विवेकी हो । अध्यात्म के ज्ञाता हो । पवित्र हो । तथा निर्मल मान सवाले हो ।उनमें गुरुत्व शोभा पाता है । 161
गुरवो निर्मलाः शान्ताः साधवो मितभाषिणः । कामक्रोधविनिर्मुक्ताः सदाचारा जितेन्द्रियाः ।
गुरु निर्मल । शांत । साधु स्वभाव के । मित भाषी । काम क्रोध से अत्यंत रहित । सदाचारी और जितेन्द्रिय होते हैं । 162
सूचकादि प्रभेदेन गुरवो बहुधा स्मृताः । स्वयं समयक परीक्ष्याथ तत्वनिष्ठं भजेत्सुधीः ।
सूचक आदि भेद से । अनेक गुरु कहे गये हैं । बुद्धिमान मनुष्य को । स्वयं योग्य विचार करके । तत्व निष्ठ । गुरु की शरण लेनी चाहिए । 163
वर्णजालमिदं तद्वद्बाह्यशास्त्रं तु लौकिकम । यस्मिन देवि समभ्यस्तं स गुरुः सूचकः स्मृतः ।
हे देवी ! वर्ण । और अक्षरों से । सिद्ध करने वाले । बाह्य । लौकिक शास्त्रों का । जिसको अभ्यास हो । वह गुरु सूचक गुरु कहलाता है । 164
वर्णाश्रमोचितां विद्यां धर्माधर्मविधायिनीम । प्रवक्तारं गुरुं विद्धि वाचकस्त्वति पार्वति ।
हे पार्वती ! धर्म अधर्म का । विधान करने वाली । वर्ण । और आश्रम के । अनुसार । विद्या का । प्रवचन करने वाले । गुरु को । तुम वाचक गुरु जानो । 165
पंचाक्षर्यादिमंत्राणामुपदेष्टा त पार्वति । स गुरुर्बोधको भूयादुभयोरमुत्तमः ।
पंचाक्षरी । आदि मंत्रों का । उपदेश देने वाले । गुरु । बोधक गुरु । कहलाते हैं । हे पार्वती ! प्रथम दो प्रकार के गुरुओं से यह गुरु उत्तम हैं । 166
मोहमारणवश्यादितुच्छमंत्रोपदर्शिनम । निषिद्धगुरुरित्याहुः पण्डितस्तत्वदर्शिनः ।
मोहन । मारण । वशीकरण । आदि तुच्छ मंत्रों को । बताने वाले । गुरु को । तत्व दर्शी पंडित । निषिद्ध गुरु कहते हैं । 167
अनित्यमिति निर्दिश्य संसारे संकटालयम । वैराग्यपथदर्शी यः स गुरुर्विहितः प्रिये ।
हे प्रिये ! संसार । अनित्य । और दुखों का । घर है । ऐसा समझा कर । जो गुरु । वैराग्य का । मार्ग बताते हैं । वे । विहित गुरु । कहलाते हैं । 168
तत्वमस्यादिवाक्यानामुपदेष्टा तु पार्वति । कारणाख्यो गुरुः प्रोक्तो भवरोगनिवारकः ।
हे पार्वती ! तत्वमसि । आदि । महा वाक्यों का । उपदेश देने वाले । तथा संसार रूपी । रोगों का । निवारण करने वाले । गुरु कारणाख्य गुरु । कहलाते हैं । 169
सर्वसन्देहसन्दोहनिर्मूलनविचक्षणः । जन्ममृत्युभयघ्नो यः स गुरुः परमो मतः ।
सभी प्रकार के । सन्देहों का । जड़ से नाश करने में । जो चतुर हैं । जन्म । मृत्यु । तथा भय का । जो विनाश करते हैं । वे परम गुरु कहलाते हैं । 170
बहुजन्मकृतात पुण्याल्लभ्यतेऽसौ महागुरुः । लब्ध्वाऽमुं न पुनर्याति शिष्यः संसारबन्धनम ।
अनेक जन्मों के । किये हुए पुण्यों से । ऐसे । महा गुरु । प्राप्त होते हैं । उनको प्राप्त कर । शिष्य । पुनः संसार बन्धन में । नहीं बँधता । अर्थात । मुक्त हो जाता है । 171
एवं बहुविधालोके गुरवः सन्ति पार्वति । तेषु सर्वप्रत्नेन सेव्यो हि परमो गुरुः ।
हे पार्वती ! इस प्रकार । संसार में । अनेक प्रकार के । गुरु होते हैं । इन सबमें । एक परम गुरु का ही । सेवन । सर्व प्रयत्नों से करना चाहिए । 172
स्वयं मूढा मृत्युभीताः सुकृताद्विरतिं गताः । दैवन्निषिद्धगुरुगा यदि तेषां तु का गतिः ।
पार्वती बोली - प्रकृति से ही मूढ । मृत्यु से भयभीत । सतकर्म से विमुख । लोग यदि । दैवयोग से । निषिद्ध गुरु का । सेवन करें । तो उनकी क्या गति होती है ? 173
निषिद्धगुरुशिष्यस्तु दुष्टसंकल्पदूषितः । बृह्मप्रलयपर्यन्तं न पुनर्याति मृत्यताम ।
महादेव बोले - निषिद्ध गुरु का । शिष्य । दुष्ट संकल्पों से । दूषित होने के कारण । बृह्म प्रलय तक । मनुष्य नहीं होता । पशु योनि में रहता है । 174
श्रृणु तत्वमिदं देवि यदा स्याद्विरतो नरः । तदाऽसावधिकारीति प्रोच्यते श्रुतमस्तकैः ।
हे देवी ! इस तत्व को । ध्यान से सुनो । मनुष्य जब । विरक्त होता है । तभी वह । अधिकारी कहलाता है । ऐसा । उपनिषद कहते हैं । अर्थात । दैव योग से । गुरु प्राप्त होने की । बात अलग है । और विचार से । गुरु चुनने की । बात अलग है । 175
अखण्डैकरसं बृह्म नित्यमुक्तं निरामयम । स्वस्मिन संदर्शितं येन स भवेदस्य देशिकः ।
अखण्ड । एक रस । नित्य मुक्त । और निरामय बृह्म । जो अपने अंदर ही । दिखाते हैं । वे ही गुरु होने चाहिए । 176
जलानां सागरो राजा यथा भवति पार्वति । गुरुणां तत्र सर्वेषां राजायं परमो गुरुः ।
हे पार्वती ! जिस प्रकार । जलाशयों में । सागर राजा है । उसी प्रकार । सब गुरुओं में । ये परम गुरु । राजा हैं । 177
मोहादिरहितः शान्तो नित्यतृप्तो निराश्रयः । तृणीकृतबृह्मविष्णुवैभवः परमो गुरुः ।
मोह आदि । दोषों से रहित । शांत । नित्य । तृप्त । किसी के । आश्रय रहित । अर्थात स्वाश्रयी । बृह्मा । और विष्णु के । वैभव को भी । तृण वत ( तिनका समान तुच्छ ) । समझने वाले । गुरु ही परम गुरु हैं । 178
सर्वकालविदेशेषु स्वतंत्रो निश्चलस्सुखी । अखण्डैकरसास्वादतृप्तो हि परमो गुरुः ।
सर्व काल । और देश में । स्वतंत्र । निश्चल । सुखी । अखण्ड । एक रस के । आनन्द से तृप्त । ही सचमुच परम गुरु हैं । 179
द्वैताद्वैतविनिर्मुक्तः स्वानुभूतिप्रकाशवान । अज्ञानान्धमश्छेत्ता सर्वज्ञ परमो गुरुः ।
द्वैत । और अद्वैत से मुक्त । अपने अनुभुव रूप । प्रकाश वाले । अज्ञान रूपी । अंधकार को । छेदने वाले । और सर्वज्ञ ही । परम गुरु हैं  । 180
यस्य दर्शनमात्रेण मनसः स्यात प्रसन्नता । स्वयं भूयात धृतिश्शान्तिः स भवेत परमो गुरुः ।
जिनके । दर्शन मात्र से । मन प्रसन्न होता है । अपने आप । धैर्य और शांति । आ जाती है । वे परम गुरु हैं । 181
स्वशरीरं शवं पश्यन् तथा स्वात्मानमद्वयम । यः स्त्रीकनकमोहघ्नः स भवेत परमो गुरुः ।
जो । अपने शरीर को । शव समान । समझते हैं । अपने आत्मा को । अद्वय । जानते हैं । जो कामिनी । और कंचन के । मोह का । नाश कर्ता हैं । वे परम गुरु हैं । 182
मौनी वाग्मीति तत्वज्ञो द्विधाभूच्छृणु पार्वति । न कश्चिन्मौनिना लाभो लोकेऽस्मिन्भवति प्रिये ।
वाग्मी तूत्कटसंसारसागरोत्तारणक्षमः । यतोऽसौ संशयच्छेत्ता शास्त्रयुक्त्यनुभूतिभिः
हे पार्वती ! सुनो । तत्वज्ञ । दो प्रकार के । होते हैं । मौनी और वक्ता । इन दोंनों में से । मौनी गुरु द्वारा । लोगों को । कोई लाभ नहीं होता । परन्तु वक्ता गुरु । भयंकर संसार सागर को । पार कराने में । समर्थ होते हैं । क्योंकि शास्त्र । युक्ति ( तर्क ) और अनुभूति से । वे सभी संशयों का । छेदन करते हैं । 183 । 184
गुरुनामजपाद्येवि बहुजन्मार्जितान्यपि । पापानि विलयं यान्ति नास्ति सन्देहमण्वपि ।
हे देवी ! गुरु नाम के जप से । अनेक जन्मों के । इकठ्ठे हुए पाप भी । नष्ट होते हैं । इसमें अणु मात्र । संशय नहीं है । 185
कुलं धनं बलं शास्त्रं बान्धवास्सोदरा इमे । मरणे नोपयुज्यन्ते गुरुरेको हि तारकः ।
अपना कुल । धन । बल । शास्त्र । नाते । रिश्तेदार । भाई । ये सब । मृत्यु के । अवसर पर । काम नहीं आते । एक मात्र गुरु ही । उस समय तारणहार हैं । 186
कुलमेव पवित्रं स्यात सत्यं स्वगुरुसेवया । तृप्ताः स्युस्स्कला देवा बृह्माद्या गुरुतर्पणात ।
अपने गुरु की । सेवा करने से । अपना कुल भी । पवित्र होता है । गुरु के तर्पण से । बृह्मा आदि । सब देव तृप्त होते हैं । 187
स्वरूपज्ञानशून्येन कृतमप्यकृतं भवेत । तपो जपादिकं देवि सकलं बालजल्पवत ।
हे देवी ! स्वरूप के । ज्ञान के बिना । किये हुए । जप । तप आदि । सब कुछ । नहीं किये हुए । के बराबर हैं । बालक के । बकवाद के । समान ( व्यर्थ ) हैं । 188
न जानन्ति परं तत्वं गुरुदीक्षापराड्मुखाः । भ्रान्ताः पशुसमा ह्येते स्वपरिज्ञानवर्जिताः ।
गुरु दीक्षा से । विमुख रहे हुए लोग । भ्रांत हैं । अपने । वास्तविक ज्ञान से । रहित हैं । वे सचमुच । पशु के समान हैं । परम तत्व को । वे नहीं जानते । 189
तस्मात्कैवल्यसिद्धयर्थं गुरुमेव भजेत्प्रिये । गुरुं विना न जानन्ति मूढास्तत्परमं पदम ।
हे प्रिय ! कैवल्य की । सिद्धि के लिए । गुरु का ही । भजन करना चाहिए । गुरु के बिना । मूढ लोग । उस परम पद को । नहीं जान सकते । 190
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते सर्वकर्माणि गुरोः करुणया शिवे ।
हे शिवे ! गुरु की । कृपा से । हृदय की ग्रन्थि । छिन्न हो जाती है । सब संशय । कट जाते हैं । और सब कर्म । नष्ट हो जाते हैं । 191
कृताया गुरुभक्तेस्तु वेदशास्त्रनुसारतः । मुच्यते पातकाद घोराद् गुरुभक्तो विशेषतः ।
वेद । और शास्त्र के । अनुसार । विशेष रूप से । गुरु की । भक्ति करने से । गुरु भक्त । घोर पाप से भी । मुक्त हो जाता है । 192
दुःसंगं च परित्यज्य पापकर्म परित्यजेत । चित्तचिह्नमिदं यस्य तस्य दीक्षा विधीयते ।
दुर्जनों का । संग त्याग कर । पाप कर्म । छोड़ देने चाहिए । जिसके चित्त में । ऐसा चिह्न । देखा जाता है । उसके लिए । गुरु दीक्षा का । विधान है । 193
चित्तत्यागनियुक्तश्च क्रोधगर्वविवर्जितः । द्वैतभावपरित्यागी तस्य दीक्षा विधीयते ।
चित्त का । त्याग करने में । जो प्रयत्नशील है । क्रोध और । गर्व से रहित है । द्वैत भाव का । जिसने त्याग किया है । उसके लिए । गुरु दीक्षा का । विधान है । 194
एतल्लक्षणसंयुक्तं सर्वभूतहिते रतम । निर्मलं जीवितं यस्य तस्य दीक्षा विधीयते ।
जिसका जीवन । इन लक्षणों से । युक्त हो । निर्मल हो । जो सब जीवों के । कल्याण में । रत हो । उसके लिए । गुरु दीक्षा का । विधान है । 195
अत्यन्तचित्तपक्वस्य श्रद्धाभक्तियुतस्य च । प्रवक्तव्यमिदं देवि ममात्मप्रीतये सदा ।
हे देवी ! जिसका चित्त । अत्यन्त परिपक्व हो । श्रद्धा । और भक्ति से । युक्त हो । उसे यह तत्व । सदा मेरी । प्रसन्नता के लिए । कहना चाहिए । 196
सत्कर्मपरिपाकाच्च चित्तशुद्धस्य धीमतः । साधकस्यैव वक्तव्या गुरुगीता प्रयत्नतः ।
सतकर्म के । परिपाक से । शुद्ध हुए । चित्त वाले । बुद्धिमान साधक को ही । गुरु गीता । प्रयत्न पूर्वक कहनी चाहिए । 197
नास्तिकाय कृतघ्नाय दांभिकाय शठाय च । अभक्ताय विभक्ताय न वाच्येयं कदाचन ।
नास्तिक । कृतघ्न । दंभी । शठ । अभक्त । और विरोधी को । यह गुरु गीता । कदापि नहीं कहनी चाहिए । 198
स्त्रीलोलुपाय मूर्खाय कामोपहतचेतसे । निन्दकाय न वक्तव्या गुरुगीतास्वभावतः ।
स्त्री लम्पट । मूर्ख । काम वासना से गृस्त । चित्त वाले । तथा निंदक को । गुरु गीता नहीं कहनी चाहिए । 199
एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुर्नैव मन्यते । श्वनयोनिशतं गत्वा चाण्डालेष्वपि जायते ।
एकाक्षर मंत्र का । उपदेश करने वाले को । जो गुरु नहीं मानता । वह 100 जन्मों में । कुत्ता होकर । फिर चाण्डाल की योनि में जन्म लेता है । 200
गुरुत्यागाद भवेन्मृत्युर्मन्त्रत्यागाद्यरिद्रता । गुरुमंत्रपरित्यागी रौरवं नरकं व्रजेत ।
गुरु का त्याग करने से । मृत्यु होती है । गुरु मंत्र को छोड़ने से । दरिद्रता आती है । और गुरु एवं मंत्र । दोनों का । त्याग करने से । रौरव नरक मिलता है । 201
शिवक्रोधाद गुरुस्त्राता गुरुक्रोधाच्छिवो न हि । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराज्ञां न लंघयेत ।
शिव के क्रोध से । गुरु रक्षा करते हैं । लेकिन गुरु के क्रोध से । शिव रक्षा नहीं करते । अतः सब प्रयत्न से । गुरु की आज्ञा का । उल्लंघन नहीं करना चाहिए । 202
सप्तकोटिमहामंत्राश्चित्तविभृंशकारकाः । एक एव महामंत्रो गुरुरित्यक्षरद्वयम ।
7 करोड़ महा मंत्र विद्यमान हैं । वे सब । चित्त को । भृमित करने वाले हैं । गुरु नाम का । दो अक्षर वाला मंत्र । एक ही महा मंत्र है । 203
न मृषा स्यादियं देवि मदुक्तिः सत्यरूपिणि । गुरुगीतासमं स्तोत्रं नास्ति नास्ति महीतले ।
हे देवी ! मेरा यह कथन । कभी मिथ्या नहीं होगा । वह सत्य स्वरूप है । इस पृथ्वी पर । गुरु गीता के समान । अन्य कोई स्तोत्र नहीं है । 204
गुरुगीतामिमां देवि भवदुःखविनाशिनीम । गुरुदीक्षाविहीनस्य पुरतो न पठेत्क्वचित ।
भव दुख का । नाश करने वाली । इस गुरु गीता का । पाठ । गुरु दीक्षा विहीन । मनुष्य के आगे । कभी नहीं । करना चाहिए । 205
हस्यमरत्यन्तरहस्यमेतन्न पापिना लभ्यमिदं महेश्वरि । अनेकजन्मार्जितपुण्यपाकाद गुरोस्तु तत्वं लभते मनुष्यः ।
हे महेश्वरी ! यह रहस्य । अत्यंत गुप्त । रहस्य है । पापियों को । वह नहीं मिलता । अनेक जन्मों के । किये हुए । पुण्य के । परिपाक से ही । मनुष्य । गुरु तत्व को । प्राप्त कर सकता है । 206
सर्वतीर्थवगाहस्य संप्राप्नोति फलं नरः । गुरोः पादोदकं पीत्वा शेषं शिरसि धारयन ।
गुरु के । चरणामृत का । पान करने से । और उसे । मस्तक पर धारण करने से । मनुष्य सब तीर्थों में । स्नान करने का । फल प्राप्त करता है । 207
गुरुपादोदकं पानं गुरोरुच्छिष्टभोजनम । गुरुर्मूर्ते सदा ध्यानं गुरोर्नाम्नः सदा जपः ।
गुरु के । चरणामृत का । पान करना चाहिए । गुरु के । भोजन में से । बचा हुआ खाना । गुरु की मूर्ति का । ध्यान करना । और गुरु नाम का । जप करना चाहिए । 208
गुरुरेको जगत्सर्वं बृह्मविष्णुशिवात्मकम ।  गुरोः परतरं नास्ति तस्मात्संपूजयेद गुरुम ।
बृह्मा । विष्णु । शिव सहित । समग्र जगत । गुरु में समाविष्ट है । गुरु से अधिक । और कुछ भी । नहीं है । इसलिए गुरु की । पूजा करनी चाहिए । 209
ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभ्यते गुरुभक्तितः । गुरोः समानतो नान्यत् साधनं गुरुमार्गिणाम ।
गुरु के प्रति ( अनन्य ) भक्ति से । ज्ञान के बिना भी । मोक्ष पद । मिलता है । गुरु के मार्ग पर । चलने वालों के लिए । गुरु के समान । अन्य कोई साधन नहीं है । 210
गुरोः कृपाप्रसादेन बृह्मविष्णुशिवादयः । सामर्थ्यमभजन सर्वे सृष्टिस्थित्यंतकर्मणि ।
गुरु के । कृपा प्रसाद से ही । बृह्मा । विष्णु । और शिव । यथा कृम । जगत की सृष्टि । स्थिति । और लय करने का । सामर्थ्य प्राप्त करते हैं । 211
मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम । स्मृतिवेदपुराणानां सारमेव न संशयः ।
हे देवी ! गुरु । यह दो अक्षर वाला । मंत्र । सब मंत्रों में । राजा है । श्रेष्ठ है । स्मृतियाँ । वेद । और पुराणों का । वह सार ही है । इसमें संशय नहीं है । 212
यस्य प्रसादादहमेव सर्वं मय्येव सर्वं परिकल्पितं च । इत्थं विजानामि सदात्मरूपं त्स्यांघ्रिपद्मं प्रणतोऽस्मि नित्यम ।
मैं ही सब हूँ । मुझमें ही सब कल्पित है । ऐसा ज्ञान । जिनकी कृपा से हुआ है । ऐसे आत्म स्वरूप । गुरु के । चरण कमलों में । मैं नित्य प्रणाम करता हूँ । 213
अज्ञानतिमिरान्धस्य विषयाक्रान्तचेतसः । ज्ञानप्रभाप्रदानेन प्रसादं कुरु मे प्रभो ।
हे प्रभो ! अज्ञान रूपी । अंधकार में । अंध बने हुए । और विषयों से । आक्रान्त चित्त वाले । मुझको । ज्ञान का । प्रकाश देकर । कृपा करो । 214
इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमा महेश्वर संवादे श्री गुरु गीतायां तृतीयोऽध्यायः

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