सोमवार, दिसंबर 12, 2011

क्या कोई ज्ञात को नकार सकता है




अब यह कुछ ऐसी वास्तविकता है, जिसे मैं निश्चित होकर कह सकता हूँ कि मैंने उपलब्ध किया है। मेरे लिये यह कोई सैद्धांतिक संकल्पना नहीं है, यह मेरे जीवन का अनुभव है। सुनिश्चित वास्तविक और ठोस, इसलिए मैं इसकी उपलब्धि के लिए क्या आवश्यक है, यह कह सकता हूँ, और मैं कहता हूँ कि पहली चीज यह है कि हम जो है, उसे वैसा का वैसा ही पहचाने, यानि अपनी पूर्णता में कोई इच्छा क्या हो जायेगी, और तब प्रत्येक क्षण के अवलोकन में स्वयं को अनुशासित करें।

जैसे कोई अपनी इच्छाओं को खुद ही देखे, और उन्हें उस अवैयक्तिक प्रेम की ओर निर्दिष्ट करे जो कि उसकी स्वयं की निष्पत्ति हो। जब आप निरंतर जागरूकता का अनुशासन स्थापित कर लेते हैं। उन सब चीजों का जो आप सोचते हैं, महसूस करते हैं, और करते हैं (अमल में लाते हैं) का निरंतर अवलोकन हम में से अधिकतर के जीवन में उपस्थित दमन, ऊब, भ्रम से मुक्त कर, अवसरों की श्रंखला ले आता है, जो हमें संपूर्णता की ओर प्रशस्त करती है। तो जीवन का लक्ष्य कुछ ऐसा नहीं जो कि बहुत दूर हो। जो कि दूर कहीं भविष्य में उपलब्ध करना है। अपितु पल पल की, प्रत्येक क्षण की वास्तविकता, हरपल का यथार्थ जानने में है। जो अभी अपनी अनन्तता सहित हमारे सामने साक्षात ही है।

उन पलों में जब आप जिन्दगी को हिस्सों में बांट देते हैं, और यह सोचते हैं कि इसका लक्ष्य अंततः कुछ दूर भविष्य में पाना है, तो आप यथार्थ के मधुर आशय को खो देते हैं। क्योंकि जिन्दगी का असली मजा यहीं इन्हीं पलों को जीने इन्हीं पलों में जो हम कर रहे हैं, उसमें है। जिन्दगी जवानी और बुढ़ापे के बंटवारे को नहीं जानती।

कोई कैसे नकार सकता है, क्या कोई ज्ञात को नकार सकता है। किसी महान नाटकीय घटना में नहीं बल्कि छोटे छोटे वाकयों में। क्या मैं शेव करते समय स्विटजरलैंड में बिताये हसीन वक्त की यादों को नकार सकता हूँ, क्या कोई खुशनुमा वक्त की यादों को नकार सकता है, क्या कोई किसी बात के प्रति जागरूक हो सकता है, और नकार सकता है यह नाटकीय नहीं है। यह चमत्कार पूर्ण या असाधारण नहीं है। लेकिन कोई भी इस बारे में नहीं जानता।

फिर भी अनवरत इन छोटी छोटी चीजों को नकारना, छोटी छोटी सफाईयों से छोटे छोटे दागों को घिसने और पोंछने से क्या एक बहुत ही बड़ी सफाई नहीं हो जायेगी। यह बहुत ही आवश्यक है, अपरिहार्य है, यह बहुत ही जरूरी है कि विचार को याद के रूप में नकारा जाये, वो चाहे खुशनुमा हो, या दर्दनाक। दिन भर प्रत्येक मिनट जब भी विचार याद की तरह आये, उसे नकारना।

किसी भी व्यक्ति को ऐसा किसी उद्देश्य से नहीं करना है, ना ही अज्ञात की किसी असाधारण अपूर्व अवस्था में उतरने के अनुसरण स्वरूप, आप ऋषि वैली में रहते हैं, और मुम्बई और रोम के बारे में सोचते हैं। यह एक संघर्ष एवं वैमनस्य पदा करता है, और संघर्ष मस्तिष्क को कुंद बनाता है। खंडि‍त चीज बनाता है। क्या आप इस चीज को देखते हैं, और इसे पोंछकर हटा सकते हैं? क्या आप यह सफाई जारी रखते हैं।

क्योंकि आप अज्ञात में प्रवेश करना चाहते हैं। इससे आप अज्ञात को नहीं जान सकेंगे। क्योंकि जिस क्षण आप इसे अज्ञात के रूप में पहचानते हैं। वह वापस ज्ञात की परिधि में आ जाता है। पहचानने या मान्यता देने की प्रक्रिया, ज्ञात में निरन्तर रहने कि प्रक्रिया है।

जबकि हम नहीं जानते कि अज्ञात क्या है? हम यही एक चीज कर सकते हैं, हम विचारों कों पोंछते जायें। जैसे ही यह उगें, आप फूल देखें, उसे महसूस करें, सौन्दर्य देखें, उसका प्रभाव उसकी असाधारण दीप्ति देखें। फिर आप अपने उस कमरें में चले आये, जिसमें आप रहते हैं, जो कि उचित अनुपात में नहीं बना है, जो कि कुरूप है।

आप कमरे में रहते हैं लेकिन आपके पास कुछ सौन्दर्यबोध होता है, और आप फूल के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं, और विचार की पकड़ में आ जाते हैं। तो जैसे ही विचार उगे, आपको दिखे, उसे पोंछ दें, हटा दें, तो अब जिस गहराई से यह पोंछना, या सफाई कर्म, या हटाना करते हैं। आप जिस गहराई से फूल, अपनी पत्नी, अपने देवता, अपने आर्थिक जीवन को नकारते हैं, यह देखना है।

आपको अपनी पत्नी, बच्चों और कुरूप दानवीय समाज के साथ जीना ही है। आप जीवन से पलायन नहीं कर सकते। लेकिन जब अब पूर्णतः नकारना शुरू करते हैं, तो विचार, शोक, खुशी से आपके रिश्ते भी अलग होंगे, तो यहाँ पर अपरिहार्य अत्यावश्यक रूप से पूर्णरूपेण नकारना होना चाहिये, आंशिक रूप से नकारना नहीं चलेगा। उन चीजों को बचाना भी नहीं चलेगा, जिन्हें आप चाहते हैं। ओर केवल उन चीजों को नकारने से भी नहीं चलेगा, जो आप नहीं चाहते।

सच्चे शाब्दिक मायनों में सीखना, केवल जागरूकता अवधान पूर्ण अवस्था में ही संभव है। जिसमें आंतरिक या बाह्य विवशता न हो। उपयुक्त चिंतन मनन केवल तब हो सकता है, जब मन परंपरा और स्मृति की दासता में न हो। अवधान पूर्ण होना ही मन में शांति को आंमत्रित करता है, जो कि सृजन का द्वार है।

यही वजह है कि अवधान या जागरूकता सर्वोच्च रूप से महत्वपूर्ण हैं। मन की उर्वरता के लिए क्रियात्मक स्तर पर ज्ञान की आवश्यकता होती है, न कि ज्ञान पर ही रूक जाने की। हमारा सरोकार छात्र के मानव के रूप में सम्पूर्ण विकास पर होना चाहिए, ना कि गणित या वैज्ञानिक या संगीत जैसे किसी एक क्षेत्र में उसकी क्षमता बढ़ाने से। हमारा सरोकार छात्र के सम्पूर्ण मानवीय विकास से होना चाहिए।

अवधान की अवस्था किस प्रकार उपलब्ध की जा सकती है? यह अनुनय, विनय, मनाने, तुलना करने, पुरस्कार, अथवा दंड जैसे दबाव के तरीकों से नहीं उपजायी जा सकती। भय का निर्मूलन अवधान पूर्ण होने की शुरूआत है। जब तक कुछ होने, कुछ हो जाने की जिद या अपेक्षा, जो कि सफलता का पीछा करने जैसा है। जब तक हैं, अपनी सम्पूर्ण निराशा, अवसाद, और कुटिल विसंगतियों के साथ भय बना रहता है।

आप ध्यान केन्द्रित करना सिखा सकते हैं लेकिन अवधान पूर्ण होना नहीं सिखा सकते। वैसे ही जैसे कि भय से स्वाधीन रहना नहीं सिखा सकते। लेकिन हम शुरूआत कर सकते हैं भय को पैदा करने वाले कारणों को खोज कर, उन कारणों को समझना, भय के निर्मूलन में सहायक हो सकता है। तो जब छात्र के आसपास अच्छाई का वातावरण बनता है। जब वह अपने आपको सुरक्षित और सहज महसूस करता है तो जागरूकता या अवधान तुरन्त ही उदित हो जाता है। जागरूकता या अवधान सप्रेम निष्काम कर्म की तरह उसमें चले आते हैं। प्रेम तुलना नहीं है, इसलिए कुछ होने की ईर्ष्या और दमन भी अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं।

=जे. कृष्णमूर्ति=

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भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।

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