सोमवार, दिसंबर 12, 2011

ध्यान




ध्यान निस्तब्ध और सुनसान मार्ग पर इस तरह उतरता है जैसे पहाड़ियों पर सौम्य वर्षा। यह इसी तरह सहज और प्राकृतिक रूप से आता है, जैसे रात। वहाँ किसी तरह का प्रयास या केन्द्रीकरण या विक्षेप विकर्षण पर किसी भी तरह का नियंत्रण नहीं होता। वहाँ पर कोई भी आज्ञा या नकल नहीं होती, ना किसी तरह का नकार होता है, ना स्वीकार। ना ही ध्यान में स्मृति की निरंतरता होती है। मस्तिष्क अपने परिवेश के प्रति जागरूक रहता है पर बिना किसी प्रतिक्रिया के शांत रहता है। बिना किसी दखलंदाजी के वह जागता तो है पर प्रतिक्रियाहीन होता है।

वहाँ नितांत शांति स्तब्धता होती है, पर शब्द विचारों के साथ धुँधले पड़ जाते हैं। वहाँ अनूठी और निराली उर्जा होती है। उसे कोई भी नाम दें, वह जो भी हो, उसका महत्व नहीं है। वह गहनता पूर्वक सक्रिय होती है। बिना किसी लक्ष्य और उद्देश्य के वह सृजित होता है। बिना कैनवास और संगमरमर के बिना कुछ तराशे या तोड़े वह मानव मस्तिष्क की चीज नहीं होती। ना अभिव्यक्ति की कि अभिव्यक्त हो और उसका क्षरण हो जाये। उस तक नहीं पहुँचा जा सकता। उसका वर्गीकरण या विश्लेषण नहीं किया जा सकता।

विचार और भाव या अहसास उसको जानने समझने के साधन नहीं हो सकते। वह किसी भी चीज से पूर्णतया असम्बद्ध है, और अपने ही असीम विस्तार और अनन्तता में अकेली ही रहती है। उस अंधेरे मार्ग पर चलना, वहाँ पर असंभवता का आनंद होता है ना कि उपलब्धि का । वहाँ पहुँच, सफलता और ऐसी ही अन्यान्य बचकानी मांगों और प्रतिक्रियाओं का अभाव होता है।

होता है तो बस असंभव असंभवता असंभाव्य का अकेलापन। जो भी संभव है वह यांत्रिक है। और असंभव की परिकल्पना की जा सके तो कोशिश करने पर उसे उपलब्ध किये जा सकने के कारण वह भी यांत्रिक हो जायेगा। उस आनन्द का कोई कारण या कारक नहीं होता, वह बस सहजतः होती है। किसी अनुभव की तरह नहीं, बस अपितु किसी तथ्य की तरह। किसी के स्वीकारने या नकारने के लिए नहीं कि उस पर वार्तालाप या वादविवाद या चीरफाड़ विश्लेषण किये जायें। इसके लिए भी नहीं, वह कोई चीज नहीं कि उसे खोजा जाये, उस तक पहुंचने का कोई मार्ग नहीं।

सब कुछ उस एक के लिए मरता है, वहाँ मृत्यु और संहार प्रेम है। क्या आपने भी कभी देखा है, कहीं बाहर गंदे मैले कुचैले कपड़े पहने एक मजदूर किसान को, जो सांझ ढले अपनी मरियल हड्डियों का ढांचा रह गई गाय के साथ घर लौटता है।

मन और मस्तिष्क की गुणवत्ता ध्यान में महत्वपूर्ण है। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आपने क्या उपलब्ध किया, या उपलब्धि के बारे में आप क्या कह रहे हैं। बल्कि मन का वह गुण है, जो निर्दोष और अति संवेदनशील है, नकार के द्वारा सकारात्मक अवस्था तक पहुंचा जाता है। हम समूह में रहें, या अपने में अनुभव के द्वारा ध्यान की शुद्धता को नकारते हैं। किसी अन्त पर पहुँचना ध्यान का ध्येय नहीं है। यह ध्येय भी है, और साथ ही उसकी समाप्ति भी। अनुभव के द्वारा मन को कदापि निर्दोष या शुद्ध नहीं बनाया जा सकता। अनुभव को नकारने पर ही निर्दोषता की सकारात्मक अवस्था तक पहुंचा जाता है, जो कि विचार द्वारा नहीं गढ़ी जा सकती।

विचार कभी भी निर्दोष नहीं होता। ध्यान विचार की समाप्ति है पर ध्यान करने वाले के द्वारा नहीं। ध्यान करने वाले के लिए ध्यान है। यदि ध्यान नहीं है तो प्रकाश और रंगों के अति सुन्दर विश्व में जैसे आप एक अंधे आदमी की तरह हैं। आप कभी सागर किनारे भटकें तो ध्यान के ये गुण आपके पास आते हैं। यदि कभी ऐसा होता है तो उनका पीछा ना करें। यदि आप उनका अनुसरण करते हैं तो यह आपकी स्मृति का सक्रिय होना है जो अतीत होता है। और जो है उसकी मृत्यु अतीत है।

या जब आप जंगलों पहाड़ों में विचरण कर रहे हों तो अपने आसपास के सम्पूर्ण वातावरण को, सब कुछ को, जीवन के सौन्दर्य, और पीड़ाओं को आपसे कहने दें। ताकि आप भी अपने दुख के प्रति जागरूक हो सकें, और ये दुख खत्म हो सकें।

ध्यान जड़ है, ध्यान पौधा है, ध्यान फूल है, और ध्यान फल है। यह शब्द ही हैं जो फल, फूल, पौधे, और जड़ को अलग अलग कर देते या बांट देते हैं। इस बंटवारे में कोई भी कर्म भलेपन तक नहीं पहुँचता और सदगुण या भलाई सम्पूर्ण दृष्टि से ही जन्मते हैं।

क्या आप कोई ऐसी क्रांति चाहते हैं जो आपकी सारी संकल्पनाओं विश्वासों मूल्यों आपकी नैतिकता आपकी सम्मानीयता आपके ज्ञान को तहस नहस कर दे। इस प्रकार तहस नहस कर दे कि आप अत्यंतिक सम्पूर्ण रूप से ना कुछ हो जायें। यहाँ तक कि आपका कोई चरित्र ही न बचे। वो व्यक्ति ही न बचे, जो खोजी है, जो आदमी फैसले करता है, जो क्रोधी और अक्रोधी है। आप पूर्णतः कुछ भी होने से खाली हो जायें, जो भी आप हैं?


यह खालीपन अपने चरम तप सहित परम सौन्दर्य होता है। जिसमें कठोरता या आक्रामकता का दावा करती कोई चिंगारी नहीं होती। यही उस भेद का अर्थ है, जो बाद में वहाँ होता है। वहाँ आश्चर्यजनक समझ बोध होता ही है, ना कि सूचना और सीखना। यही विवेक या समझबोध सर्वदा रहता है। आप चाहे सो रहे हों, या जाग रहे हों।

इसलिए हम कहते हैं कि वहाँ केवल अन्दर और बाहर का अवलोकन होना चाहिए जो कि बुद्धि मस्तिष्क को तीक्ष्ण करता है। मस्तिष्क की यह तीक्ष्णता उसे शांत बनाती है। मस्तिष्क की इस संवेदनशीलता और समझ बोधपरकता ही विचार को संचालित करती है जब उसकी आवश्यकता हो। अन्य समय मस्तिष्क सोया नहीं रहता पर दृष्टा हो शांत हो रहता है।

इसलिए मस्तिष्क या दिमाग अपनी प्रतिक्रियाओं से संघर्ष नहीं पैदा करता। यह बिना किसी जूझने के, इसलिए बिना किसी विक्षिप्तता, या विक्षेप के काम करता है। तब करना, और होना, या किया जाना, और अमल में होना तुरन्त एक साथ होता है। वैसे ही जैसे कभी आप खतरे में पड़ें और जो बन पड़े तुरन्त सम्पन्न कर दें। इसलिए वहाँ पर हमेशा संकल्पनात्मक चीजों से मुक्ति रहती है।

यह संकल्पनात्मक चीजें ही हैं, जो अवलोकन कर्ता, मैं, अहं हो जाती हैं। जो बांटती हैं, प्रतिरोध करती हैं, और अवरोध बनाती हैं। जब मैं नहीं होता तो सफलता, फल या परिणाम का कोई भेद नहीं रहता। तब सम्पूर्ण जीवन, सौन्दर्य को जीना होता है। तब सम्बंधों में भी सौन्दर्य होता है बिना किसी एक छवि को दूसरी छवि से प्रति स्थापित किये। तभी अनन्त महानता का अवतरण संभव होता है।

कुछ भी जानने समझने के लिए आपको उसके साथ जीना होगा उसका अवलोकन करना ही होगा। आपको उसके सभी पहलू, उसकी सारी अंर्तवस्तु, उसकी प्रकृति, उसकी संरचना, उसकी गतिविधियां जाननी होंगी। क्या आपने कभी अपने ही साथ जीने की कोशिश की है? यदि की है तो आपने यह देखना भी शुरू किया होगा कि आप एक स्थिर अवस्था में ही नहीं रहते।

मानव जीवन एक ताजा और जिन्दा चीज है, और जिन्दा चीज के साथ रहने के लिए आपका मन भी उसी तरह ही ताजा और जिन्दा होना चाहिये। मन कभी भी जिन्दा नहीं रह सकता जब तक कि विचारों, फैसलों और मूल्यों में जकड़ा हुआ हो। अपने मन, दिल दिमाग की गतिविधियों, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के अवलोकन की दिशा में अनिवार्य रूप से आपके पास एक मुक्तमन होना चाहिये। वो मन नहीं, जो सहमत या असहमत होता हो, कोई पक्ष ले लेता हो, और उन पर टीका टिप्पणियां या वाद-विवाद करता हो। मात्र शब्दों के विवाद में ही उलझा रहता हो।

बल्कि एक ऐसा मन हो जिसका ध्येय समझ बूझ का अनुसरण करना हो क्योंकि हम में से अधिकतर लोग यह जानते ही नहीं कि हम अपने ही अस्तित्व की ओर कैसे देखें, कैसे उसे सुनें? तो हम यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि हम किसी बहती नदी के सौन्दर्य को देख पायेंगे, या पेड़ों के बीच से गुजरती हवा को सुन पायेंगे।

जब हम आलोचना करते हैं, या किसी चीज के बारे में किसी तरह के फैसले करने लगते हैं तो हम उसे स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते? ना ही उस समय, जब हमारा दिलदिमाग बिना रूके बकबक में ही लगा रहता है। तब हम जो है, उसका वास्तविक अवलोकन नहीं कर पाते। हम अपने बारे में अपने पूर्वाभास, पूर्वानुमान ही देख पाते हैं, जो अपने बारे में स्वयं हमने ही बनाये हैं। हममें से प्रत्येक ने अपने बारे में एक छवि बना रखी है कि हम क्या सोचते हैं, या हमें क्या होना है?

और यह छवि या चित्र ही हमें, हम जो यथार्थ में हैं, हमारी वास्तविकता के दर्शनों से परे रखता है, बचाता है। किसी चीज को सहज रूप से जैसी वो है, वैसी ही देखना, यह संसार में सर्वाधिक कठिन चीजों में से एक है। क्योंकि हमारे दिलदिमाग बहुत ही जटिल हैं हमने सहजता का गुण खो दिया है।

यहाँ मेरा आशय कपड़ों और भोजन, केवल एक लंगोट पहनकर काम चलाने, या उपवास व्रतों का रिकार्ड तोड़ने वाले, अपरिपक्व कार्यों, और मूर्खताओं से नहीं है। जिन्हें तथाकथित संतों ने सम्पन्न किया है। मेरा आशय है, उस सहजता से, जो किसी चीज को सीधे सीधे वैसा ही देख पाती है बिना किसी भय के, वो सरलता, जो हमारी ओर उस तरह देख सके, जैसे कि वास्तव में हम हैं बिना किसी विक्षेप के। जब हम झूठे बोलें तो झूठ कहें, उसे ढंके छुपाये नहीं, ना ही उससे दूर भाग जाये। अपने को समझने के अनुक्रम में, हमें अत्यन्त विनम्रता की आवश्यकता भी है।

जब आप यह कहते हुए शुरूआत करते हैं कि मैं खुद को जानता हूँ। आप अपने बारे में सीखने समझने को तुरन्त ही बन्द कर चुके होते हैं। या यदि आप कहते हैं कि मेरे अपने बारे में जानने समझने लायक कुछ नहीं है। क्योंकि मैं केवल स्मृतियों, संकल्पनाओं, अनुभवों और परम्पराओं का एक गट्ठर मात्र हूँ, तो भी आप अपने को सीखने समझने की प्रक्रिया को ठप कर चुके होते हैं।

उस क्षण जब आप कुछ उपलब्ध करते हैं, तो आप अपनी सहजता सरलता और विनम्रता के गुणों पर विराम लगा देते हैं। उस क्षण जब आप किसी निर्णय पर पहुंचते हैं, या ज्ञान से जांच परख की शुरूआत करते हैं, तो आप खत्म हो चुके होते हैं। उसके बाद आप हर जिन्दा चीज का पुरानी चीजों के सन्दर्भ अनुवाद करना शुरू कर देते हैं।

जबकि यदि आप पैरों पर खड़े न हों आपकी जमीन पर पकड़ ना हो। यदि कोई निश्चितता ना हो, कोई उपलब्धि ना हो, तो देखने और उपलब्ध करने की आजादी होती है। और जब आप आजाद होकर देखना शुरू करते हैं तो जो भी होता है हमेशा नया होता है। आश्वस्त या आत्मविश्वास से भरा हुआ आदमी, एक मृत मनुष्य होता है।

=जे. कृष्णमूर्ति=

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Agra, uttar pradesh, India
भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।

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