सोमवार, दिसंबर 19, 2011

पावै सुख अपार




प्रश्न - अभ्यास करते करते यानी भजन, ध्यान करते करते किसी किसी को नींद आने लगती है और अभ्यासी सो जाता है। किसी किसी को तो गहरी नींद में नाक बजने लग जाती है। जागने पर सोचता है कि बङी गहरी समाधि लग गयी है। क्या यह सचमुच समाधि की हालत होती है?

उत्तर - यह धोखा है। भजन, सुमिरन, ध्यान में जब नींद आने लग जाती है तो वह एक प्रकार का विघ्न है। इसे तन्द्रा कहते हैं और यह जाग्रत तथा सोने के बीच की हालत है। प्रारम्भिक अभ्यास में यह दशा किसी किसी को होती है। जब नींद आती मालूम पङे तो भजन करना छोङकर उठ जायें और कुछ देर टहल घूम लें। यदि आवश्यकता समझे तो मुँह हाथ धोकर कुल्ला कर लें। सिर धो लें। फ़िर अभ्यास में बैठ जायें। ज्यादा खाना खाकर भजन, सुमिरन, ध्यान की साधना में बैठने से ऐसा अक्सर होता है। खाली पेट भजन, सुमिरन, ध्यान में आन्तरिक स्मरण करता रहे तो ऐसा अभ्यास
करते रहने से कुछ ही समय में सारी विघ्न बाधायें दूर हो जायेंगी।

इसके अतिरिक्त तीन प्रकार के विघ्न और भी हैं जो अभ्यासी के मार्ग में बाधा डालते हैं।
1. विक्षेप 2. कषाय, और 3. रसा स्वाद।

1. विक्षेप - जब भजन और ध्यान में मन लगता है तब कभी कभी ऐसा होता है कि झटके के साथ एकदम चित्त उधर से हट जाता है। जैसे किसी ने अचानक आकर पुकारा या आवाज दी या हाथ से हिलाकर उठाना चाहा या मन में अचानक कोई सांसारिक तरंगें ऐसी उठीं जिसके कारण चित्त चलायमान हो गया या कोई कीङा, मच्छर, चींटी इत्यादि ने काट लिया।

यह केवल कुछ उदाहरण हैं जिससे विक्षेप का अर्थ स्पष्ट हो जाय। इस प्रकार की अनेक विघ्न बाधायें विक्षेप के अन्तर्गत आती हैं और इसके कारण अभ्यासी भजन और ध्यान को एकदम छोङ देता है। इसका उपाय यह है कि इन कारणों की पहले से रोकथाम करे। भजन, ध्यान में बैठने के लिये साफ़ सुथरी जगह पर बैठकर भजन ध्यान करे। घर परिवार के लोगों को समझा दे कि भजन ध्यान के समय कोई जोर से न बोले। इशारे इशारों से काम ले लें। बहुत जरूरी पङने पर धीरे धीरे बोलकर काम चलावें। जिससे कि अभ्यासी के भजन, ध्यान में बाधा न पङे। जब तक भजन ध्यान की एकाग्रता में परिपक्वता नहीं आ जाती तब तक यह दशा रहती है।

अभ्यास करते करते जब एकाग्रता में दृढ़ता आ जाती है तब इस प्रकार के विघ्न बाधायें नहीं डालते। फ़िर चाहे कोई सिर पर ढोल बजाता रहे। अभ्यासी के चित्त को डिगा नहीं सकता। महर्षि वाल्मीकि के ऊपर दीमकों ने घर बना लिया था। रामकृष्ण परमहंस जब पंचवटी में ध्यान करने बैठते थे तो मच्छर उनके शरीर पर इस प्रकार लिपट जाते थे कि जैसे वे कोई कपङा ओढ़े हों।

पल पल जो सुमिरन करे, मन में श्रद्धा धार।
आधि व्याधि नासे सकल, पावै सुख अपार।

2. कषाय - कभी भजन व ध्यान के समय अभ्यासी के मन में ऐसे विचार उठते हैं या ऐसे दृश्य सामने आते हैं जिन्हें उसने वर्तमान जन्म में न देखा है न सुना है और न जिनका कोई आधार है। ऐसे विचार पूर्ण जन्मों के कर्मों के परिणामस्वरूप होते हैं और मन की गुनावन से पैदा होते हैं। बिना थोङी देर अपना प्रभाव दिखाये यह नहीं जाते हैं। जो अभ्यासी गुरू को आगे रखता है और प्रेम तथा विरह को दृढ़ता से पकङ कर चलता है उसे इस प्रकार के विघ्न कम सताते हैं। जब कभी ऐसे विचार आकर घेरें उस समय अभ्यासी को चाहिये कि भजन के साथ साथ श्री सदगुरू भगवान के स्वरूप का ध्यान करे। कुछ ही समय में यह विचार हट जायेंगे और भजन, ध्यान के आनन्द का रस मिलने लग जायेगा। साथ ही साधक का मन उत्साहित होकर और ज्यादा से ज्यादा समय भजन, भक्ति व सेवा, पूजा, दर्शन में लगने लगता है और आनन्दित भी होता है तथा अपने श्री सदगुरूदेव को प्रसन्नचित्त व आनन्दविभोर करके सन्तुष्ट कर लेता है और जब श्री सदगुरू सन्तुष्ट हो जाते हैं तो वे अपने शिष्य व साधक को अपने दया से मोक्ष प्रदान कर देते हैं।

गुरू नाम का सुमिरन किये, जन्म यह निश्चय जीता संवर।
मोक्ष मिल जाता दास को, दया का हाथ होता सर।

3. स्वाद से आशय यह है कि जो थोङा बहुत रस भजन व ध्यान में अभ्यासी को प्रारम्भिक दशा में मिलता है उसे पाकर कभी कभी साधक बहुत मग्न हो जाता है और भजन, ध्यान के आनन्द में विभोर होकर तृप्त हो जाता है। सन्तुष्ट हो जाता है। इसी सन्तुष्टि के फ़लस्वरूप साधक का मन भजन, सुमिरन, ध्यान में ज्यादा से ज्यादा लगने लगता है। जिससे उसे समय का ज्ञान नहीं रह पाता। उसी भजन, भक्ति में विभोर मन सदगुरू की कृपा व दया का पात्र बन जाता है।

जब ऐसी दशा होती है तो साधक को चाहिये कि अपने साधना को बढ़ाता जाये तथा आध्यात्मिक चढ़ाई धीरे धीरे चढ़ता जाय। ऐसा करने से धीरे धीरे सारी विघ्न बाधायें समाप्त हो जाती हैं और भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान में मग्न होकर मन श्री सदगुरू की दया का अमृतपान कर मस्त व मगन हो उठता हैये सब श्री सदगुरू की कृपा की ही देन है। ऐसी स्थिति में श्री सदगुरू की चरण शरण ग्रहण किये रहे।

सन्त सदगुरू के जो उपकार हैं उनका बदला जीव क्या दे सकता है? संत सदगुरू के उपकारों के बदले यदि जीव तीन लोक की सम्पदा भी भेंट कर दे तो भी वह मन में यह सोचकर सकुचाता है कि मैंने कुछ भी तो भेंट नहीं किया।

कथन है कि -

सदगुरू के उपकार का, बदला दिया न जाय।
तीन लोक की सम्पदा, भेंटत मन सकुचाय।

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Agra, uttar pradesh, India
भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के फ़िरोजाबाद जिले में जसराना तहसील के एक गांव नगला भादौं में श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस का ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ के नाम से आश्रम है। जहाँ लगभग गत दस वर्षों से सहज योग का शीघ्र प्रभावी और अनुभूतिदायक ‘सुरति शब्द योग’ हँसदीक्षा के उपरान्त कराया, सिखाया जाता है। परिपक्व साधकों को सारशब्द और निःअक्षर ज्ञान का भी अभ्यास कराया जाता है, और विधिवत दीक्षा दी जाती है। यदि कोई साधक इस क्षेत्र में उन्नति का इच्छुक है, तो वह आश्रम पर सम्पर्क कर सकता है।

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