बुधवार, फ़रवरी 01, 2012

सोंह निरंजन रंरंकार और शक्ति ओंकारा

संतो शब्दई शब्द बखाना । शब्द फ़ांस फ़ंसा सब कोई । शब्द नहीं पहचाना ।
प्रथमहि बृह्म स्व इच्छा ते । पाँचों शब्द उचारा । सोंह निरंजन रंरंकार और शक्ति ओंकारा ।
पाँचों तत्व प्रकृति तीनों गुण उपजाया । लोक दीप चारों खान चौरासी लख बनाया ।
शब्द काल कलंदर कहिये । शब्दइ भर्म भुलाया । पाँच शब्द की आशा में सरवस मूल गंवाया ।
शब्दइ बृह्म प्रकाश मेट के बैठे मूंदे द्वारा । शब्दइ निरगुण शब्दइ सरगुण शब्दइ वेद पुकारा ।
शुद्ध बृह्म काया के भीतर बैठ करै स्थान । ज्ञानी योगी पंडित औ सिद्ध शब्द में उरझान ।
पाँचइ शब्द पाँचइ मुद्रा काया बीच ठिकाना । जो जिहसंक आराधन करता सो तिहि करत बखाना ।
शब्द निरंजन चाचरी मुद्रा है नैनन के माहीं । ताको जाने गोरख योगी महा तेज तप माहीं ।
शब्द ओंकार भूचरी मुद्रा त्रिकुटी है स्थाना । व्यास देव ताहि पहचाना । चाँद सूर्य तिहि जाना ।
सोहं शब्द अगोचरी मुद्रा भंवर गुफ़ा स्थाना । शुकदेव मुनि ताहि पहचाना । सुन अनहद को काना ।
शब्द ररंकार खेचरी मुद्रा दसवां द्वार ठिकाना । बृह्मा विष्णु महेश आदि लो ररंकार पहिचाना ।
शक्ति शब्द ध्यान उनमुनी मुद्रा बसे आकाश सनेही । झिलमिल झिलमिल जोत दिखावे जाने जनक विदेही ।
पाँच शब्द पाँच है मुद्रा सो निश्चय कर जाना । आये पुरुष पुरान निःअक्षर तिनकी खबर न आना ।
नौ नाथ चौरासी सिद्ध लों पाँच शब्द में अटके । मुद्रा साध रहे घट भीतर फ़िर औंधे मुख लटके ।
पाँच शब्द पाँच है मुद्रा लोक दीप यम जाला । कहे कबीर अक्षर के आगे निःअक्षर का उजियाला ।

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