बुधवार, फ़रवरी 15, 2012

इस प्रकार उपदेश देने वाला बृह्म राक्षस होता है

बृह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं । द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम । भावतीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि ।
जो बृह्मानंद । स्वरूप हैं । परम सुख । देने वाले हैं । जो केवल । ज्ञान स्वरूप हैं । ( सुख । दुख । शीत । उष्ण आदि ) द्वन्द्वों से । रहित हैं । आकाश के समान । सूक्ष्म । और । सर्व व्यापक हैं । तत्वमसि आदि । महा वाक्यों के । लक्ष्यार्थ हैं । एक हैं । नित्य हैं । मल रहित हैं । अचल हैं । सब बुद्धियों के । साक्षी हैं । भावना से । परे हैं । सत । रज । और तम । तीनों गुणों से । रहित हैं । ऐसे । श्री सदगुरु देव को । मैं नमस्कार करता हूँ । 52
गुरुपदिष्टमार्गेण मनः शिद्धिं तु कारयेत । अनित्यं खण्डयेत्सर्वं यत्किंचिदात्मगोचरम ।
गुरु के द्वारा । उपदिष्ट मार्ग से । मन की । शुद्धि करनी चाहिए । जो कुछ भी अनित्य । वस्तु । अपनी इन्द्रियों की विषय । हो जायें । उनका खण्डन ( निराकरण ) करना चाहिए । 53
किमत्रं बहुनोक्तेन शास्त्रकोटिशतैरपि । दुर्लभा चित्तविश्रान्तिः विना गुरुकृपां पराम ।
यहाँ ज्यादा कहने से क्या लाभ ? गुरु की परम कृपा के बिना । करोड़ों शास्त्रों से भी चित्त की विश्रांति दुर्लभ है । 54
करुणाखड्गपातेन छित्त्वा पाशाष्टकं शिशोः । सम्यगानन्दजनकः सदगुरु सोऽभिधीयते ।
एवं श्रुत्वा महादेवि गुरुनिन्दा करोति यः । स याति नरकान घोरान यावच्चन्द्रदिवाकरौ ।
करुणा रूपी तलवार के । प्रहार से । शिष्य के आठों पाशों ( संशय । दया । भय । संकोच । निन्दा । प्रतिष्ठा । कुल अभिमान । संपत्ति ) को काटकर । निर्मल आनंद देने वाले को । गुरु कहते हैं । ऐसा सुनने पर भी । जो मनुष्य । गुरु निन्दा करता है । वह ( मनुष्य ) जब तक । सूर्य चन्द्र का । अस्तित्व रहता है । तब तक । घोर नरक में । रहता है । 55 । 56
यावत्कल्पान्तको देहस्तावद्देवि गुरुं स्मरेत । गुरुलोपो न कर्त्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत ।
हे देवी ! देह कल्प के अन्त तक रहे । तब तक । गुरु का स्मरण । करना चाहिए । और आत्म ज्ञानी होने के बाद भी ( स्वच्छन्द अर्थात स्वरूप का छन्द मिलने पर भी ) शिष्य को । गुरु की शरण । नहीं छोड़नी चाहिए । 57
हुंकारेण न वक्तव्यं प्राज्ञशिष्यै कदाचन । गुरुराग्रे न वक्तव्यमसत्यं तु कदाचन ।
गुरु के समक्ष । प्रज्ञावान शिष्य को । कभी हुँकार शब्द से ( मैने ऐसे किया । वैसा किया ) नहीं बोलना चाहिए । और कभी । असत्य नहीं । बोलना चाहिए । 58
गुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य गुरुसान्निध्यभाषणः । अरण्ये निर्जले देशे संभवेद बृह्मराक्षसः ।
गुरु के समक्ष । जो हुँकार शब्द से । बोलता है । अथवा गुरु को । तू कहकर । जो बोलता है । वह निर्जन मरु भूमि में । बृह्म राक्षस होता है । 59
अद्वैतं भावयेन्नित्यं सर्वावस्थासु सर्वदा । कदाचिदपि नो कुर्यादद्वैतं गुरुसन्निधौ ।
सदा । और सभी अवस्थाओं में । अद्वैत की । भावना करनी चाहिए । परन्तु गुरु के साथ । अद्वैत की । भावना कदापि नहीं करनी चाहिए । 60
दृश्यविस्मृतिपर्यन्तं कुर्याद गुरुपदार्चनम । तादृशस्यैव कैवल्यं न च तद्व्यतिरेकिणः ।
जब तक । दृश्य प्रपंच की । विस्मृति न हो जाय । तब तक । गुरु के । पावन चरणार विन्द की । पूजा अर्चना करनी चाहिए । ऐसा करने वाले को ही । कैवल्य पद की । प्राप्ति होती है । इसके विपरीत । करने वाले को । नहीं होती । 61
अपि संपूर्णतत्त्वज्ञो गुरुत्यागी भवेद्ददा । भवेत्येव हि तस्यान्तकाले विक्षेपमुत्कटम ।
संपूर्ण । तत्वज्ञ भी । यदि गुरु का । त्याग कर दे । तो । मृत्यु के समय । उसे महान विक्षेप । अवश्य हो जाता है । 62
गुरौ सति स्वयं देवी परेषां तु कदाचन । उपदेशं न वै कुर्यात तदा चेद्राक्षसो भवेत ।
हे देवी ! गुरु के रहने पर । अपने आप । कभी किसी को । उपदेश नहीं देना चाहिए । इस प्रकार । उपदेश देने वाला । बृह्म राक्षस होता है । 63
न गुरुराश्रमे कुर्यात् दुष्पानं परिसर्पणम । दीक्षा व्याख्या प्रभुत्वादि गुरोराज्ञां न कारयेत ।
गुरु के आश्रम में । नशा नहीं करना चाहिए । टहलना नहीं चाहिए । दीक्षा देना । व्याख्यान करना । प्रभुत्व दिखाना । और गुरु को । आज्ञा करना । ये सब निषिद्ध हैं । 64
नोपाश्रमं च पर्यंकं न च पादप्रसारणम । नांगभोगादिकं कुर्यान्न लीलामपरामपि ।
गुरु के आश्रम में । अपना छप्पर । और पलंग । नहीं बनाना चाहिए ( गुरु के सम्मुख ) पैर नहीं पसारना । शरीर के भोग । नहीं भोगने चाहिए । और अन्य लीलाएँ । नहीं करनी चाहिए । 65
गुरुणां सदसद्वापि यदुक्तं तन्न लंघयेत । कुर्वन्नाज्ञां दिवारात्रौ दासवन्निवसेद गुरौ ।
गुरुओं की बात । सच्ची हो । या झूठी । परन्तु उसका । कभी उल्लंघन । नहीं करना चाहिए । रात और दिन । गुरु की । आज्ञा का पालन । करते हुए । उनके सान्निध्य में । दास बन कर । रहना चाहिए । 66
अदत्तं न गुरोर्द्रव्यमुपभुंजीत कहिर्चित । दत्तं च रंकवद ग्राह्यं प्राणोप्येतेन लभ्यते ।
जो दृव्य । गुरुदेव ने नहीं दिया हो । उसका उपयोग । कभी नहीं । करना चाहिए । गुरु के दिये हुए । दृव्य को भी । गरीब की तरह । गृहण करना चाहिए । उससे प्राण भी । प्राप्त हो सकते हैं । 67
पादुकासनशय्यादि गुरुणा यदभिष्टितम । नमस्कुर्वीत तत्सर्वं पादाभ्यां न स्पृशेत क्वचित ।
पादुका । आसन । बिस्तर आदि । जो कुछ भी । गुरु के । उपयोग में आते हों । उन सबको । नमस्कार करना चाहिए । और उनको । पैर से । कभी नहीं । छूना चाहिए । 68
गच्छतः पृष्ठतो गच्छेत गुरुच्छायां न लंघयेत । नोल्बणं धारयेद्वेषं नालंकारास्ततोल्बणान ।
चलते हुए । गुरु के । पीछे चलना चाहिए । उनकी परछाईं का भी । उल्लंघन । नहीं करना चाहिए । गुरु के समक्ष । कीमती वेशभूषा । आभूषण आदि । धारण नहीं करने चाहिए । 69
गुरुनिन्दाकरं दृष्टवा धावयेदथ वासयेत । स्थानं वा तत्परित्याज्यं जिह्वाच्छेदाक्षमो यदि ।
गुरु की । निन्दा करने वाले को । देखकर । यदि उसकी । जिह्वा काट डालने में । समर्थ न हो । तो उसे । अपने स्थान से । भगा देना चाहिए । यदि वह ठहरे । तो स्वयं । उस स्थान का । परित्याग । करना चाहिए । 70
मुनिभिः पन्नगैर्वापि सुरैवा शापितो यदि । कालमृत्युभयाद्वापि गुरुः संत्राति पार्वति ।
हे पार्वती ! मुनियों । पन्नगों । और देवताओं के । शाप से । तथा यथा काल । आये हुए । मृत्यु के भय से भी । शिष्य को । गुरु बचा सकते हैं । 71
विजानन्ति महावाक्यं गुरोश्चरणसेवया । ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः ।
गुरु के । चरणों की । सेवा करके । महा वाक्य के । अर्थ को । जो समझते हैं । वे ही । सच्चे संन्यासी हैं । अन्य तो । मात्र वेशधारी हैं । 72
नित्यं बृह्म निराकारं निर्गुणं बोधयेत परम । भासयन बृह्मभावं च दीपो दीपान्तरं यथा ।
गुरु वे हैं । जो नित्य । निर्गुण । निराकार । परम बृह्म । का बोध देते हुए । जैसे एक दीपक । दूसरे दीपक को । प्रज्ज्वलित करता है । वैसे ही । शिष्य में । बृह्म भाव को । प्रकट करते हैं । 73
गुरुप्रादतः स्वात्मन्यात्मारामनिरिक्षणात । समता मुक्तिमर्गेण स्वात्मज्ञानं प्रवर्तते ।
गुरु की । कृपा से । अपने भीतर ही । आत्मानंद । प्राप्त करके । समता । और मुक्ति के । मार्ग द्वारा । शिष्य । आत्म ज्ञान को । उपलब्ध होता है । 74
स्फ़टिके स्फ़ाटिकं रूपं दर्पणे दर्पणो यथा । तथात्मनि चिदाकारमानन्दं सोऽहमित्युत ।
जैसे । स्फ़टिक मणि में । स्फ़टिक मणि । तथा दर्पण में । दर्पण । दिख सकता है । उसी प्रकार । आत्मा में । जो चित । और आनंदमय । दिखाई देता है । वह मैं हूँ । 75
अंगुष्ठमात्रं पुरुषं ध्यायेच्च चिन्मयं हृदि । तत्र स्फ़ुरति यो भावः श्रुणु तत्कथयामि ते ।
हृदय में । अंगुष्ठ मात्र ( अंगूठा के बराबर )  परिणाम वाले । चैतन्य पुरुष का । ध्यान । करना चाहिए । वहाँ । जो भाव । स्फ़ुरित होता है । वह मैं तुम्हें कहता हूँ । सुनो । 76
अजोऽहममरोऽहं च ह्यनादिनिधनोह्यहम । अविकारश्चिदानन्दो ह्यणियान महतो महान ।
मैं अजन्मा हूँ । मैं अमर हूँ । मेरा आदि नहीं है । मेरी मृत्यु नहीं है । मैं निर्विकार हूँ । मैं चिदानन्द हूँ । मैं अणु से भी छोटा हूँ । और महान से भी महान हूँ । 77
अपूर्वमपरं नित्यं स्वयं ज्योतिर्निरामयम । विरजं परमाकाशं ध्रुवमानन्दमव्ययम ।
अगोचरं तथाऽगम्यं नामरूपविवर्जितम । निःशब्दं तु विजानीयात्स्वाभावाद बृह्म पार्वति ।
हे पार्वती ! बृह्म को । स्वभाव से ही । अपूर्व ( जिससे पूर्व कोई नहीं ऐसा ) अद्वितीय । नित्य । ज्योति स्वरूप । निरोग । निर्मल । परम आकाश स्वरूप । अचल । आनन्द स्वरूप । अविनाशी । अगम्य । अगोचर । नाम । रूप । से रहित । तथा निशब्द । जानना चाहिए । 78 । 79
यथा गन्धस्वभावत्वं कर्पूरकुसुमादिषु । शीतोष्णस्वभावत्वं तथा बृह्मणि शाश्वतम ।
जिस प्रकार । कपूर । फ़ूल । इत्यादि में । गन्धत्व ( अग्नि में ) उष्णता । और ( जल में ) शीतलता । स्वभाव से ही । होते हैं । उसी प्रकार । बृह्म में । शाश्वतता भी । स्वभाव सिद्ध है । 80
यथा निजस्वभावेन कुंडलकटकादयः । सुवर्णत्वेन तिष्ठन्ति तथाऽहं बृह्म शाश्वतम ।
जिस प्रकार । कटक । कुण्डल आदि । आभूषण । स्वभाव से ही । सुवर्ण हैं । उसी प्रकार । मैं स्वभाव से ही । शाश्वत बृह्म ही हूँ । 81
स्वयं तथाविधो भूत्वा स्थातव्यं यत्रकुत्रचित । कीटो भृंग इव ध्यानात यथा भवति तादृशः ।
स्वयं । वैसा होकर । किसी न किसी । स्थान में रहना । जैसे कीडा । भृंग का । चिन्तन करते करते । भृंग ही । हो जाता है । वैसे ही । जीव । बृह्म का । ध्यान करते करते । बृह्म स्वरूप ही । हो जाता है । 82
गुरोर्ध्यानेनैव नित्यं देही बृह्ममयो भवेत । स्थितश्च यत्रकुत्रापि मुक्तोऽसौ नात्र संशयः ।
सदा । गुरु का । ध्यान करने से । जीव । बृह्म मय हो जाता है । वह किसी भी । स्थान में । रहता हो । फ़िर भी । मुक्त ही है । इसमें । कोई संशय नहीं है । 83
ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं यशः श्री समुदाहृतम । षड्गुणैश्वर्ययुक्तो हि भगवान श्री गुरुः प्रिये ।
हे प्रिय ! भगवत स्वरूप । गुरु । ज्ञान । वैराग्य । ऐश्वर्य । यश । लक्ष्मी । और मधुर वाणी । ये 6 गुण । रूप ऐश्वर्य से । संपन्न होते हैं । 84
गुरुः शिवो गुरुर्देवो गुरुर्बन्धुः शरीरिणाम । गुरुरात्मा गुरुर्जीवो गुरोरन्यन्न विद्यते ।
मनुष्य के लिए । गुरु ही । शिव हैं । गुरु ही । देव हैं । गुरु ही । बांधव हैं । गुरु ही । आत्मा हैं । और गुरु ही । जीव हैं । ( सचमुच ) गुरु के सिवा । अन्य कुछ भी नहीं है । 85
एकाकी निस्पृहः शान्तः चिंतासूयादिवर्जितः । बाल्यभावेन यो भाति बृह्मज्ञानी स उच्यते ।
अकेला । कामना रहित । शांत । चिन्ता रहित । ईर्ष्या रहित । और बालक की तरह । जो शोभता है । वह बृह्म ज्ञानी कहलाता है । 86
न सुखं वेदशास्त्रेषु न सुखं मंत्रयंत्रके । गुरोः प्रसादादन्यत्र सुखं नास्ति महीतले ।
वेदों । और शास्त्रों में । सुख नहीं है । मंत्र और यंत्र में । सुख नहीं है । इस पृथ्वी पर । गुरु के कृपा प्रसाद के । सिवा अन्यत्र । कहीं भी । सुख नहीं है । 87
चावार्कवैष्णवमते सुखं प्रभाकरे न हि । गुरोः पादान्तिके यद्वत्सुखं वेदान्तसम्मतम ।
गुरु के चरणों में । जो वेदान्त निर्दिष्ट । सुख है । वह सुख । न चावार्क मत में । न वैष्णव मत में । और न प्रभाकर ( सांख्य ) मत में है । 88
न तत्सुखं सुरेन्द्रस्य न सुखं चक्रवर्तिनाम । यत्सुखं वीतरागस्य मुनेरेकान्तवासिनः ।
एकान्त वासी । वीत रागी । मुनि को । जो सुख मिलता है । वह सुख । न इन्द्र को । और न । चक्रवर्ती राजाओं को । मिलता है । 89
नित्यं बृह्मरसं पीत्वा तृप्तो यः परमात्मनि । इन्द्रं च मन्यते रंकं नृपाणां तत्र का कथा ।
हमेशा । बृह्म रस का । पान करके । जो । परमात्मा में । तृप्त हो गया है । वह ( मुनि ) इन्द्र को भी । गरीब मानता है । तो राजाओं की । तो बात ही क्या ? 90
यतः परमकैवल्यं गुरुमार्गेण वै भवेत । गुरुभक्तिरतिः कार्या सर्वदा मोक्षकांक्षिभिः ।
मोक्ष की । आकांक्षा करने वालों को । गुरु भक्ति । खूब करनी चाहिए । क्योंकि । गुरु के द्वारा ही । परम मोक्ष की प्राप्ति होती है । 91
एक एवाद्वितीयोऽहं गुरुवाक्येन निश्चितः । एवमभ्यास्ता नित्यं न सेव्यं वै वनान्तरम ।
अभ्यासान्निमिषणैव समाधिमधिगच्छति । आजन्मजनितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ।
गुरु के । वाक्य की । सहायता से । जिसने ऐसा । निश्चय । कर लिया है कि - मैं एक । और अद्वितीय हूँ । और । उसी अभ्यास में । जो रत है । उसके लिए । अन्य वनवास का । सेवन आवश्यक नहीं है । क्योंकि । अभ्यास से ही । एक क्षण में । समाधि लग जाती है । और उसी क्षण । इस जन्म तक के । सब पाप । नष्ट हो जाते हैं । 92 । 93
गुरुर्विष्णुः सत्त्वमयो राजसश्चतुराननः । तामसो रूद्ररूपेण सृजत्यवति हन्ति च ।
गुरु ही । सत्व गुणी होकर । विष्णु रूप से । जगत का । पालन करते हैं । रजो गुणी होकर । बृह्मा रूप से । जगत का । सृजन करते हैं । और तमो गुणी होकर । शंकर रूप से । जगत का । संहार करते हैं । 94
तस्यावलोकनं प्राप्य सर्वसंगविवर्जितः । एकाकी निःस्पृहः शान्तः स्थातव्यं तत्प्रसादतः ।
उनका ( गुरु का ) दर्शन पाकर । उनके । कृपा प्रसाद से । सब प्रकार की । आसक्ति छोड़कर । एकाकी । निःस्पृह । और शान्त होकर । रहना चाहिए । 95
सर्वज्ञपदमित्याहुर्देही सर्वमयो भुवि । सदाऽनन्दः सदा शान्तो रमते यत्र कुत्रचित ।
जो जीव । इस जगत में । सर्वमय । आनंदमय । और शान्त होकर । सर्वत्र । विचरता है । उस जीव को । सर्वज्ञ कहते हैं । 96
यत्रैव तिष्ठते सोऽपि स देशः पुण्यभाजनः । मुक्तस्य लक्षणं देवी तवाग्रे कथितं मया ।
 ऐसा पुरुष । जहाँ रहता है । वह स्थान । पुण्य तीर्थ है । हे देवी ! तुम्हारे सामने । मैंने । मुक्त पुरूष का । लक्षण कहा । 97
यद्यप्यधीता निगमाः षडंगा आगमाः प्रिये । आध्यामादिनि शास्त्राणि ज्ञानं नास्ति गुरुं विना ।
हे प्रिय ! मनुष्य चाहे । चारों वेद । पढ़ ले । वेद के । छह अंग पढ़ ले । आध्यात्म शास्त्र आदि । अन्य सब । शास्त्र पढ़ ले । फ़िर भी । गुरु के बिना । ज्ञान नहीं मिलता । 98
शिवपूजारतो वापि विष्णुपूजारतोऽथवा । गुरुतत्वविहीनश्चेत्तत्सर्वं व्यर्थमेव हि ।
शिव की । पूजा में । रत हो । या । विष्णु की । पूजा में । रत हो । परन्तु गुरु तत्व के । ज्ञान से । रहित हो । तो वह । सब व्यर्थ है । 99
सर्वं स्यात्सफलं कर्म गुरुदीक्षाप्रभावतः । गुरुलाभात्सर्वलाभो गुरुहीनस्तु बालिशः ।
गुरु की । दीक्षा के । प्रभाव से । सब कर्म । सफल होते हैं । गुरु की । संप्राप्ति रूपी । परम लाभ से । अन्य सब । लाभ मिलते हैं । जिसका गुरु नहीं । वह मूर्ख है । 100
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सर्वसंगविवर्जितः । विहाय शास्त्रजालानि गुरुमेव समाश्रयेत ।
इसलिए । सब प्रकार के । प्रयत्न से । अनासक्त होकर । शास्त्र की । माया जाल छोड़कर । गुरु की ही । शरण लेनी चाहिए । 101
ज्ञानहीनो गुरुत्याज्यो मिथ्यावादी विडंबकः । स्वविश्रान्ति न जानाति परशान्तिं करोति किम ।
ज्ञान रहित । मिथ्या बोलने वाले । और दिखावट करने वाले । गुरु का । त्याग । कर देना चाहिए । क्योंकि जो । अपनी ही । शांति । पाना नहीं जानता । वह दूसरों को । क्या शांति दे सकेगा ? 102
शिलायाः किं परं ज्ञानं शिलासंघप्रतारणे । स्वयं तर्तुं न जानाति परं निसतारेयेत्कथम ।
पत्थरों के । समूह को । तैराने का ज्ञान । पत्थर में । कहाँ से । हो सकता है ? जो खुद । तैरना । नहीं जानता । वह दूसरों को । क्या तैरायेगा । 103
न वन्दनीयास्ते कष्टं दर्शनाद भ्रान्तिकारकः । वर्जयेतान गुरुन दूरे धीरानेव समाश्रयेत ।
जो गुरु । अपने दर्शन से ( दिखावे से ) शिष्य को । भ्रान्ति में । ड़ालता है । ऐसे गुरु को । प्रणाम । नहीं करना चाहिए । इतना ही नहीं । दूर से ही । उसका । त्याग करना चाहिए । ऐसी स्थिति में । धैर्यवान । गुरु का ही । आश्रय लेना चाहिए । 104
पाखण्डिनः पापरता नास्तिका भेदबुद्धयः । स्त्रीलम्पटा दुराचाराः कृतघ्ना बकवृतयः ।
कर्मभृष्टाः क्षमानष्टाः निन्द्यतर्कैश्च वादिनः । कामिनः क्रोधिनश्चैव हिंस्राश्चंड़ाः शठस्तथा ।
ज्ञानलुप्ता न कर्तव्या महापापास्तथा प्रिये । एभ्यो भिन्नो गुरुः सेव्य एकभक्त्या विचार्य च ।
भेद बुद्धि । उत्पन्न करने वाले । स्त्री लम्पट । दुराचारी । नमक हराम । बगुले की तरह ठगने वाले । क्षमा रहित । निन्दनीय । तर्कों से वितंडा वाद करने वाले । कामी । क्रोधी । हिंसक । उग्र । शठ । तथा अज्ञानी । और महा पापी । पुरुष को । गुरु । नहीं करना चाहिए । ऐसा विचार करके । ऊपर दिये । लक्षणों से भिन्न । लक्षणों वाले । गुरु की । एक निष्ठ भक्ति से । सेवा करनी चाहिए । 105 । 106 । 107
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं धर्मसारं मयोदितम । गुरुगीता समं स्तोत्रं नास्ति तत्वं गुरोः परम ।
गुरु गीता के । समान । अन्य कोई । स्तोत्र नहीं है । गुरु के समान । अन्य । कोई तत्व नहीं है । समग्र धर्म का । यह सार । मैंने कहा है । यह सत्य है । सत्य है । और बार बार सत्य है । 108
अनेन यद भवेद् कार्यं तद्वदामि तव प्रिये । लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु विवर्जयेत ।
हे प्रिय ! इस गुरु गीता का । पाठ करने से । जो कार्य । सिद्ध होता है । अब वह । कहता हूँ । हे देवी ! लोगों के लिए । यह उपकारक है । मात्र लौकिक का । त्याग करना चाहिए । 109
लौकिकाद्धर्मतो याति ज्ञानहीनो भवार्णवे । ज्ञानभावे च यत्सर्वं कर्म निष्कर्म शाम्यति ।
जो कोई । इसका उपयोग । लौकिक कार्य के लिए । करेगा । वह ज्ञान हीन होकर । संसार रूपी सागर में । गिरेगा । ज्ञान भाव से । जिस कर्म में । इसका उपयोग । किया जाएगा । वह कर्म । निष्कर्म में । परिणत होकर । शांत हो जाएगा । 110
इमां तु भक्तिभावेन पठेद्वै शृणुयादपि । लिखित्वा यत्प्रसादेन तत्सर्वं फलमश्नुते ।
भक्ति भाव से । इस गुरु गीता का । पाठ करने से । सुनने से । और लिखने से । वह ( भक्त ) सब फल भोगता है । 111
गुरुगीतामिमां देवि हृदि नित्यं विभावय । महाव्याधिगतैदुःखैः सर्वदा प्रजपेन्मुदा ।
हे देवी ! इस गुरु गीता को । नित्य । भाव पूर्वक । हृदय में । धारण करो । महा व्याधि वाले । दुखी लोगों को । सदा आनंद से । इसका । जप करना चाहिए । 112
गुरुगीताक्षरैकैकं मंत्रराजमिदं प्रिये । अन्ये च विविधा मंत्राः कलां नार्हन्ति षोडशीम ।
हे प्रिय ! गुरु गीता का । एक एक अक्षर । मंत्र राज है । अन्य जो । विविध मंत्र हैं । वे इसका सोलहवाँ भाग भी नहीं । 113
अनन्तफलमाप्नोति गुरुगीताजपेन तु । सर्वपापहरा देवि सर्वदारिद्रयनाशिनी ।
हे देवी ! गुरु गीता के जप से । अनंत फल । मिलता है । गुरु गीता । सब पापों को । हरने वाली । और सब । दारिद्रय का । नाश करने वाली है । 114
अकालमृत्युहंत्री च सर्वसंकटनाशिनी । यक्षराक्षसभूतादिचोरव्याघ्रविघातिनी ।
गुरु गीता । अकाल मृत्यु को । रोकती है । सब संकटों का । नाश करती है । यक्ष । राक्षस । भूत । चोर । और बाघ आदि का । घात करती है । 115
सर्वोपदृवकुष्ठदिदुष्टदोषनिवारिणी । यत्फलं गुरुसान्निध्यात्तत्फलं पठनाद भवेत ।
गुरु गीता । सब प्रकार के । उपद्रवों । कुष्ठ । और दुष्ट । रोगों । और दोषों का । निवारण । करने वाली है । गुरु के । सान्निध्य से । जो फल । मिलता है । वह फल । इस गुरु गीता का । पाठ करने से मिलता है । 116
महाव्याधिहरा सर्वविभूतेः सिद्धिदा भवेत । अथवा मोहने वश्ये स्वयमेव जपेत्सदा ।
इस गुरु गीता का । पाठ करने से । महा व्याधि । दूर होती है । सब ऐश्वर्य । और सिद्धियों की । प्राप्ति होती है । मोहन में । अथवा वशीकरण में । इसका पाठ । स्वयं ही । करना चाहिए । 117
मोहनं सर्वभूतानां बन्धमोक्षकरं परम । देवराज्ञां प्रियकरं राजानं वश्मानयेत ।
इस गुरु गीता का । पाठ करने वाले पर । सब प्राणी । मोहित हो जाते हैं । बन्धन में से । परम मुक्ति । मिलती है । देवराज इन्द्र को । वह प्रिय होता है । और राजा । उसके वश होता है । 118
मुखस्तम्भकरं चैव गुणाणां च विवर्धनम । दुष्कर्मनाश्नं चैव तथा सत्कर्मसिद्धिदम ।
इस गुरु गीता का । पाठ । शत्रु का । मुख । बन्द करने वाला है । गुणों की । वृद्धि । करने वाला है । दुष्कृत्यों का । नाश करने वाला । और सतकर्म में । सिद्धि देने वाला है । 119
असिद्धं साधयेत्कार्यं नवग्रहभयापहम । दुःस्वप्ननाशनं चैव सुस्वप्नफलदायकम ।
इसका पाठ । असाध्य कार्यों की । सिद्धि कराता है । नव ग्रहों का । भय हरता है । दुस्वपन का । नाश करता है । और सुस्वपन के । फल की प्राप्ति कराता है । 120
मोहशान्तिकरं चैव बन्धमोक्षकरं परम । स्वरूपज्ञाननिलयं गीतशास्त्रमिदं शिवे ।
हे शिवे ! यह गुरु गीता रूपी । शास्त्र । मोह को । शान्त करने वाला । बन्धन में से । परम मुक्त । करने वाला । और स्वरूप ज्ञान का । भण्डार है । 121
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चयम । नित्यं सौभाग्यदं पुण्यं तापत्रयकुलापहम ।
व्यक्ति । जो जो । अभिलाषा करके । इस गुरु गीता का । पठन चिन्तन । करता है । उसे वह । निश्चय ही । प्राप्त होता है । यह गुरु गीता । नित्य सौभाग्य । और पुण्य । प्रदान करने वाली । तथा तीनों तापों ( आधि । व्याधि । उपाधि ) का । शमन करने वाली है । 122
सर्वशान्तिकरं नित्यं तथा वन्ध्यासुपुत्रदम । अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यस्य विवर्धनम ।
यह गुरु गीता । सब प्रकार की । शांति करने वाली । वंध्या स्त्री को । सुपुत्र देने वाली । सधवा स्त्री के । वैध्व्य का । निवारण । करने वाली । और सौभाग्य की । वृद्धि करने वाली है । 123
आयुरारोग्मैश्वर्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम । निष्कामजापी विधवा पठेन्मोक्षमवाप्नुयात ।
यह गुरु गीता । आयुष्य । आरोग्य । ऐश्वर्य । और पुत्र । पौत्र की । वृद्धि करने वाली है । कोई विधवा । निष्काम भाव से । इसका जप । पाठ करे । तो मोक्ष की प्राप्ति होती है । 124
अवैधव्यं सकामा तु लभते चान्यजन्मनि । सर्वदुःखभयं विघ्नं नाश्येत्तापहारकम ।
यदि वह ( विधवा ) सकाम होकर । जप करे । तो अगले जन्म में । उसको संताप हरने वाला । अवैधव्य ( सौभाग्य ) प्राप्त होता है । उसके सब । दुख । भय । विघ्न । और संताप का । नाश होता है । 125
सर्वपापप्रशमनं धर्मकामार्थमोक्षदम । यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम ।
इस गुरु गीता का । पाठ । सब पापों का । शमन करता है । धर्म । अर्थ । और मोक्ष की । प्राप्ति कराता है । इसके पाठ से । जो जो । आकांक्षा की जाती है । वह अवश्य । सिद्ध होती है । 126
लिखित्वा पूजयेद्यस्तु मोक्षश्रियम्वाप्नुयात । गुरूभक्तिर्विशेषेण जायते हृदि सर्वदा ।
यदि कोई । इस गुरु गीता को लिखकर । उसकी पूजा करे । तो उसे । लक्ष्मी । और मोक्ष की । प्राप्ति होती है । और विशेष कर । उसके हृदय में । सर्वदा । गुरु भक्ति । उत्पन्न होती रहती है । 127
जपन्ति शाक्ताः सौराश्च गाणपत्याश्च वैष्णवाः । शैवाः पाशुपताः सर्वे सत्यं सत्यं न संशयः ।
शक्ति के । सूर्य के । गणपति के । शिव के । और पशुपति के । मतवादी । इसका ( गुरु गीता का ) पाठ करते हैं । यह सत्य है । सत्य है । इसमें कोई । संदेह नहीं है । 128
जपं हीनासनं कुर्वन् हीनकर्माफलप्रदम । गुरुगीतां प्रयाणे वा संग्रामे रिपुसंकटे ।
जपन् जयमवाप्नोति मरणे मुक्तिदायिका । सर्वकमाणि सिद्धयन्ति गुरुपुत्रे न संशयः ।
बिना आसन किया हुआ । जप । नीच कर्म । हो जाता है । और निष्फल । हो जाता है । यात्रा में । युद्ध में । शत्रुओं के उपद्रव में । गुरु गीता का । जप । पाठ करने से । विजय मिलता है । मरण काल में । जप करने से । मोक्ष मिलता है । गुरु पुत्र के ( शिष्य के ) सब कार्य । सिद्ध होते हैं । इसमें संदेह नहीं है । 129 । 130
गुरुमंत्रो मुखे यस्य तस्य सिद्धयन्ति नान्यथा । दीक्षया सर्वकर्माणि सिद्धयन्ति गुरुपुत्रके ।
जिसके मुख में । गुरु मंत्र है । उसके सब कार्य । सिद्ध होते हैं । दूसरे के नहीं । दीक्षा के कारण । शिष्य के सब कार्य । सिद्ध हो जाते हैं । 131
भवमूलविनाशाय चाष्टपाशनिवृतये । गुरुगीताम्भसि स्नानं तत्वज्ञ कुरुते सदा ।
सर्वशुद्धः पवित्रोऽसौ स्वभावाद्यत्र तिष्ठति । तत्र देवगणाः सर्वे क्षेत्रपीठे चरन्ति च ।
तत्वज्ञ पुरूष । संसा रूपी । वृक्ष की जड़ । नष्ट करने के लिए । और आठों प्रकार के बन्धन ( संशय । दया । भय । संकोच । निन्दा । प्रतिष्ठा । कुल अभिमान । और संपत्ति ) की निवृति करने के लिए । गुरु गीता रूपी । गंगा में । सदा स्नान करते रहते हैं । स्वभाव से ही । सर्वथा शुद्ध । और पवित्र । ऐसे वे महापुरूष । जहाँ रहते हैं । उस तीर्थ में । देवता विचरण करते हैं । 132 । 133
आसनस्था शयाना वा गच्छन्तष्तिष्ठन्तोऽपि वा । अश्वरूढ़ा गजारूढ़ा सुषुप्ता जाग्रतोऽपि वा ।
शुचिभूता ज्ञानवन्तो गुरुगीतां जपन्ति ये । तेषां दर्शनसंस्पर्शात पुनर्जन्म न विद्यते ।
आसन पर । बैठे हुए । या लेटे हुए । खड़े रहते । या चलते हुए । हाथी या घोड़े पर सवार । जागृत अवस्था में । या सुषुप्त अवस्था में । जो पवित्र ज्ञानवान पुरूष । इस गुरु गीता का । जप । पाठ करते हैं । उनके दर्शन और स्पर्श से । पुनर्जन्म नहीं होता । 134 । 135
कुशदुर्वासने देवि ह्यासने शुभ्रकम्बले । उपविश्य ततो देवि जपेदेकाग्रमानसः ।
हे देवी ! कुश और दुर्वा के आसन पर । सफ़ेद कम्बल बिछाकर । उसके ऊपर बैठकर । एकाग्र मन से । इसका ( गुरु गीता का ) जप करना चाहिए । 136
शुक्लं सर्वत्र वै प्रोक्तं वश्ये रक्तासनं प्रिये । पदमासने जपेन्नित्यं शान्तिवश्यकरं परम ।
सामान्यतया सफ़ेद आसन । उचित है । परंतु वशीकरण में । लाल आसन आवश्यक है । हे प्रिये ! शांति प्राप्ति के लिए । या वशीकरण में । नित्य पदमासन में । बैठकर जप करना चाहिए । 137
वस्त्रासने च दारिद्रयं पाषाणे रोगसंभवः । मेदिन्यां दुःखमाप्नोति काष्ठे भवति निष्फलम ।
कपड़े के आसन पर बैठकर । जप करने से - दारिद्रय आता है । पत्थर के आसन पर - रोग । भूमि पर बैठकर जप करने से - दुख आता है । और लकड़ी के आसन पर । किये हुए जप । निष्फल होते हैं । 138
कृष्णाजिने ज्ञानसिद्धिः मोक्षश्री व्याघ्रचर्मणि । कुशासने ज्ञानसिद्धिः सर्वसिद्धिस्तु कम्बले ।
काले मृग चर्म । और दर्भासन पर बैठकर । जप करने से । ज्ञान सिद्धि होती है । व्याघ्र चर्म पर जप करने से । मुक्ति प्राप्त होती है । परन्तु कम्बल के आसन पर । सर्व सिद्धि प्राप्त होती है । 139
आग्नेय्यां कर्षणं चैव वयव्यां शत्रुनाशनम । नैरॄत्यां दर्शनं चैव ईशान्यां ज्ञानमेव च ।
अग्नि कोण की तरफ । मुख करके । जप । पाठ । करने से - आकर्षण । वायव्य कोण की तरफ़ - शत्रुओं का नाश । नैऋत्य कोण की तरफ - दर्शन । और । ईशान कोण की तरफ । मुख करके । जप । पाठ । करने से ज्ञान की प्रप्ति है । 140
उदंमुखः शान्तिजाप्ये वश्ये पूर्वमुखतथा । याम्ये तु मारणं प्रोक्तं पश्चिमे च धनागमः ।
उत्तर दिशा की ओर । मुख करके । पाठ करने से - शांति । पूर्व दिशा की ओर - वशीकरण । दक्षिण दिशा की ओर - मारण । सिद्ध होता है । तथा । पश्चिम दिशा की ओर । मुख करके । जप । पाठ । करने से । धन प्राप्ति । होती है । 141
इति श्री स्कान्दोत्तरखण्डे उमामहेश्वरसंवादे श्री गुरुगीतायां द्वितीयोऽध्यायः

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