सोमवार, मार्च 22, 2010

मुक्ति का ज्ञान कुण्डलिनी ज्ञान से अलग है ??

आम तोर पर लोग साधू संतों आदि मैं अंतर नहीं कर पाते हैं । मैं इनके बारे मैं बता रहा हूँ ।
संत - ये सबसे बड़ी शक्ति होती है .इनसे ऊपर कोई शक्ति नहीं होती .संत शब्द सनत से बना है जिसका मतलव ही लगातार होता है .इनका केवल एक ही धर्म होता है सनातन धर्म .यानी संसार के किसी धर्म से इनको कोई मतलव नहीं होता है .इनका जन्म भी नहीं होता है ये प्रकट होते है । महत्वपूर्ण बात ये है की शास्त्रों वेदों से इनका कोई लेना देने नहीं होता है .इनके मत को संतमत कहते है .केवल परमात्मा का असली नाम यानी ढाई अक्षर का महामंत्र देकर ये जीवों का कल्याण करते है .आम पूजा नियम आदि से इनका कोई मतलब नहीं होता है ।
योगी -ये दुसरे नंबर पर होते है .इनकी साधनाएँ अनेकों प्रकार की होती है और योगियों के बहुत प्रकार होते है .कुछ योगियों को भगवान् भी कहा जाता है जैसे राम ,कृष्ण ,परुशराम ये ढेरों की संख्या मैं होते है .खास बात ये है के ये तीन लोक के दायरे मैं आते है और अविनाशी नहीं होते है यानी एक निर्धारित समय के बाद इनका रिटायर मेंट हो जाता है इनके अनेकों मंत्र अनेकों साधनाएँ होती है ।
महात्मा -ये तीसरे नंबर पर होते है .इनके भी अनेक प्रकार होते है इनकी भी अनेक प्रकार की साधनाएँ होती है उदाहरण के लिए कृष्ण को ,सूर्य को इन्द्र को भी महात्मा कहा जाता .दरअसल कोई आत्मा जब ऊंचाई को प्राप्त कर लेती है तो वो आत्मा से महात्मा हो जाती है फिर इनका रूपांतरण इनकी इच्छानुसार देवता आदि मैं हो जाता है । बहुत अच्छे कर्मों से भी देवता बना जा सकता है और इन्द्र आदि पदवी प्राप्त करके स्वर्ग आदि सुखों का भोग हजारों बरसों तक किया जा सकता है
सिद्ध -महात्मा से नीचे सिद्ध होते है कुण्डलिनी ज्ञान के माध्यम से ये सिद्धि प्राप्त कर लेते है और विभिन्न प्रकार के चमत्कार आदि दिखाकर ये वैभव भोगते है .इनकी सिद्धि का असर ख़त्म होते ही इनकी बेहद दुर्गति होती है.और बाद मैं नरक के अलावा इनका कोई स्थान नहीं होता है
एक बात और है संसार मैं सबसे अधिक प्रभावित लोग सिद्धों से ही होते है और उनके अधिक संपर्क मैं रहने बाले क्रियाओं मैं साथ देने वाले भी दुर्गति को प्राप्त होकर नरक मैं स्थान पाते हैं ।
बस इनसे नीचे कोई स्थान नहीं होता । संसारमैं जो लोग तमाम तरह के स्वांग रचकर विभिन्न पदवी आदि धारण कर लेते है उसका अलोकिक दृष्टि से कोई महत्व नहीं होता है
इनमें पुजारी ,भिछुक ,शास्त्रग्य ,भागवत वक्ता , प्रवचन करता , विभिन्न मतों का अनुसरण करने वाले ,ज्योतिषी ,तांत्रिक ,सन्यासी ,आदि किसी भी प्रकार का आत्म कल्याण करने मैं सक्षम नहीं होते है । और न ही कथा कीर्तन भागवत आदि सुनने से आत्म कल्याण होता है और न ही मुक्ति होती है ।
वास्तव मैं कोई भी धर्म हो कोई भी पूजा हो किसी भी जाती या देश का इंसान हो कुण्डलिनी ज्ञान और मुक्ति के लिए सहज योग के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है । ध्यान रखे कुण्डलिनी ज्ञान से मुक्ति कभी नहीं होती है । हाँ आत्मा अति दुर्लभ महानता को भी इस ज्ञान से प्राप्त कर सकती है और मनुष्य शारीर के रहते हुए वह इन्द्र आदि देवता की पदवी प्राप्त कर सकती है
पर मुक्ति का ज्ञान कुण्डलिनी ज्ञान से अलग है ??

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