शनिवार, अप्रैल 10, 2010

आत्मा ज्योर्तिमय आनन्दमय है.. .

ओंकार को नेत पुकारा , यह सुन शब्द वेद से पारा . अंडा सुन्न में सैर करायी , सो वो शब्द परखिया भाई ..जो यह ओंकार शब्द है . वह वेद की वाणी से परे यानी उससे अलग है जिसमें प्रवेश होने से जो यह अंडाकार
ब्रह्मांड है उसमें पहुँच कर परमात्मा का दर्शन कराने वाला हैं जिसे विदेह स्थित में जानो . आत्मा सब भूत तत्वों में निवास करती है .
आत्मा ज्योर्तिमय आनन्दमय है . जब इन्द्रियां अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है तथा मन बुद्धि के निर्णय से शान्त हो जाता है और अहंग चित्त में स्थित होकर देखता है तब वह पराविधा को ही देखता है . जो वाणियों का माध्यम परावाणी है . वह आत्मा से ही उत्पन्न होती है जिस प्रकार आकाश का गुण वायु है आत्मा का गुण पराविधा है . बुद्धि आदि इन्द्रियों से सम्बद्ध होने के कारण आत्मा को साक्षी कहा जाता है . जब बुद्धि से अविवेक दूर हो जाता है तब आत्मा का साक्षीपन मोक्ष में बाधा नहीं डालता है .सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शून्य है क्योंकि ब्रह्माण्ड की आकृति शून्य जैसी गोल है . इससे सारी ही आकृतियां गोल है .सूर्य , चन्द्र , तारे
प्रथ्वी सभी शून्य जैसी आकृति वाले है .सभी अण्ड गोल वृक्ष पहाङ शून्य के समान प्रतीत होते हैं . अतः अण्ड पिण्ड ब्रह्माण्ड सब शून्य है . मन जब विचारों से शून्य हो जाता है तब समाधि में समा जाता है .

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