शनिवार, अगस्त 13, 2011

त्याग के संकल्प के बिना कोई योगी नहीं बनता - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 6

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः । 6-1
श्रीकृष्ण बोले - कर्म के फल का । आश्रय न लेकर । जो कर्म करता है । वह संन्यासी भी है । और योगी भी । वह नहीं । जो अग्निहीन है । न वह । जो अक्रिय है ।
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन । 6-2
जिसे सन्यास कहा जाता है । उसे ही तुम योग भी जानो । हे पाण्डव ! क्योंकि सन्यास । अर्थात त्याग के । संकल्प के बिना । कोई योगी नहीं बनता ।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते । 6-3
1 मुनि के लिये । योग में स्थित होने के लिये । कर्म साधन कहा जाता है । योग में स्थित हो जाने पर । शान्ति उसके लिये । साधन कही जाती है ।
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते । 6-4
जब वह । न इन्द्रियों के । विषयों की ओर । और न । कर्मों की ओर । आकर्षित होता है । सभी संकल्पों का त्यागी । तब उसे । योग में । स्थित कहा जाता है ।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन । 6-5
स्वयँ से । अपना उद्धार करो । स्वयँ ही । अपना पतन नहीं । मनुष्य स्वयँ ही । अपना मित्र होता है । और स्वयँ ही । अपना शत्रु ।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत । 6-6
जिसने । अपने आप पर । जीत पा ली है । उसके लिये । उसका आत्मा । उसका मित्र है । लेकिन ( जिसने ) स्वयँ पर । जीत नहीं प्राप्त की है । उसके लिये । उसका आत्मा ही । शत्रु की तरह वरतता है ।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः । 6-7
अपने आत्मन पर । जीत प्राप्त किया । सरदी गरमी । सुख दुख । तथा मान अपमान में । 1 सा रहने वाला । । प्रसन्न चित्त मनुष्य । परमात्मा में बसता है ।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः । 6-8
ज्ञान और अनुभव से । तृप्त हुई आत्मा । अ हिल । अपनी इन्द्रियों पर । जीत प्राप्त किये । इस प्रकार युक्त । व्यक्ति को ही । योगी कहा जाता है । जो लोहे । पत्थर । और सोने को । 1 सा देखता है ।
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते । 6-9
जो अपने सुहृद को । मित्र को । वैरी को । कोई मतलब न रखने वाले को । बिचौले को । घृणा करने वाले को । सम्बन्धी को । यहाँ तक कि 1 साधु पुरूष को । और ( 1 ) पापी पुरूष को । 1 ही बुद्धि से । देखता है । वह उत्तम है ।
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः । 6-10
योगी को । एकान्त स्थान पर । स्थित होकर । सदा अपनी आत्मा को । नियमित करना चाहिये । एकान्त में । इच्छाओं । और घर । धन आदि । मानसिक परिग्रहों से रहित हो । अपने चित्त । और आत्मा को । नियमित करता हुआ ।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम । 6-11
उसे  । ऐसे आसन पर । बैठना चाहिये । जो साफ । और पवित्र स्थान पर । स्थित हो । स्थिर हो । और जो । न ज़्यादा ऊँचा हो । और न ज़्यादा नीचा हो । और कपड़े । खाल । या कुश । नामक घास से बना हो ।
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये । 6-12
वहाँ अपने मन को एकाग्र कर । चित्त । और इन्द्रियों को अक्रिय कर । उसे आत्म शुद्धि के लिये । ध्यान योग का । अभ्यास करना चाहिये ।
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन । 6-13
अपनी काया । सिर और गर्दन को । 1 सा सीधा । धारण कर । अचल रखते हुये । स्थिर रहकर । अपनी नाक के । आगे वाले भाग की ओर । एकाग्रता से देखते हुये । और किसी दिशा में । नहीं देखना चाहिये ।
प्रशान्तात्मा विगतभीर्बृह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः । 6-14
प्रसन्न आत्मा । भय मुक्त । बृह्मचर्य के वृत में स्थित । मन को संयमित कर । मुझमें चित्त लगाये हुये । इस प्रकार युक्त हो । मेरी ही परम चाह रखते हुये ।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति । 6-15
इस प्रकार योगी । सदा अपने आपको । नियमित करता हुआ । नियमित मन वाला । मुझमें स्थित होने के कारण । परम शान्ति । और निर्वाण को । प्राप्त करता है ।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन । 6-16
हे अर्जुन ! न बहुत खाने वाला । योग प्राप्त करता है । ( और ) न वह । जो बहुत ही कम खाता है । ( और ) न वह । जो बहुत सोता है । और न वह । जो जागता ही रहता है ।
युक्ताहारविहारस्य  युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा । 6-17
जो नियमित आहार लेता है । और नियमित निर आहार रहता है । नियमित ही कर्म करता है । नियमित ही सोता और जागता है । उसके लिये । यह योग । दुखों का अन्त कर देने वाला । हो जाता है ।
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा । 6-18
जब स्वयँ ही । उसका चित्त । बिना हलचल के । और सभी कामनाओं से मुक्त । उसकी आत्मा में । विराजमान रहता है । तब उसे ( योग ) युक्त कहा जाता है ।
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः । 6-19
जैसे एक दीपक । वायु न होने पर । हिलता नहीं है । उसी प्रकार योग द्वारा । नियमित किया हुआ । योगी का चित्त । होता है ।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति । 6-20
जब । उस योगी का । चित्त । योग द्वारा । विषयों से । हट जाता है । तब । वह स्वयँ । अपनी आत्मा को । स्वयँ । अपनी आत्मा द्वारा । देख तुष्ट होता है ।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः । 6-21
( तब ) वह अत्यन्त सुख । जो इन्द्रियों से पार । उसकी बुद्धि में । समाता है । उसे देख लेने के बाद । योगी । उसी में । स्थित रहता है । और सार से । हिलता नहीं ।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते । 6-22
तब बड़े से बड़ा । लाभ । प्राप्त कर लेने पर भी । वह उसे । अधिक नहीं मानता । और न ही । उस सुख में स्थित । वह भयानक से भयानक । दुख से भी । विचलित होता है ।
तं विद्याददुः खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा । 6-23
दुख से । जो जोड़ ( जुङाव ) है । उसके । इस टूट जाने को ही । योग का नाम दिया जाता है । निश्चय कर । और पूरे मन से । इस योग मे जुटना चाहिये ।
संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः । 6-24
शुरू होने वाली । सभी कामनाओं को । त्याग देने का । संकल्प कर । मन से । सभी इन्द्रियों को । हर ओर से । रोक कर ।
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत । 6-25
धीरे धीरे । बुद्धि की स्थिरता । ग्रहण करते हुये । मन को । आत्म में स्थित कर । कुछ भी नहीं सोचना चाहिये ।
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत । 6-26
जब जब । चंचल और अस्थिर मन । किसी भी ओर । जाये । तब तब । उसे नियमित कर । अपने वश में । कर लेना चाहिये ।
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम । उपैति शान्तरजसं बृह्मभूतमकल्मषम । 6-27
ऐसे प्रसन्न चित्त । योगी को । उत्तम सुख । प्राप्त होता है । जिसका । रजो गुण । शान्त हो चुका है । जो पाप मुक्त है । और बृह्म में । समा चुका है ।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन बृह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते । 6-28
अपनी आत्मा को । सदा योग में लगाये । पाप मुक्त हुआ । योगी । आसानी से । बृह्म से । स्पर्श होने का । अत्यन्त सुख भोगता है ।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः । 6-29
योग से युक्त आत्मा । अपनी आत्मा को । सभी जीवों में देखते हुये । और सभी जीवों में । अपनी आत्मा को । देखते हुये । हर जगह एक सा रहता है ।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति । 6-30
जो मुझे । हर जगह । देखता है । और हर चीज़ को । मुझमें देखता है । उसके लिये । मैं कभी । ओझल । नहीं होता । और न ही । वो । मेरे लिये । ओझल होता है ।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते । 6-31
सभी भूतों में । स्थित । मुझे । जो अनन्य भाव से । स्थित होकर । भजता है । वह । सब कुछ । करते हुये भी । मुझ ही में । रहता है ।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः । 6-32
हे अर्जुन ! जो सदा । दूसरों के दुख सुख । और अपने दुख सुख । को एक सा देखता है । वही योगी । सबसे परम है ।
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम । 6-33
अर्जुन बोला - हे मधुसूदन ! जो आपने । यह समता भरा । योग बताया है । इसमें मैं । स्थिरता नहीं देख पा रहा हूँ । मन की चंचलता के कारण ।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवददृढम । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम । 6-34
हे कृष्ण ! मन तो चंचल । हलचल भरा । बलवान । और दृण होता है । उसे रोक पाना तो । मैं वैसे ही अत्यन्त कठिन मानता हूँ । जैसे वायु को रोक पाना ।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते । 6-35
श्रीकृष्ण बोले - बेशक !  हे महाबाहो ! चंचल मन को । रोक पाना कठिन है । लेकिन । हे कौन्तेय ! अभ्यास और वैराग्य से इसे काबू किया जा सकता है ।
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः । 6-36
मेरे मत में । आत्म संयम बिना । योग प्राप्त करना । अत्यन्त कठिन है । लेकिन । अपने आपको वश में कर । अभ्यास द्वारा । इसे प्राप्त किया जा सकता है ।
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति । 6-37
अर्जुन बोला - हे कृष्ण ! श्रद्धा होते हुए भी । जिसका मन । योग से हिल जाता है । योग सिद्धि को । प्राप्त न कर पाने पर । उसका क्या परिणाम होता है ?
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो बृह्मणः पथि । 6-38
क्या वह । दोनों पथों में असफल हुआ । टूटे बादल की तरह । नष्ट नहीं हो जाता । हे महाबाहो ! अप्रतिष्ठित और बृह्म पथ से विमूढ हुआ ।
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते । 6-39
हे कृष्ण ! मेरे इस संशय को । आप पूरी तरह । मिटा दीजिये । क्योंकि । आपके अलावा । और कोई नहीं है । जो इस संशय को छेद पाये ।
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिददुर्गतिं तात गच्छति । 6-40
श्रीकृष्ण बोले - हे पार्थ ! उसके लिये । विनाश न यहाँ है । और न कहीं और ही । क्योंकि हे तात ! कल्याणकारी कर्म करने वाला । कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता ।
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभृष्टोऽभिजायते । 6-41
योग पथ में । भृष्ट हुआ मनुष्य । पुण्यवान लोगों के । लोकों को प्राप्त कर । वहाँ । बहुत समय तक । रहता है । और फिर । पवित्र और श्रीमान । घर में जन्म लेता है ।
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम । 6-42
या फिर । वह बुद्धिमान योगियों के घर में । जन्म लेता है । ऐसा जन्म मिलना । इस संसार में बहुत मुश्किल है ।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन । 6-43
वहाँ उसे । अपने पहले वाले जन्म की ही । बुद्धि से । फिर से संयोग प्राप्त होता है । फिर दोबारा अभ्यास करते हुये । हे कुरुनन्दन ! वह सिद्धि प्राप्त करता है ।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्द बृह्मतिवर्तते । 6-44
पूर्व जन्म में । किये अभ्यास की तरफ । वह बिना वश ही । खिंच जाता है । क्योंकि । योग में । जिज्ञासा रखने वाला भी । वेदों से ऊपर । उठ जाता है ।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम । 6-45
अनेक जन्मों में । किये प्रयत्न से । योगी । विशुद्ध और पाप मुक्त हो । अन्त में । परम सिद्धि को । प्राप्त कर लेता है ।
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन । 6-46
योगी । तपस्वियों से अधिक है । विद्वानों से भी अधिक है । कर्म से जुड़े । लोगों से भी अधिक है । इसलिये । हे अर्जुन ! तुम योगी बनो ।
योगिनामपि सर्वेषां मदभतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः । 6-47
और सभी योगियों में । जो अन्तर आत्मा को । मुझमें ही बसाकर । श्रद्धा से मुझे याद करता है । वही सबसे उत्तम है ।

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