शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

सत शब्द बिना कोई पदार्थ सिद्ध नहीं होता

हे साधो ! जिनका नित्य प्रबुद्ध चित्त है । वे जगत के कार्य भी करते हैं । पर आत्म तत्व में स्थित हैं । तो वह सर्वदा समाधि में स्थित हैं । और जो पदम आसन बाँधकर बैठते हैं । और बृह्म अंजली हाथ में रखते हैं । पर चित्त आत्म पद में स्थित नहीं होता । और विश्रान्ति नहीं पाते । तो उनको समाधि कहाँ ? वह समाधि नहीं कहलाती । हे भगवन ! परमार्थ तत्व बोध आशा रूपी सब तृणों के जलाने वाली अग्नि है । ऐसी निराश रूपी जो समाधि वही समाधि है । तूष्णीम होने का नाम समाधि नहीं है । हे साधो ! जिसका चित्त समाहित । नित्य तृप्त । और सदा शान्त रूप है । और जो यथा भूतार्थ है । अर्थात जिसे ज्यों का त्यों ज्ञान हुआ है । और उसमें निश्चय है । वह समाधि कहाती है । तूष्णीम होने का नाम समाधि नहीं है । जिसके हृदय में संसार रूप सत्यता का क्षोभ नहीं है । जो निर अहंकार है । और अन उदय ही उदय है । वह पुरुष समाधि में कहाता है । ऐसा जो बुद्धिमान है । वह सुमेरु से भी अधिक स्थित है । हे साधो ! जो पुरुष निश्चिन्त है । जिसका गृहण और त्याग बुद्धि निवृत्त हुई है । जिसे पूर्ण आत्म तत्व ही भासता है । वह व्यवहार भी करता दृष्ट आता है । तो भी उसकी समाधि है । जिसका चित्त 1 क्षण भी । आत्म तत्व में स्थित होता है । उसकी अत्यन्त समाधि है । और क्षण क्षण बढ़ती जाती है । निवृत नहीं होती । जैसे अमृत के पान किये से उसकी तृष्णा बढ़ती जाती है । वैसे ही 1 क्षण को भी समाधि बढ़ती ही जाती है । जैसे सूर्य के उदय हुए सब किसी को दिन भासता है । वैसे ही ज्ञान वान को सब आत्म तत्व भासता है । कदाचित भिन्न नहीं भासता । जैसे नदी का प्रवाह किसी से रोका नहीं जाता । वैसे ही ज्ञान वान की आत्म दृष्टि

किसी से रोकी नहीं जाती । और जैसे काल की गति काल को 1 क्षण भी विस्मरण नहीं होती । वैसे ही ज्ञान वान की आत्म दृष्टि विस्मरण नहीं होती । जैसे चलने से ठहरे पवन को । अपना पवन भाव विस्मरण नहीं होता । वैसे ही ज्ञान वान को चिन्मात्र तत्व का विस्मरण नहीं होता । और जैसे सत शब्द बिना । कोई पदार्थ सिद्ध नहीं होता । वैसे ही ज्ञान वान को । आत्मा के सिवाय । कोई पदार्थ नहीं भासता । जिस ओर ज्ञान वान की दृष्टि जाती है । उसे वहाँ अपना आप ही भासता है । जैसे उष्णता बिना अग्नि नहीं । शीतलता बिना बरफ नहीं । और श्यामलता बिना काजल नहीं होती । वैसे आत्मा बिना । जगत नहीं होता । हे साधो ! जिसको आत्मा से भिन्न पदार्थ । कोई नहीं भासता । उसको उत्थान कैसे हो ? मैं सर्वदा बोध रूप । निर्मल । और सर्वदा सर्वात्मा समाहित चित हूँ । इससे उत्थान मुझको कदाचित नहीं होगा । आत्मा से भिन्न मुझको कोई नहीं भासता । सब प्रकार आत्म तत्व ही । मुझको भासता है । हे साधो ! आत्म तत्व सर्वदा जानने योग्य है । सर्वदा और सब प्रकार आत्मा स्थित है । फिर समाधि और उत्थान कैसे हो ? जिसको कार्य कारण में विभाग कलना नहीं फुरती । और जो आत्म तत्व में ही स्थित है । उसको समाहित असमाहित क्या कहिये ? समाधि और उत्थान का वास्तव में कुछ भेद नहीं । आत्म तत्व सदा अपने आप में स्थित है । द्वैत भेद कुछ नहीं । तो समाहित असमाहित क्या कहिये ?

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