शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

हे मूर्ख मन ! तू अहं अहं क्यों करता है ?

वशिष्ठ बोले - हे राम ! पूर्व में जैसे उद्दालक भूतों के समूह को । विचार करके परम पद को प्राप्त हुआ है । सो तुम सुनो । हे राम ! जगत रूपी जीर्ण घर के । वायव्य कोण में एक देश है । जो पर्वत और तमालादि वृक्षों से पूर्ण है । और महा मणियों का स्थान है । उस स्थान में उद्दालक नाम एक बुद्धिमान ब्राह्मण मान करने के योग्य विद्यमान था । परन्तु अर्ध प्रबुद्ध था । क्योंकि परम पद को उसने न पाया था । वह ब्राह्मण यौवन अवस्था के पूर्व ही शुभेच्छा से शास्त्रोंक्त यम । नियम । और तप को साधने लगा । तब उसके चित्त में यह विचार उत्पन्न हुआ कि - हे देव ! जिसके पाने से । फिर कुछ पाने योग्य न रहे । जिस पद में विश्राम पाने से । फिर शोक न हो । और जिसके पाने से । फिर बन्धन न रहे । ऐसा पद मुझको कब प्राप्त होगा ? कब मैं मन के मनन भाव को त्याग कर । विश्रान्ति मान होऊँगा । जैसे मेघ भृम ने को त्याग कर । पहाड़ के शिखर में विश्रान्ति करता है । और कब चित्त की दृश्य रूप वासना मिटेगी । जैसे तरंग से रहित समुद्र शान्त मान होता है । वैसे ही कब मैं । मन के संकल्प विकल्प से रहित । शान्ति मान होऊँगा ? तृष्णा रूपी नदी को बोध रूपी बेड़ी और संत संग और सत शास्त्र रूपी मल्लाह से कब तरूँगा ? चित्त रूपी हाथी । जो अभिमान रूपी मद से । उन्मत्त है । उसको विवेक रूपी अंकुश से । कब मारूँगा  और ज्ञान रूपी सूर्य से । अज्ञान रूपी अन्धकार । कब नष्ट करूँगा ? हे देव ! सब आरम्भों को त्याग कर ।  मैं अलेप और अकर्ता । कब होऊँगा ? जैसे जल में कमल अलेप रहता है । वैसे ही मुझको । कर्म कब स्पर्श न करेंगे ? मेरा परमार्थ रूपी भास्कर वपु कब उदय होगा ? जिससे मैं जगत की गति को देखकर हँसूँगा । हृदय में सन्तोष पाऊँगा । और पूर्ण बोध विराट आत्मा की तरह होऊँगा ? वह समय कब होगा कि - मुझ जन्मों के अन्धे को । ज्ञान रूपी नेत्र । प्राप्त होगा ।

जिससे मैं परम बोध पद को देखूँगा ? वह समय कब होगा ? जब मेरा चित्त रूपी मेघ । वासना रूपी वायु से रहित । आत्म रूपी सुमेरु पर्वत में । स्थित होकर शान्त मान होगा ? अज्ञान दशा । कब जावेगी ? और ज्ञान दशा । कब प्राप्त होगी ? अब वह समय कब होगा कि - मन और काया और प्रकृति को देख कर हँसूँगा ? वह समय कब होगा ? जब जगत के कर्मों को बालक की चेष्टावत मिथ्या जानूँगा । और जगत मुझको सुषुप्ति की तरह हो जावेगा । वह समय कब होगा ? जब मुझको पत्थर की शिला वत निर्विकल्प समाधि लगेगी । और शरीर रूपी वृक्ष में पक्षी आलय करेंगे । और निसंग होकर छाती पर आ बैठेंगे ? हे देव ! वह समय कब होगा ? जब इष्ट अनिष्ट विषय की प्राप्ति से मेरे चित्त की वृत्ति चलायमान न होगी । और विराट की तरह सर्वात्मा होऊँगा ? वह समय कब होगा ? जब मेरा सम असम आकार शान्त हो जावेगा । और सब अर्थों से निरिच्छित रूप मैं हो जाऊँगा ? कब मैं उप शम को प्राप्त होऊँगा । जैसे मन्दराचल से रहित क्षीर समुद्र शान्ति मान होता है । और कब मैं अपना चेतन वपु पाकर शरीर को अशरीर वत देखूँगा ? कब मेरी पूर्ण चिन्मात्र वृत्ति होगी । और कब मेरे भीतर बाहर की सब कलना शान्त हो जावेगी । और सम्पूर्ण चिन्मात्र ही का मुझे भान होगा ? मैं गृहण त्याग से रहित कब संतोष पाऊँगा ? और अपने स्व प्रकाश में स्थित होकर संसार रूपी नदी के जरा मरण रूपी तरंगों से कब रहित होऊँगा ? और अपने स्वभाव में कब स्थित होऊँगा ?
हे राम ! ऐसे विचार कर उद्दालक चित्त को ध्यान में लगाने लगा । परन्तु चित्त रूपी वानर दृश्य की ओर निकल जाये । पर स्थित न हो । तब वह फिर ध्यान में लगावे । और फिर वह भोगों की ओर निकल जावे । जैसे वानर नहीं ठहरता । वैसे ही चित्त न ठहरे । जब उसने बाहर विषयों को त्याग कर । चित्त को अन्तर्मुख किया । तब

भीतर जो दृष्टि आई । तो भी विषयों को चिन्तने लगा । निर्विकल्प न हुआ । और जब रोक रखे । तब सुषुप्ति में लीन हो जावे । सुषुप्ति और लय । जो निद्रा है । उस ही में चित्त रहे । तब वह वहाँ से उठकर और स्थान को चला । जैसे सूर्य सुमेरु की प्रदक्षिणा को चलाता है । और गन्धमादन पर्वत की एक कन्दरा में स्थित हुआ । जो फूलों से संयुक्त । सुन्दर । और पशु पक्षी मृगों से रहित । एकान्त स्थान था । और जो देवता को भी देखना कठिन था । वहाँ अत्यन्त प्रकाश भी न था । और अत्यन्त तम भी न था । न अत्यन्त उष्ण था । और न शीत । जैसे मधुर कार्तिक मास होता है । वैसे ही वह निर्भय एकान्त स्थान था । जैसे मोक्ष पदवी निर्भय एकान्त रूप होती है । वैसे ही उस पर्वत में कुटी बना । और उस कुटी में तमाल पर । और कमलों का आसन कर । और ऊपर मृग छाला बिछाकर वह बैठा । और सब कामना का त्याग किया । जैसे बृह्मा जगत को उपजा कर छोड़ बैठे । वैसे ही वह सब कलना को त्याग बैठा । और विचार करने लगा - अरे मूर्ख मन ! तू कहाँ जाता है । यह संसार माया मात्र है । और इतने काल तू जगत में भटकता रहा । पर कहीं तुझको शान्ति न हुई । वृथा धावता रहा । हे मूर्ख मन ! उप शम को त्याग कर । भोगों की ओर धावता है । सो अमृत को त्याग कर विष का बीज बोता है । यह सब तेरी चेष्टा दुखों के निमित्त है । जैसे कुशवारी अपना घर बनाकर । आप ही को बन्धन करती है । वैसे ही तू भी आपको आप संकल्प उठाकर बन्धन करता है । अब तू संकल्प के संसरने को त्याग कर आत्म पद में स्थित हो कि तुझको शान्ति हो । हे मन जिह्वा के साथ मिल कर । जो तू शब्द करता है । वह दादुर के शब्द वत व्यर्थ है । कानों के साथ मिल कर सुनता है । तब शुभ अशुभ वाक्य गृहण करके मृग की तरह नष्ट होता है । त्वचा के साथ मिल कर । जो तू स्पर्श की इच्छा करता है । सो हाथी की तरह नष्ट होता है । रसना के स्वाद की

इच्छा से । मछली की तरह नष्ट होता है । और गन्ध लेने की इच्छा से । भँवरे की तरह नष्ट हो जावेगा । जैसे भँवरा सुगन्ध के निमित्त फूल में फँस मरता है । वैसे ही तू फँस कर मरेगा । और सुन्दर स्त्रियों की वाच्छा से । पतंग की तरह जल मरेगा । हे मूर्ख मन ! जो एक इन्द्रिय का भी स्वाद लेते हैं । वे नष्ट होते हैं । तू तो पंच 5 विषय का सेवने वाला है । क्या तेरा नाश न होगा । इससे तू इनकी इच्छा त्याग कि तुझको शान्ति हो । जो इन भोगों की इच्छा न त्यागेगा । तो मैं ही तुझको त्यागूँगा । तू तो मिथ्या असत्य रूप है । तुझको मेरा क्या प्रयोजन है । विचार कर मैं तेरा त्याग करता हूँ । हे मूर्ख मन ! जो तू देह में । अहं अहं करता है । सो तेरा अहं किस अर्थ का है । अंगुष्ठ से लेकर मस्तक पर्यन्त । अहं वस्तु कुछ नहीं । यह शरीर तो अस्थि । माँस । और रक्त का थैला है । यह तो अहं रूप नहीं । और पोल आकाश रूप है । यह पंच 5 तत्वों का जो शरीर बना है । उसमें अहं रूप वस्तु तो कुछ नहीं है । हे मूर्ख मन ! तू अहं अहं क्यों करता है ? यह जो तू कहता है कि - मैं देखता हूँ । मैं सुनता हूँ । मैं सूँघता हूँ । मैं स्पर्श करता हूँ । मैं स्वाद लेता हूँ । और इनके इष्ट अनिष्ट में राग द्वेष से जलता है । सो वृथा कष्ट पाता है । रूप को नेत्र गृहण करते हैं । नेत्र रूप से उत्पन्न हुए हैं । और तेज का अंश उनमें स्थित है । जो अपने विषय को गृहण करता है । इसके साथ मिलकर तू क्यों तपायमान होता है ? शब्द - आकाश में उत्पन्न हुआ है । और आकाश का अंश श्रवण में स्थित है । जो अपने गुण शब्द को ग्रहण करता है । इसके साथ मिलकर तू क्यों राग द्वेष कर तपायमान होता है ? स्पर्श इन्द्रिय - वायु से उत्पन्न हुई है । और वायु का अंश त्वचा में स्थित है । वही स्पर्श को गृहण करता है । उससे मिलकर तू क्यों राग द्वेष से तपायमान होता है ? रसना इन्द्रिय - जल से उत्पन्न हुई है । और जल का अंश जिह्वा है । जो अग्रभाग में स्थित 


है । वही रस गृहण करती है । इससे मिलकर । तू क्यों वृथा तपाय मान होता है ? और घ्राण इन्द्रिय - गन्ध से उपजी है । और पृथ्वी का अंश घ्राण में स्थित है । वही गन्ध को गृहण करती है । उसमें मिलकर तू क्यों वृथा राग द्वेष वान होता है ? मूर्ख मन ! इन्द्रियाँ तो अपने अपने विषय को गृहण करती हैं । पर तू इनमें अभिमान करता है कि - मैं देखता हूँ । मैं सुनता हूँ । मैं सूँघता हूँ । मैं स्पर्श करता हूँ । और रस लेता हूँ । यह इन्द्रियाँ तो सब आत्म भर हैं । अर्थात अपने विषय को गृहण करती हैं । और के विषय को गृहण नहीं करती कि - नेत्र देखते हैं । श्रवण नहीं करते । और कान सुनते हैं । देखते नहीं इत्यादि । सब इन्द्रियाँ अपना धर्म किसी को देती भी नहीं । और न किसी का लेती हैं । वे अपने धर्म में स्थित हैं । और विषय को गृहण कर इनको राग द्वेष कुछ नहीं होता । इनको गृहण करने की वासना भी कुछ नहीं होती । और तू ऐसा मूर्ख है कि - औरों के धर्म आप में मान कर राग द्वेष से जलता है । जो तू भी राग द्वेष से रहित होकर चेष्टा करे । तो तुझको दुख कुछ न हो । जो वासना सहित कर्म करता है । वह बन्धन का कारण होता है । वासना बिना कुछ दुख नहीं होता । तू मूर्ख है । जो विचार कर नहीं देखता । इससे मैं तुझको त्याग करता हूँ । तेरे साथ मिल कर मैं बड़े खेद पाता हूँ । जैसे भेड़िये के बालक को । सिंह चूर्ण करता है । वैसे ही । तूने मुझको चूर्ण किया है । तेरे साथ मिलकर मैं तुच्छ हुआ हूँ । अब तेरे साथ मेरा प्रयोजन कुछ नहीं । मैं तो निर्विकल्प शुद्ध चिदानन्द हूँ । जैसे महा आकाश घट से मिल कर घटा आकाश होता है । वैसे ही तेरे साथ मिलकर मैं तुच्छ हो गया हूँ । इस कारण मैं तेरा संग त्याग कर परम चिदाकाश को प्राप्त होऊँगा । मैं निर्विकार हूँ । और अहं त्वं की कल्पना से रहित हूँ । तू क्यों अहं त्वं करता है ? शरीर में व्यर्थ अहं करने वाला । और कोई नहीं । तू ही चोर है । अब मैंने तुझको पकड़ कर त्याग दिया है । तू तो अज्ञान से उपजा मिथ्या और असत्य रूप है । जैसे बालक अपनी परछाईं में वेताल जान कर । आप भय पाता है । वैसे ही तूने सबको दुखी किया है । जब तेरा नाश होगा । तब आनन्द होगा । तेरे

उपजने से महा दुख है । जैसे कोई ऊँचे पर्वत से गिर कर कूप में जा पड़े । और कष्ट वान हो । वैसे ही तेरे संग से । मैं आत्म पद से गिरा । देह अभिमान रूपी गढ़े में । राग द्वेष रूपी दुख पाता था । पर अब तुझको त्याग कर । मैं निर अहंकार पद को प्राप्त हुआ हूँ । वह पद । न प्रकाश है । न एक है । न दो है । न बड़ा है । और न छोटा है । अहं त्वं आदि से रहित । अचैत्य चिन्मात्र है । जरा । मृत्यु । राग । द्वेष । और भय । सब तेरे संयोग से होते हैं । अब तेरे वियोग से मैं निर्विकार शुद्ध पद को प्राप्त होता हूँ । हे मन ! तेरा होना दुख का कारण है । जब तू निर्वाण हो जावेगा । तब मैं बृह्म रूप होऊँगा । तेरे संग से मैं तुच्छ हुआ हूँ । जब तू निवृत्त होगा । तब मैं शुद्ध होऊँगा । जैसे मेघ और कुहरे के होने से आकाश मलीन भासता है । पर जब वर्षा हो जाती है । तब शुद्ध और निर्मल हो रहता है । वैसे ही तेरे निवृत्त हुए निर्लेप अपना आप आत्मा भासता है । हे चित्त ! ये जो देह इन्द्रिय आदि पदार्थ हैं । सो भिन्न हैं । इनमें अहं वस्तु कुछ नहीं । इनको एक तूने ही इकट्ठी किया है । जैसे एक तागा । अनेक मणियों को इकट्ठा करता है । वैसे ही सबको इकट्ठा करके तू अहं अहं करता है । तू मिथ्या राग द्वेष करता है । इससे तू शीघ्र ही सब इन्द्रियों को लेकर निर्वाण हो । जिससे तेरी जय हो ।

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