शनिवार, अगस्त 13, 2011

यह बृह्म योनि है और मैं उसमें गर्भ देता हूँ - श्रीमदभगवद गीता अध्याय 14

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः । 14-1
श्रीकृष्ण बोले - हे अर्जुन ! मैं फिर से तुम्हें वह बताता हूँ । जो सभी ज्ञानों में से उत्तम ज्ञान है । इसे जानकर सभी मुनि परम सिद्धि को प्राप्त हुये हैं ।
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च । 14-2
इस ज्ञान का आश्रय ले । जो मेरी स्थित को प्राप्त कर चुके हैं । वे सर्ग के समय फिर जन्म नहीं लेते । और न ही प्रलय में व्यथित होते हैं ।
मम योनिर्महदबृह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम । संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत । 14-3
हे भारत ! यह महद बृह्म ( मूल प्रकृति ) योनि है । और मैं उसमें गर्भ देता हूँ । इससे ही सभी जीवों का जन्म होता है । हे भारत !
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः । तासां बृह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता । 14-4
हे कौन्तेय ! सभी योनियों में जो भी जीव पैदा होते हैं । उनकी महद बृह्म तो योनि है ( कोख है ) और मैं बीज देने वाला पिता हूँ ।
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम । 14-5
हे महाबाहो ! सत रज और तम  प्रकृति से उत्पन्न होने वाले यह 3 गुण अविकारी अव्यय आत्मा को देह में बाँधते हैं ।
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम । सुखसङगेन बध्नाति ज्ञानसङगेन चानघ । 14-6
हे अनघ ! ( पापरहित ) उनमें से सत निर्मल और प्रकाशमयी । पीडा रहित होने के कारण सुख के संग और ज्ञान द्वारा आत्मा को बाँधता है ।
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङगसमुदभवम । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम । 14-7
तृष्णा ( भूख । इच्छा ) और आसक्ति से उत्पन्न रज गुण को तुम रागात्मक जानो । यह देह ( आत्मा ) को कर्म के प्रति आसक्ति से बाँधता है । हे कौन्तेय !
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत । 14-8
तम को लेकिन तुम अज्ञान से उत्पन्न हुआ जानो । जो सभी देहवासियों को मोहित करता है । हे भारत ! वह प्रमाद । आलस्य और निद्रा द्वारा आत्मा को बाँधता है ।
सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत  । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत । 14-9
सत सुख को जन्म देता है । रज गुण कर्मों ( कार्यों ) को । हे भारत ! लेकिन तम गुण ज्ञान को ढककर प्रमाद ( अज्ञानता । मूर्खता ) को जन्म देता है ।
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा । 14-10
हे भारत ! रजगुण और तमगुण को दबाकर सत बढता है । सत और तमगुण को दबाकर रजगुण बढता है । और रज और सत को दबाकर तमगुण बढता है ।
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत । 14-11
जब देह के सभी द्वारों में प्रकाश उत्पन्न होता है । और ज्ञान बढता है । तो जानना चाहिये कि सत गुण बढा हुआ है ।
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ । 14-12
हे भरतर्षभ ! जब रजगुण की वृद्धि होती है । तो लोभ प्रवृत्ति और उद्वेग से कर्मों का आरम्भ । स्पृहा ( अशान्ति ) होते हैं ।
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन । 14-13
हे कुरुनन्दन। तमगुण के बढने पर अप्रकाश । अप्रवृत्ति ( न करने की इच्छा ) प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं ।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते । 14-14
जब देहभृत सत के बढे होते हुये मृत्यु को प्राप्त होता है । तब वह उत्तम ज्ञानमंद लोगों के अमल ( स्वच्छ ) लोकों को जाता है ।
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते । 14-15
रजगुण की बढोती में जब जीव मृत्यु को प्राप्त होता है । तो वह कर्मों से आसक्त जीवों के बीच जन्म लेता है  । तथा तमगुण की वृद्धि में जब मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है । तो वह मूढ योनियों में जन्म लेता है ।
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम । 14-16
सात्विक ( सत गुण में आधारित ) अच्छे कर्मों का फल भी निर्मल बताया जाता है । राजसिक कर्मों का फल लेकिन दुख ही कहा जाता है । और तामसिक कर्मों का फल अज्ञान ही है ।
सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च । 14-17
सत ज्ञान को जन्म देता है । रज गुण लोभ को । तम गुण प्रमाद । मोह और अज्ञान उत्पन्न करता है ।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः । 14-18
सत में स्थित प्राणी ऊपर उठते हैं । रजगुण में स्थित लोग मध्य में ही रहते हैं ( अर्थात न उनका पतन होता है । न उन्नति ) लेकिन तामसिक जघन्य गुण की वृत्ति में स्थित होने के कारण ( निंदनीय तमगुण में स्थित होने के कारण ) नीचे को गिरते हैं ( उनका पतन होता है )।
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा दृष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मदाभवं सोऽधिगच्छति । 14-19
जब मनुष्य गुणों के अतिरिक्त और किसी को भी कर्ता नहीं देखता समझता ( स्वयं और दूसरों को भी अकर्ता देखता है ) केवल गुणों को ही कर्ता देखता है । और स्वयं को गुणों से ऊपर ( परे ) जानता है । तब वह मेरे भाव को प्राप्त करता है ।
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्वभवान । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते । 14-20
इन 3 गुणों को । जो देह की उत्पत्ति का कारण हैं । लाँघ कर देही । अर्थात आत्मा । जन्म । मृत्यु और जरा आदि दुखों से विमुक्त हो अमृत का अनुभव करता है ।
कैर्लिङगेस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते । 14-21
अर्जुन बोले - हे प्रभो ! इन 3 गुणों से अतीत हुये मनुष्य के क्या लक्षण होते हैं ? उसका क्या आचरण होता है ? वह 3 गुणों से कैसे पार होता है ?
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङक्षति । 14-22
श्रीकृष्ण बोले - हे पाण्डव ! 3 गुणों से । ऊपर उठा महात्मा । न प्रकाश ( ज्ञान )  न प्रवृत्ति ( रजगुण)  न ही । मोह ( तमगुण ) के बहुत बढने पर । उनसे द्वेष करता है । और न ही । लोप हो जाने पर । उनकी इच्छा करता है ।
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते । 14-23
जो इस धारणा में स्थित रहता है कि गुण ही आपस में । बरत रहे हैं । और इसलिये उदासीन ( जिसे कोई मतलब न हो )  की तरह । गुणों से । विचलित नहीं होता । न ही उनसे कोई । चेष्ठा करता है ।
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः । 14-24
सुख और दुख में 1 सा । अपने आप में ही स्थित । जो मिट्टी । पत्थर । और सोने को 1 सा देखता है । जो प्रिय और अप्रिय की । 1 सी तुलना करता है । जो धीर मनुष्य । निंदा और आत्म संस्तुति ( प्रशंसा ) को । 1 सा देखता है ।
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते । 14-25
जो मान और अपमान को । 1 सा ही तोलता है ( बराबर समझता है ) मित्र और विपक्षी को भी । बराबर देखता है । सभी आरम्भों का । त्याग करने वाला है । ऐसे महात्मा को । गुणातीत ( गुणों के अतीत ) कहा जाता है ।
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्बृह्मभूयाय कल्पते । 14-26
और जो मेरी । अव्यभिचारी भक्ति करता है । वह इन गुणों को लाँघ कर । बृह्म की प्राप्ति करने का । पात्र हो जाता है ।
बृह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च । 14-27
क्योंकि मैं ही बृह्म का । अमृतता का ( अमरता का )  अव्ययता का । शाश्वतता का । धर्म का । सुख का । और एकान्तिक सिद्धि का । आधार हूँ ( वे मुझमें ही स्थापित हैं )

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