सोमवार, अगस्त 09, 2010

संसार में कोई सुखी नहीं है ।

अपनी अग्यानता के कारण ही जीव ( सभी योनियां ) इस संसार में पैदा होता है । सभी प्रकार के दुखों से युक्त और मलिन ( मैला ) इस असार संसार में अनेक प्रकार के शरीरों में प्रविष्ट जीवात्माओं की अनन्तराशियां हैं । जो इसी संसार में जन्म लेते हैं । इसी में मर जाते हैं । किन्तु उनका अन्त नहीं होता । और वे दुख से सदैव व्याकुल रहते हैं । इस संसार में कोई सुखी नहीं है । इस जगत से परे । पारब्रह्मस्वरूप । निरवयव । सर्वग्य । सर्वकर्ता । सर्वेश । निर्मल । अद्वय तत्व । स्वयं प्रकाश । आदि अन्त से रहित । विकारशून्य । परात्पर । निर्गुण । सच्चिदानन्द शिव हैं । ये जीव उन्हीं का
अंश है । जो अनादि अविध्या से वैसे ही आच्छादित हैं । जैसे अग्नि में विस्फ़ुल्लिंग होते हैं । अनादि कर्मों के प्रभाव से प्राप्त शरीर आदि अनेकों उपाधियों में होने के कारण भिन्न भिन्न हो गये हैं । सुख दुख देने वाले पुन्य और पाप संग्रह का इस शरीर पर नियन्त्रण है । अपने कर्म के अनुसार ही जीव को जाति देह ( योनि ) आयु तथा भोग की प्राप्ति होती है । सूक्ष्म या लिंग शरीर के बने रहने तक ये जन्म मरण का । आवागमन का चक्र चलता ही रहता है । स्थावर ( पेड पौधे । पहाड आदि ) कृमि कीट । पशु पक्षी । मनुष्य । धार्मिक देवता और मुमुक्ष । यथाक्रम चार प्रकार के शरीरों को धारणकर हजारों बार उनका परित्याग करते हैं । यदि पुन्य कर्म के प्रभाव से उनमें से किसी को मानव योनि मिल जाय तो उसे ग्यानमार्ग अपनाकर मोक्ष प्राप्त करना चाहिये । समस्त चौरासी लाख योनियों में स्थित जीवात्माओं को इसी एक मात्र मानव योनि में तत्वग्यान का लाभ होकर मोक्ष मिल सकता है । इस मृत्युलोक में हजारों नहीं बल्कि करोडों बार जन्म लेने पर जीव को कभी कभी ही पूर्व संचित पुन्य के प्रभाव से मानव योनि प्राप्त होती है । यह मानव योनि मोक्ष की सीडी है । इस देवताओं को भी दुर्लभ योनि को प्राप्त कर जो प्राणी स्वयं अपना उद्धार नहीं करता । उससे बडकर पापी कोई नहीं हो सकता । अन्य योनियों की अपेक्षा सुन्दर इन्द्रियों वाले इस जन्म का लाभ लेकर जो मनुष्य आत्मा का हित नहीं सोचता । वह आत्मघाती के समान है । कोई भी पुरुषार्थ शरीर के बिना सम्भव नहीं है । इसलिये शरीर रूपी धन की जतन से रक्षा करते हुये पुन्य कर्म और ग्यान लाभ करना चाहिये । आत्मा ही सबका पात्र है । इसलिये उसकी रक्षा में मनुष्य हमेशा तत्पर रहे । जो व्यक्ति आजीवन आत्मा के प्रति सचेष्ट रहता है । वह जीवित ही । इसी जन्म में अपना कल्याण होते देखता है । मनुष्य को ग्राम क्षेत्र धन घर शुभ अशुभ कर्म और शरीर बार बार प्राप्त नहीं होते । अतः विद्वान ये जानकर जतन से शरीर की रक्षा करते हैं । कोढ आदि जैसे महा भयंकर रोग हो जाने पर भी मनुष्य इस शरीर को नही छोडना चाहता । नाम जपत ( ढाई अक्षर का महामन्त्र ) कोढी भला । कंचन भली न देह ) इसलिये शरीर की रक्षा धर्म के लिये । धर्म की रक्षा ग्यान के लिये । और ग्यान की रक्षा ध्यान योग के लिये । ध्यान योग की रक्षा तत्काल इसी जीवन में मुक्ति प्राप्त हेतु जतन से करनी चाहिये । यदि आत्मा ही अहितकारी कर्म से अपने को दूर करने में समर्थ नहीं हो सकता । तो अन्य दूसरा कौन हितकारी है ? जो आत्मा को सुख प्रदान करेगा ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
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